भारत का पड़ोसी देश के साथ कूटनीतिक सम्बन्ध – India’s Diplomatic Relationship with her Neighbors

Sansar LochanIndia and its neighbours, International Affairs1 Comment

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क्षेत्रफल, जनसंख्या तथा आर्थिक एवं सैन्य क्षमताओं के सन्दर्भ में भारत अपने पड़ोसी देशों की तुलना में अत्यधिक विशाल देश है. प्रत्येक पड़ोसी देश, भारतीय उपमहाद्वीप में स्थित अन्य देशों की अपेक्षा भारत के साथ अधिक महत्त्वपूर्ण नैतिक, भाषाई या सांस्कृतिक विशेषताएँ साझा करता है.

विगत दशकों के दौरान अपने पड़ोसी देशों और SAARC के प्रति भारत की दृष्टि में स्पष्ट परिवर्तन परिलक्षित हुआ है. भारत चाहता है कि इस क्षेत्र में सभी देश आपस में आर्थिक सम्बन्ध मजबूत करें. 2014 में सभी सार्क देशों के नेताओं को नई सरकार के शपथ-ग्रहण समारोह में आमंत्रित कर भारत की नेबरहुड फर्स्ट नीति की शुरुआत की गई थी.

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC)

  • यह एक क्षेत्रीय संगठन है जिसकी स्थापना वर्ष 1985 में की गई थी.
  • सार्क की स्थापना का मुख्य उद्देश्य दक्षिण एशिया के लोगों के कल्याण को प्रोत्साहित करना, जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना और क्षेत्र में आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति एवं सांस्कृतिक विकास को त्वरित करना था.
  • सदस्य देश हैं – भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, अफ़ग़ानिस्तान और भूटान.

पृष्ठभूमि

अपने पड़ोसी देशों के प्रति भारत की विदेश नीति से सम्बंधित इतिहास निम्नलिखित है –

  • शीतयुद्ध के दौरान भारत को अनिच्छुक शक्ति (Reluctant Power) के रूप संदर्भित किया गया था. इसका यह तात्पर्य है कि समझा जाता था कि भारत के पास संसाधन उपलब्ध हैं परन्तु इनके उपयोग के लिए इसने कोई कार्यवाही नहीं की या कार्यवाही का प्रबंध ही नहीं किया.
  • प्रारम्भ में भारत ने चीन के साथ पञ्चशील समझौते पर हस्ताक्षर किये थे तथा गुटनिरपेक्ष (NAM) सिद्धांत के साथ आगे बढ़ा था. हाल के वर्षों में भारत ने लुक ईस्ट पॉलिसी (वर्तमान में Act East) तथा सार्क, बिम्सटेक (BIMSTEC) इत्यादि जैसे क्षेत्रीय मंचों के जरिये अपने पड़ोसियों के साथ सम्बन्धों को आगे बढ़ाया है.
  • भारत ने 1998 की गुजराल डॉक्ट्रिन के भाग के रूप में “गैर-पारस्परिकता की नीति (Policy of Non-Reciprocity)” का अनुसरण किया है. इस नीति के अनुसार भारत के अपने पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्ध भारत की क्षेत्रीय स्थिति के आधार पर होने चाहिए न कि पारस्परिकता के सिद्धांत पर.
  • भारत ने वैश्वीकरण के इस युग में दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय एकीकरण की जरुरत को पूरा करने के लिए “न्यू नेबरहुड पॉलिसी (New Neighborhood Policy)” का अनुसरण किया है. यह नीति सीमा क्षेत्रों के विकास, क्षेत्र में अच्छी कनेक्टिविटी और सांस्कृतिक सम्पर्क को प्रोत्साहन देने से सम्बंधित है.
  • वर्ष 2014 में भारत ने सभी सार्क देशों के नेताओं को नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया था तथा अपनी “नेबरहुड फर्स्ट (Neighborhood First)” नीति का प्रतिपादन किया था. इस नीति के महत्त्वपूर्ण बिंदु निम्न हैं –
  1. भारत अपने पड़ोसी देशों तथा हिन्द महासागर के द्वीपीय देशों को राजनीतिक एवं कूटनीतिक प्राथमिकता प्रदान करने का इच्छुक है.
  2. यह पड़ोसी देशों को संसाधनों, सामग्रियों तथा प्रशिक्षण के रूप में सहायता कर समर्थन प्रदान करेगा.
  3. वस्तुओं, लोगों, ऊर्जा, पूँजी तथा सूचना के मुक्त प्रवाह में सुधार हेतु व्यापक सम्पर्क की सुविधा हो.
  4. भारत के नेतृत्व में क्षेत्रवाद में ऐसे मॉडल को प्रोत्साहित करना जो पड़ोसी देशों के भी अनुकूल हो.
  5. सांस्कृतिक विरासत के जरिये पड़ोसी देशों के साथ सम्पर्क स्थापित करना.

