जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति – National Policy on Biofuels 2018

Sansar LochanEnergy, Environment and BiodiversityLeave a Comment

हाल ही में, केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा जैव ईंधन के उत्पादन और उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए जैव-ईंधन पर राष्ट्रीय नीति – 2018 (National Policy on Biofuels – 2018) को स्वीकृति प्रदान की गई है. जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति को लागू करने वाला पहला राज्य राजस्थान है.

भूमिका

सरकार द्वारा इससे पहले, 2009 में जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति तैयार की गई थी. इस नीति के मुख्य बिंदु नीचे दिए गये हैं –

  1. 2017 तक बायो डीजल और बायो ऐथनॉल दोनों के लिए जैव ईंधन के 20% मिश्रण का एक सांकेतिक लक्ष्य प्राप्त करना.
  2. बंजर, निम्नीकृत और सीमान्त भूमि पर गैर-खाद्य तिलहनों से बायो डीजल के उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाएगा.
  3. किसानों हेतु उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए गैर-खाद्य तिलहनों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP).
  4. बायो ऐथनॉल और बायो डीजल की खरीद के लिए न्यूनतम खरीद मूल्य.
  5. दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन सहित जैव-ईंधन के बागानों, प्रसंस्करण और उत्पादन पर ध्यान केन्द्रित करने के साथ अनुसन्धान एवं विकास पर अत्यधिक बल दिया जाना.
  6. दूसरी पीढ़ी के जैव-ईंधनों के लिए वित्तीय प्रोत्साहन.
  7. नीतिगत मार्गदर्शन और समन्वयन प्रदान करने के लिए प्रधानमन्त्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय जैव ईंधन समन्वय समिति.
  8. नीति के कार्यान्वयन की निगरानी करने के लिए कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में जैव ईंधन संचालन समिति.
  9. हालाँकि, भारत में जैव ईंधन कार्यक्रम जैव ईंधन उत्पादन के लिए घरेलू फीडस्टॉक की निरंतर और मात्रात्मक गैर-उपलब्धता के कारण व्यापक रूप से प्रभावित हुआ है.
  10. भारत में अभी तक ऐथनॉल की औद्योगिक पैमाने पर उपलब्धता केवल चीनी मीलों से ही हुई है. चीनी मिलें इसे शराब उत्पादक जैसे अन्य उपयोगकर्ताओं को बेचने के लिए स्वतंत्र हैं, जो इन्हें अधिक भुगतान करते हैं.
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जैव ईंधन क्या है?

जैव ईंधन कम समय में कार्बनिक पदार्थ से उत्पादित किया जाने वाला हाइड्रोकार्बन ईंधन है. यह जीवाश्म ईंधन से भिन्न होता है क्योंकि जीवाश्म ईंधन के बनने में लाखों-करोड़ों वर्ष लग जाते हैं. जैव ईंधन को ऊर्जा का नवीकरणीय रूप माना जाता है और इसमें जीवाश्म ईंधन की तुलना में कम ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन होता है.

प्रकार

  • पहली पीढ़ी के जैव ईंधन – इसमें किण्वन के पारम्परिक तरीके द्वारा ऐथनॉल बनाने के लिए गेहूँ और गन्ने जैसी खाद्य फसलों और बायोडीजल के लिए तिलहनों का उपयोग किया जाता है.
  • दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन – इसमें गैर-खाद्य फसलों का उपयोग किया जाता है और ईंधन के उत्पादन में लकड़ी, घास, बीज फसलों, जैविक अपशिष्ट जैसे फीडस्टॉक का उपयोग किया जाता है.
  • तीसरी पीढ़ी के जैव ईंधन – इसमें विशेष रूप से इंजिनियर्ड शैवालों (engineered Algae) का प्रयोग किया जाता है. शैवाल के बायोमास का उपयोग जैव ईंधन में परिवर्तित करने के लिए किया जाता है. इसमें अन्य की तुलना में ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन कम होता है.
  • चौथी पीढ़ी के जैव ईंधन – इसका उद्देश्य न केवल संधारणीय ऊर्जा का उत्पादन करना है बल्कि यह कार्बन डाइऑक्साइड के अभिग्रहण (capturing) और भंडारण (storage) की एक पद्धति भी है.

विभिन्न प्रकार के जैव ईंधन

बायो ऐथनॉल : यह कार्बोहाइड्रेट और फसलों एवं अन्य पौधों व घासों के रेशेदार (cellulosic) सामग्री के किण्वन से उत्पादित अल्कोहल है. सामान्यतः ईंधन की ऑक्टेन संख्या बढ़ाने के लिए इसका योजक के रूप में प्रयोग किया जाता है.

बायो डीजल : यह पौधों और पशुओं से प्राप्त तेलों और वसा के ट्रांस एस्टरीफिकेशन द्वारा उत्पादित फैटी एसिड का मिथाइल या मिथाइल एस्टर है. इसका प्रत्यक्ष रूप से ईंधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है.

बायो गैस : बायो गैस अवायवीय जीवों द्वारा कार्बनिक पदार्थों के अवायवीय पाचन के माध्यम से उत्पादित मीथेन है. इसे पूरक गैस प्राप्ति करने के लिए एनारोबिक डाइजेस्टर में या तो जैव-निम्नीकरणीय अपशिष्ट पदार्थ डालकर अथवा ऊर्जा फसलों का उपयोग करके उत्पादन किया जा सकता है.

