गाँधी-इरविन समझौता (5 मार्च, 1931) के बारे में जानें

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लंदन में आयोजित प्रथम गोलमेज सम्मेलन  की असफलता और असहयोग आन्दोलन की व्यापकता ने सरकार के सामने यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस और गाँधी के बिना भारत की राजनीतिक समस्या का समाधान आसान नहीं है. इसलिए लॉर्ड इरविन ने मध्यस्थता द्वारा गाँधीजी से समझौते की बातचीत प्रारम्भ कर दी. गाँधीजी 26 जनवरी, 1931 को जेल से रिहा कर दिए गये. 17 फ़रवरी से दिल्ली में इरविन और गाँधी जी के बीच वार्ता चलने लगी. 5 मार्च, 1931 को गाँधी-इरविन समझौते (दिल्ली पैक्ट)/ Gandhi-Irwin Pact के मसविदे पर हस्ताक्षर किये गये.

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यदि आपने प्रथम गोलमेज सम्मेलन और असहयोग आन्दोलन के विषय में नहीं पढ़ा तो नीचे पढ़ लें –

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गाँधी-इरविन पैक्ट (दिल्ली पैक्ट)/ Gandhi-Irwin Pact

गाँधी-इरविन समझौते के अनुसार सरकार ने निम्नलिखित वायदे किये –

  1. सरकार सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा कर देगी.
  2. जिन लोगों की संपत्ति आंदोलन के दौरान जब्त की गई थी, उसे वापस कर दिया जाएगा .
  3. सरकार दमन बंद कर आंदोलन के दौरान जारी किए गए सभी अध्यादेशों और उनसे संबंधित मुकदमों को वापस ले लेगी.
  4. भारतीयों को नमक बनाने की छूट दी जाएगी.
  5. जिन लोगों ने आंदोलन के दौरान सरकारी नौकरियों से त्याग-पत्र दे दिया था, उन्हें सरकार पुनः वापस लेने का विचार करेगी.

इन आश्वासनों के बदले गाँधीजी सविनय अवज्ञा आंदोलन बंद कर लेने, दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने, पुलिस अत्याचारों की जाँच-पड़ताल नहीं करवाने, ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार नहीं करने और बहिष्कार की नीति को त्यागने पर सहमत हो गए.

गाँधी-इरविन समझौते प्रतिक्रियाएँ

गाँधी-इरविन समझौते पर भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएँ हुईं.

  1. “काँग्रेस की स्वतंत्रता का प्रस्ताव और 26 जनवरी का वायदा, दोनों की समझौते की बातचीत के दौरान उपेक्षा की गई. इससे नेहरू और दूसरे वामपंथी नेता बहुत दुःखी हुए.” सरकार ने किसी भी महत्त्वपूर्ण माँग को स्वीकार नहीं किया, यहाँ तक कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फाँसी की सजा को कारावास में भी नहीं बदला.
  2. 23 मार्च को इन तीनों वीरों को जेल में फाँसी पर लटका दिया गया. इसका तीव्र विरोध हुआ.
  3. केंद्रीय विधानसभा में विपक्ष के नेता सर अब्दुर रहीम तथा स्वतंत्र दल के उपाध्यक्ष कावसजी जहाँगीर ने विरोध प्रकट करने के लिए सभा से बहिर्गमन किया .
  4. दुःखी और क्षुब्ध जवाहरलाल ने घोषणा की, “भगत सिंह का शव हमारे और इंग्लैंड के बीच खड़ा रहेगा.”
  5. गाँधी और काँग्रेस की इससे कटु आलोचना हुई. श्री अयोध्या सिंह समझौते पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखते हैं, “पूर्ण स्वाधीनता या डोमिनियन स्टेट्स / (अधिराज्य) की बात जाने दीजिए; न तो लगान कम किया गया, न कोई टैक्स, न नमक पर सरकार की इजारेदारी हटाई गई, सिर्फ बुजुर्आ वर्ग को नाममात्र के लिए एक-दो सुविधाएँ दी गई. बस इसी पर सारा जन-आंदोलन उस वक्त बंद कर दिया गया, जब वह चरम सीमा पर पहुँच रहा था और क्रांतिकारी रूप ले रहा था. एक बार फिर बुर्जुआ वर्ग के स्वार्थ के लिए सारे देश के स्वार्थ की बलि दे दी गई. 1922 ई० की पुनरावृत्ति व्यापक रूप में की गई.”

इसके बावजूद इतना तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि सरकार को गाँधी-इरविन समझौता करने को बाध्य होना पड़ा. यह एक बड़ी विजय थी और आम जनता ने उसे इसी रूप में लिया.

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