भारत सरकार अधिनियम, 1919 – मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार

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1858 में कम्पनी की सत्ता हस्तगत करने के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने भारत में सहयोग की नीति का अनुसरण किया. इसे कार्य रूप देने के लिए 1861, 1892 एवं 1909 के अधिनियम पारित किये गये. परन्तु यह नीति सफल सिद्ध नहीं हुई. इसलिए ब्रिटिश सरकार ने अपनी भारतीय नीति में बदलाव लाया. यह अनुभव किया गया कि केवल भारतीयों से सहयोग लेना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि भारत में क्रमशः उत्तरदायी शासन की स्थापना भी की जानी चाहिए. इसके लिए 1919 में दूसरा अधिनियम पारित कर आंशिक उत्तरदायित्व (partial responsibility) के सिद्धांत को अपनाया गया. इस अधिनियम के जन्मदाता भारत सचिव मॉण्टेग्यु तथा भारतीय गवर्नर जनरल चेम्सपफोर्ड थे. अतः इसे “मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार” या “मांट-फोर्ड सुधार” या “1919 का भारत सरकार अधिनियम” भी कहा जाता है.

मांटेग्यू ने भारत के वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड तथा भारत के राष्ट्रवादियों से भेंट की और एक समिति का गठन किया जिसमें एक भारतीय भूपेन्द्रनाथ बसु भी शामिल थे. समिति ने सुधारों का एक मसौदा तैयार किया. प्रस्तावित सुधारों के एक अंतिम प्रारूप को जुलाई 1918 में प्रकाशित किया गया जिसे  1919 का भारत सरकार अधिनियम कहते हैं.

भारत सरकार अधिनियम 1919 की प्रस्तावना

  1. अधिनियम की प्रस्तावना में मांटेग्यू घोषणा में निहित तत्त्वों का समावेश किया गया. प्रस्तावना में निम्नलिखित बिन्दुओं को सम्मिलित किया गया –
  2. भारत, ब्रिटिश साम्राज्य का एक अभिन्न अंग है.
  • भारत में उत्तरदायी सरकार की स्थापना की जायेगी जोकि क्रमिक विकास द्वारा ही सम्भव है.
  1. भारतीय शासन में भारतीयों की भागीदारी उत्तरोत्तर बढ़ाना है.
  2. स्वशासी प्रशासनिक संस्थाओं का शनैः शनैः विकास किया जाएगा.
  3. प्रान्तों में स्वायत्त शासन के विकास के साथ ही प्रान्तों को केंद्र सरकार के नियंत्रण से जहाँ तक संभव हो, मुक्त किया जाना था.

मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार को पारित करने के कारण

1919 में भारत सरकार अधिनियम के पारित होने के निम्नलिखित कारण थे –

मॉर्ले-मिण्टो सुधार से अंसतोष (Dissatisfaction with the Morley Minto Reforms)

मॉर्ले-मिण्टो सुधार त्रुटिपूर्ण, एवं अपर्याप्त था. उनसे भारतवासियों का कोई भी वर्ग संतुष्ट नहीं हुआ. भारतवासी पूर्ण स्वराज के लिए संघर्ष कर रहे थे. मॉर्ले-मिण्टो सुधार ने उनकी आशा पर पानी फेर दिया. अधिनियम कई अर्थों में प्रतिगामी था, उसने सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को अपनाकर भारत में सांप्रदायिकता का बीज बोया. यद्यपि निर्वाचन की प्रथा अपनायी गयी थी, परन्तु उसका व्यावहारिक महत्त्व नहीं के  बराबर रहा. प्रांतीय तथा स्थानीय संस्थाओं पर केन्द्रीय नियंत्रण को और भी दृढ़ बना दिया गया, जिससे केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति को बल मिला. अतः भारतीयों को यह अधिनियम संतोष प्रदान नहीं कर सका जिस कारण सुधारों के लिए उनका आन्दोलन और भी तेज हो गया. ;

सरकार की दमन नीति (Govt policy of repression)

