आपातकाल : संवैधानिक प्रावधान, परिस्थितियाँ एवं प्रभाव

Aaj hum janenge apatkal kya hota hai? Rashtrpati ise kab aur kaise lagoo karta hai? Bharat me kab-kab apatkal/emergency ki ghoshna ki gayi hai? Ye sare information Hindi me diye gaye hain.

आपातकाल : संवैधानिक प्रावधान, परिस्थितियाँ एवं प्रभाव

जर्मनी के संविधान के राष्ट्रपति की तरह भारत के राष्ट्रपति (राष्ट्रपति <<के बारे में पढ़ें) को भी संकटकाल/आपातकाल (emergency) में उत्पन्न कठिनाइयों का समाधान करने के लिए अत्यंत ही विस्तृत और निरंकुश अधिकार दिए गए हैं. जब राष्ट्रपति आपातकाल की घोषणा करेगा तब उसके हाथों में ऐसे बहुत-से अधिकार आ जायेंगे जो उसे साधारण स्थिति में प्राप्त नहीं हैं.

आपातकाल तीन स्थितयों में घोषित किया जाता है-  Declaration of Emergency

a) युद्ध या युद्ध की संभावना अथवा सशस्त्र विद्रोह से उत्पन्न संकट

b) राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफल होने से उत्पन्न संकट

c) आर्थिक संकट

युद्ध या युद्ध की संभावना अथवा आंतरिक अशांति से उत्पन्न संकट

संविधान के अनुच्छेद 352 के अनुसार, यदि राष्ट्रपति को यह विश्वास हो जाए कि देश अथवा देश के किसी भाग की सुरक्षा तथा शान्ति युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्रन है, तो वह आपातकाल की घोषणा करग का शासन अपने हाथ में ले सकता है. राष्ट्रपति इस आशय की घोषणा उस दशा में भी कर सकता है, जब उसे यह विश्वास हो जाए कि युद्ध अथवा सशस्त्र विद्रोह के कारण देश अथवा देश के किसी भाग की सुरक्षा और शान्ति निकट भविष्य में संकट में पड़नेवाली है. तात्पर्य यह है कि संभावना मात्र से ही राष्ट्रपति आपातकाल (emergency) की घोषणा कर सकता है.

संविधान के 44वें संशोधन अधिनियम के अनुसार राष्ट्रपति के आपातकालीन अधिकार (emergency power) में परिवर्तन किये गए; जैसे – –

I) अपने मंत्रिमंडल के निर्णय के बाद प्रधानमंत्री (प्रधानमंत्री <<के बारे में पढ़ें) द्वारा लिखित सिफारिश केअड़ ही राष्ट्रपति संकटकाल की घोषणा कर सकता है.

II) राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की घोषणा (declaration of emergency) के 30 दिनों के अंतर्गत घोषणा पर संसद के दोनों सदनों द्वारा 2/3 बहुमत से स्वीकृति आवश्यक है, अन्यथा छह महीने के बाद संकटकाल की घोषणा समाप्त समझी जाती है.

III) यदि लोक सभा के 1/10 सदस्य इस आशय का प्रस्ताव रखें कि आपातकाल (emergency) समाप्त हो जाना चाहिए, तो 14 दिनों के अन्दर ही इस प्रस्ताव पर विचार के लिए सदन की बैठक बुलाने की व्यवस्था की जायेगी.

IV) नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार आपातकाल की घोषणा (declaration of emergency) के बाद भी समाप्त नहीं किये जायेंगे.

भारत के राष्ट्रपति ने अपने इस अधिकार का प्रयोग सर्वप्रथम 1962 ई. में किया था, जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया. दूसरी बार इसका प्रयोग 1971 ई. में (Pakistan War) किया गया. तीसरी बार इसका प्रयोग 26 जून, 1975 को आंतरिक अशांति के नियंत्रण के लिए किया गया.

जब तक यह घोषणा लागू रहेगी तब तक —

a) संघ की कार्यपालिका किसी राज्य को यह आदेश दे सकती है कि वह राज्य अपनी कार्यपालिका शक्ति का किसी रीति से उपयोग करे.

b) संसद राज्यों की सूची में वर्णित विषयों पर कानून-निर्माण कर सकती है.

c) नागरिकों के कई मूल अधिकार (मूल अधिकार <<के बारे में पढ़ें) स्थगित हो जायेंगे.

d) राष्ट्रपति मूल अधिकारों को कार्यान्वित करने के लिए किसी व्यक्ति के सर्वोच्च, उच्च या अन्य न्यायालयों (उच्चतम न्यायालय <<के बारे में पढ़ें) में जाने के अधिकार को स्थगित कर सकता है, और

e) राष्ट्रपति संघ तथा राज्यों के बीच राजस्व-विभाजन सम्बंधित समस्त उपबंधों को स्थगित कर सकता है.




