बैक्ट्रियन या भारतीय यूनानी का इतिहास और उनका योगदान

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बैक्ट्रियन या भारतीय यूनानी मौर्य साम्राज्य के पतन (184 ई० पू०) के बाद भारत की राजनीतिक एकता समाप्त हो गई. भारत की डांवाडोल राजनीतिक स्थिति का लाभ उठाने के लिए लगभग 200 ई० पू० से अनेक विदेशी शक्तियों ने भारत पर कई आक्रमण किये. सबसे पहले हिन्दुकुश पार करने वालों में यूनानी थे. वे बैक्ट्रिया पर शासन करते थे जो वक्ष नदी के दक्षिण में उत्तरी अफगानिस्तान के क्षेत्र में था.

बैक्ट्रियन या भारतीय यूनानी

आक्रमणकारी एक के बाद एक करके आए लेकिन उनमें से कुछ ने एक ही समय समान्तर रूप से भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में शासन किया. इतिहासकारों की राय है कि इन विदेशी आक्रमणों का एक महत्त्वपूर्ण कारण था सेल्युकस साम्राज्य की कमजोरी. इसकी स्थापना बैक्ट्रिया (उत्तरी अफगानिस्तान) और ईरान से लगे हुए क्षेत्रों में (जिन्हें पार्थिया कहा जाता था) हुई थी. सीथियन (शक) कबीलों के बढ़ते हुए दबाव के कारण परवर्ती यूनानी शासक इस क्षेत्र में (अर्थात्‌ बैक्ट्रिया तथा पार्थिया में) अपनी सत्ता बनाए रखने में असमर्थ थे. चीन की दीवार के निर्माण (चिन वंश के शासकों ने इसका निर्माण 221 ई० पू० के आसपास कराया था) के बाद सीथियन जन चीन में घुसने की स्थिति में नहीं थे. इसलिए उन्होंने अपना ध्यान अपने पड़ौसी यूनानियों और पार्थियनों की ओर दिया. सीथियन कबीलों के द्वारा ढकेले जाने पर बैकक्ट्रिया के यूनानी भारत पर आक्रमण करने के लिए विवश हो गये.

डेमेट्रियस तथा यूक्रेटाइडस

मौर्य सम्राट अशोक के अयोग्य उत्तराधिकारी इतने कमजोर थे कि वे उनके आक्रमणों को नहीं रोक सके. भारत पर सर्वप्रथम यूनानियों ने आक्रमण किये, जिन्हें इतिहासकार भारतीय यूनानी अथवा बैक्ट्रियायी यूनानी कहते हैं. सेल्यूकस के अयोग्य उत्तराधिकारियों से बैक्ट्रिया के गवर्नर डियोडोटस ने (लगभग ई० पू० 250 में) स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया. वह तथा उसका उत्तराधिकारी (डियोडोटस द्वितीय) मध्य एशिया में अपना साम्राज्य संगठित करते रहे. लेकिन उनके बाद के शासक डेमोक्रेटियस प्रथम ने (200 ई० पू० से 175 ई० पू० तक) भारत पर अनेक आक्रमण किये. कहा जाता है कि उसने पंजाब के एक बड़े भाग को (183 ई० पू० में) जीत लिया. उसने शाकल (स्यालकोट) को अपनी राजधानी बनाया. उसने “भारतीयों के राजा”  नामक उपाधि धारण की तथा यूनानी एवं खरोष्ठी दोनों लिपियों वाले सिक्के जारी किये. परन्तु मध्य एशिया का जो भाग (बलख प्रान्त) उसके कब्जे में था उससे उसे हाथ धोने पड़े क्योंकि यूक्रेटाइडस नामक व्यक्ति ने उसके विरुद्ध वहां सफल विद्रोह कर दिया. वह (यूक्रेटाइडस) भारत की तरफ भी बढ़ा और उसके कुछ हिस्सों को जीतकर तक्षशिला को अपनी राजधानी बना लिया. इस तरह भारत में बैक्ट्रियन साम्राज्य दो राजाओों के मध्य बँट गया– ड्रेमेट्रियस तथा यूक्रेटाइडस .

