[कालक्रम] Modern History Important Topics Part 2

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CHRONOLOGY OF HISTORY OF MODERN INDIA – Part 2

  • अंग्रेजों की उपनिवेशवादी नीतियों के खिलाफ जब पूरा देश उठ खड़ा हुआ था तो मध्य प्रदेश भी उससे अछूता नहीं रहा. 1818 ई. में प्रदेश के महाकौशल क्षेत्र में सर्वप्रथम विद्रोह की चिंगारी दिखाई पड़ी थी. जब नागपुर के तत्कालीन देशभक्त शासक अप्पा जी भोंसले को अंग्रेजों ने मण्डला, बैतूल, छिंदवाड़ा, सिवनी और नर्मदा कछार का क्षेत्र छोड़ देने हेतु बाध्य किया. ऐसी स्थिति में अप्पा जी ने अंग्रेजों से युद्ध किया, लेकिन उन्हें पराजित होकर भागना पड़ा.  
  • 1833 में रामगढ़ नरेश जुझारू सिहं के पुत्र दवेनाथ सिहं ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध किया तो, किन्तु वे भी असफल रहे.
  • दुर्राम की संधि के नाराज चन्द्रपुर (सागर) के जवारहट सिहं बुंदेला, भरहुत के मधुकर शाह, मदनपुर के गोंड मुखिया दिल्हन शाह और  हीरापुर के हीरेनशाह ने अंग्रेजों के विरुद्ध 1842 में बगावत के झंडे गाड़ दिये. इस प्रकार सागर, दमोह, नरसिंहपुर से लेकर जबलपुर, मण्डला और होशंगाबाद तक के सारे क्षेत्र में विद्रोह की आग भड़क उठी, लेकिन आपसी सामंजस्य और तालमेल के अभाव में इस प्रयास को अंग्रेज दबाने में सफल रहे.  
  • अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय लोगों में जो रोष पैदा हुआ, उसकी चरम परिणति 1857 की क्रांति में देखी गयी. तांत्या टोपे, नाना साहब, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जैसे लोगों ने इस प्रदेश में क्रांति की अलख जगायी.
  • विद्रोह की शुरुआत 3 जून, 1857 नीमच में हुई जो 14 जनू को ग्वालियर के निकट मुरार की छावनी में, 20 जून को शिवपुरी क्षेत्र में, 1 जुलाई 1857 को महू एवं इंदौर में फ़ैल गयी. इस दौरान तांत्या टोपे और झांसी के रानी लक्ष्मीबाई दोनों ने एक साथ मिलकर युद्ध किये.  
  • परन्तु 28 जनू, 1858 को रानी शहीद हो गयी तथा तांत्या टोपे को बाद में फाँसी दे दी गई.
  • 1857 के विप्लव के दौरान ही संबलपुर राज्य (वर्तमान छत्तीसगढ़) के शासक सुरेन्द्र साईं ने भी अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संगठित किया. इन विद्रोहियों ने 2 वर्ष तक मंडलेश्वर पर राज किया, लेकिन 1959 में उनका दमन कर दिया गया.
  • इसी समय भीमा नायक के नेतृत्व में आदिवासियों ने सेंधवा में विद्रोह कर दिया,जिसे दबाने के लिए अंग्रेजी सेना को काफी प्रयास करने पड़े. 1856 में छत्तीसगढ़ में पड़े भीषण अकाल के दौरान सानखान के राजा नारायण सिंह ने जो राहत कार्य चलाये, उसे अंग्रेजों ने बगावत के रूप में लिया और वीर नारायण सिंह को 19 दिसंबर, 1857 को तोप से उड़ा दिया. परन्तु उनकी शहादत में एक इतिहास बन गयी.
  • संगठित राजनीतिक आंदोलन के दूसरा दौर यहाँ तब आंरभ हुआ, जब 1885 में कांग्रेस गठित हुई. कलकत्ता मेंहुए कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन (1886 अध्यक्ष दादा भाई नौरोजी) में मध्य भारत से बापूराव, दादा किन खेड़े, गंगाधन, चिटनिस, गोपाल हरि भिंडे और अब्दुल अजीज ने भाग लिया.
  • 1891 ई. में कांग्रेस का सातवां अधिवेशन नागपुर में हुआ. तिलक के प्रभाव में मध्य प्रांत, मालवा आदि जगहों पर गणेश उत्सव, शिवाजी उत्सव, अखाड़ों आदि के माध्यम से राष्ट्रीय भावना का प्रचार होने लगा.