गुजराल डॉक्ट्रिन (Gujral Doctrine)

Gujral Doctrine में निम्नलिखित पाँच सिद्धांत हैं –

  • भारत, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों से पारस्परिकता की अपेक्षा नहीं करता है बल्कि यह अच्छी भावना और विश्वास के अंतर्गत जो कुछ भी दे सकता है या जो सुविधाएँ प्रदान कर सकता है, उन्हें उपलब्ध कराएगा.
  • किसी भी दक्षिण एशियाई देश को क्षेत्र के एक अन्य देश के हितों के विरुद्ध अपने क्षेत्र के प्रयोग की अनुमति प्रदान नहीं करनी चाहिए.
  • किसी भी देश को किसी अन्य देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.
  • सभी दक्षिण एशियाई देशों को एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता तथा संप्रभुता का अनिवार्य रूप से सम्मान करना चाहिए.
  • इन देशों को अपने सभी मुद्दों का समाधान शांतिपूर्ण द्विपक्षीय वार्ताओं के जरिये करना चाहिए.

पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में दूरी के कारण

भारत का उसके पड़ोसी देशों के संबंधों में दूरी के तीन कारण उल्लेखनीय हैं –

  1. प्रतिकूल संरचनात्मक चुनौतियाँ
  2. सुरक्षा और विकास के प्रमुख मुद्दों पर सर्वसम्मति का अभाव
  3. चीन का प्रभाव
  4. भारत की कठोर प्रतिक्रिया कार्यनीति
  5. राजनीतिक विवाद

1. प्रतिकूल संरचनात्मक चुनौतियाँ

भारत के सामने सीमा संघर्षों की ऐतिहासिक विरासत और नैतिक एवं सामाजिक समस्याएँ विद्यमान हैं. ये भारत की दक्षिण एशियाई नीति की सफलता को विफल बनाने वाली प्रमुख संरचनात्मक असक्षमताएँ हैं. उदाहरण के लिए नेपाल में मधेशियों, श्रीलंका में तमिलों, बांग्लादेश के साथ सीमा एवं नदी जल विवाद से सम्बंधित मुद्दों को भारत की विभिन्न संरचनात्मक असक्षमताओं के रूप में देखा जा सकता है.

2. सुरक्षा और विकास के प्रमुख मुद्दों पर सर्वसम्मति का अभाव

दक्षिण एशिया एकमात्र ऐसा भूभाग है जिसकी स्वयं की कोई क्षेत्रीय सुरक्षा सरंचना नहीं है और सर्वसम्मति के अभाव के चलते ऐसी किसी संरचना के विकास के लिए प्रयास भी नहीं किये गये हैं. भारत की बिग ब्रदर वाली छवि को क्षेत्र के अन्य देशों द्वारा क्षेत्र की सुरक्षा और विकास हेतु सहयोग देने के लिए एक सक्षम कारक के रूप में नहीं अपितु एक खतरे के रूप में देखा जाता है.

3. चीन का प्रभाव

चीन ने वर्ष 2015 के भारत-नेपाल सीमा अवरोध के बाद भारत के पड़ोस के वैकल्पिक व्यापार तथा कनेक्टिविटी विकल्पों (अर्थात् ल्हासा तक राजमार्ग, शुष्क बन्दरगाहों के विकास हेतु सीमा पर रेलमार्ग) में अपनी स्थिति मजबूत करने हेतु सशक्त प्रयास किये हैं.

श्रीलंका, बांग्लादेश, मालदीव और पाकिस्तान में चीन की रणनीतिक अचल सम्पदा मौजूद है और साथ ही इन देशों की घरेलू नीतियों में चीन सहभागी है.

चीन पहले से ही अवसंरचना और कनेक्टिविटी परियोजनाओं में अपनी उपस्थिति का विस्तार कर रहा था और अब उसने राजनीतिक मध्यस्थता आरम्भ कर दी है. उदाहरण के लिए म्यांमार और बांग्लादेश के मध्य एक रोहिंग्या शरणार्थी वापसी समझौता तय करने के लिए कदम बढ़ाना, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के विदेश मंत्रियों की बैठकों का आयोजन करना ताकि दोनों को One Belt, One Road (OBOR) के साथ एक मंच पर लाया जा सके तथा मालदीव सरकार और विपक्ष के बीच मध्यस्थता करना.