ब्रिटिश सरकार ने सुधारों द्वारा उदारवादियों को खुश करने तथा दमनचक्र द्वारा उग्रवादियों को कुचलने की नीति अपनायी. लेकिन वह न तो उदारवादियों को खुश कर सकी न उग्रवादियों को ही कुचल सकी. उसके दमनकारी कार्यों की घोर प्रतिक्रिया हुई. राष्ट्रीय आन्दोलन और भी तीव्र हो गया तथा क्रांतिकारी और आतंकवादी सक्रिय हो गये. स्वभावतः सरकार का ध्यान भारतीयों को संतुष्ट करने की ओर गया. 

सरकार के प्रति मुसलमानों के रुख में परिवर्तन (Change in the Muslim attitude towards the government)

प्रारम्भ में सरकार के पक्षपाती नीतियों के चलते मुसलमानों को बहुत प्रोत्साहन मिला और वे ब्रिटिश सरकार की ओर बहुत हद तक झुक गये. पृथक निर्वाचन की मान्यता ने अंग्रेजों और मुसलमानों की मित्रता की घनिष्ठता को भी गाढ़ा बना दिया. लेकिन मॉर्ले-मिण्टो सुधार के बाद कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिनसे मुसलमानों में राष्ट्रीय जागरण हुआ तथा वे अंग्रेज विरोधी हो गये. 1911 में बंगाल विभाजन का अंत कर दिया गया, जिससे मुसलमानों का सरकार पर से विश्वास उठने लगा. तुर्की-इटली युद्ध और बाल्कन युद्ध में अंग्रेजों ने तुर्की के विरुद्ध नीति अपनायी जिससे भारतीय मुसलमान बहुत ही सशंकित हो गये. दूसरी ओर राष्ट्रवादी पत्र-पत्रिकाओं ने मुसलमानों के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित की. इसका फल यह हुआ कि मुसलमान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नजदीक आने लगे, मुस्लिम लीग पर अलीगढ़ आन्दालेन का प्रभाव कम होने लगा तथा कुछ राष्ट्रवादी मुसलमानों का प्रभाव उस पर बढ़ गया. लीग का दृष्टिकोण राष्ट्रवादी तथा प्रगतिवादी हो गया. कांग्रेस और लीग का अधिवेशन लखनऊ में एक ही समय हुआ और दोनों ने सुधार की योजना एक समान तैयार की जो ‘लखनऊ समझौते’ के नाम से प्रसिद्ध है. यह एक महान् ऐतिहासिक घटना थी जिसने भारत के बड़े संप्रदायों को एकता के सूत्र में बांध दिया.

प्रथम विश्वयुद्ध का प्रभाव

1914 में प्रथम विश्वयुद्ध आरंभ हुआ. भारतीयों का युद्ध में सहयोग प्राप्त करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने उसके साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना प्रारम्भ कर दिया और उन्हें जीतने के उद्देश्य से अनेक घोषणाएं की गयीं. भारतीयों ने भी उदारता दिखलायी और ब्रिटिश शासकों की युद्ध में भरपूर सहायता की. लॉर्ड हार्डिंग ने भारतीयों के साथ प्रेम और सहानुभूति का बर्ताव किया और दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी भारतीयों के प्रति अन्यायपूर्ण व्यवहार का विरोध किया. लायड जार्ज ने यह घोषणा की कि “सभी राष्ट्रों को अपना-अपना भाग्य निर्णय करने का अधिकार होगा”.

