प्रथम विश्वयुद्ध का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

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प्रथम विश्वयुद्ध का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

युद्ध के दौरान कारखानों और मजदूरों की संख्या में तीव्रता से बढ़ोतरी हुई. 1914 ई. में जहाँ कारखानों में कार्यरत मजदूरों की संख्या 9,50,973 थी, वहीं 1918 ई. में उनकी संख्या 11,22,922 हो गई. 1913 ई. में कपड़ा-मिलों की संख्या 272 और उनमें काम करने वाले मजदूरों की संख्या 2,53,786 थी, किन्तु 1923 ई. तक उनकी संख्या क्रमशः 333 और 3,47,380 हो गयी. यह स्थिति चटकलों की भी थी. कल-कारखानों की वृद्धि से पूँजीपति वर्ग को बेशुमार मुनाफा हुआ, लेकिन मजदूरों की स्थिति पहले जैसे ही दयनीय बनी रही. सच्चाई तो यह है कि उनकी स्थिति में पहले से गिरावट ही आई. मूल्यवृद्धि का उनकी स्थिति पर जानलेवा प्रभाव पड़ा. उनके काम करने की स्थिति भी अच्छी नहीं थी. उन्हें आवश्यकता से अधिक घंटों तक काम करना पड़ता था. इससे उनकी स्थिति नारकीय बन गयी. फलतः मजदूरों ने शोषण और उत्पीड़न के विरुद्ध आवाज़ उठाना आरम्भ किया. इसी बीच विश्व राजनीति में दो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घटीं. 1917 ई० में रूस की महान क्रांति हुई. इसने जारशाही को समाप्त कर साम्यवादी सरकार की स्थापना की. अंतर्राष्ट्रीय साम्यवादी संगठन का उदय हुआ. इस संगठन ने दुनिया के मजदूरों को एक होने एवं पूँजीपतियों के विरुद्ध संघर्ष करने का आह्वान किया. इसका प्रभाव भारतीय श्रमिक-वर्ग पर भी पड़ा और उन लोगों ने संगठन के प्रयास तेज कर दिए. 1917 ई० में ही महात्मा गाँधी सत्य और अहिंसा का अस्त्र लेकर भारतीय राजनीति में उतरे. उन्होंने श्रमिकों और कृषकों को भी अपने आंदोलन में शरीक किया एवं उनके अधिकारों के लिए संघर्ष किया. परिणामस्वरूप, भारतीय श्रमिकों में भी जुझारू प्रवृत्ति उत्पन्न हुई. अपनी माँगों की पूर्ति का साधन उन्होंने हड़ताल को बनाया. अब हड़ताल पहले से ज्यादा संगठित और व्यापक एव लंबी अवधि की होने लगी.

हड़तालें

रूसी क्रांति के प्रभाव और भारतीय व्यवस्था से क्षुब्ध होकर 1917 ई० मेँ भारत में श्रमिकों ने बड़े पैमाने पर हड़तालें आरंभ कर दीं. 1917 ई० में बंबई के कपड़ा-मजदूरों की हड़ताल हुई. वे महँगाई से होनेवाले नुकसान को पूरा करने के लिए वेतन-वृद्धि की माँग कर रहे थे. 1917 ई० में 30 से अधिक हड़तालें हुईं. 1918 ई० में अहमदाबाद में मिल-मजदूरों की हड़ताल हुई, जिसका नेतृत्व स्वयं गाँधी ने किया. मजदूरों की माँग मनवाने के लिए उन्हें उपवास भी करना पड़ा. परिणामस्वरूप उनके वेतन में 35% की वृद्धि की गई. यह श्रमिकों की पहली बड़ी विजय थी. 1918-19 में हड़ताल एक महामारी के समान फैल गई. बंगाल के चटकल-मजदूरों, बंबई के कपड़ा-मिल-मजदूरों, रेलवे कर्मचारियों, गोदी-कर्मचारियों, टकसाल, छापाखाना, बिजली और नगरपालिका के कर्मचारियों, सभी ने हड़ताल की. ये हड़तालें अधिक व्यापक और संगठित थीं. इन हड़तालों के कुछ सुखद परिणाम भी निकलें. मजदूरों के वेतन में वृद्धि हुई एवं काम के घंटे निश्चित किए गए.

श्रमिकों के संगठन

हड़तालों के साथ-साथ मजदूरों की एकता और शक्ति को बनाए रखने के लिए मजदूर यूनियन भी बनाए जाने लगे. 1920 ई० तक भारत में लगभग 125 मजदूर-संगठन बन गए, जिनके सदस्यों की संख्या लगभग 2,50,000 थी. देश के सभी महत्त्वपूर्ण उद्योगों के अपने-अपने संगठन थे. अब आवश्यकता यह महसूस की गई कि श्रमिकों का एक अखिल भारतीय संगठन बनाया जाए, जिससे सभी मजदूरों एवं श्रमिक संगठनों को एक सूत्र में बाँधकर साम्राज्यवादी सरकार और शोषक पूँजीपति वर्ग के बिरुद्ध व्यापक और संगठित आंदोनल चलाया जा सके. इस समय तक राष्ट्रसंघ की एक शाखा के रूप में अंतर्राष्ट्रीय श्रम-संगठन (इंटरनेशनल लेबर ऑरगेनाइजेशन – आई० एल० ओ०) का गठन हो जुका था. इसका उद्देश्य मजदूरों की समस्या का निराकरण करना ओर उनमें एकता की भावना जगाना था. इसलिए, भारत में मजदूरों के एक केंद्रीय संगठन की आवश्यकता महसूस की गई.

