Sansar डेली करंट अफेयर्स, 27 April 2020

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Sansar Daily Current Affairs, 27 April 2020


GS Paper 1 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Indian culture will cover the salient aspects of Art Forms, Literature and Architecture from ancient to modern times.

Topic : Basava Jayanti

संदर्भ

भारतीय प्रधानमंत्री के द्वारा 26 अप्रैल, 2020 को बासव जयंती (Basava Jayanthi) के अवसर पर एक वीडियो संदेश में भगवान बसवेश्वरा को श्रद्धांजलि दी गई. विदित हो कि उन्हें उन्हें लिंगायत तबके का संस्थापक संत माना जाता है.

बासवन्ना

बासवन्ना का जन्म कर्नाटक के इंगलेश्वर, बागेवाड़ी शहर में 20 मार्च 1134 को हुआ था, जो वर्ष 1134 में आनंदमामा (संवत्सर) के वैशाख महीने का तीसरा दिन था. विश्वासियों के अनुसार, पैगंबर बासवन्ना के जन्म के साथ, एक नया युग शुरू हुआ. बासवन्ना 12वीं शताब्दी के एक समाज सुधारक थे. उन्होंने अपने समकालीन शरणों के साथ मिलकर ब्राह्मणों की वर्चस्वता के विरुद्ध एक बहुत प्रबल आध्यात्मिक, सामाजिक तथा धार्मिक विद्रोह चलाया था. बासवन्ना का कहना था कि कर्म ही पूजा है. उन्होंने अपने आन्दोलन में वचनों के माध्यम से महिलाओं को समान दर्जा दिया. बासवन्ना और अन्य शरण सरल कन्नड़ भाषा में वचन कहते थे जिससे कि साधारण से साधारण जन भी उनकी बातों को समझ सके.

लिंगायत

  • लिंगायतवाद की परंपरा की स्थापना 12वीं सदी में कर्नाटक के एक सामाजिक सुधारक और दार्शनिक बासव द्वारा की गई थी.
  • बासव/बासवन्ना ने सामाजिक व्यवस्था को सुधारने के लिए मानव स्वतंत्रता, समानता, तर्कसंगतता और भाईचारे को आधार बनाने के लिए कहा.
  • लिंगायतों का कहना है कि उनके आदिगुरु बासवन्ना ने जिस शिव को अपना इष्ट बनाया था वे हिन्दू धर्म के शिव नहीं हैं अपितु इष्ट लिंग (निराकार भगवान्) हैं जिसे लिंगायत अपने गले में लटकाते हैं.

वीरशैव

  • वीरशैव शैव-पंथी हैं और मुख्यतः कर्नाटक में रहते हैं.
  • कर्नाटक के अतिरिक्त यह समुदाय केरल, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पाया जाता है.
  • वीरशैव का दावा है कि बासवन्ना लिंगायत परंपरा के संस्थापक नहीं थे अपितु वे वीरशैव सम्प्रदाय के अंतर्गत ही एक सुधारक मात्र थे.
  • वीरशैव सम्प्रदाय की जड़ें वेद और आगमों में हैं और यह शिव के अतिरिक्त किसी अन्य भगवान् की पूजा नहीं करता.

बासवन्ना और शरण आन्दोलन

  • बासवन्ना ने शरण नामक एक आन्दोलन चलाया था जिसके प्रति सभी जाति के लोग आकर्षित हुए थे. इस आन्दोलन से सम्बंधित ढेर सारा साहित्य उसी प्रकार रचा गया था जैसे कि भक्ति आन्दोलन में हुआ था. इस साहित्य को वचन” कहते हैं. इनमें वीरशैव संतों के आध्यात्मिक अनुभवों को प्रस्तुत किया गया था.
  • बासवन्ना का शरण आन्दोलन एक समानतावादी आन्दोलन था जो अपने समय के हिसाब से एक क्रांतिकारी आन्दोलन था.
  • बासवन्ना ने अनुभव मंडप नामक स्थल स्थापित किया था जहाँ विभिन्न जातियों और समुदायों के शरण जमा होकर सीखने और विचारने का काम करते थे.
  • जाति प्रथा के अंतिम गढ़ अर्थात् विवाह को चुनौती देते हुए शरणों ने एक ऐसा वैवाहिक कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें दूल्हा निम्न जाति का और दुल्हन ब्राह्मण होती थी.

GS Paper 2 Source : Indian Express

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UPSC Syllabus : Indian Constitution- historical underpinnings, evolution, features, amendments, significant provisions and basic structure.