मिनांडर उर्फ़ मिलिंद

स्यालकोट से शासन करने वाला दूसरा प्रसिद्ध बैक्ट्रियन शासक (ड्रेमेट्रियस के बाद) मिनांडर (या मिलिंद) था. उसने सम्भवतः ई० पू० 160 से ई० पू० 120 तक राज किया. उसे प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु नागसेन (जो नागार्जुन के नाम से भी प्रसिद्ध है) ने बौद्ध धर्म में दीक्षित किया. मिनान्‍डर ने नागसेन से बौद्ध धर्म से सम्बन्धित अनेक प्रश्न पूछे. वे प्रश्न और नागसेन के उत्तर मिलिन्दपन्ह नामक ग्रन्थ में हैं. वह बड़ा योग्य और वीर शासक था. सम्भवतः उसने काठियावाड़-भड़ौच तथा गंगा-यमुना के मध्यवर्ती क्षेत्रों को भी जीता. यूनानी लेखक पेरिप्लस के अनुसार, मिनान्डर के सिक्के भड़ौच के बाजारों में खूब चलते थे. उसकी राजधानी साकल (स्यालकोट) शिक्षा एवं व्यापार का केन्द्र था. यह अत्यन्त सुन्दर नगर था इसमें अनेक बगीचे थे तथा इसके चारों ओर सुन्दर पहाड़ियां थीं. इसमें पानी का अच्छा प्रबन्ध था. नगर के मध्य में शाही दुर्ग था.

प्रोफेसर रेप्सन ने लिखा है कि “मिनान्डर की एक न्यायप्रिय शासक के रूप में प्रसिद्धि केवल भारत तक ही सीमित नहीं थी.” परन्तु उसके उत्तराधिकारी अयोग्य थे . शक (सीथियन), पार्थियन तथा कुषाणों के आक्रमणों ने बैक्ट्रियन साम्राज्य को समाप्त कर दिया.

बैक्ट्रियनों के योगदान

बैक्ट्रियन सम्पर्क से भारत पर यूनानी सभ्यता एवं संस्कृति का व्यापक प्रभाव पड़ा. उनका शासन भारतीय इतिहास में बड़ी संख्या में सिक्‍के जारी करने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं. इससे भारतीयों ने सिक्‍के बनाने की कला के क्षेत्र में बहुत कुछ सीखा. उनके साथ सम्पर्क स्थापित होने से पूर्व भारतीय Punch-marked coins काम में लाते थे. उन पर कोई मुद्रालेख नहीं होता था. इन (यवनों) के सिक्कों की एक ओर राजा तथा दूसरी ओर किसी देवता की मूर्ति अंकित या कुछ अन्य चिह्न अंकित होते थे. इस तरह उनके सिक्‍के पहले सिक्के थे जिन्हें निश्चित रूप से उनके लिए उत्तरदायी शासकों के साथ जोड़ा जा सकता है. उनके लिए उत्तरदायी शासकों ने बैक्ट्रियन मुद्रा प्रणाली को अपनाया. इतिहासकारों की राय है कि बेक्ट्रियनों ने ही पहली बार भारत में सोने के सिक्के जारी किए, जिनकी संख्या कुषाण शासन के दौरान बढ़ गई. ज्योतिष के क्षेत्र में नक्षत्रों को देखकर भविष्य बताने की कला इनसे ही भारतीयों ने सीखी. इनके प्रभाव से ही भारत में गांधार कला शैली सर्वप्रथम विकसित हुई. यूनान के अनेक राजा भारतीय दर्शन एवं धर्म से प्रभावित हुए. यूनानियों ने योग की क्रियाएँ तथा तपस्या विधियाँ भारतीयों से सीखीं. संक्षेप में यह कहा जा सकता है पारस्परिक सम्पर्क में भारतीयों एवं यूनानियों ने परस्पर बहुत कुछ ग्रहण किया.

Tags : बैक्ट्रियन या भारतीय यूनानी भारत कब आये? इनका भारत में योगदान. Indo-Greek or Indo-Bactrian Kingdom rule explained in Hindi. हिन्द-यवन राज्य

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