लिच्छवि साम्राज्य

Dr. SajivaAncient HistoryLeave a Comment

वृज्जि या वज्जि संघ 16 महाजनपदों में से एक था. यदि आपने महाजनपद के बारे में नहीं पढ़ा, तो यह पोस्ट पढ़ें > महाजनपद. यह महाजनपद मगध के उत्तर में स्थित था. यह संघ आठ कुलों के संयोग से बना था और इनमें चार (विदेह, ज्ञातृक, वज्जि तथा लिच्छवि) कुल अधिक प्रमुख थे. वैशाली इस संघ की राजधानी थी.

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लिच्छवि साम्राज्य

वृज्जि या वज्जि संघ में लिच्छिवियों का जनपद सर्वाधिक शक्तिशाली और महत्त्वपूर्ण था. इनकी राजधानी वैशाली थी. महावस्तु नामक ग्रंथ से ज्ञात होता है कि गौतम बुद्ध लिच्छिवियों के विशेष निमन्त्रण पर वैशाली गए थे. यह नगरी केवल लिच्छवि गणराज्य की ही नहीं अपितु सम्पूर्ण वृज्जि संघ की राजधानी भी रही थी. लिच्छिवियों का शासन एक प्रकार का कुलीन परिवारों का प्रजातन्त्र था. इस राज्य की राजनीतिक शक्ति उन्हीं द्वारा (या नागरिकों द्वारा) निर्वाचित सभासदों के हाथों में थी. राजकार्य चलाने वाले वृद्ध हुआ करते थे; जिनमें से प्रत्येक को ‘राजा’ कहा जाता था.

‘राजा’ से तात्पर्य एक निरंकुश शासक से नहीं अपितु राज्य का शासक या प्रशासकीय सभा का एक सदस्य से होता था. स्रोतों से यह ज्ञात नहीं होता कि इन राजाओं का चुनाव होता था या उनका पद विभिन्‍न परिवारों के पितृ वंशानुगत स्वामी या नायक होते थे. एक जातक के अनुसार (पण्य जातक) लिच्छवी राज्य में 7707 राजा या नागरिक प्रतिनिधि सभा का निर्माण करते थे. इस सभा के सदस्य परस्पर एक-दूसरे से छोटे या बड़े नहीं माने जाते थे. इन्हीं में एक राजा, एक उपराजा, सेनापति ओर भंडागारिक (या कोषाध्यक्ष) चुने जाते थे. कहा जाता है कि एक ही मुकदमें की सुनवाई करने के लिए लिच्छवि गणराज्य में एक के बाद एक करके सात न्यायालय थे. मगर कुछ विद्वान इस बात की सच्चाई को संदेहास्पद मानते हैं.

बौद्ध साहित्य लिच्छिवियों के सामाजिक, और राजनीतिक जीवन पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालता है. यहाँ कानून द्वारा नागरिकों का सामाजिक जीवन को नियंत्रित किया जाता था. सबके लिए सामान्य नियम यह था कि कोई भी संधीय कुलों से बाहर विवाह नहीं कर सकता था. उनका आन्तरिक संगठन अच्छा था ओर गौतम बुद्ध के अनुसार इसलिए लिच्छिवि गण अजेय था. इसकी जनसंख्या काफी अधिक थी. अनेक भवन इस नगर की सुन्दरता को बढ़ाते थे. इस नगर का विशेष धार्मिक महत्त्व था. वर्धमान महावीर की माता इसी राज्य के क्षत्रियों की वंशज थी. इसी नगर के समीप कुन्द ग्राम (आज कल जो बासु कुण्ड कहलाता है) में उत्पन्न हुए थे. इसी नगर में दूसरी बौद्ध सभा का आयोजन किया गया था. वृज्जि संघ को अजातशत्रु ने अपने प्रधान अमात्य वस्सकार को वैशाली में भेजकर तथा लिच्छवियों में फूट डलवाकर तोड़ने में सफलता प्राप्त की थी. एक युद्ध में इस संघ को पराजित कर अजातशत्रु ने नष्ट कर दिया.

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