मित्र राष्ट्रों ने भी यह ऐलान किया कि वे निजी स्वार्थों के लिए युद्ध नहीं लड़ रहे हैं, अपितु संसार के जनतंत्र की रक्षा के लिए ही उन्होंने युद्ध में प्रवेश किया है. चूंकि ब्रिटिश सरकार ने बार-बार इस बात पर जोर दिया था कि जनतंत्र की रक्षा करने और पराधीन राष्ट्रों को आत्म-निर्णय का अधिकार देने के लिए वह युद्ध कर रही है, इसलिए भारतीयों को यह आशा हुई कि युद्ध के उपरांत भारत को स्वशासन का अधिकार होगा. युद्ध काल में भारतीयों ने स्वतंत्रता और स्वशासन का महत्त्व भी समझा. इस प्रकार प्रथम महायुद्ध के प्रभाव के अंतर्गत भारतीयों में राष्ट्रीय जागरण और चेतना आयी. युद्ध की समाप्ति के बाद अंग्रेजों ने अपने आश्वासन को पूरा नहीं किया. इसलिए भारतीयों ने श्रीमती एनी बेसेंट तथा तिलक के नेतृत्व में होम रूल आन्दालेन चलाया. यद्यपि इस आंदोलन को दबा दिया गया, फिर भी इससे भारतीयों में चेतना और जागरण की वृद्धि हुई और राष्ट्रीय एकता अपनी चरम-सीमा पर पहुँच गयी.

केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा के सदस्यों द्वारा ज्ञापन पत्र

जब केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा के सदस्यों को लॉर्ड चेम्सफोर्ड द्वारा प्रस्तुत सुधार प्रस्तावों के विषय में पता चला तो 19 निर्वाचित सदस्यों, जिनमें जिन्ना, श्रीनिवास शास्त्री और सुरेन्द्र नाथ बनर्जी आदि शामिल थे, ने सरकार के पास एक ज्ञापन पत्र प्रस्तुत किया. उनका कहना था कि केवल उत्तम सरकार या कुशल शासन ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसी सरकार की आवश्यकता है जो जनता के प्रति उत्तरदायी हो, वह हमें स्वीकार है.

उनके कुछ सुझाव इस प्रकार थे – कार्यकारिणी या व्यवस्थापिका परिषदों में कम से कम आधे भारतीय हों, विधान परिषदों में निर्वाचित सदस्यों का बहुमत हो, अल्पसंख्यकों को समुचित प्रतिनिधित्व मिले, भारत सचिव का पद हटा दिया जाए तथा प्रांतों को स्वायत्तता मिले.

मेसोपोटामिया की घटना

मेसोपोटामिया की घटना का भी भारत के संवैधानिक विकास पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा. टर्की के विरुद्ध कार्यवाही की पूरी जिम्मेदारी भारत सरकार पर थी, जिसमें वह पूर्णतः असफल रही, मेसोपोटामिया कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में भारत सरकार को दोषी ठहराया तथा भारत में राजनैतिक सुधार की मागं की.

ड्यूक द्वारा याचना पत्र 1915

विलियम ड्यूक जो बंगाल का भूतपूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर तथा भारतीय परिषद् का सदस्य था, ने भारतीय समस्याओं से संबंधित एक याचना पत्र प्रस्तुत किया. उसने प्रांतों में द्वैध शासन लागू करने का सुझाव दिया जो आंशिक रूप से उत्तरदायी होगी. उसके विचार से यह मध्यान्तरिक व्यवस्था होगी, क्योंकि एकाएक पूर्ण उत्तरदायी सरकार की स्थापना भारत में संभव नहीं थी. यद्यपि इस प्रलेख का कहीं भी उल्लेख नहीं किया गया, फिर भी 1919 के सुधार अधिनियम का यह वास्तविक आधार था.

भारत सरकार अधिनियम, 1919 की मुख्य धाराएं

गृह सरकार में परिवर्तन

  • 1793 में भारत राज्य सचिव को भारतीय राजस्व से वेतन मिलता था. वह अब अंग्रेजी राजस्व से मिलने लगा.
  • राज्य सचिव के कुछ कार्यों को लेकर एक नये पदाधिकारी भारतीय उच्च आयुक्त (Indian High Commissioner) जिसको भारतीय राजस्व से वेतन मिलता था, दे दिये गये. यह उच्च आयुक्त अब सपरिषद गवर्नर जनरल का कार्यकर्ता (agent) बन गया.
  • प्रांतों में हस्तांतरित विषयों पर भारत सचिव का नियंत्रण कम हो गया, यद्यपि केन्द्र पर उसका नियंत्रण बना रहा.