Topic : Basic structure and the Kesavananda Bharati case

संदर्भ

अप्रैल 24, 1973 को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सिकरी और 12 न्यायाधीशों की एक संवैधानिक पीठ ने एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण निर्णय दिया था. यह निर्णय केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के लिए दिया गया था. 68 दिन सुनवाई के बाद यह निर्णय 7-6 मत से पारित हुआ था.

इसमें यह व्यवस्था दी गई थी कि संविधान की मूलभूत संरचना का उल्लंघन नहीं हो सकता है और इसमें संसद भी कोई संशोधन नहीं कर सकती है.

पिछले 47 वर्षों से यह निर्णय भारतीय संवैधानिक कानून का एक आधारभूत अंग माना जाता रहा है.

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य वाद का इतिहास

सर्वप्रथम इस धारणा का प्रतिपादन सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा 24 अप्रैल, 1973 को मौलिक अधिकारों से सम्बंधित एक विवाद केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य  पर निर्णय देते हुए किया गया.

1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य विवाद में यह विषय फिर से उच्चतम न्यायालय के समक्ष आया. जिस न्यायपीठ ने इसे सुना उसमें 13 न्यायाधीश थे. बहुमत अर्थात् 7 न्यायाधीशों ने 24वें संविधान संशोधन को विधिमान्य ठहराते हुए “गोलकनाथ मामले” में दिए फैसले को उलट दिया किन्तु साथ ही एक नया सिद्धांत प्रतिपादित किया. न्यायालय ने यह कहा कि संसद् मूल अधिकारों वाले भाग में संशोधन करने के लिए उतनी ही सक्षम है जितनी कि संविधान के किसी अन्य भाग का. परन्तु संविधान का संशोधन करके संसद् संविधान की आधारभूत संरचना (जिसे आधारभूत लक्षण भी कहा गया है) को न तो संक्षिप्त कर सकती है, न समाप्त कर सकती है और न नष्ट कर सकती है. गोलकनाथ मामले के बाद किसी भी मूल अधिकार को न तो छीना जा सकता था और न ही नष्ट किया जा सकता था. केशवानंद मामले के बाद न्यायालय को यह विनिश्चय करना है कि कोई मूल अधिकार आधारभूत लक्षण है या नहीं. यदि वह आधारभूत लक्षण है तो उसे कदापि हटाया नहीं जा सकता.

इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि “संसद मौलिक अधिकारों को संशोधित या सीमित कर सकती है, किन्तु संविधान के अनुच्छेद 368 से संसद को संविधान के मूल ढाँचे (basic structure) में परिवर्तन का अधिकार प्राप्त नहीं होता.”

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने नीचे लिखे हुए तत्वों को संविधान के मूल ढाँचे का हिस्सा बताया –

  1. संविधान की सर्वोच्चता
  2. सरकार का “लोकतांत्रिक” (Democratic) और “गणतांत्रिक” (Republican) ढाँचा
  3. संविधान का “धर्मनिरपेक्ष” (Secular) स्वरूप
  4. संविधान की “संघात्मक” (Federal) प्रकृति
  5. विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच “शक्तियों का बँटवारा”(Separation of Powers)
  6. देश की सम्प्रभुता (Sovereignty)

संविधान की आधारभूत संरचना

  • केशवानंद भारती की संवैधानिक पीठ में, सदस्यों के बीच गंभीर वैचारिक मतभेद देखने को मिले तथा पीठ ने 7-6 से निर्णय किया कि संसद को संविधान के ‘आधारभूत संरचना’ में बदलाव करने से रोका जाना चाहिये.
  • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 368; जो संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्तियाँ प्रदान करता है, के तहत संविधान की आधारभूत संरचना में बदलाव नहीं किया जा सकता है.

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गोलकनाथ, केशवानंद और मिनर्वा मिल्स का मामला

भारतीय संविधान की मूलभूत संरचना से सम्बंधित LANDMARK CASES

संविधान के मूल ढाँचे या आधारभूत सिद्धांतों की धारणा


GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Functions and responsibilities of the Union and the States, issues and challenges pertaining to the federal structure, devolution of powers and finances up to local levels and challenges therein.

Topic : Autonomous District Councils

संदर्भ

बोडो लैंड टेरिटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट (Bodoland Territorial Area Districts – BTAD) का संवैधानिक प्रमुख राज्य का राज्यपाल होता है और इसका प्रशासन बोड़ोलैंड टेरिटोरियल (Bodoland Territorial Council – BTC) करती है.

BTC का कार्यकाल 27 अप्रैल को समाप्त होने जा रहा है, अतः इसके लिए 4 अप्रैल को चुनाव होने थे. परन्तु कोविड-19 महामारी के चलते यह चुनाव सम्पन्न नहीं हो पायेंगे. इसलिए संभावना है कि BTAD में राज्यपाल शासन लागू हो जाएगा.

