[Sansar Editorial] ईरान परमाणु समझौता, P5+1 के बारे में जानें – Iran Nuclear Deal

Sansar LochanIndia and non-SAARC countries, International Affairs1 Comment

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ईरान परमाणु समझौता, 2015 में ईरान तथा विश्व के छह देशों – अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी (अर्थात् P5+जर्मनी+यूरोपियन संघ) के बीच सम्पन्न हुआ था. इस समझौते को संयुक्त व्यापक कार्य योजना (Joint Comprehensive Plan of Action : JCPOA) भी कहते हैं. संयुक्त राज्य अमेरिका हाल ही में इस समझौते से बाहर निकल आया है.

P5 का अर्थ हुआ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के पाँच स्थायी सदस्य – अमेरिका, चीन, यूनाइटेड किंगडम, फ़्रांस और रूस. जब यह परमाणु समझौता हुआ तो इसे P5+1 एवं EU के नाम से जाना जाने लगा क्योंकि इसमें जर्मनी भी था (जो UN का स्थाई सदस्य नहीं है).

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ईरान परमाणु समझौता – मुख्य बिंदु

  • समझौते के तहत ईरान द्वारा माध्यम संवर्धित यूरेनियम (Medium Enriched Uranium – MEU) के अपने भंडारण को पूर्ण रूप से समाप्त करने, निम्न संवर्द्धित यूरेनियम (LEU) के भण्डारण को 98% तक कम करने और आगामी 13 वर्षों में अपने गैस सेंट्रीफ्यूजों की संख्या को 2/3 तक कम करने पर सहमति व्यक्त की गई.
  • इस समझौते के माध्यम से ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगाये गए प्रतिबंधों की निगरानी के लिए कठोर तंत्रों की स्थापना की गई थी.
  • इसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि वर्ष 2031 तक ईरान को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (International Atomic Energy Agency : IAEA) के प्रत्येक जाँच अनुरोध को स्वीकार करना होगा. ऐसा न किये जाने की स्थिति में, आयोग बहुमत के आधार पर निर्णय लेते हुए प्रतिबंधों को पुनः आरोपित करने सहित उचित दंडात्मक कार्यवाही कर सकता है.
  • संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा समझौते से बाहर होने का प्रमुख कारण यह है कि यह समझौता ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, 2025 के बाद इसकी परमाणु गतिविधियों तथा यमन एवं सीरिया में जारी संघर्ष में इसकी भूमिका को लक्षित नहीं करता है.
  • वर्तमान स्थिति के अनुसार, परमाणु समझौते को तब तक समाप्त नहीं किया जा सकता है जब तक की ईरान एवं अन्य हस्ताक्षरकर्ता इसकी प्रतिबद्धताओं से सम्बद्ध रहें.

ईरान के विरुद्ध आरोप

यह आरोप लगाया गया था कि ईरान अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों के कार्य को बाधित कर रहा था. यह IAEA निरीक्षकों को सैन्य प्रतिष्ठानों तक पहुँचने की अनुमति नहीं दे रहा था जो कि इसका “गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम” का भाग है.

अन्य देशों की प्रतिक्रियाएँ

  • JCPOA के अन्य भागीदार इस समझौते को भंग करने के पक्ष में नहीं है.
  • केवल दो देशों – सऊदी अरब और इजराइल ने अमेरिका का इस समझौते से पीछे हटने की निर्णय की सराहना की है.

निहितार्थ

  • अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) का कहना है कि अमेरिका के एकपक्षीय निर्णय से सम्पूर्ण समझौते की नींव ही हिल गई है. यदि अमेरिका इस समझौते से जुड़ा होता तो यह बहुत हद तक सम्भव था कि समझौते के हर-एक बिंदु को अंततः ईरान सहज स्वीकार कर लेता.
  • ट्रांस-पैसिफिक साझेदारी, पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते और उत्तरी अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौते से अलगाव के बाद, यह निर्णय अमेरिकी विश्वसनीयता को और कम करता है.
  • पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (OPEC) में ईरान तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है. इस निर्णय के बाद ईरान की तेल आपूर्ति गिरकर 200,000 bpd और 1 मिलियन bpd के बीच हो सकती है. यह इस पर निर्भर करेगा कि वाशिंगटन के निर्णय का कितने अन्य देश समर्थन करते हैं.
  • तेल की  कीमतों में संभावित वृद्धि हो सकती है जो वित्तीय बाजारों में अस्थिरता का कारण बन सकती है क्योंकि यूरोपीय देशों तक 37% तेल आपूर्ति ईरान द्वारा की जाती है. JCPOA के निर्माण के बाद व्यापार सम्बन्धों में कई आयामों का विकास हुआ है. अमेरिका द्वारा समझौते में स्वयं को अलग करना विशेष रूप से यूरोपीय देशों में इसकी विश्वसनीयता में कमी और NATO गठबंधन को कमजोर बना सकता है.
  • यह जनसामान्य के जीवन में अनेक कठिनाइयाँ पैदा करेगा.

भारत पर निर्णय के प्रभाव

तेल की कीमतें : ईरान वर्तमान में भारत का दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता देश (इराक के बाद) है और कीमतों में कोई भी वृद्धि मुद्रास्फीति के स्तर और भारतीय रूपये दोनों को भी प्रभावित करेगी.

चाबहार : अमेरिकी प्रतिबंध चाबहार परियोजना के निर्माण की गति को धीमा कर सकते हैं अथवा रोक भी सकते हैं. भारत, बन्दरगाह हेतु निर्धारित कुल 500 मिलियन डॉलर के व्यय में इसके विकास के लिए लगभग 85 मिलियन डॉलर का निवेश कर चुका है, जबकि अफ़ग़ानिस्तान के लिए रेलवे लाइन हेतु लगभग 1.6 अरब डॉलर तक का व्यय हो सकता है.

भारत, INSTC (International North–South Transport Corridor) का संस्थापक है. इसकी अभिपुष्टि 2002 में की गई थी. 2015 में JCPOA पर हस्ताक्षर किये जाने के बाद ईरान से प्रतिबन्ध हटा दिए गये और INSTC की योजना में तीव्रता आई. यदि इस मार्ग से सम्बद्ध कोई भी देश या बैंकिंग और बीमा कम्पनियाँ INSTC योजना से लेन-देन करती है तथा साथ ही ईरान के साथ व्यापार पर अमेरिकी प्रतिबंधों का अनुपालन करने का निर्णय लेती हैं तो नए अमेरिकी प्रतिबंध INSTC के विकास को प्रभावित करेंगे.

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