भारत सरकार में परिवर्तन

कार्यकारिणी में परिवर्तन : यद्यपि केन्द्र में उत्तरदायी सरकार लाने का कोई प्रयत्न नहीं किया गया, परन्तु भारतीयों को अधिक प्रभावशाली भूमिका दी गयी. गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में 8 सदस्यों में से 3 भारतीय नियुक्त किये गये और उन्हें विधि, शिक्षा, श्रम, स्वास्थ्य तथा उद्योग विभाग इत्यादि सौंपे गये. 

विषयों का बंटवारा : इस समय तक सभी विषयों पर केन्द्र का अधिकार था और वह सभी विषयों पर आज्ञा दे सकता था तथा कानून बना सकता था. इन नये सुधारों के अनुसार विषयों को केन्द्र तथा प्रांतों में बांट दिया गया. केन्द्रीय सूची में सम्मिलित विषयों पर सपरिषद गवर्नर जनरल का अधिकार था. इसमें वे विषय सम्मिलित थे जो राष्ट्रीय महत्त्व के थे अथवा एक से अधिक प्रांतों से संबंध रखते थे, जैसे – विदेशी मामले, राजनैतिक संबंध, डाक और तार, सार्वजनिक, संचार व्यवस्था, दीवानी तथा फौजदारी कानून तथा कार्यप्रणाली इत्यादि. सभी मामले केन्द्रीय सूची में थे, परन्तु जो प्रांतीय महत्त्व के विषय थे, जैसे – स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, शिक्षा, चिकित्सा प्रशासन, भूमिकर प्रशासन, जल संभारण, अकाल सहायता, शांति तथा व्यवस्था, कृषि इत्यादि प्रांतीय सूची में थे. जो विषय स्पष्ट हस्तान्तरित नहीं किए गये वे सभी केन्द्रीय माने गये.

विधान संबंधी परिवर्तन: एक सदनीय साम्राज्यिक विधान परिषद (imperial legislative council) के स्थान पर भारत सरकार अधिनियम 1919 के अनुसार केन्द्र में द्विसदनीय व्यवस्था स्थापित की गई. एक सदन राज्य परिषद (Council of State) और दूसरा सदन केन्द्रीय विधान सभा (Central Legislative Assembly) था.

राज्य परिषदों में जो ऊपरी सदन था, उसमें 60 सदस्य होते थे, जिसमें 26 गवर्नर जनरल द्वारा मनोनीत होते थे और 34 निर्वाचित होते थे. 26 मनोनीत सदस्यों में से 19 पदाधिकारी तथा 7 अशासनिक होते थे. 34 निर्वाचितों में से 20 साधारण निर्वाचन क्षेत्रों से चुने जाते थे, 10 मुसलमानों द्वारा, तीन यूरोपीयों द्वारा तथा एक सिखों द्वारा. इस राज्य परिषद का प्रति वर्ष आंशिक रूप से नवीकरण होता था. यद्यपि ये सदस्य प्रायः 5 वर्ष के लिए बनते थे. इसका प्रधान वायसराय द्वारा नियुक्त होता था. सदस्यों को ‘माननीय’ (Honurable) की उपाधि दी जाती थी. स्त्रियों को सदस्यता के उपयुक्त नहीं समझा गया. गवर्नर जनरल इस सदन को बुला, स्थगित अथवा भंग कर सकता था.

मताधिकार बहुत सीमित था. केवल वही लोग जिनकी आय 10,000 रुपये वार्षिक थी अथवा जो न्यूनतम 750 रुपये वार्षिक भूमिकर के रूप में देते थे, मत का अधिकार प्राप्त कर सकते थे. दूसरे, प्रत्याशी को किसी विधान मडंल का अनुभव होना चाहिए अथवा से किसी विश्वविद्यालय के सीनटे का सदस्य होना चाहिए था. इसके अतिरिक्त वह उपाधिकारी (title holder) भी होना चाहिए. इसके अतिरिक्त करोड़ की जनसंख्या में से केवल 17,364 व्यक्ति ही मताधिकार प्राप्त कर सके.