अन्य सम्बंधित तथ्य

‘First China-South Asia Cooperation Forum’ (CSACF)

  • हाल ही में युन्नान प्रांत (चीन) में “प्रथम चाइना-साउथ एशिया कारपोरेशन फोरम (CSACF)” का अनावरण किया गया.
  • CSACF का सचिवालय युन्नान प्रांत में स्थापित किया जायेगा जहाँ इसके वार्षिक सम्मेलनों का भी आयोजन किया जाएगा.
  • सार्क देशों (भूटान को छोड़कर), दक्षिण-पूर्वी एशिया में म्यांमार और वियतनाम तथा कुछ अन्य देशों के अधिकारियों ने इस फोरम में भाग लिया था.
  • इस फोरम के उद्देश्य निर्दिष्ट करते हैं कि “चीन और दक्षिण एशियाई देशों को सहयोग को मजबूत करने, सहयोग में विस्तार करने, सहयोग परियोजनाओं को क्रियान्वित करने तथा सहयोग गुणवत्ता में सुधार करने हेतु अन्तः क्रिया को अपेक्षाकृत अधिक सुदृढ़ करना चाहिए”.
  • यह OBOR का एक भाग है तथा इसकी स्थापना एशिया में क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए की गई है.

4. भारत की कठोर प्रतिक्रिया कार्यनीति

भारत की दक्षिण एशिया में केन्द्रीय अवस्थिति है तथा भौगोलिक और आर्थिक रूप से यह सबसे विशाल देश है. अतः यह अपेक्षा की जा सकती है कि भारत का उसके प्रत्येक पड़ोसी देश पर अधिक प्रभाव होगा. परन्तु अनेक अवसरों पर भारत की कठोर प्रतिक्रिया कार्यनीति अप्रभावी सिद्ध हुई है :

  • वर्ष 2015 में नेपाल सीमा पर अवरोध तथा भारतीय सहायता में एक अनुवर्ती कटौती ने नेपाली सरकार को उनके संविधान में संशोधन के लिए बाध्य नहीं किया जबकि भारत अपेक्षा कर रहा था कि उपर्युक्त कदम उठाकर नेपाल को संविधान संशोधन हेतु बाध्य किया जा सकता है. संभवत: इन क़दमों ने वहाँ भारत की स्थिति को विपरीत रूप से प्रभावित किया है.
  • वर्ष 2015 में भारतीय प्रधानमन्त्री द्वारा माले यात्रा को रद्द करना तथा मालदीव में आपातकाल की आलोचना भी मालदीव सरकार में भारत की इच्छानुरूप परिवर्तन करने में असफल सिद्ध हुई. इसका विपरीत प्रभाव पड़ा तथा मालदीव ने भारतीय नौसेना के “मिलन” अभ्यास में भाग लेने से इनकार कर दिया.

5. राजनीतिक विवाद

विभिन्न कारणों से SAARC के सदस्यों के साथ भारत के सम्बन्ध आदर्श नहीं हैं या राजनीतिक रूप से विपरीत परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं.

  • मालदीव के राष्ट्रपति यामीन अब्दुल गयूम ने विपक्ष के विरुद्ध दमनात्मक कार्रवाई कर, चीन को आमंत्रित करके तथा पाकिस्तान को सार्क से अलग करने के भारत के प्रयासों में भारत का साथ नहीं देकर भारत को चुनौती दी है.
  • नेपाल में के.पी. शर्मा ओली सरकार भारत की प्रथम पसंद नहीं हैं तथा दोनों देशों की 1950 की शांति एवं मित्रता संधि इत्यादि पर असहमति है.
  • श्रीलंका और अफगानिस्तान में भारत के सम्बन्ध विगत कुछ वर्षों से तुलनात्मक रूप से बेहतर हैं परन्तु इन देशों में होने वाले आगामी चुनाव भारत के समक्ष चुनौती प्रस्तुत कर सकते हैं.

संबधित सुझाव

इन उल्लिखित कारकों में से किसी कारक को पूर्णतः परिवर्तित करना बहुत मुश्किल है, पर दक्षिण एशिया में भूगोल के मौलिक तथ्यों और साझी संस्कृति को भी नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. अतः भारत को नेबरहुड फर्स्ट को पुनः मजबूत बनाने हेतु अपने प्रयासों पर जरुर ध्यान देना चाहिए.

a) सॉफ्ट पॉवर

यह देखा गया है कि जब-जब भारत ने सॉफ्ट पॉवर की नीति अपनाई है वहाँ उसे लाभ ही हुआ है. कह सकते हैं कि सॉफ्ट पॉवर की नीति एक प्रबल कूटनीतिक हथियार है. उदाहरण के लिए भूटान और अफगानिस्तान में भारत द्वारा रक्षा सहायता देने की तुलना में विकास के लिए दी गई सहायता के कारण अधिक सफलता मिली है. इसे देखते हुए दो वर्षों की गिरावट के बाद 2018 में भारत द्वारा दक्षिण एशिया हेतु किये गये आवंटन में 6% वृद्धि की गई है.

