भारत छोड़ो आन्दोलन – Quit India Movement in Hindi

Dr. SajivaHistory, Modern History12 Comments

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भारत छोड़ो आन्दोलन – भूमिका

भारत के इतिहास में 1942 की अगस्त क्रान्ति (August Revolution) एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है. इस क्रांति का नारा था “अंग्रेजों भारत छोड़ो (Quit India) और सचमुच ही एक क्षण तो ऐसा लगने लगा कि अब अंग्रेजों को भारत से जाना ही पड़ेगा. द्वितीय विश्वयुद्ध (Second Word War) में जगह-जगह मित्रराष्ट्रों की पराजय से अंग्रेजों के हौसले पहले से ही चूर हो गए थे और उस पर यह 1942 की क्रांति. ऐसा लगने लगा कि अंग्रेजी साम्राज्य अब टूट कर बिखरने ही वाला है. अंग्रेजों ने भारतीयों से सहायता पाने के लिए यह प्रचार किया कि भारतीय स्वयं ही अपने देश के मालिक हैं और उन्हें आगे बढ़कर अपने देश की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि भारत पर भी जापानी आक्रमण का खतरा बढ़ गया था. 1942 ई. में जब जापान प्रशांत महासागर को पार करता हुआ मलाया और बर्मा तक आ गया तो ब्रिटेन ने भारत के साथ समझौता कर लेने की बात पर विचार किया. अंग्रेजों को डर था कि कहीं जापान भारत पर भी आक्रमण न कर दे.

लेकिन गाँधीजी का विचार था कि अंग्रेजों की उपस्थिति के कारण ही जापान भारत पर आक्रमण करना चाहता है, इसलिए उन्होंने अंग्रेजों को भारत छोड़ने तथा भारतीयों के हाथ में सत्ता सौंपने की माँग की. यदि ब्रिटिश सरकार भारतीयों के हाथ में सत्ता सौंपने के लिए तैयार हो जाती तो भारत युद्ध में सहायता दे सकता था.

अंग्रेज इसके लिए तैयार नहीं थे. अतः आन्दोलनकारियों ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने की धमकी दी. कई कांग्रेसी नेताओं का विचार था कि जापानी खतरे को देखते हुए इस आन्दोलन का यह सही समय नहीं था. मौलाना आजाद भी गाँधीजी से सहमत नहीं थे. 1942 ई. में वर्धा में कांग्रेस की बैठक हुई और गांधीजी तथा सरदार पटेल के प्रयास से “अहिंसक विद्रोह (Nonviolent protest)” का कार्यक्रम पारित हुआ. पुनः 8 अगस्त, 1942 ई. को अबुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में बम्बई कांग्रेस महासमिति की बैठक हुई जिसमें भारत छोड़ो प्रस्ताव को स्वीकृति दी गई.

गाँधीजी गिरफ्तार

बहुत बड़े पैमाने पर सामूहिक संघर्ष शुरू करने की बात प्रस्ताव में घोषित की गई थी. सरकार ने जन-संघर्ष के शुरू होने की प्रतीक्षा नहीं की. रातों-रात गाँधीजी और देश के अन्य नेताओं को भी गिरफ्तार कर लिया गया. गाँधीजी को पूना के आगा खां महल में भेज दिया गया. महादेव भाई, कस्तूरबा, श्रीमती नायडू और मीराबेन को भी बंद कर दिया गया. लेकिन नेताओं के जेल चले जाने से भारत चुप नहीं हो गया. “करो या मरो (Do or Die)” का नारा लोगों ने अपना लिया था. हर जगह प्रदर्शन किये जा रहे थे. सारे देश में हिंसक कार्यवाही फूट पड़ी थी. लोगों ने सरकारी इमारतें जला दीं. सारे देश में हड़तालें हो रही थीं और उपद्रव फ़ैल गए थे. वायसराय लिनलिथगो (Viceroy Linlithgow) ने इसका सारा दोष गाँधीजी पर मढ़ दिया. उसने कहा कि गाँधीजी ने हिंसा को निमंत्रण दिया है.