निम्न सदन को केन्द्रीय विधान सभा कहते थे, उसमें 145 सदस्य थे जिनमें 104 निर्वाचित तथा 41 मनोनीत होते थे. मनोनीत सदस्यों में से 26 शासनिक तथा 15 अशासनिक होते थे. 104 निर्वाचित में से 52 साधारण निर्वाचन क्षेत्रों से, 32 साम्प्रदायिक क्षेत्रों से (30 मुसलमान, 2 सिख) और 20 विशेष निर्वाचन क्षेत्रों से (7 भूमिपतियों द्वारा, 9 यूरोपीयों द्वारा) और 4 भारतीय व्यापार समुदायों द्वारा निर्वाचित किये जाते थे.

सभा का कायर्काल 3 वर्ष का था, मगर गवर्नर जनरल की इच्छा पर बढ़ाया भी जा सकता था. यह उल्लेखनीय है कि 1936 में निर्वाचित सभा 10 वर्ष के बाद भंग हुई. यहां भी मताधिकार बहुत सीमित था. मतदाता 15 रुपये मासिक किराया देता हो अथवा 15 रुपये वार्षिक नगरपालिका का कर देता हो अथवा न्यूनतम 2000 रुपये वार्षिक आयकर देता हो अथवा 50 रुपए वार्षिक भूमिकर देता हो. ऐसे लोगों की संख्या 1920 में 9 लाख के लगभग ही थी.

प्रान्तों में स्थानों का बटंवारा जनसंख्या पर नहीं अपितु उनके महत्त्व पर था. उदाहरण के रूप में पंजाब (सैनिक महत्त्व के कारण) तथा बिहार, उड़ीसा को 12-12 स्थान मिले यद्यपि पंजाब की जनसंख्या बिहार और उड़ीसा का 2/3 थी. मद्रास तथा बम्बई प्रत्येक को 16 स्थान मिले यद्यपि बम्बई की जनसंख्या मद्रास से आधी थी. बम्बई का व्यापारिक महत्त्व था.

केन्द्रीय विधान मंडल की शक्तियाँ

द्विसदनीय केन्द्रीय विधान मंडल को पर्याप्त शक्तियां दी गयीं. यह समस्त भारत के लिए कानून बना सकता था, भारतीय प्रजा तथा सरकारी अधिकारियों के लिए भी, चाहे वे भारत में हों अथवा विदेश में. किसी भी विद्यमान कानून को बदला या रद्द किया जा सकता था. सदस्यों को प्रस्ताव अथवा स्थगन प्रस्ताव रखने की अनमुति थी ताकि किसी महत्त्वपूर्ण विषय पर तुरंत विचार किया जा सके. उन्हें प्रश्न तथा पूरक प्रश्न पूछने की भी अनुमति थी. अल्पकालिक प्रश्न भी पूछे जा सकते थे. सदस्यों को बोलने का अधिकार तथा स्वतंत्रता थी. परन्तु विधान मंडल पर कुछ नियंत्रण भी थे. निम्नलिखित विषयों पर विधेयक रखने के पूर्व गवर्नर जनरल की अनुमति प्राप्त करनी आवश्यक थी –

  • विद्यमान कानून को अथवा गवर्नर जनरल के अध्यादेश को रद्द करना अथवा उसमें संशोधन करने से संबंधित विधेयक
  • विदेशी तथा देशी रियासतों से संबंध
  • स्थल, नौसेना तथा वायुसेना का अनुशासन बनाये रखना
  • सावर्जनिक ऋण तथा कर
  • जनता के धर्म और धार्मिक रीति-रिवाज
  • उपर्युक्त के अतिरिक्त यदि गवर्नर जनरल यह समझे कि किसी विधेयक से देश अथवा साम्राज्य की शक्ति तथा रक्षा को भय है तो वह उस पर विचार रोक सकता था. यदि गवर्नर जनरल के आदेश पर विधान मंडल किसी विधेयक को पारित नहीं करता तो गवर्नर जनरल क्राउन की अनमुति लकेर उसे पारित कर सकता था और वह 6 माह तक लागू रहता. इसे साधारण काननू का महत्त्व प्राप्त था. गवर्नर जनरल की अनमुति किसी भी काननू के लिए आवश्यक थी. इससे स्पष्ट है कि गवर्नर जनरल के पास वास्तविक निषेधाधिकार थे.

