द्वैध शासन से आप क्या समझते हैं? Diarchy in Hindi

Dr. SajivaHistory, Modern HistoryLeave a Comment

Subhas_Chandra_Bose
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1919 ई. के भारत सरकार अधिनियम द्वारा प्रांतीय सरकार को मजबूत बनाया गया और द्वैध शासन (diarchy) की स्थापना की गई. 1919 के पहले प्रांतीय सरकारों पर केंद्र सरकार का पूर्ण नियंत्रण रहता था. लेकिन अब इस स्थिति में परिवर्तन लाकर प्रांतीय सरकारों को उत्तरदायी बनाने का प्रयास किया गया. इस द्वैध शासन का एकमात्र उद्देश्य था – भारतीयों को पूर्ण उत्तरदायी शासन के लिए प्रशासनिक शिक्षा देना. द्वैध शासन के प्रयोग ने भारत में एक नया ऐतिहासिक अध्याय प्रारंभ किया. असम, बंगाल, बिहार, उड़ीसा, बम्बई, मध्य प्रांत, पंजाब, मद्रास, संयुक्त प्रांत और बर्मा में यह नयी व्यवस्था लागू की गयी.

इस अधिनियम द्वारा केंद्र एवं प्रान्तों के बीच विषयों का बँटवारा किया गया और जो विषय भारत के हित में थे, उन्हें केन्द्रीय सरकार के अधीन रखा गया. प्रतिरक्षा, यातायात, विदेश नीति, सीमा शुल्क, मुद्रा, सार्वजनिक ऋण इत्यादि को केन्द्रीय विषय में सम्मिलित किया गया. स्थानीय स्वशासन सार्वजनिक, स्वास्थ्य, सफाई और शिक्षा, पुलिस, जेल तथा सहकारिता आदि को प्रांतीय विषय के अधीन रखा गया.

द्वैध शासन के अंतर्गत नियम (System under Diarchy)

अधिनियम में की गई व्यवस्था के अनुसार प्रांतीय सरकार केंद्र सरकार के नियंत्रण तथा निर्देशन में कार्य करती थी. सभी महत्त्वपूर्ण विषयों की सूचना उसे केंद्र सरकार को देनी पड़ती थी. क्रांतिकारी संगठनों को दबाने के लिए केंद्र सरकार जो आदेश जारी करती थी उसे प्रांतीय सरकार को अनिवार्य रूप से मानना पड़ता था. प्रान्तों को वित्त सम्बन्धी कुछ अधिकार दिए गए थे और वह कुछ विषयों पर अलग कर (tax) लगाकर अपने खर्चे के लिए पैसा जमा कर सकती थी. इससे प्रांतीय वित्त व्यवस्था में आत्मनिर्भरता आई. प्रान्तों में हस्तांतरित विषयों का शासन चलाने के लिए एक गवर्नर होता था जो अपने अधीन कुछ मंत्रियों की नियुक्ति करता था. गवर्नरों को 1919 के अधिनियम में एक निर्देश पत्र जारी किया गया था जिसमें मंत्रियों की सलाह मानने तथा जन-प्रतिनिधियों की इच्छा पर ध्यान देने का आग्रह किया गया था. मंत्रियों के विचार के विरुद्ध भी गवर्नर हस्तांतरित विषय के सम्बन्ध में कोई निर्णय ले सकता था.

द्वैध शासन के अंतर्गत जिस द्वैध शासन की स्थापना हुई उसमें प्रांतीय विधानमंडल के अधिकार और कार्य में परिवर्तन किये गए थे. विधानपरिषद् की सदस्य संख्या बढ़ाई गई तथा दो सदन के सिद्धांत को स्वीकार किया गया. विधानपरिषद् का कार्यकाल तीन वर्षों का था. निर्धारित अवधि के पहले भी गवर्नर विधानपरिषद् को भंग कर सकता था. प्रांतीय विधानपरिषद् को शासन के लिए कानून बनाने का अधिकार प्राप्त था. साधारण कानून बनाने के लिए उसे गवर्नर जनरल की पूर्वानुमति नहीं लेनी पड़ती थी. विशेष महत्त्वपूर्ण विषयों पर कानून बनाने के लिए गवर्नर जनरल की अनुमति आवश्यक थी. गवर्नर विधानपरिषद् के किसी विधेयक को पुनर्विचार के लिए भेज सकता था. वित्त पर अंतिम निर्णय गवर्नर का ही रहता था. कार्यकारिणी परिषद् के सदस्य को हटाने का अधिकार विधानपरिषद् को नहीं था; वह केवल प्रश्न एवं पूरक प्रश्न पूछ सकती थी और काम रोको प्रस्ताव पास कर सकती थी. द्वैध शासन के कारण विधानपरिषद् की कार्यवाही में अनेक प्रकार की त्रुटियाँ थीं. विधानपरिषद् में अनेक सम्प्रदाय, वर्ग और हितों को विशेष प्रतिनिधित्व देकर देश की राष्ट्रीय एकता को चोट पहुँचाई गई.

द्वैध शासन की असफलता (Failure of Diarchy System)

द्वैध शासन असफल रहा. इसकी विफलता कई कारणों से हुई थी. इसने खुद सरकार के अन्दर ही कई मतभेद पैदा कर दिए. इसका एक भाग उत्तरदायी और दूसरा अनुत्तरदायी था. यह गलत सिद्धांत पर आधारित था और प्रांतीय विषयों का विभाजन दोषपूर्ण था. गवर्नर को कोई वास्तविक अधिकार नहीं दिया गया था. प्रांतीय सरकार को हमेशा वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था और सुधारों के प्रति हमेशा ब्रिटिश सरकार की उदासीन नीति के कारण द्वैध शासन सफल नहीं हो सका. इस व्यवस्था में सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना का पूर्णतया अभाव था और मंत्री तथा लोक सेवकों के बीच बराबर तनावपूर्ण सम्बन्ध बना रहता था. इस प्रकार आंशिक उत्तरदायी शासन यानी द्वैध शासन हर दृष्टिकोण से असफल रहा. यह एक अधूरी योजना थी जो भारत के लिए एक मजाक का विषय ही बनी रही.

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