चोल साम्राज्य और इस वंश के शासक – The Chola Empire

Dr. SajivaAncient History, History2 Comments

चोल साम्राज्य

आज हम चोल साम्राज्य के विषय में पढेंगे. जानेंगे इस वंश का उदय और पतन कैसे हुआ, इस वंश के राजा कौन थे. इस पोस्ट को आगे भी update किया जाएगा जिसमें हम Chola’s government (केन्द्रीय शासन), न्याय प्रणाली, आय-व्यय के साधन, कला और संस्कृति के विषय में भी जानेंगे. चलिए जानते हैं Chola Empire के सभी details in Hindi.

भूमिका : चोल वंश

चोल वंश का इतिहास प्राचीन है. इस वंश के शासक अपने आपको भारत के प्राचीनतम और मूल निवासियों की संतान मानते थे. महाभारत, मेगस्थनीज के वर्णन, अशोक के अभिलेख और अनेक प्राचीन बौद्ध और यूनानी पुस्तकों में चोलों के वर्णन  मिलते हैं. इस वंश के शक्तिशाली साम्राज्य का प्रारम्भ नवीं शताब्दी से माना जाता है और धीरे-धीरे दक्षिण भारत का अधिकांश भाग इसके अधीन आ गया. उन्होंने श्रीलंका और मालद्वीप पर भी अधिकार कर लिया. इनके पास एक विशाल और शक्तिशाली नौसेना थी. ये दक्षिण-पूर्वी एशिया में अपना प्रभाव कायम करने में सफल हो सके. चोल साम्राज्य निःसंदेह दक्षिण भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली साम्राज्य था. इस साम्राज्य के प्रथम (द्वितीय शताब्दी से आठवीं शताब्दी) चरण के जिन वर्षों में जब यह एक प्रभावशाली साम्राज्य था, उन वर्षों में दक्कन भारत का विदेशी व्यापार बहुत समृद्ध था क्योंकि पेरिप्लस और ट्रालेमी जैसे विदेश यात्री और विद्वानों के विवरणों में चोल राज्य के बंदरगाहों का उल्लेख मिलता है. इसके बाद संगम साहित्य (<<संगम साहित्य के बारे में पढ़ें) में अनेक चोल राजाओं का उल्लेख मिलता है जिनमें करिकाल सर्वाधिक विख्यात था. उसका शासन संभवतः 190 ई. के आसपास शुरू हुआ. करिकाल के कुछ समय बाद पेरुनरकिल्लि नामक प्रसिद्ध राजा हुआ जिसने अपनी विजयों के उपलक्ष्य में राजसूत्र यज्ञ भी किया था. उसके बाद संभवतः प्राचीन चोल राज्य की शक्ति शिथिल पड़ गई थी. उनके राज्य के अधिकांश भाग को संभवतः पल्लवों ने जीता (पल्लव कौन थे? <<यहाँ पढ़ें.)

ह्वेनसांग

सातवीं शती में आया चीनी ह्वेनसांग देश का भ्रमण करते हुए चोल राज्य में भी गया था. वह लिखता है –

“चोल राज्य 2400 या 2500 ली में फैला हुआ है और उसकी राजधानी का घेरा 10 ली है. देश उजाड़ है और ज्यादातर भाग में दलदल और वन हैं. जनसंख्या बहुत कम है और डाकू लूटमार बहुत करते हैं.”

चूँकि ह्वेनसांग ने अपने विवरण में किसी भी चोल राज्य के नाम का उल्लेख नहीं किया है इसलिए अधिकांश इतिहास यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उस समय चोल राज्य महत्त्वपूर्ण नहीं था और संभवत: वह राज्य पल्लवों के अधीन था. पल्लवों की शक्ति नष्ट होने पर चोल राज्य ने पुनः प्रगति की.

चोल साम्राज्य का उत्थान

चोल साम्राज्य की पुनः स्थापना विजयपाल (850-871 ई.) ने की जो आरम्भ में पल्लवों का एक सामंती सरदार था. उसने 850 ई. में तंजावुर को अपने अधिकार में कर लिया और पांड्य राज्य पर आक्रमण कर दिया. विजयपाल की मृतु 871 ई. में हो गई. उसके बाद उसका पुत्र आदित्य प्रथम (871-907 ई.) राजा बना. उसने अपने वंश की शक्ति और सम्मान को बढ़ाया. उसी के शासनकाल में 897 ई. तक चोल इतने शक्तिशाली हो गए थे कि उन्होंने पल्लव शासक को पराजित कर उसकी हत्या कर दी और सम्पूर्ण क्षेत्र पर अधिकार कर लिया. आदित्य प्रथम की मृत्यु के बाद परान्तक प्रथम (907-955 ई.) राजा बना. शुरू-शुरू में वह भी चोलों के प्रभाव को बनाए रख सका. उसके पांड्य राज्य को जीता और “मदुरई कोंडा” की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है – “मदुरई का विजेता”. लेकिन उसे राष्ट्रकूटों से जब लोहा लेना पड़ा तो चोल साम्राज्य को भी हानि हुई. राष्ट्रकूट शासक कृष्णा तृतीय ने 949 ई. में उसे (परान्तक प्रथम) को पराजित किया और चोल साम्राज्य  उत्तरी क्षेत्र पर अधिकार कर लिया. इससे चोल वंश को भारी धक्का लगा. लेकिन 965 ई. में कृष्णा तृतीय की मृत्यु के बाद जब राष्ट्रकूटों का पतन होने लगा तो चोल साम्राज्य एक बार फिर प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होने लगा.