बजट के विषय में यह कहा गया कि सरकार विधान सभा में उसे विनियोग मांगों के रूप में प्रस्तुत करेगी. कुछ मुद्दे सभा के मतों पर निर्भर थे, कुछ मुद्दों पर बहस हो सकती थी और कुछ मुद्दों पर बहस नहीं भी हो सकती थी. वोट को तो छोड़ ही दें.

प्रातों में द्वैध शासन (Dyarchy) की स्थापना

भारत सरकार अधिनियम 1919 से सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तन प्रांतीय प्रशासन में आया. जैसा कि माण्टफोर्ड रिपोर्ट में कहा गया था और प्रस्तावना में भी दुहराया गया था. प्रांत में उत्तरदायी सरकार स्थापित करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिये जिससे हम अपने उत्तरदायित्व को ध्यान में रखते हुए उन्हें अधिकाधिक वैधानिक तथा प्रशासनिक स्वतंत्रता प्रदान कर सकें. इसी उद्देश्य से प्रांतों में द्वैध प्रशासनिक प्रणाली की स्थापना की गयी.

समीक्षा

मुख्य रूप से भारत सरकार अधिनियम 1919 में तीन त्रुटियाँ थीं. पहली, यह कि केंद्र में आंशिक रूप से भी उत्तरदायी सरकार नहीं थी. दूसरी, पृथक् मताधिकार को सुदृढ़ किया गया और तीसरे, प्रांतों में द्वैध शासन को लागू करना, जिसे कार्यान्वित करना बहुत ही कठिन कार्य था. परन्तु फिर भी भारत सरकार अधिनियम 1919 इससे पूर्व की संवैधानिक परिस्थिति से निश्चय ही आगे बढ़ने वाला एक पग था. इसके द्वारा मताधिकार में कुछ उदारता आयी तथा सीधे चुनाव प्रारंभ हुए. इसके अतिरिक्त भारतीयों को एक नया अवसर मिला कि उनका राजनीतिक प्रशिक्षण हो तथा वे शासकीय कार्य को कुछ प्रभावित कर सकें.

आरंभ से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत सरकार अधिनियम 1919 को ‘निराशाजनक तथा असंतोषप्रद’ की संज्ञा दी. उन्होंने कहा कि प्रांतों में द्वैध शासन तभी सहन किया जा सकता है, यदि केंद्र में भी इसे लागू किया जाए. कांग्रेस ने यह भी गारंटी मांगी की पूर्ण स्वायत्त शासन 15 वर्षों में लागू किया जाएगा. गारंटी न मिलने पर कांग्रेस ने 1920 में अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन आरम्भ कर दिया. 1923 में कांग्रेस के स्वराज दल ने चुनावों में भाग लिया ताकि संविधान को विधानमंडलों के अन्दर से तोड़ा जाए. पहला निर्वाचन 1920 में हुआ और द्वैध शासन 1921 से 1937 तक 9 प्रांतों में चलता रहा. केवल बंगाल में 1924 से 1927 तथा मध्य प्रांत में 1924 से 1926 तक निलम्बित रहा. यह ठीक है कि द्वैध शासन भद्दा, भ्रममय तथा जटिल था और इसका असफल होना निश्चित था. पर इस प्रयाग को सर्वथा निष्पफल नहीं कह सकते. लोकप्रिय मंत्रियों ने स्थानीय निकायों, शिक्षा तथा समाज सुधारों की ओर ध्यान दिया. परन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि अंग्रेजो का यह कथन कि भारतीय स्वशासन के योग्य नहीं, असत्य सिद्ध हो गया. यह संवैधानिक अनुभव उनके लिए बहुत ही लाभप्रद तथा प्रोत्साहन देने वाला था.

