पराबैंगनी किरण ओजोन परत को किस तरह प्रभावित कर रही है?

Sansar LochanClimate Change, Environment and Biodiversity4 Comments

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ओजोन ऑक्सीजन के तीन अणुओं से बनी जीवन रक्षक गैस है, जो पृथ्वी को एक नाजुक परदे की तरह लपेटे हुए है. यह ओजोन परत पृथ्वी की तथा इसमें रहने वालों की सूर्य की घातक पराबैंगनी किरणों से रक्षा कर रही है. आज हम इसी टॉपिक पर बात करने वाले हैं कि पराबैंगनी किरणें (ultraviolet rays) किस प्रकार ओजोन परत (Ozone Layer) को प्रभावित कर रही हैं और ओजोन परत को बचाने के लिए अभी तक हमारे द्वारा क्या-क्या कदम उठाये गए हैं?

ओजोन परत (Ozone layer)

ओजोन गैस पूरे पृथ्वी के ऊपर एक परत के रूप में छाया रहता है और क्षतिकारक UV किरणों के विकिरण को धरातल पर रहने वाले प्राणियों तक पहुँचने से रोकता है. इस परत को ओजोन परत कहते हैं. यह परत मुख्य रूप से समताप मंडल में होती है.

इसे जीवन सहायक इसलिए माना जाता है कि इसमें कम तरंग दैर्ध्य (wave length) का प्रकाश, जो कि 300 नैनोमीटर से कम हो, को अपने में अवशोषित करने की विलक्षण क्षमता है. जहाँ पर वातावरण में ओजोन उपस्थित नहीं होगी, वहाँ सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणें (UV rays) पृथ्वी पर पहुँचने लगेंगी. ये किरणें मनुष्य के साथ-साथ जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के लिए भी बहुत खतरनाक है. ओजोन पृथ्वी से 60 किलोमीटर की ऊँचाई पर पाई जाती है. वायुमंडल का यह क्षेत्र स्ट्रेटोस्फीयर (stratosphere) कहलाता है. ध्रुवों के ऊपर इसकी परत की मोटाई 8 km है और विषुवत् रेखा (equator line) के ऊपर इसकी मोटाई 17 km है.

पराबैंगनी किरण vs ओजोन परत

जब पराबैंगनी किरणें (UV light) ऑक्सीजन के एक अणु पर प्रहार करती हैं तो फोटोन उस  अणु को दो अत्यधिक क्रियाशील भागों में विभक्त कर देता है. ये भाग जल्दी से ऑक्सीजन के एक सम्पूर्ण अणु से क्रिया करके ओजोन की रचना करते हैं. इसलिए हम कह सकते हैं कि ओजोन की रचना ऑक्सीजन के प्रकाश-रासायनिक परिवर्तन से होती है, तथा यह क्रिया जितनी अधिक तीव्रता से होगी उतनी ही अधिक मात्र में ओजोन गैस (ozone gas) का निर्माण होगा. परन्तु बहुत से रसायन जो हमारे उद्योगों के फलस्वरूप प्राप्त होते हैं, ओजोन बनाने की क्रिया को शिथिल कर देते हैं. इनमें क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) तथा नाइट्रस ऑक्साइड सहित वे सभी गैसें हैं जिनमें क्लोरीन,  ब्रोमीन और फ्लोरीन विद्यमान होती हैं. क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) ओजोन परत को क्षति पहुँचाती है.

क्लोरोफ्लूरो कार्बन (CFC) एक यौगिक गैस है जिसमें क्लोरीन, फ्लोरीन और कार्बन के तत्त्व होते हैं.

ओजोन छिद्र (Ozone Hole)

ओजोन छिद्र उस ओजोन परत के उस भाग को कहते हैं जहाँ वह परत झीनी पड़ गई है. हम अक्सर अखबारों में, न्यूज में ओजोन छिद्र अथवा ओजोन की चादर का झीना हो जाने के बारे में पढ़ते हैं. वैज्ञानिक परीक्षणों से पता चला है कि पिछले 20 वर्षों में आर्कटिक (उत्तरी ध्रुव प्रदेश) और अंटार्कटिक (दक्षिणी ध्रुव प्रदेश) से इस सुरक्षा-कवच की मोटाई में कमी पाई गई है. दरअसल, यही धीरे-धीरे बढ़ता झीनापन हमें आने वाले खतरे की चेतावनी दे रहा है. अगर ओजोन की यह चादर और पतली हो गई तो धरती में गर्मी बढ़ेगी और पराबैंगनी किरण (ultraviolet rays/UV) समस्त प्राणियों और वनस्पतियों को मुश्किल में डाल देगी. ध्रुवों की बर्फ पिघल जाएगी, जिसके चलते समुद्र के पानी का स्तर ऊपर आएगा और फलतः तटवर्ती क्षेत्र बाढ़ की चपेट में आ जायेंगे.