राज्यों में सांवैधानिक तंत्र की विफलता से उत्पन्न संकट

संविधान के अनुच्छेद 365 के अनुसार, यदि राष्ट्रपति को राज्यपाल से सूचना मिले अथवा उसे यह विश्वास हो जाए कि किसी राज्य में संविधान के अनुसार शासन चलाना असंभव हो गया है, तो वह घोषणा द्वारा उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर सकता है. ऐसी स्थिति में वह राज्य की कार्यपालिका शक्ति अपने हाथों में ले सकता है, राज्य के विधानमंडल की शक्तियाँ संसद राष्ट्रपति को दे सकती है. राष्ट्रपति कभी भी दूसरी घोषणा द्वारा इस घोषणा को रद्द कर सकता है.

इस प्रकार की घोषणा संसद के दोनों सदनों के सामने रखी जाएगी और दो  महीने तक लागू रहेगी. लेकिन, यदि इसी बीच संसद की स्वीकृति मिल जाए, तो वह दो महीनों के बाद भी स्वीकृति की तिथि से छह महीने तक लागू रहेगी. संविधान के 44वें संशोधन के अनुसार अब किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन अधिक-से-अधिक 1 वर्ष रह सकता है. यह 1 वर्ष से अधिक तभी रह सकता है जब निर्वाचन आयोग सिफारिश करे कि  राज्य में चुनाव कराना संभव नहीं.

इस प्रकार की घोषणा से राष्ट्रपति राज्य के उच्च न्यायालय के अधिकारों को छोड़कर राज्य के समस्त कार्यों और अधिकारों को अपने हाथ में ले सकता है. यदि लोक सभा अधिवेशन में न हो, तो वह राज्य की संचित निधि से व्यय करने की आज्ञा भी दे सकता है. संविधान (संविधान <<के बारें में पढ़ें) द्वारा संघ सरकार का हो, तो राष्ट्रपति यह समझ सकता है कि राज्य का संवैधानिक तंत्र विफल हो चुका है और वह इस आशय की घोषणा निकाल सकता है.

आर्थिक संकट

संविधान के अनुच्छेद 360 के अनुसार, यदि राष्ट्रपति को यह विश्वास हो जाए कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है, जिसमें भारत अथवा उसके राज्यक्षेत्र के किसी भाग की आर्थिक स्थिरता और साख को खतरा है, तो वह इस आशय की घोषणा कर सकता है. दूसरी घोषणा के द्वारा उसे इस घोषणा को रद्द करने का भी अधिकार है. यह घोषणा संसद के दोनों सदनों के सामने रखी जायेगी और संसद की स्वीकृति मिल जाये, तो यह दो महीनों तक लागू रहेगी. यदि यह घोषणा उस समय की गई है जबकि लोक सभा के भंग होने के पूर्व स्वीकृति न हुई हो, तो युद्ध अथवा आंतरिक अशांति के लिए निर्धारित व्यवस्था काम में लाई जायेगी.

इस घोषणा का प्रभाव यह होगा कि संघ की कार्पालिका शक्ति को राज्यों के आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार मिल जायेगा. राष्ट्रपति को यह अधिकार होगा कि वह सरकारी नौकरों, यहाँ तक कि सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन कम करने और राज्यों के विधानमंडल द्वारा स्वीकृत धन विधेयक (धन विधेयक <<के बारें में पढ़ें) और वित्त विधेयक को अपनी स्वीकृति के लिए रोक कर रखने का आदेश दे. इसका प्रयोग अभी तक नहीं हुआ है.

इस प्रकार हमने इस आर्टिकल के माध्यम से यह जाना कि किन-किन परिस्तिथियों में राष्ट्रपति भारत देश में आपातकाल (emergency) की घोषणा कर सकता है.

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About Dr. Sajiva

प्रसिद्ध साहित्यिक व्यक्तित्व एवं इतिहास के विद्वान्. बिहार/झारखण्ड में प्रशासक के रूप में 35 वर्ष कार्यशील रहे. ये आपको इतिहास और संस्कृति से सम्बंधित विषयों से अवगत करायेंगे.

One Response to "आपातकाल : संवैधानिक प्रावधान, परिस्थितियाँ एवं प्रभाव"

  1. Sundram pandey   May 15, 2017 at 3:13 pm

    Sir, geography, political science, economics ka book chahiye.plz sir app bta sakte h kaun se author ka lu.in Hindi and English both.plzz sir.pre aur mains ke liye ho

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