इस नीति में जैव ईंधन को तीन श्रेणी बाँटा गया है.

  1. पहली श्रेणी 1G है जिसके अंतर्गत bioethanol & biodiesel एवं “Advanced Biofuels” आते हैं.
  2. दूसरी श्रेणी 2G है जिसमें ethanol, Municipal Solid Waste (MSW) आते हैं.
  3. तीसरी श्रेणी 3G कहलाएगी जिसमें आने वाले ईंधन biofuels, bio-CNG आदि हैं.

जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति – 2018 की मुख्य विशेषताएँ

  • राज्य सरकार जैव ईंधन के विपणन को प्रोत्साहित करेगी एवं उसके विषय में जागरुकता का प्रसार करेगी.
  • विदित हो कि राजस्थान में 8 टन प्रतिदिन की क्षमता का एक बायोडीजल संयंत्र भारतीय रेलवे की वित्तीय सहायता से पहले ही स्थापित किया जा चुका है.
  • राज्य सरकार के अनुसार, राज्य ग्रामीण आजीविका विकास परिषद्  (SRLDC) बायोडीजल की आपूर्ति के जरिये अतिरिक्त आय के स्त्रोतों का पता लगाने के लिए महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को भी प्रोत्साहित करेगी.
  • इस नीति में एथनोल (ethanol) उत्पादन के लिए उपयोग किये जाने वाले कच्चे माल की परिभाषा को व्यापक विस्तार देते हुए इसमें इन सामग्रियों को भी जोड़ा गया है – गन्ना रस, चुकंदर जैसे मीठे पदार्थ, मीठा बाजरा, मंडयुक्त अनाज जैसे मकई, कसावा, क्षतिग्रस्त गेहूँ, टूटा चावल, अखाद्य सड़ा आलू,
  • नीति में जैव ईंधनों को आधारमुक्त जैव ईंधनों यानी पहली पीढ़ी (1जी) के बायोइथेनॉल और बायोडीजल तथा विकसित जैव ईंधनों यानी दूसरी पीढ़ी (2जी) के इथेनॉल, निगम के ठोस कचरे (Municipal Solid Waste – MSW) से लेकर ड्रॉप-इन ईंधन, तीसरी पीढ़ी (3जी) के जैव ईंधन, Bio-CNG आदि को श्रेणीबद्ध किया गया है, ताकि प्रत्येक श्रेणी के अंतर्गत उचित वित्तीय और आर्थिक प्रोत्साहन बढ़ाया जा सके.
  • ज्ञातव्य है कि अतिरिक्त उत्पादन के चरण के दौरान किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिलने का खतरा होता है.
  • इसे संज्ञान में रखते हुए इस नीति में राष्ट्रीय जैव ईंधन समन्वय समिति की मंजूरी से इथेनॉल उत्पादन के लिए (पेट्रोल के साथ उसे मिलाने के लिए) अधिशेष अनाजों के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है.
  • जैव ईंधनों के लिए नीति में 2जी इथेनॉल जैव रिफाइनरी को 1G जैव ईंधनों की तुलना में अतिरिक्त कर प्रोत्साहन, उच्च खरीद मूल्य आदि के अलावा 6 सालों में 5 हजार करोड़ रु. निधि की व्यवस्था करने का प्रावधान है.

इस नीति से संभावित लाभ

आयत पर निर्भरता कम करती है – बड़े पैमाने पर जैव ईंधन के उत्पादन से कच्चे तेल पर आयात निर्भरता में कमी आएगी और विदेशी मुद्रा की बचत होगी.

स्वच्छ पर्यावरण – फसलों को जलाने में कमी लाने और कृषि अवशेषों/अपशिष्ट के जैव ईंधन में रूपांतरण में ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन और अन्य कणिकीय पदार्थों में कमी आएगी.

नगरपालिका ठोस अपशिष्ट प्रबंधन – एक अनुमान के अनुसार, प्रतिवर्ष भारत में 62 MMT नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (Municipal Solid Waste : MSW) उत्पन्न होता है. यह नीति अपशिष्ट/प्लास्टिक, MSW का ड्राप इन फ्यूल (ठोस अपशिष्ट से हाइड्रोकार्बन ईंधन) में रूपांतरण को बढ़ावा देती है.

ग्रामीण क्षेत्रों में अवसंरचना संबंधी निवेश – पूरे देश में दूसरी पीढ़ी की जैव रिफाइनरियों की संख्या बढ़ने से ग्रामीण इलाकों में अवसंरचना सम्बन्धी निवेश को बढ़ावा मिलेगा.

रोजगार सृजन – जैव रिफ़ाइनरियों की स्थापना से संयंत्र परिचालनों, ग्रामीण स्तर के उद्यमों और आपूर्ति शृंखला प्रबंधन में रोजगार के अवसर पैदा होंगे.

किसानों के लिए अतिरिक्त आय – किसान कृषि अवशेषों/अपशिष्ट का लाभ उठा सकते हैं जिन्हें अक्सर उनके द्वारा जला कर नष्ट कर दिया जाता है. कीमत गिरने पर वे अपने अधिशेष उत्पाद उचित दाम में इथेनॉल बनाने वाली इकाइयों को बेच सकते हैं.

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