पराबैंगनी किरणों (Ultraviolet Rays) के घातक प्रभाव

पराबैंगनी किरणें (ultraviolet/UV rays)घातक बीमारियों के लिए भी कसूरवार हैं, जैसे:-

  1. शरीर की त्वचा का काला पड़ते जाना
  2. आँख की रोशनी का प्रभावित होना
  3. चर्म कैंसर
  4. शरीर में झुर्रियों का पड़ना
  5. समय से पहले बुढ़ापे का आना

ये किरणें पौधों की वृद्धि पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती हैं. जैसे- प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की क्रिया को कम कर देती हैं. इन किरणों के चलते पौधों और फसलों में बीजों का अंकुरण (seed germination) देर से होता है. लोग ऐसा अनुमान लगाते हैं कि ओजोन की परत (ozone layer) को होने वाली क्षति से जलीय पारिस्थितिकी, विशेष रूप से मछलियाँ, प्रभावित होगी.

हमारे सामने चुनौती

CFC यौगिकों का घरेलू और औद्योगिकों क्षेत्रों में इतना ज्यादा प्रयोग हो रहा है कि उनकी जगह दूसरे रसायन को इस्तेमाल करना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है. अभी तक कोई विकल्प नहीं खोजा जा सका है. इन यौगिकों का प्रयोग वातानुकूलन उपकरणों में, पैकेजिंग उद्योग में, इलेक्ट्रॉनिक उद्योग में, बिजली पैदा करने में, आग को बुझाने के उपकरणों में होता है. CFC विकल्प खोजते समय हमें यह बात दिमाग में रखनी होगी कि जिस तरह CFC यौगिकों में आग नहीं लग सकती, कोई विष नहीं फैल सकता और किसी दूसरे रसायन से वे क्रिया भी नहीं करते – – ये खूबियाँ उसके वैकल्पिक यौगिकों में भी होनी चाहिएँ. इसके साथ ही वैकल्पिक यौगिकों में ओजोन में कमी लाने का दुर्गुण या तो बिल्कुल नहीं या न के बराबर होना चाहिए.

CFC का विकल्प

अनुसंधानों से पता चला है कि ओजोन की परत (ozone layer) नष्ट करने में दो बातें मुख्य रूप से असर डालती हैं-

  • यौगिक में मौजूद क्लोरिन का अनुपात
  • वायुमंडल में तरल यौगिक के सक्रिय बने रहने का समय

इस आधार पर जो मूल CFC खोजे गए थे उनका ओजोन विनाशक अंक एक (1) था और आग बुझाने वाले उपकरणों में विद्यमान CFC में 3 से 10 था. इस आधार पर ऐसे यौगिक खोजे जा रहे हैं जो वायुमंडल में बहुत तेजी से फैल जाएँ और ज्यादा देर तक टिके रहें.

ऐसे यौगिकों की खोज करते हुए वैज्ञानिक हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC) यौगिकों तक पहुँचे. ये टिकाऊ हैं और वायुमंडल की ऊपरी सतह तक पहुँचते-पहुँचते लगभग इनका विनाश हो जाता है. पर्यावरण की दृष्टि से यदि देखें तो CFC यौगिकों की अपेक्षा HFC यौगिक अधिक स्वीकार्य हैं इनका ओजोन विनाशक अंक शून्य से 0.05 तक है जो CFC की तुलना में बहुत कम है. लेकिन अभी नए HFC यौगिकों पर ज्यादा खोज नहीं हुई है. इस विषय में बहुत कम आँकड़े उपलब्ध हैं और इनकी सत्यता के बारे में शकाएँ उठाई गई हैं.

परन्तु जब तक हम सुरक्षित रसायनों और नई तकनीकों को पूरी तरह से विकसित न कर लें तब तक हमारा कर्तव्य है कि हम पृथ्वी के जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की सुरक्षा के लिए ऐसे रसायनों का प्रयोग कम करें जो ओजोन के सुरक्षा कवच को कमजोर बना रहे हैं.

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