b) चीन के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन

क्षेत्र में चीन की प्रत्येक परियोजना का विरोध करने के स्थान पर भारत को त्रिआयामी दृष्टिकोण को अपनाना होगा –

  • पहला, जब भारत को यह अनुभव हो कि कोई परियोजना उसके हितों के प्रतिकूल है तो भारत को परियोजना का विकल्प प्रस्तुत करना चाहिए. यदि आवश्यक हो तो उसे अपने चतुर्भुजीय भागीदारों (जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया) से सहयोग से ऐसा करना चाहिए.
  • दूसरा, भारत को उन परियोजनाओं के सन्दर्भ में तटस्थ रहना चाहिए जिनमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है. साथ ही साथ उसे सतत विकास सहायता के लिए ऐसे दक्षिण एशियाई सिद्धांतों का विकास करते रहना चाहिए जिसका सम्पूर्ण क्षेत्र में उपयोग किया जा सके.

c) आसियान देशों से सीख

आसियान (ASEAN) की तरह सार्क देशों को भी प्रायः अनौपचारिक रूप से बैठक करनी चाहिए, एक दूसरे की सरकार के आंतरिक कार्यों में नाममात्र का हस्तक्षेप करना चाहिए तथा सरकार के प्रत्येक स्तर पर अधिक अन्तः क्रिया करनी चाहिए. इसके अतिरिक्त कुछ विशेषज्ञ यह तर्क देते हैं कि इंडोनेशिया की भाँति भारत को भी सार्क प्रक्रिया को अधिक सामंजस्यपूर्ण बनाने के लिए निर्णय निर्माण में गौण भूमिका निभानी चाहिए.

d) नेबरहुड फर्स्ट की सीमाओं समझना

वैश्विक शासन में अपनी अधिकारपूर्ण प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय और राजनीतिक संगठनों में सुधार के प्रयास करने के अतिरिक्त भारत को निवेश, प्रौद्योगिकी तक पहुँच, अपनी रक्षा एवं ऊर्जा आवश्कताओं की प्रतिपूर्ति तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं में अपने हितों की सुरक्षा करने की आवश्यकता है. विदित हो कि इन आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति उसके पड़ोसी देशों द्वारा नहीं हो सकती है.

हाल ही में शुरू की गई कुछ पहलें –

Videsh Aaya Pradesh ke Dwaar

  • यह हाल ही में विदेश मंत्रालय द्वारा हैदराबाद में प्रारम्भ की गई एक पहल है.
  • यह जन सामान्य तक विदेश नीति के उद्देश्यों को ले जाने के लिए वर्धित सार्वजनिक कूटनीतिक पहुँच का एक भाग है.
  • विदेश नीति मंत्रालय की प्राथमिकताओं को साधारण शब्दों में व्यक्त करने के लिए स्थानीय मीडिया के साथ प्रत्यक्ष अन्तः क्रिया करेगा. इसके साथ ही राजनयिक प्रयासों के माध्यम से जन सामान्य को प्राप्त लाभों को स्पष्ट करेगा तथा विदेश नीति के क्षेत्र को जन सामान्य के नजदीक लायेगा.
  • इस पहल का उद्देश्य विदेश नीति में रूचि रखने वाले मीडिया पेशेवरों का एक समूह तैयार करना और विदेश मंत्रालय से उसका सामंजस्य स्थापित करना है.

ई-विदेश क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय योजना (E-FRRO)

  • हाल ही में गृह मंत्रालय ने देश में E-FRRO (E-Foreigners Regional Office Scheme) योजना शुरू की है.
  • यह एक वेब-आधारित एप्लीकेशन है. इसका निर्माण इंडियन ब्यूरो ऑफ़ इमीग्रेशन द्वारा किया गया है. इसका उद्देश्य भारत यात्रा पर आये विदेशियों को त्वरित और पर्याप्त सेवाएँ प्रदान करना है.
  • नए सिस्टम पर E-FRRO का प्रयोग करते हुए विदेशी नागरिक वीजा तथा प्रवास सम्बन्धी 27 सेवाएँ प्राप्त कर सकेंगे तथा अपवादात्म्क मामलों को छोड़कर शारीरिक रूप से उपस्थित हुए बिना सेवाओं को ईमेल या डाक के माध्यम से प्राप्त कर सकेंगे.

स्टडी इन इंडिया कार्यक्रम

“Study in India Programme” मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा आरम्भ किया गया है. इसका प्राथमिक उद्देश्य भारत की एक उत्कृष्ट शिक्षण स्थल के रूप में ब्रांडिंग कर विदेशी छात्रों को आकर्षित करना है.

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