NCERT का निचोड़

चोल राज्य को चोल्डमंडलम अथवा कोरोमंडल कहा जाता है. चोलमंडलम पेन्नार और बेल्लारु नदियों के मध्य समुद्रतट पर स्थित था. यह राज्य पांड्यों के राज्य के उत्तर-पूर्व में स्थित था. संगम साहित्य के विवरणों के अनुसार कहा जाता है कि इसकी सीमाएं स्थिर नहीं थीं तथा सदैव बदलती रहती थी. इस राज्य की सबसे पुरानी राजधानी उरगपुर (उरैयूर त्रिचनापल्ली के समीप) थी; क्रमशः कावेरीपट्टनम, तन्जवुर (तंजौर) और गंग कोंडचोलापुरम भी इसकी राजधानियां रहीं. पांड्यों की उत्त्पत्ति के  बारे में बहुत मतभेद हैं किन्तु सर्वाधिक मान्य मत है कि इस शब्द की उत्पत्ति ‘चूल’ नामक शब्द से हुई जिसका अर्थ शिर अथवा श्रेष्ठ होता है.  चूंकि चोल दक्षिण प्रदेश के राजाओं में सबसे श्रेष्ठ थे इसीलिए उन्हें चोल कहा गया.

सम्भवत: वे भी मूलतः उत्तर भारत के निवासी थे तथा यहीं से दक्षिण की ओर गये थे. चोलों के प्रारम्भिक इतिहास के सम्बन्ध में हमें अशोक के शिलालेख तया बौद्ध साहित्य से जानकारी मिलती है. महावंश के अनुसार द्वितीय शताब्दी ई० पू० के मध्य एलार नामक श्रीलंका (सिंहल) को जीतकर उस पर पचास वर्षों से भी अधिक शासन किया. उसके काल में सम्भवतः विदेशी व्यापार बहुत समृद्ध था क्योंकि पेरिप्लस तथा टालेमी जैसे विद्वान यात्रियों के विवरणों में चोल राज्य के बन्दरगाहों का उल्लेख मिलता है. एलार के बाद के अनेक चोल शासकों के बारे में संगम साहित्य में अनेक शासकों का वर्णन है. उनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शासक था करिकाल.

साम्राज्य का साहसी वीर योद्धा – चोल राजा करिकाल

वस्तुतः उसी के काल से चोलों का अधिक विश्वसनीय इतिहास शुरू हुआ. इसका शासन लगभग 190 ई० माना जाता है उसके पिता का नाम इसनजेतचेन्नी था. उसने पुहार की स्थापना की तथा कावेरी नदी का 160 किलो मीटर लम्बा तटबंध का निर्माण कराया. निर्माण में उन 12,000 दासों ने योगदान दिया जिन्हें श्रीलंका से बन्दी बनाकर लाया गया था. संगम साहित्य की अनेक कविताओं से पता चलता है कि वह वीर योद्धा, साहसी था तथा सामुदायिक क्रियाकलापों में बहुत रुचि रखता था. उसी के काल में चोलों की राजधानी उरगपुर से उठ कर कावेरीपट्टनम में आयी. वह बड़े पैमाने के वाणिज्य-व्यापार का केंद्र था. उसने एक विशाल नाव बेड़े का निर्माण किया तथा सूती कपड़े के व्यापार को बहुत प्रोत्साहन दिया. उसने जंगलों को कृषि-पोग्य भूमि में बदल दिया ओर सिंचाई के लिए अनेक तालाबों का निर्माण कराया. उसने अनेक वेदिक यज्ञ भी किये. कहा जाता है कि उसके (करिकाल) कुछ समय बाद पेरूनरकिल्लि नामक प्रसिद्ध शासक हुआ, जिसने अपने विजयों के उपलक्ष्य में राजसूय यज्ञ भी कराया.

चोल साम्राज्य का पतन

सम्भवतः उसी के अन्तिम दिनों या उसके उत्तराधिकारियों के काल में चोल सत्ता का तेजी से पतन हुआ . उनकी राजधानी कावेरीपट्टनम पर अधिकार कर उसे नष्ट कर दिया गया. दो पड़ोसी सी शक्तियों – चेरों और पाण्ड्यों ने चोलो के मध्य अपना राज्य विस्तार किया. सम्भवतः उनके कुछ प्रदेश पर पहले सातवाहन वंश के राजाओं तथा बाद में पल्‍लवों ने भी अधिकार कर लिया था.

चोल शासकों का योगदान 

जो भी हो चौथी शताब्दी के मध्य में चोल शासकों ने कोई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक भूमिका अदा नहीं. सातवीं शदी में चीनी यात्री ह्वेनसांग जब भारत भ्रमण करते हुए सुदूर दक्षिण में गया. पल्‍लव शक्ति के पतन के बाद चोलों की शक्ति एवं राज्य का पुनः उत्कर्ष हुआ.

Content is updated on 14 March, 2020

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2 Comments on “चोल साम्राज्य और इस वंश के शासक – The Chola Empire”

  1. Sir aap ancient history ki series bise notes uplavdh karbae jis prakar Apne morden history karbae

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