पर्यावरणीय नैतिकता – Environmental Ethics

Sansar LochanEthics3 Comments

पर्यावरणीय नैतिकता (environmental ethics) का सम्बन्ध प्राकृतिक पर्यावरण के साथ मनुष्यों के नैतिक समबन्धों से है. यह इस तथ्य को प्रकट करती है कि पृथ्वी पर उपस्थित सभी जीवों को जीवन जीने का अधिकार प्राप्त है. प्रकृति को नष्ट करके, हम सभी जीवों के जीवन जीने के इस अधिकार को अस्वीकृत कर रहे हैं. यह कार्य अन्यायपूर्ण और अनैतिक है. न केवल अन्य मनुष्यों, बल्कि प्रत्येक जीव का सम्मान करना और उनके जीने के अधिकार को स्वीकृति प्रदान करना हमारा कर्तव्य है.

पर्यावरणीय नैतिकता से सम्बन्धित मुद्दे

प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग

प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं और मानव अस्तित्व के लिए महत्त्वपूर्ण हैं. इनका सम्बन्ध भावी पीढ़ियों के स्वच्छ और हरित पर्यावरण के अधिकार से है.

वनों का विनाश

  • जब औद्योगिक प्रक्रियाएँ संसाधनों का विनाश का कारण बनती हैं, तो क्या यह उद्योगों का उत्तरदायित्व नहीं है कि वे क्षरित संसाधनों को पुनर्स्थापित करें?
  • क्या पर्यावरण के पुनर्स्थापन के माध्यम से मूल पर्यावरण की पुनर्प्राप्ति की जा सकती है? जैव विविधता की क्षति के लिए कौन उत्तरदाई है?
  • क्या वनों में स्थित वन्यजीवों और पौधों के अधिकार हैं? यदि वन्यजीवों, पौधों और अन्य प्रजातियों को नष्ट कर दिया जाएगा तो क्या होगा? क्या यह हमें प्रभावित करेगा?
  • क्या केवल हमारे उपभोग और लालच के लिए कुछ प्रजातियों के विलुप्त हो जाने का कारण बनना सही है?

पशुओं को हानि

कई अन्य पशु प्रजातियों की संख्या निरंतर कमी हो रही है. क्योंकि उनका उपयोग खाद्य स्रोत, पशुओं में परीक्षण (animal testing) आदि के लिए किया जा रहा है. हम पशुओं को उनके जीने के अधिकार से कैसे वंचित कर सकते हैं? उन्हें उनके आवास और भोजन से वंचित करने का हमारा कृत्य कहाँ तक उचित है? हमें हमारी सुविधाओं के लिए उन्हें क्षति पहुँचाने का अधिकार किसने दिया?

पर्यावरण प्रदूषण

  • पर्यावरण की समस्याओं का एक मजबूत विस्तार सम्बन्धी आयाम होता है. उदाहरण के लिए, जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों से वर्तमान पीढ़ी के निर्धन लोग और भावी पीढ़ी असंगत रूप से प्रभावित होगी, जोकि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए कम उत्तरदाई हैं.
  • इसकी भलीभांति समझ होने के बावजूद कि गैसोलीन से चलने वाले वाहन प्राकृतिक संसाधनों के विनाश को बढ़ावा देते हैं? क्या हमारे लिए यह उचित है कि हम इनके विनिर्माण और उपयोग को जारी रखें?
  • क्या पर्यावरण और प्रकृति की सुरक्षा के लिए तैयार किये गये दिशानिर्देशों का कोई प्रभाव हुआ है? उनकी विफलता के क्या कारण हैं?

पर्यावरणीय नैतिकता को कैसे बनाया रखा जाए?

  • प्राकृतिक संसाधनों का न्यायोचित उपयोग
  • ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लोगों के मध्य समानता
  • भावी पीढ़ियों के लिए संसाधनों का संरक्षण
  • जानवरों के पर्यावरणीय अधिकार
  • पर्यावरण शिक्षा
  • पारम्परिक मूल्य प्रणालियों का संरक्षण
  • जानवरों को अनावश्यक हानि न पहुँचाना
  • इको-टूरिज्म की रोकथाम
  • पर्यावरण अनुकूल वस्तुओं का उपयोग करना
  • पर्यावरण को साफ़ और स्वच्छ रखना
  • पर्यावरण प्रभाव आकलन
  • पर्यावरण की सुरक्षा में सामुदायिक भागीदारी

नैतिक सिद्धांत और पर्यावरण

धर्म

अधिकांश धर्म पर्यावरण के संरक्षण या प्रकृति को संरक्षित करने के विचारों को प्रोत्साहित करते हैं. कुछ धर्मों में, कुछ पौधों या जानवरों, नदियों और पहाड़ों आदि की उन्हें किसी विशेष देवता से सम्बंधित पवित्रता या प्रतीकों के रूप में मानते हुए पूजा की जाती है. इससे ज्ञात होता है कि पशुओं और अन्य गैर-मानवीय सत्ताओं के अधिकारों का अपमान करना धार्मिक नैतिकता के विरुद्ध है.

