[Sansar Editorial] अविश्वास प्रस्ताव (Motion of no confidence) क्या होता है? जानें in Hindi

Sansar LochanSansar Editorial 2018Leave a Comment

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The Hindu –  DECEMBER 24 (Original Article Link)


हाल ही में तेलुगू देशम पार्टी ने लोकसभा में सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव (Motion of no confidence) का नोटिस दिया था. इसका कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों ने जोरदार समर्थन भी किया था. कालांतर में विपक्ष के लाए गए इस अविश्वास प्रस्ताव पर लंबी बहस चली जिसके बाद भाजपा ने सदन में अपना बहुमत साबित कर दिया. वोटिंग के उपरान्त सदन में विपक्ष का लाया गया अविश्वास प्रस्ताव खारिज कर दिया गया. प्रस्ताव के पक्ष में कुल 126 मत पड़े जबकि विपक्ष में 325 मत पड़े. चलिए जानते हैं क्या है यह अविश्वास प्रस्ताव और भारत के राजनीतिक इतिहास में ऐसे प्रस्ताव कब-कब लाये गये?

अविश्वास प्रस्ताव

सबसे पहले विपक्षी दल को लोकसभा या स्पीकर को इसकी लिखित सूचना देनी होती है. इसके उपरान्त स्पीकर उस दल के किसी सांसद से इसे पेश करने के लिए कहती है. जब किसी दल को लगता है कि सरकार सदन का विश्वास या बहुमत खो चुकी है तब वो अविश्वास प्रस्ताव पेश कर सकती है. अविश्वास प्रस्ताव को तभी स्वीकार किया जा सकता है, जब सदन में उसे कम-से-कम 50 सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो. अविश्वास प्रस्ताव और विश्वास प्रस्ताव दोनों निचले सदन यानी केंद्र सरकार के मामले में लोकसभा और राज्य सरकारों के मामले में विधानसभा में लाये जा सकते हैं.

विश्वास प्रस्ताव

यह प्रस्ताव केंद्र में प्रधानमंत्री और राज्य में मुख्यमंत्री पेश करते हैं. सरकार के बने रहने के लिए इस प्रस्ताव का पारित होना आवश्यक है. प्रस्ताव पारित नहीं हुआ तो सरकार गिर जाएगी. यह दो परिस्थितियों में लाया जाता है –

  1. जब सरकार को समर्थन देने वाले घटक समर्थन वापिस का ऐलान कर दें, ऐसे में राष्ट्रपति या राज्यपाल प्रधानमन्त्री या मुख्यमंत्री को सदन का भरोसा हासिल करने को कह सकते हैं.
  2. अगर लोकसभा अध्यक्ष या स्पीकर अविश्वास प्रस्ताव को मंजूरी दे देते हैं तो प्रस्ताव पेश करने के 10 दिनों के अंदर इस पर चर्चा जरुरी है. इसके बाद स्पीकर अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में वोटिंग करा सकता है या फिर कोई फैसला ले सकता है.

इतिहास

  1. भारतीय संसद के इतिहास में पहली बार अगस्त 1963 में जे.बी. कृपलानी ने अविश्वास प्रस्ताव रखा था. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की सरकार के विरुद्ध रखे गये इस प्रस्ताव के पक्ष में केवल 62 वोट पड़े और विरोध में 347 वोट.
  2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75 में कहा गया है कि केन्द्रीय मंत्रिपरिषद् लोकसभा इ प्रति जवाबदेह है, अर्थात् इस सदन में बहुमत हासिल होने पर ही मंत्रिपरिषद बनी रही सकती है. इसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर प्रधानमन्त्री सहित मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना होता है.
  3. संसद में 26 बार से ज्यादा अविश्वास प्रस्ताव रखे जा चुके हैं और सर्वाधिक अविश्वास प्रस्ताव 15 बार इंदिरा गाँधी की कांग्रेस सरकार के विरुद्ध आये. लाल बहादुर शास्त्र और नरसिंह राव की सरकारों ने तीन-तीन बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना किया.
  4. 24 बार ये प्रस्ताव असफल रहे हैं लेकिन 1978 में ऐसे एक प्रस्ताव ने मोरारजी देसाई सरकार को गिरा दिया.
  5. अविश्वास प्रस्ताव पेश करने का रिकॉर्ड मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद ज्योतिर्मय बसु के नाम है. उन्होंने अपने चारों प्रस्ताव इंदिरा गाँधी की सरकार के विरुद्ध रखे.
  6. NDA सरकार के पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने विपक्ष में रहते हुए दो बार अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था. वाजपेयी जब खुद प्रधानमन्त्री बने तो उन्हें भी दो बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा. इनमें से पहली बार तो वो सरकार नहीं बचा पाए लेकिन दूसरी बार विपक्ष को उन्होंने हरा दिया.
  7. आमतौर पर जब संसद अविश्वास पर वोट करती है या वह विश्वास मत में विफल रहती है, तो किसी सरकार को दो तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त करनी होती है – त्यागपत्र देना, संसद को भंग करने और आम चुनाव का अनुरोध करना.

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