इसी दौरान कस्तूरबा की मौत हो गयी और गाँधीजी को भी मलेरिया हो गया. वह गंभीर रूप से बीमार हो गए. भारतीय जनता ने कहा कि उन्हें तत्काल रिहा कर दिया जाए. अधिकारियों ने यह सोचकर कि वह मृत्यु-शैया पर  हैं, उन्हें और उनके साथियों को रिहा कर दिया.

असफल प्रयास

हालाँकि अगस्त आन्दोलन/Quit India Movement सफल नहीं हो सका और भारत को स्वतंत्रता नहीं दिला सका. लेकिन फिर भी भारत के अन्य आन्दोलनों की तुलना में यह सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण साबित हुआ. इस आन्दोलन ने जन-अन्सतोष को चरम बिंदु पर पहुँचा दिया. यह क्रान्ति अत्याचार और दमन के विरुद्ध भारतीय जनता का विद्रोह था जिसकी तुलना हम वास्तिल के पतन (fall of Bastille) या रूस की अक्टूबर क्रान्ति से कर सकते हैं. अब औपनिवेशिक स्वराज्य की बात बिल्कुल ख़त्म हो गई तथा अंग्रेजों का भारत छोड़कर जाना निश्चित हो गया और हमें पाँच वर्षों के अन्दर ही आजादी मिल गई.

अगस्त-आन्दोलन – कारण

अगस्त-आन्दोलन कोई आकस्मिक घटना  नहीं थी. आन्दोलन प्रारम्भ करने के पीछे कुछ प्रमुख कारणों का उल्लेख करना आवश्यक है.

  1. सर्वप्रथम क्रिप्स योजना से ब्रिटिश सरकार का रवैया स्पष्ट हो गया था. इंग्लैंड भारत में सही ढंग से संवैधानिक गतिरोध को दूर करना नहीं चाहता था. क्रिप्स-प्रस्ताव के माध्यम से सरकार यह सिद्ध करना चाहती थी कि कांग्रेस भारत की आम जनता की प्रतिनिधि संस्था नहीं है. भारत में एकता का अभाव है. अतः सत्ता का हस्तान्तरण संभव नहीं है.
  2. भारत पर जापानी आक्रमण की आशंका बढ़ गई थी. सिंगापुर, मलाया और बर्मा को छोड़ने के लिए अंग्रेजों को विवश हो जाना पड़ा. बंगाल छोड़ने के पहले सत्ता भारतीयों के हाथ में हस्तांतरित करने के लिए अगस्त-आन्दोलन प्रारम्भ किया गया था.
  3. बर्मा पर जापानी आक्रमण के समय शरणार्थियों के साथ अंग्रेजी सरकार ने भेदभाव की नीति अपनाई थी. भारतीयों को कष्टदायक स्थिति में रखा जा रहा था और भारतीय सैनिकों के साथ बुरा व्यवहार किया जाता था. भारतीयों के साथ ब्रिटिश सरकार के व्यवहार से क्षुब्ध होकर गाँधी ने अगस्त-आन्दोलन की घोषणा की.
  4. पूर्वी बंगाल में सरकार ने आतंक का राज्य कायम कर रखा था. सैनिकों को रखने के लिए बलपूर्वक घर खाली करवा लिया गया था. बिना मुआवजा दिए भूमि अर्जित कर ली गई थी. सरकार की तानाशाही के विरोध में आन्दोलन प्रारम्भ करना आवश्यक हो गया था.
  5. युद्धकाल में भारत की स्थिति संकटपूर्ण बन गई थी. मूल्य में बहुत अधिक वृद्धि हुई. कागजी मुद्रा का प्रचार हुआ. जन-साधारण को जीवनयापन में अत्यधिक कठिनाई का सामना करना पड़ रहा था. अतः आर्थिक असंतोष हिंसक क्रान्ति का रूप ले सकता था. ऐसी अवस्था में गांधीजी ने भारत छोड़ो आन्दोलन की घोषणा की और भारत को स्वतंत्र बनाने के लिए “करो या मरो” का मन्त्र दिया.

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12 Comments on “भारत छोड़ो आन्दोलन – Quit India Movement in Hindi”

  1. आपने बहुत अच्छा बताया धन्यवाद

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