  • माखन लाल चतुर्वेदी ने अपने ‘कर्मवीर’ के प्रकाशन से राष्ट्रीय चेतना के प्रचार को नयी दिशा प्रदान की.
  • 1899 में लाहौर में सम्पन्न कांग्रेस अधिवेशन में मध्य प्रांत के डॉ. हरि सिंह गौड़ ने न्याय विभाग और शासन को अलग-अलग रखने की मांग के समर्थन में आवाज उठायी. उन्होंने ही 1904 में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति की कटु आलोचना की.
  • 1907 में जबलपुर में क्रांतिकारी दल का गठन हुआ तथा 1915 में हामेरूल लीग की स्थापना की गयी.
  • 1923 में यहां ‘झंडा सत्याग्रह’ आरंभ हुआ.
  • सिवनी जिले में 1916 में स्वतंत्रता आंदोलन आरंभ हुआ. 1920-21 में यहां कांग्रेस और खिलाफत दोनों ने साथ-साथ आंदोलन चलाये. कांग्रेस का नेतृत्व डुण्डीराज जटार ने तथा खिलाफत आंदोलन का अब्दुल जब्बार खां ने किया.
  • 1923 के ‘नागपुर झंडा सत्याग्रह’ के से भारी संख्या में लोगों ने भाग लिया. 
  • 1930-31 में ‘नमक सत्यागह्र’ के समय सिवनी के श्री दुर्गाशंकर मेहता ने गाँधी चौक पर नमक बनाकर सत्यागह्र किया. सिवनी के जेल में सुभाषचंद्र बोस, शरतचंद्र बोस, आचार्य विनोबा भावे, पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र एवं एच.वी. कामथ जैसे स्वतंत्रता सेनानी रहे थे. 
  • 1922 में भोपाल रियासत की सिहोर कोतवाली के सामने विदेशी फेल्ट कैप की होली जली.
  • 1938 में भोपाल राज्य प्रजामंडल की स्थापना हुई, जिसके मंच से मौलाना तरजी मशरिकी सदर एवं चतुर नारायण मालवीय ने स्वतंत्रता की मांग उठायी.
  • 1923 में जबलपुर से आंरभ हुए ‘झंडा सत्याग्रह’ का निर्देशन देवदास गांधी, रामगोपाल आचार्य तथा डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने किया.
  • जबलपुर में ही सेठ गोविन्द दास और पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र के नेतृत्व में 6 अप्रैल, 1930 में ‘सत्यागह्र’ का आरम्भ हुआ.
  • यहीं पर इसी वर्ष हुए ‘जगंल सत्याग्रह’ के दौरान सेठ गोविन्द दास, पं. माखन लाल चतुर्वेदी, पं. रविशंकर शुक्ल, पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र तथा विष्णु दयाल भार्गव को गिरफ्तार कर उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया.
  • 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के आरंभ हो जाने पर गांधीजी ने यहीं से अपने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की.
  • 1930 में रायपुर क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन ने बहुआयामी रूप ले लिया. इस आंदोलन में एक ओर जहां प. रविशंकर शुक्ल, महंत लक्ष्मी दास, घनश्याम सिंह गुप्त, रत्नाकर झा, तामस्कर, बैरिस्टर छेदी लाल, डॉ. रामाचरण राय, डॉ. शिवदुलारे मिश्र, ओतलवार अग्निहोत्री, हरिनारायण वाजपेयी जैसे लोग कांग्रेस की नीतियों को लाकेप्रिय बना रहे थे तो वहीं दूसरी ओर ठाकुर प्यारे लाल सिंह मजदूरों को संगठित कर राष्ट्रीय आंदोलन में उन्हें सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार कर रहे थे.
  • 1938 में खण्डवा, सिहोर, जबलपुर, रायपुर आदि नगरों में नमक काननू तोड़ा गया.
  • वर्धा में सेवाग्राम में गांधीजी के आश्रम की स्थापना से राज्य में स्वतंत्रता आंदोलन ने जोर पकड़ लिया.
  • रतलाम में स्वामी ज्ञानानंद ने आंदोलन की नींव डाली.
  • 1920 में रतलाम कांग्रेस कमेटी बनायी गयी एवं मुहम्मद उमर खान इसके प्रथम अध्यक्ष बनाये गए.