इस दिशा में पहल काँग्रेस ने की. 31 अक्टूबर, 1920 की बंबई में लाला लाजपतराय की अध्यक्षता में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन काँग्रेस (ए० आई० टी० यू० सी०) का गठन किया गया. बाल गंगाधर तिलक, एनी बेसेंट और सी० एफ० एन्डूज इसके उपाध्यक्षों में से थे. इस संगठन की ओर से एन०एम० जोशी 1920 ई० के आइ० एल० ओ० सम्मेलन में शरीक हुए. इस अखिल भारतीय संगठन पर आरंभ में मॉडरेट नेताओं का नियंत्रण रहा. बाद में, अनेक राष्टीय नेता, जैसे चित्तरंजन दास, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस सभी ने इसके कार्यों में अभिरुचि ली. 1920 ई० में ही काँग्रेस का नागपुर अधिवेशन हुआ, जिसमें मजदूरों और किसानों के संबंध में भी प्रस्ताव पारित कर उनकी दशा सुधारने के लिए कार्यक्रम बनाने का निर्णय किया गया. इसके बाद काँग्रेस निरंतर मजदूरों की समस्याओं पर ध्यान देने लगी. 1922 ई० में गया काँग्रेस-अधिवेशन के अध्यक्ष चित्तरंजन दास ने मजदूरों और किसानों को काँग्रेस के प्रभाव में लाने को आवश्यकता पर बल दिया. 1925 ई० के कानपुर-अधिवेशन में काँग्रेस ने रचनात्मक कार्यों में मिल-मजदूरों को संगठित करने का कार्यक्रम स्वीकार किया. पुन:, 1927 ई- में काँग्रेस महासमिति ने औद्योगिक मजदूरों के बीच काम करने के लिए प्रचारक नियुक्त करने और संगठन बनाने को योजना बनाई.

इस बीच ट्रेड यूनियन काँग्रेस  भी मजदूरों को संगठित करने का प्रयास कर रही थी. परिणामस्वरूप, 1926 ई० तक 57 श्रमिक संगठन इसके साथ संबद्ध हो गए. इनकी सदस्य संख्या करीब 1,25,000 थी. इससे स्पष्ट है कि प्रथम विश्वयुद्ध (First World War) के बाद मजदूरों में नई चेतना का तेजी से विकास हुआ और श्रमिक-आंदोलन में वृद्धि हुई, परंतु ट्रेड यूनियन काँग्रेस का रुख सुधारवादी था, क्रांतिकारी नहीं. इसपर ब्रिटेन के श्रमिकदल के समाजवादी लोकतंत्रवादी विचारधारा का प्रभाव था. समाजवादी झुकाव होते हुए भी इसपर एन० एम० जोशी जैसे नरमदलीय लोगों का प्रभाव ही बन रहा. ये नेता श्रमिक संगठनों की राजनीतिक गतिविधियाँ केवल श्रमिकों को आर्थिक अवस्था सुधारने तक की सीमित रखना चाहते थे. गाँधीजी के अहिंसावाद, प्रन्यासवाद (ट्रस्टीशीप) तथा वर्ग-सहयोग की भावना के कारण मजदूरों को राजनीतिक आंदोलनों से दूर रखने का प्रयास किया गया. फलतः, 1920-22 के असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) में श्रमिकों को शामिल नहीं किया गया.

मजदूरों के प्रति ब्रिटिश दृष्टिकोण

ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने मजदूरों की बढ़ती एकता की शक्ति को पहचाना और इसे अपने लिए खतरनाक माना. अतः, भारतीय श्रमिकों को अपने प्रभाव में लेने का उपाय उन लोगों ने किया. 1919-20 में इस उद्देश्य से मद्रास ओर बंबई में श्रम-विभाग स्थापित किए गए. 1921 ई० में औद्योगिक अशांति की जाँच करने के लिए बंगाल कमिटी का गठन किया गया. 1922 ई० में बंबई इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स कमिटी (Bombay Industrial Disputes Committee) की स्थापना को गई. इनका उद्देश्य श्रमिकों की उचित समस्याओं का निराकरण कर उन्हें अपने प्रभाव में लेना था. इस दिशा में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रयास 1926 ई० का व्यापार-संघ अधिनियम था. इसके द्वारा हड़ताल को मजदूरों का वैधानिक अधिकार स्वीकार किया गया; परंतु हड़तालों पर कुछ पाबंदियाँ भी लगाई गईं.

इसी समय ब्रिटेन के राजनीतिक दलों ने भी भारतीय श्रमिक वर्ग में रुचि लेनी आरंभ की. ब्रिटिश लेबर पार्टी और ब्रिटिश ट्रेड यूनियनों के नेता भारत आए. वे भारत में भी लेबर पार्टी को स्थापना करना चाहते थे. अपने प्रयास में उन्हें कुछ सफलता मिली. कुछ संगठन उनके प्रभाव से सुधारवादी एमर्स्टडम-गुट में शामिल हुए, परंतु भारत में लेबर पार्टी की स्थापना नहीं हो सकी. ब्रिटिश ट्रेड यूनियनों के वामपंथी मोर्चे ने भी भारतीय श्रमिकों को अपनी ओर आकृष्ट करने का प्रयास किया एवं उन्हें वामपंथी क्रांतिकारी मार्ग पर चलने का मार्ग सुझाया, लेकिन सरकार ने उनके प्रयास को विफल कर दिया.

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