Important Quick Points of Govt. of India Act 1919

  • कांग्रेस के 1916 के प्रस्ताव में कहा गया था कि, भारत पर शासन दिल्ली और शिमला से होना चाहिए न कि व्हाईट हॉल तथा डाउनिंग स्ट्रीट से.
  • 1919 के अधिनियम द्वारा ‘आंशिक उत्तरदायित्व’ के सिद्धांत को अपनाया गया.
  • इस अधिनियम का जन्मदाता भारत सचिव मांटेग्यू तथा भारतीय गवर्नर जनरल चेम्सपफोर्ड थे.
  • प्रथम विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉयड जार्ज ने यह घोषणा की थी कि, “सभी राष्ट्रों को अपना-अपना भाग्य निर्णय करने का अधिकार होगा.” मित्र राष्ट्रों ने भी ऐलान किया कि “वे निजी स्वार्थों के लिए युद्ध नहीं लड़ रहे हैं, अपितु संसार के जनतंत्र की रक्षा के लिए ही उन्होंने युद्ध में प्रवेश किया है.”
  • विलियम ड्यूक, जो बंगाल का भूतपूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर तथा भारतीय परिषद का सदस्य था, ने 1915 में अपनी याचना पत्र में प्रांतों में द्वैध शासन लागू करने का सुझाव दिया था.
  • मांटेग्यू की घोषणा” 20 अगस्त, 1917 को लोकसभा में दी गयी, इसे ‘अगस्त घोषणा’ (August Declaration) भी कहते हैं. “स्मार्ट सरकार की नीति, जिससे भारत सरकार पूर्णतः सहमत है, यह है कि भारतीय शासन के प्रत्येक विभाग में भारतीयों का सम्पर्क उत्तरोत्तर बढ़े और उत्तरदायी शासन प्रणाली की धीरे-धीरे विकास हो, जिससे कि अधिकाधिक प्रगति करटे हुए स्वशासन प्रणाली भारत में स्थापित हो और ब्रिटिश साम्राज्य के अंग के रूप में रहे.
  • अधिनियम के स्मरणीय उपबंध :-
  1. भारत राज्य सचिव का वेतन अब अंग्रेजी राजस्व से
  2. एक नए पदाधिकारी ‘भारतीय उच्च आयुक्त’ की नियुक्ति
  • विषयों का केन्द्र तथा प्रांतों के मध्य बंटवारा
  1. केन्द्र में द्विसदनीय व्यवस्था की स्थापना- राज्य परिषद तथा केन्द्रीय विधान परिषद दोनों में निर्वाचित सदस्यों का बहुमत.
  2. प्रांतों में द्वैध शासन की स्थापना.
  3. प्रांतीय परिषदों को अब विधान परिषदों की संज्ञा दी गई. प्रांतीय विधान परिषदों की चुनाव की विधि प्रत्यक्ष (direct) थी.
  • द्वैध शासन प्रणाली के अन्र्तगत 1920 में चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस के स्वराज दल ने हिस्सा लिया. यह प्रणाली पहली अप्रैल, 1921 से पहली अप्रैल, 1927 तक चलती रही. यद्यपि बंगाल आरै मध्य प्रांत में यह कुछ वर्ष निलम्बित रही.
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसे ‘निराशाजनक तथा असंतोषप्रद’ की संज्ञा दी.
  • मुख्य रूप से इस ऐक्ट की तीन त्रुटियाँ थी – i) केन्द्र में आंशिक रूप से भी उत्तरदायी सरकार नहीं. ii) पृथक मताधिकार को सुदृढ़ किया जाना. iii) प्रांतों में द्वैध शासन को लागू करना.

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One Comment on “भारत सरकार अधिनियम, 1919 – मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार”

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