मानव केन्द्रित नैतिकता (Anthropocentric Ethics)

यह उपयोगितावादी नैतिकता का एक भाग है. इसमें यह दावा किया जाता है कि हमारे पास जो भी प्रत्यक्ष नैतिक दातित्व हैं (जिसमें पर्यावरण के सम्बन्ध में हमारे दायित्व भी सम्मिलित हैं), वे हमारे साथी मनुष्यों के कारण ही हैं. इसके अनुसार पर्यावरण सम्बन्धी चिंताएँ केवल इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि ये मनुष्यों को प्रभावित करती हैं. उदारहण के लिए, प्रदूषण स्वास्थ्य को क्षीण करता है, संसाधनों का ह्रास जीवन स्तर के समक्ष संकट उत्पन्न करता है तथा जलवायु परिवर्तन मानव जीवन और आजीविका के समक्ष खतरा उत्पन्न करता है. समग्र रूप में, मानव केन्द्रित नैतिकता यह दावा करती है कि पर्यावरण का सम्मान करना हमारा दायित्व है ताकि मानव कल्याण और समृद्धि सुनिश्चित की जा सके.

पर्यावरणीय नैतिकता की मौजूदा परम्पराएँ मानव केन्द्रित हैं क्योंकि ये दावा करती हैं कि गैर-मानव “प्रकृति/पारिस्थितिकी तन्त्र” का मानव कल्याण के साधन के रूप में केवल “सहायक” मूल्य है.

गहन पारिस्थितिकी (Deep Ecology)

  • इस पारिस्थितिकी-दर्शन के अनुसार, मनुष्यों को “स्वयं (self)” की अपनी अवधारणा को विस्तृत कर इसमें अन्य जीवन रूपों को शामिल करना चाहिए. इसका सम्बन्ध पारिस्थितिकी चेतना के विचार से है. यह 8 बुनियादी सिद्धांत प्रदान करता है :-
  • पृथ्वी पर मानव और गैर-मानव जीवन, दोनों का अन्तर्निहित मूल्य होता है.
  • जीवन रूपों की समृद्धता और विविधता इन मूल्यों की प्राप्ति में योगदान करती है और यह खुद भी एक मूल्य होती है.
  • महत्त्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के अतिरिक्त मनुष्यों के पास इस समृद्धता और विविधता को कम करने का कोई अधिकार नहीं है.
  • सभी जीवन रूपों और संस्कृतियों का विकास वस्तुतः कम जनसंख्या के साथ संगत होता है.
  • मानव द्वारा गैर-मानव विश्व (non-human world) में अत्यधिक हस्तक्षेप किया जाता है और इससे स्थिति तेजी से खराब होती जा रही है. इसलिए नीतियों में संशोधन किया जाना चाहिए.
  • वैचारिक परिवर्तन इस रूप में होना चाहिए जो मुख्य रूप से बढ़ते हुए उच्च जीवन स्तर के विपरीत जीवन की गुणवत्ता का समर्थन करता हो.

सद्गुणों की नैतिकता (Virtue Ethics)

इसके अंतर्गत चरित्र की उत्कृष्टता का एक निश्चित क्षेत्र शामिल है जो एक बेहतर मानव जीवन के लिए आवश्यक है जैसे : सत्यनिष्ठा, संवेदनशीलता, अच्छा निर्णय आदि. ये यह निर्धारित करते हैं कि हम गैर-मानव विश्व से किस प्रकार सम्बन्ध स्थापित करते हैं, उदाहरण के लिए, अन्य संवेदनशील प्राणियों के प्रति संवेदनशीलता और करुणा रखना.

सतत विकास में निहित नैतिकता (Ethics behind Sustainable Development)

अंतर-पीढ़ीगत समानता (Inter-generational equality)

इसका आशय है कि संसाधनों के उचित उपयोग, प्रदूषण में कमी, जनसंख्या नियंत्रण और पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखते हुए भावी पीढ़ी को एक स्वस्थ, संसाधनपूर्ण और सुरक्षित पर्यावरण का हस्तांतरण करना हमारा उत्तरदायित्व है.

अन्तः-पीढ़ीगत समानता (Intra-generational equality)

राष्ट्रों के भीतर और परस्पर समानता को बढ़ावा देने के लिए इस प्रकार की तकनीक का विकास करना जो गरीब देशों के आर्थिक विकास में सहयोग करे ताकि राष्ट्रों के मध्य विद्यमान सम्पत्ति अंतराल को कम किया जा सके. यह सभी के लिए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने के समान अवसर प्रदान करेगी.

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