  • 1931 में यहीं से एक ‘स्त्री सेवादल’ तथा 1935 में ‘प्रजा परिषद’ का गठन हुआ. इसके माध्यम से स्त्री, किसान एवं मजदूरों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा गया.
  • 1934 में झाबुआ में प्रजामंडल के नेतृत्व में शराबबंदी, हरिजन उद्धार, विदेशी वस्तु का बहिष्कार जैसे आंदोलन किये गये.
  • 1934 में भोपाल में ‘भोपाल राज्य हिन्दू सभा’ की नींव डाली गयी जिससे आम जनता में चेतना फ़ैल गयी.
  • 1942 में मंडलेश्वर में क्रांतिकारी बंदियों द्वारा किया गया विद्रोह स्वतंत्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है.
  • 1942 के “भारत छोड़ो आन्दोलन” की शुरुआत ग्वालियर रियासत में सबसे पहले विदिशा में ही हुई थी.
  • स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व भोपाल रियासत में आंदोलन कभी भी तेज नहीं हो पाया, परंतु 1948-49 के दौरान हुए जन विद्रोहों ने रियासत की सामंती नींवों को हिला दिया. मजबूर होकर भोपाल के नवाब ने रियासत को भारत में मिलाने की घोषणा कर दी तथा 1 जून, 1949 को केन्द्र सरकार ने भोपाल राज्य की सत्ता अपने हाथ में ले ली. 
  • वस्तुतः मध्य प्रदेश के सभी जिलों ने स्वतत्रंता संघर्ष में खुलकर भागीदारी की और अतंतः 15 अगस्त, 1947 को देश की आजादी के साथ ही मध्य प्रदेश भी आजाद हो गया. इससे ब्रिटिश प्रातं एवं रियासत की जनता दोनों को मुक्ति मिली.
  • ऑपरेशन जीरो आवर के तहत 9 अगस्त को तड़के सुबह ही सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. गाँधीजी को पूना में आगा खां पैलेस में रखा गया.
  • भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान बलिया (यू.पी.), तामुलक (मिदनापुर, बंगाल), सतारा (बम्बई) तथा तालचर (ओडिशा) में क्रान्तिकारियों ने समानान्तर सरकार की स्थापना की.
  • मुस्लिम लीग भारत छोड़ो आन्दोलन से अलग ही रही तथा जिन्ना ने 23 मार्च, 1943 को ‘पाकिस्तान दिवस’ मनाने का आह्वान किया.
  • साम्यवादी भी इस आन्दोलन से अलग ही रहे.
  • राजगोपालाचारी फार्मूला को जिन्ना ने ‘अंगहीन और दीमक लगा हुआ पाकिस्तान’ बताया.
  • 25 जून 1945 को वेवेल की अध्यक्षता में शिमला सम्मेलन हुआ. वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के निर्माण पर समझौता नहीं होने के कारण यह असफल रहा. जिन्ना का कहना था कि परिषद के पांचों मुस्लिम सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार सिर्फ मुस्लिम लीग को है.
  • जुलाई 1945 में इंग्लैंड में चुनाव हुए, जिसमें मजदूर दल को सफलता मिली. चर्चिल की जगह एटली प्रधानमंत्री बने. एमरी की जगह पैथिक लौरेंस को भारत मंत्री नियुक्त किया गया.
  • 1945-46 में भारत में भी चुनाव हुए. केन्द्रीय विधानसभा में कांग्रेस को 57 तथा लीग को 30 स्थान मिले. बहुसंख्यक हिन्दू प्रांतों में कांग्रेस की सरकार बनी. बंगाल और सिन्ध में लीग की सरकार बनी तथा पंजाब में खिज्र हयात खां के नेतृत्व में कांग्रेस, अकाली और यूनियनिस्ट दल के मिले-जुले मंत्रिमंडल का निर्माण हुआ.
