आपराधिक कानूनों में संशोधन की प्रक्रिया

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GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus: सरकारी नीतियां एवं विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप और उनके डिजाइन और कार्यान्वयन से उत्पन्न विषय.

Topic : Govt starts process to amend IPC, CrPC; seeks suggestions from governors, CMs, MPs, judges

संदर्भ

आपराधिक कानूनों में व्यापक बदलाव करने के उद्देश्य से, केंद्र सरकार द्वारा सभी हितधारकों के परामर्श से ‘भारतीय दंड संहिता, 1860″, “आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973” और “भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872” जैसे कानूनों में संशोधन की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी गई है.

इस संदर्भ में, गृह मंत्रालय ने राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों, उपराज्यपालों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों, भारत के मुख्य न्यायाधीश, विभिन्‍न उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों, बार काउंसिल ऑफ इंडिया, विभिन्‍न राज्यों के बार काउंसिल, विभिन्‍न विश्वविद्यालयों, कानून संस्थानों एवं सांसदों सहित सभी हितधारकों से “आपराधिक कानूनों में व्यापक संशोधन” के संबंध में सुझाव मांगे हैं. ज्ञातव्य है कि भारतीय संविधान में आपराधिक कानून और आपराधिक प्रक्रिया संविधान की 7वीं अनुसूची की समवर्ती सूची में सम्मिलित हैं.

आपराधिक न्याय प्रणाली का तात्पर्य सरकार की उन एजेंसियों से है जो कानून लागू करने, आपराधिक मामलों पर निर्णय देने और आपराधिक आचरण में सुधार करने के लिए कार्यरत हैं. आपराधिक न्याय प्रणाली सुधारों में आमतौर पर सुधारों के तीन घटक शामिल हैं, जैसे- न्यायिक सुधार, जेल सुधार, पुलिस सुधार.

Govt starts process to amend IPC, CrPC

सुधार की जरूरत क्यों?

  • सुनवाई प्रक्रिया एवं मामलों के निपटारे में देरी होने के कारण “विचाराधीन कैदियों” और “दोषियों” के मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है.
  • इसके अतिरिक्त न्याय प्रणाली अभी तक भी औपनिवेशिक युग के कानूनों द्वारा संचालित की जा रही है.
  • न्यायालयों में लंबित पड़े मामलों की संख्या (लगभग 3.5 करोड़ मामले) अनवरत बढ़ती जा रही है.
  • सरकार द्वारा आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार पर विचार करने के लिए अब तक मलिमथ समिति, 2001 -03 (आपराधिक न्याय प्रणाली), माधव मेनन समिति (2007), रणबीर सिंह समिति (2019) का गठन किया जा चुका है.

सुझाव एवं सिफारिशें

  • दस्तावेजों का डिजिटलीकरण किया जाए, इससे जांच और सुनवाई की प्रक्रिया में तेजी आएगी.
  • राजद्रोह, मोब लिंचिंग और ऑनर किलिंग जैसे अपराधों की परिभाषा बदलने पर विचार किया जाना चाहिए.
  • एक ही प्रकृति के अपराधों के लिए अलग-अलग सजा की मात्रा और प्रकृति को तय करने में न्यायाधीशों के निर्णय, न्यायिक उदाहरणों के सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए.
  • अपराध करने के लिए आपराधिक जिम्मेदारी की न्यूनतम उम्र को बदलने की आवश्यकता पर भी चर्चा करने की आवश्यकता है.
  • मलिमथ समिति ने न्यायालय की छुट्टियों को कम करने, पुलिस की कानून और व्यवस्था एवं जाँच विंग को अलग-अलग करने की सिफारिश की थी.

इस टॉपिक से UPSC में बिना सिर-पैर के टॉपिक क्या निकल सकते हैं?

  1. मलिमथ समिति
  2. माधव मेनन समिति
  3. रणबीर सिंह समिति
  4. 7वीं अनुसूची की समवर्ती सूची
“आपराधिक न्याय प्रणाली का उद्देश्य निर्दोषों के अधिकारों की रक्षा करना और दोषियों को दंडित करना था, लेकिन आजकल यह व्यवस्था आम लोगों के उत्पीड़न का एक साधन बन गई है।.” अपने विचार प्रकट करते हुए इस कथन की पुष्टि कीजिये.”200-शब्द

मेरी राय – मेंस के लिए

सुधार कैसे लाये जा सकते हैं?

  • पीड़ितों का संरक्षण: पीड़ितों के अधिकारों की पहचान करने के लिये कानूनों में सुधार हेतु ‘पीड़ित होने के कारणों’ पर विशेष रूप से ज़ोर देना.
  • नए अपराधों और अपराधों के मौजूदा वर्गीकरण के पुनर्मूल्यांकन को आपराधिक न्यायशास्त्र के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिये.
  • आईपीसी और सीआरपीसी को सुव्यवस्थित करना.
  • गैर-सैद्धांतिक अपराधीकरण को रोकना.

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