बालू के अति-खनन की समस्या और इसका समाधान

Sansar LochanClimate ChangeLeave a Comment

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संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने हाल ही में बालू से सम्बंधित विश्व-भर के संसाधनों के पर्यावरण की दृष्टि से प्रशासन के लिए नए-नए समाधान खोजने के विषय में एक प्रतिवेदन निर्गत किया है.

प्रतिवेदन के मुख्य निष्कर्ष

  • विश्व-भर में बालू की खपत बढ़ती जा रही है. जितनी तेजी से हम बालू निकाल रहे हैं, उतनी तेजी से प्रकृति उसकी कमी की भरपाई नहीं कर पाती है.
  • पानी के बाद मात्रा की दृष्टि से बालू और बजरी प्रकृति के दूसरे ऐसे सबसे बड़े संसाधन हैं जिनका दोहन और व्यापार होता है. किन्तु इसके लिए नियम सबसे कम हैं.
  • संसार-भर में बालू की माँग का 85% से 90% अंश घाटों और खाइयों से पूरा होता है. नदियों और समुद्र तटों से 10%-15% बालू निकाला जाता है. पर्यावरण और सामाजिक गतिविधियों से इन दोनों स्रोतों पर खतरा बना हुआ है.
  • जहाँ तक प्रत्येक वर्ष घाटों, खाइयों, नदियों और समुद्र तटों से 40-50 बिलियन टन पिसा हुआ पत्थर, बालू और बजरी निकाले जाते हैं. इसका आधा भाग भवन निर्माण उद्योग में चला जाता है. निर्माण कार्य में इसकी खपत भविष्य में बढ़ेगी ही.

चिंता का विषय

  • बालू, बजरी आदि को निकालने से बहुत कर के नदियों और तटीय क्षेत्र में अपरदन होता है और मीठे जल तथा समुद्री मछलियों के अतिरिक्त पूरे जलीय पारिस्थितिकी को खतरा हो जाता है. इसके कारण नदी-तट स्थाई नहीं रह पाते हैं जिस कारण बाढ़ की घटनाएँ बढ़ जाती हैं और भूमिजल का स्तर भी नीचे चला जाता है.
  • प्रतिवेदन के अनुसार विश्व की अधिकांश नदियाँ समुद्र में जितना प्राकृतिक बालू और बजरी डाला करती थीं उसमें 50% से 95% तक की गिरावट आ चुकी है.
  • पनबिजली उत्पन्न करने के लिए अथवा सिंचाई के लिए नदियों पर बाँध बनाने से उनमें बहती हुई गाद की मात्रा भी घट जाती है.
  • बालू की प्राकृतिक भरपाई नहीं होने से समुद्र तट दुष्प्रभावित हो जाता है. विदित हो कि समुद्र के स्तर में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली आंधी के साथ-साथ उत्पन्न लहरों की तीव्रता और साथ ही तटीय क्षेत्र में विकास कार्य से समुद्री बीचों पर बुरा प्रभाव पड़ता है.
  • बालू की निकासी का एक अप्रत्यक्ष परिणाम स्थानीय लोगों की आजीविका में कमी के रूप में सामने आता है. यह विडंबना ही है कि तटीय पर्यटक स्थलों पर निर्माण कार्य से वहाँ की प्राकृतिक बालू में कमी आती है और फलस्वरूप वे स्थल अनाकर्षक हो जाते हैं और श्रमिकों की सुरक्षा पर खतरा भी हो जाता है क्योंकि बालू उद्योग से सम्बंधित नियम नहीं बने हुए हैं.

क्या किया जाए?

  • अनावश्यक और मात्र प्रतिष्ठा के लिए निर्माण कार्य नहीं किया जाना चाहिए.
  • किसी भवन को तोड़कर और उसे फिर से बनाने के स्थान पर उसके संधारण पर पैसा खर्च होना चाहिए.
  • निर्माण कार्य में यथासंभव सीमेंट और कंक्रीट के उपयोग से बचा जाए और हरित अवसंरचना का प्रयोग किया जाए.
  • बालू के खनन को कम करने के लिए आज वैश्विक स्तर से लेकर स्थानीय स्तर तक कार्रवाई करने की आवश्यकता है. इसमें सार्वजनिक, निजी और सिविल सोसाइटी संगठनों को भी संग्लन किया जाए.
  • सरकार को भी चाहिए कि वह इस विषय में सर्वसहमति बनाए और अपनी नीतियों को बालू की उपलब्धता के अनुसार फिर से गढ़े.

UNEP क्या है?

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी है जो पर्यावरण से सम्बंधित गतिविधियों का समन्वय करती है. यह पर्यावरण की दृष्टि से उचित नीतियों एवं पद्धतियों का कार्यान्वयन करने में विकासशील देशों को सहायता प्रदान करती है.

UNEP पर संयुक्त राष्ट्र विभिन्न एजेंसीयों की पर्यावरण विषयक समस्याओं को देखने का दायित्व है. जहाँ तक वैश्विक तापवृद्धि (global warming) की समस्या पर चर्चा का प्रश्न है, इसको देखने का काम जर्मनी के Bonn में स्थित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मलेन (United Nations Framework Convention on Climate Change) का है.

UNEP जिन समस्याओं को देखता है उनमें प्रमुख हैं – वायुमंडल, समुद्री एवं धरातलीय पारिस्थितिकी तंत्र, पर्यावरणिक प्रशासन एवं हरित अर्थव्यवस्था.

UNEP पर्यावरण से सम्बंधित विकास परियोजनाओं के कार्यान्वयन एवं उन्हें धन देने का काम भी करता है.

Fast Facts

  • UNEP का full-form है – United Nations Environment Programme
  • मानवीय पर्यावरण पर हुए स्टॉकहोम सम्मलेन के परिणामस्वरूप UNEP का गठन जून 1972 में हुआ था.
  • इसका मुख्यालय नैरोबी, केन्या में है.
  • इसके संस्थापक और पहले निदेशक Maurice Strong थे.
  • विश्व ऋतु विज्ञान संगठन और UNEP ने संयुक्त रूप से 1988 में जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (Intergovernmental Panel on Climate Change –IPCC) की स्थापना की थी.
  • वैश्विक पर्यावरण सुविधा ( Global Environment Facility – GEF)  तथा मोंट्रियल संधि (Montreal Protocol) के कार्यान्वयन के लिए बहुपक्षीय निधि के लिए कार्यरत कई एजेंसियों में से UNEP भी एक एजेंसी है.
  • UNEP UNDP का एक सदस्य निकाय भी है.
  • यह UNEP ही है जिसके तत्त्वाधान में अंतर्राष्ट्रीय सायनाइड प्रबन्धन संहिता (The International Cyanide Management Code) बनी थी जिसमें सोना निकालने के समय सायनाइड के सही प्रयोग के बारे में निर्देश दिए गये थे.
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