मौर्योत्तर काल में व्यापार और नगर

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मौर्योत्तर काल के विषय में सम्पूर्ण जानकारी मौर्यों का साम्राज्य ई०पू० 185 में पूरी तरह ध्वस्त हो गया. देश में अनेक विदेशी शक्तियों (शक, कुषाण आदि) तथा देशी वंशजों (शुंग वंश, कण्व वंश, सातवाहन वंश, पाण्ड्य वंश, चोल वंश तथा चेर वंश आदि) ने अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिए. शकों, कुषाणों, सातवाहनों का प्रभाव काल लगभग 200 ई०पू० से 200 ई० … Read More

गंग वंश का इतिहास

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पल्लवों के समकालीन राज्यों में एक गंग वश का साम्राज्य था. इसे तलनाड का गंग वंश भी कहा जाता है. अनुश्रुति के अनुसार, गंग राजवंश इक्ष्वाकु वंश से उत्पन्न हुआ था. इन्होंने अपनी ऐतिहासिक महत्ता स्थापित करने के लिए स्वयं को गंग वंश कहलवाया. क्योंकि वे प्राचीन काल में गंगा नदी के किनारे से आये थे. इनकी दो शाखाएँ थीं. … Read More

कदम्ब वंश

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दक्षिण भारत में 300 ई० से 750 ई० तक एक अन्य वंश जिसका उल्लेख मिलता है वह था कदम्ब वंश. कदम्ब वंश के राजाओं ने चौथी शताब्दी ई० में दक्षिणी महाराष्ट्र और आधुनिक गोआ राज्य सहित कोंकण में अपना साम्राज्य स्थापित किया था. सम्भवतः वे ब्राह्मण थे तथा मानव्य उनका गोत्र था. उन्होंने वर्ण-व्यवस्था को अपने राज्य में कायम रखा … Read More

कण्व वंश

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मगध राज्य के शुंग वंश के अंतिम सम्राट देवभूति को मारकर 75 ई.पू. वासुदेव ने कण्व वंश की नींव रखी. उस समय भारत की राजनैतिक एकता नष्ट हो चुकी थी. देश की पश्चिमोत्तर सीमा पर शक वंश के राजा लगातार आक्रमण कर रहे थे. मगध राज्य में पाटलिपुत्र तथा उसके आसपास के प्रदेश ही शामिल थे. कण्व राजवंश शुंग वंश … Read More

आंध्र इक्ष्वाकु वंश

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दक्षिणी भारत के पूर्वी भारत के सातवाहन शक्ति के पतन के बाद एक नए वंश का उदय हुआ जिसे इक्ष्वाकु वंश के नाम से जाना जाता है. लगभग तीसरी और चौथी शताब्दी में कृष्णा नदी की पूर्वी घाटी में एक वंश राज कर रहा था जिसे राम के पूर्वज इक्ष्वाकु से अलग दिखाने के लिए आंध्र इक्ष्वाकु कहा जाता है … Read More

चेर राजवंश

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दक्षिण भारत का तीसरा राज्य चेर या केरल था। इस राज्य का मुख्य केन्द्र मालाबार तट के किनारे का आधुनिक केरल राज्य का एक भाग था। इसमें समुद्र और पर्वतीय क्षेत्रों के मध्य की संकरी भूपर्पटी शामिल थी। यहाँ की उत्पत्ति के बारे में (पाण्ड्य तथा चोलों की तरह) सुनिश्चित रूप से बताना कठिन है। कुछ विद्वानों की राय है … Read More

पाण्ड्य राजवंश

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मेगस्थनीज के विवरण के आधार पर कुछ विद्वानों की राय है कि सुदूर दक्षिण का यह प्राचीनतम राज्य था. उनका प्राचीन राज्य द्रविड प्रदेश के दक्षिण-पूर्व छोर का भाग था. प्रारम्भिक काल में उनका स्थान ताम्रपर्णी के किनारे कोरक नामक स्थान था जो एक अच्छा बन्दरगाह था. कहा जाता है कि यहीं उत्पन्न तीन भाइयों ने तीन स्थानों पर क्रमशः … Read More

वाकाटक वंश – Vakataka Dynasty in Hindi

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उत्तर महाराष्ट्र और विदर्भ (बरार) में सातवाहनों का स्थान वाकाटकों ने लिया. वास्तव में सातवाहनों के पतन एवं छठी शताब्दी के मध्य तक चालुक्य वंश के उदय तक दक्कन में वाकाटक ही सबसे महत्त्वपूर्ण शक्ति थे जिन्होंने दक्षिण एवं कभी-कभी मध्य भारत के कुछ क्षेत्रों पर भी अपनी सत्ता स्थापित रखी. वाकाटक कौन थे ? यह अब भी एक ऐतिहासिक … Read More

गांधार कला : इस शैली की मुख्य विशेषताएँ

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विदेशी राजा भारतीय कला के उत्साही संरक्षक बन गये और उन्होंने इसके प्रचार-प्रसार में वही उत्साह दिखाया जो नए-नए धर्म परिवर्तन करने वालों में होता है. कुषाण साम्राज्य में विभिन्न पद्धतियों (schools) एवं देशों में प्रशिक्षित राज-मिस्त्रियों और एनी दस्तकारों को एक साथ इकठ्ठा किया गया. भारतीय शिल्पकार यूनानियों और रोम वालों के संपर्क में, विशेषकर भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर … Read More

कनिष्क द्वारा बौद्ध धर्म का प्रचार एवं अन्य योगदान

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कनिष्क द्वारा बौद्ध धर्म का प्रचार बौद्ध साहित्य के अनुसार कनिष्क अशोक के बाद दूसरा महान बौद्ध सम्राट हुआ है. उसने बौद्ध धर्म को अपनाने के बाद अपने सिक्‍कों पर महात्मा बुद्ध की मूर्ति को प्रधानता दी. कनिष्क भी अशोक तथा हर्ष की तरह उदार धार्मिक दृष्टिकोण रखता था. उसने बौद्ध धर्म के प्रचार तथा प्रसार के लिए निम्नलिखित उपाय … Read More