प्रार्थना समाज – 1867 ई.

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आज हम जानेंगे प्रार्थना समाज के विषय में. इस पोस्ट को ध्यान से अंत तक पढ़ें.

प्रार्थना समाज

बंगाल की ही तरह महाराष्ट्र में भी सुधारवादी लहर उठी. 1837 ई० में ही प्रकाशित एक पत्रिका द्वारा मराठा ब्राह्मणों का ध्यान विधवा-विवाह की ओर आकृष्ट किया गया. रेवरेंड बाबा पद्मनजी ने भी इस विषय पर बल डाला. इसी प्रकार, 1849 ई० में परमहंस मंडली या सभा नामक एक ‘आस्तिक’ समाज कायम किया गया, लेकिन यह संस्था शीघ्र ही भंग हो गई. सुधार को दिशा में छात्र साहित्यिक और वैज्ञानिक समिति जैसी संस्थाओं और गोपाल हरिदेशमुख लोकहितवादी’, ज्योतिबा फूले और दादाभाई नौरोजी जैसे सुधारकों ने भी प्रयास किए. 1851 ई० में दादाभाई नौरोजी ने अन्य व्यक्तियों के सहयोग से रहनुमाई माजदायासन या धार्मिक सुधार परिषद् की स्थापना की. इन सुधारकों ने सामाजिक और धार्मिक सुधारों पर समान रूप से बल दिया. महाराष्ट्र में हिंदू समाज ओर धर्म में सुधार लाने का सबसे अधिक सफल प्रयास प्रार्थना समाज ने किया जिसकी स्थापना 1867 ई० में बंबई में हुई.

केशवचन्द्र सेन से प्रेरणा पाकर डॉक्टर आत्माराम पांडूरंग ने इस संस्था की स्थापना की. इसका विकास ब्रह्मसमाज के छत्रच्छाया में हुआ. प्रार्थना समाज का मुख्य उद्देश्य एकेश्वरवाद को प्रश्रय देना तथा धर्म को कुरीतियों, रूढ़ियों और पुरोहितों के आधिपत्य से मुक्त कराना था. इस संस्था ने समाज-सुधार को भी अपना लक्ष्य बनाया. इसने जाति-व्यवस्था एवं अस्पृश्यता की निंदा की, अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहित किया, विधवा-विवाह को जायज ठहराया, स्त्री-शिक्षा, दलितों, अछूतों और श्रमिकों के हितों की रक्षा करने की वकालत की. समाज को व्यापक बनाने में आर. जी. भंडारकर, जस्टिस महादेव गोविंद राणाडे, तेलुगू सुधारक विरेशलिंगम इत्यादि ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई.

बाद में गोखले, तिलक और गणेश अगरकर जैसे प्रसिद्ध प्रबुद्ध व्यक्ति भी इसमें शामिल हुए. उनके प्रयासों से 1884 ई० में दक्कन एजुकेशन सोसायटी (Deccan Education Society) और फर्ग्यूशन तथा वेलिंग्डन कॉलेज खुले. ब्रह्मसमाज से प्रभावित होते हुए भी प्रार्थना समाज इससे भिन्न था. इसने न तो ईसाई मिशनरियों से संपर्क कायम किया न ही हिंदू धर्म से. इसने अपने-आपको बिल्कुल अलग कर लिया. फलस्वरूप, बंगाल के ब्रह्मसमाज आंदोलन की अपेक्षा प्रार्थना समाज अपने उद्देश्यों में अधिक सफल रहा. बाद में तिलक के उग्रवादी स्वभाव, प्रतिक्रियावादी नीति और राजनीतिक मतभेद के चलते संस्था में फूट पड़ गई. तिलक ने सरकार द्वारा पास किए गए सहवास-वय विधेयक (Age of Consent Marriage Act, 1891) का घोर विरोध किया जिसके अनुसार बाल-विवाह को अवैध घोषित किया गया था. उन्होंने महाराष्ट्र को प्राचीन परंपरा एवं गौरव को पुनर्जीवित करने का भी प्रयास किया तथा गणपति उत्सव मनाना प्रारंभ किया. उन्होंने 1895 ई० में राणाडे द्वारा स्थापित इंडियन सोशल कान्फ्रेंस (Indian Social Conference), जिसकी स्थापना 1887 ई० में हुई थी, की सभा कांग्रेस मंच से करने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें ऐसा करने से रोक दिया गया. इससे समाज में दरार बढ़ती गई. राणाडे की मृत्यु के पश्चात्‌ (1901 ई०) गोखले इससे अलग हो गए और उन्होंने सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी (Servants of India Society – 1905) स्थापित की. इसके बावजूद प्रार्थना समाज ने महाराष्ट्र में सराहनीय कार्य किए.

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