स्वायत्त जिला परिषद् क्या हैं?

संविधान की छठी अनुसूची के अनुसार, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में जनजातीय क्षेत्र हैं जो तकनीकी रूप से अनुसूचित क्षेत्रों से अलग होते हैं. यद्यपि ये क्षेत्र राज्य के कार्यकारी अधिकार क्षेत्र में आते हैं, परन्तु कतिपय विधायी एवं न्यायिक शक्तियों का प्रयोग करने के लिए इनमें जिला परिषदों एवं क्षेत्रीय परिषदों का प्रावधान किया गया है. प्रत्येक जिला एक स्वायत्त जिला होता है और राज्यपाल अधिसूचना निर्गत कर के इन जनजातीय क्षेत्रों की सीमाओं में परिवर्तन कर सकता है अथवा उन्हें विभाजित कर सकता है.

अपनी अधिसूचना के माध्यम से राज्यपाल निम्नलिखित काम कर सकता है –

  1. कोई भी क्षेत्र सम्मिलित कर सकता है
  2. कोई भी क्षेत्र को भारत कर सकता है
  3. नया स्वायत्त जिला बना सकता है
  4. स्वायत्त जिले का क्षेत्र बढ़ा सकता है
  5. स्वायत्त जिले का क्षेत्र घटा सकता है
  6. स्वायत्त जिले का नाम बदल सकता है
  7. किसी स्वायत्त जिले की सीमाओं को परिभाषित कर सकता है

जिला परिषदों एवं क्षेत्रीय परिषदों की बनावट

  1. जिला परिषद् में अधिक से अधिक 30 सदस्य होंगे जिनमें अधिकतम चार व्यक्ति को राज्यपाल नामित करेगा और शेष वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने जाएँगे.
  2. स्वायत्त क्षेत्र के रूप में सृजित प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक अलग क्षेत्रीय परिषद् होगी.

GS Paper 2 Source : Indian Express

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UPSC Syllabus : Effect of policies and politics of developed and developing countries on India’s interests, Indian diaspora.

Topic : South China Sea dispute

संदर्भ

एक और जहाँ विश्व कोरोना वायरस महामारी से जूझ रहा है वहीं दूसरी ओर चीन दक्षिणी चीन सागर में अपनी उपस्थिति को बढ़ाने में व्यस्त है.

एशिया-प्रशांत के शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि इस सागर को लेकर विवाद बढ़ा इस क्षेत्र में कूटनीतिक सम्बन्ध और स्थिरता को क्षति पहुंचेगी.

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दक्षिणी चीन सागर विवाद क्या है?

  • मूल विवाद दक्षिणी चीन सागर में स्थित दो द्वीप समूहों को लेकर है जिनका नाम स्प्रैटली द्वीप और पारासेल है. ये दोनों द्वीपसमूह वियतनाम और फिलिपिन्स के बीच पड़ते हैं.
  • चीन इन दोनों पर अपना दावा करता है. दूसरी ओर चीन के इस दावे का विरोध फिलिपिन्स, वियेतनाम, मलेशिया और ताईवान की ओर से हो रहा है. ब्रूनेई को भी इसमें आपत्ति है.
  • फिलीपींस द्वारा मामले को 2013 में न्यायालय में लाया गया था, जो स्कारबोरो शोल पर केंद्रित था. हालाँकि बीजिंग के द्वारा कार्यवाही का बहिष्कार करने का फैसला किया गया.
  • द हेग, नीदरलैंड स्थित स्थाई मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration) ने फैसला दिया था कि दक्षिण चीन सागर पर ऐतिहासिक अधिकार के चीन के दावों का कोई कानूनी आधार नहीं है.

मध्यस्थता पैनल ने क्या निर्णय दिया?

  • हेग स्थित न्यायालय ने फैसला सुनाया कि सागर में तथाकथित nine-dash line” का चीन का दावा व्यापक आर्थिक हितों के साथ सागरीय विधि पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (United Nation Convention on the Laws of the Sea – UNCLOS) का उल्लंघन था.
  • अत्यधिक मत्स्यन और कृत्रिम द्वीपों के विकास के कारण न्यायालय ने स्प्रैटली आइलैंड जोकि एक विवादास्पद द्वीप समूह है, में पारिस्थितिकी तंत्र के कुछ हिस्सों को नुकसान पहुँचाने के लिए चीन की खिंचाई की.
  • न्यायालय ने यह भी कहा कि चीन ने फिलीपींस के संप्रभु अधिकारों का उल्लंघन किया.
  • यह भी कहा कि चीन के द्वारा कृत्रिम द्वीपों का निर्माण “कोरल रीफ पर्यावरण को गंभीर नुकसान” का कारण है.