  • कैबिनेट मिशन याजेना – 24 मार्च, 1946 को मिशन दिल्ली पहुंचा. इसके सदस्य थे- लॉर्ड पैथिक लौरेंस, सर स्टैफोर्ड क्रिप्स एवं ए. बी. एलेक्जेंडर. इसमें प्रथम बार भारत के लिए स्वाधीनता शब्द का प्रयोग किया गया था, साथ ही साथ अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों दोनों के अधिकारों की सुरक्षा की बात की गयी थी. संविधान सभा के चुनावों में कांग्रेस ने 214 सामान्य स्थानों में से 205 प्राप्त किये तथा लीग को 78 मुस्लिम स्थानों में से 73 स्थान मिले.   29 जून, 1946 को लीग ने शिष्टमंडल योजना अस्वीकार कर दी और पाकिस्तान की प्राप्ति के लिए ‘सीधी कार्यवाही’ (Direct Action) करने की धमकी दी. इधर 8 अगस्त, 1946 को कांग्रेस ने अंतरिम सरकार बनाने की योजना स्वीकार कर ली. यद्यपि लीग अंतरिम सरकार में सम्मिलित हो गयी थी, फिर भी उसने संविधान सभा में सम्मिलित होना स्वीकार नहीं किया.  संविधान सभा की बैठक 9 दिसम्बर, 1946 को दिल्ली में आरंभ हुई.
  • एटली की घोषणा 20 फरवरी, 1947 को की गयी. इसमें कहा गया कि अंग्रेज जून 1948 के पूर्व सत्ता भारतीयों को सौंप देंगे. 3 जून, 1947 को माउन्टबेटन योजना प्रकाशित हुई, जिसमें भारत का विभाजन प्रस्तावित था. कांग्रेस तथा लीग दोनों ने ही इसे स्वीकार कर लिया.  
  • ब्रिटिश पार्लियामेंट में 4 जुलाई, 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पेश किया गया, जो 18 जुलाई, 1947 को पारित हो गया.
  • 14 अगस्त को पाकिस्तान का निर्माण हुआ तथा 15 अगस्त को भारत स्वतंत्र हुआ. जिन्ना पाकिस्तान के गवर्नर जनरल और लियाकत अली प्रधानमंत्री बने.
  • भारत के गवर्नर जनरल माउन्टबटेन तथा प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू बने.
  • सरदार वल्लभ भाई पटेल को ‘भारत का बिस्मार्क’ भी कहा जाता है.
  • जूनागढ़, कश्मीर और हैदराबाद के अलावा सभी देशी रियासतों के शासकों ने 15 अगस्त, 1947 को विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए.
  • जर्मनी में हिटलर के दाएं हाथ रोबेन ट्राप ने सुभाषचन्द्र बोस का स्वागत किया.
  • सुभाषचन्द्र बोस ने पेरिस, रोम में ‘फ्री इंडिया सेंटर’ की स्थापना की.
  • इंडियन नेशलन आर्मी’ की स्थापना सिंगापुर में की गयी.
  • अस्थायी सरकार की स्थापना सिंगापुर में हुई. सुभाषचन्द्र बोस प्राइम मिनिस्टर तथा सेना के सुप्रीम कमांडर बने.
  • आजाद हिंद फ़ौज की स्त्रियों के रेजीमेंट का नाम ‘झांसी की रानी’ था.
  • राष्ट्रीय गान टैगोर की कविता थी. कांग्रेस का तिरंगा झंडा इसका झंडा था. तीन ब्रिगेडों के नाम थे, ‘सुभाष ब्रिगेड’ ‘नेहरू ब्रिगेड’ और ‘गांधी ब्रिगेड’.
  • जापान सरकार ने अंडमान और निकोबार द्वीप पर विजय प्राप्त कर इसका शासन अस्थायी सरकार को सौंप दिया.
  • आजाद हिंद फ़ौज के तीन अफसरों-गुरु दयाल सिंह ढिल्लों, श्री प्रेम कुमार सहगल और श्री शाहनवाज पर राजद्रोह का मकुदमा लाल किला में चलाया गया.
  • कांग्रेस ने ‘आजाद हिंद फ़ौज बचाव समिति’ का गठन किया जिसके सदस्य थे – भूलाभाई देसाई, श्री तेज बहादुर सप्रु, आसफ अली, नेहरू एवं जिन्ना.
  • 16 फरवरी, 1946 को ‘रॉयल इंडियन नेवी’ का विद्रोह घटिया खाना की शिकायत को लेकर शुरू हुआ.
  • नौसेना विद्रोहियों को समर्पण की सलाह श्री बल्लभ भाई पटेल ने दी थी. ऐसा कहना कि रायॅल इंडिया नेवी के विद्रोह के कारण ही कैबिनेट मिशन (18 फरवरी) भारत भेजा गया, युक्तिसगंत नहीं है.
  • कैबिनेट मिशन को भारत भेजने का निर्णय 22 जनवरी, 1946 को ही ले लिया गया था और इसकी घोषणा एक सप्ताह पहले से ही की जानी थी.

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