नाइन-डैश लाइन क्या है?

नाइन-डैश लाइन दक्षिणी हैनात द्वीप के दक्षिण और पूर्व में सैकड़ों किलीमीटर में फैला क्षेत्र है जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पार्मेल और स्प्रैटली द्वीप श्रृंखला को कवर करता है. चीन ने अपने दावे की पुष्टि हेतु 2000 वर्षों के इतिहास का हवाला दिया जिसमें इन दो द्वीप श्रृंखलाओं को इसके अभिन्न हिस्से के रूप में माना गया था.

PCA के निर्णय पर चीन की प्रतिक्रिया

  • चीन द्वारा दक्षिण चीन सागर पर एक अंतरराष्ट्रीय निर्णय को “अकृत और शून्य” कहकर खारिज कर दिया गया और किसी भी “बाध्यकारी तत्व” से रहित बताया गया.
  • चीन दक्षिण चीन सागर में एक सैन्य वायु रक्षा पहचान क्षेत्र (ADIZ) स्थापित करने पर विचार कर रहा है. ADIZ बनाये जाने से इसके ऊपर से उड़ने बाले विमानों को पहले चीन को सूचित करना होगा.
  • कई चीनी विशेषज्ञों ने जोर देकर कहा कि यह पूरा प्रकरण चीन को घेरने के उद्देश्य से अमेरिका के “पिवोट एशिया” अथवा चुनःसंतुलन रणनीति को लागू करने के लिए निर्मित किया गया छद्म आवरण है.

भारत की प्रतिक्रिया

भारत ने इसे मान्यता प्रदान करते हुए स्पष्ट कर दिया कि न्यायाधिकरण समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र के कन्वेंशन (UNCLOS) के क्षेत्राधिकार के भीतर गठन किया गया है इसलिए इसके निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए.

दक्षिण चीन सागर इतना महत्त्वपूर्ण क्यों?

  • दक्षिणी चीन सागर एक व्यस्त अंतर्राष्ट्रीय जलमार्ग, वैश्विक अर्थव्यवस्था और व्यापार की मुख्य धमनियों में से एक है.
  • लगभग $5 ट्रिलियन मूल्य का विश्व व्यापार जहाज़ों के द्वारा प्रतिवर्ष दक्षिण चीन सागर से होता है.
  • दक्षिणी चीन सागर कई अपतटीय तेल और गैस ब्लॉक के साथ संसाधनों से भी समृद्ध है.

Prelims Vishesh

What is “milk tea alliance”? :-

चीन की सरकार की निरंकुशता के विरुद्ध थाईलैंड, ताइवान और होन्गकोंग के हजारों इन्टरनेट उपयोगकर्ताओं ने एक प्रजातंत्र समर्थक सोशल नेटवर्क पर मोर्चा खोल रखा है जिसे मिल्क टी अलायन्स कहा जाता है.

West Texas Intermediate (WTI) :-

  • वेस्ट टैक्सस इंटरमिडिएट (WTI) अर्थात् टेक्सस लाइट स्वीट कच्चे तेल का एक प्रकार है जिसे तेल का दाम निश्चय करने के लिए बेंचमार्क के रूप में प्रयोग किया जाता है.
  • इस कच्चे तेल का घनत्व अपेक्षाकृत कम होता है और इसमें गंधक की मात्रा भी कम होती है इसलिए इसे हल्का (light) और मीठा (sweet) कहा जाता है.
  • WTI विश्व का सर्वोत्तम कच्चा तेल माना जाता है. पिछले दिनों यह तेल इसलिए चर्चा में आया कि न्यूयॉर्क में इसका मूल्य -40.32 प्रति बैरल तक गिर गया था जोकि इतिहास की सबसे बड़ी गिरावट थी.

World Wide Help (WWH) :-

  • IIT बॉम्बे ने वर्ल्ड वाइड हेल्प (WWH) नामक एक मंच बनाया है जिसका प्रयोग लोग चिकित्सक आदि से उपचार की सहायता लेने के लिए कर सकते हैं.
  • WWH का प्रयोग किसी ऐप या फ़ोन से हो सकता है.
  • जिसे चिकित्सा की आवश्यकता है वह व्यक्ति इसमें अपना मौलिक डाटा (जैसे उम्र) भर कर के और अपना फ़ोन नंबर देते हुए चिकित्सक से संपर्क कर सकता है.

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