चोल साम्राज्य और इस वंश के शासक – The Chola Empire

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आज हम चोल साम्राज्य के विषय में पढेंगे. जानेंगे इस वंश का उदय और पतन कैसे हुआ, इस वंश के राजा कौन थे. इस पोस्ट को आगे भी update किया जाएगा जिसमें हम Chola’s government (केन्द्रीय शासन), न्याय प्रणाली, आय-व्यय के साधन, कला और संस्कृति के विषय में भी जानेंगे. चलिए जानते हैं Chola Empire के सभी details in Hindi.

भूमिका : चोल वंश

चोल वंश का इतिहास प्राचीन है. इस वंश के शासक अपने आपको भारत के प्राचीनतम और मूल निवासियों की संतान मानते थे. महाभारत, मेगस्थनीज के वर्णन, अशोक के अभिलेख और अनेक प्राचीन बौद्ध और यूनानी पुस्तकों में चोलों के वर्णन  मिलते हैं. इस वंश के शक्तिशाली साम्राज्य का प्रारम्भ नवीं शताब्दी से माना जाता है और धीरे-धीरे दक्षिण भारत का अधिकांश भाग इसके अधीन आ गया. उन्होंने श्रीलंका और मालद्वीप पर भी अधिकार कर लिया. इनके पास एक विशाल और शक्तिशाली नौसेना थी. ये दक्षिण-पूर्वी एशिया में अपना प्रभाव कायम करने में सफल हो सके. चोल साम्राज्य निःसंदेह दक्षिण भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली साम्राज्य था. इस साम्राज्य के प्रथम (द्वितीय शताब्दी से आठवीं शताब्दी) चरण के जिन वर्षों में जब यह एक प्रभावशाली साम्राज्य था, उन वर्षों में दक्कन भारत का विदेशी व्यापार बहुत समृद्ध था क्योंकि पेरिप्लस और ट्रालेमी जैसे विदेश यात्री और विद्वानों के विवरणों में चोल राज्य के बंदरगाहों का उल्लेख मिलता है. इसके बाद संगम साहित्य (<<संगम साहित्य के बारे में पढ़ें) में अनेक चोल राजाओं का उल्लेख मिलता है जिनमें करिकाल सर्वाधिक विख्यात था. उसका शासन संभवतः 190 ई. के आसपास शुरू हुआ. करिकाल के कुछ समय बाद पेरुनरकिल्लि नामक प्रसिद्ध राजा हुआ जिसने अपनी विजयों के उपलक्ष्य में राजसूत्र यज्ञ भी किया था. उसके बाद संभवतः प्राचीन चोल राज्य की शक्ति शिथिल पड़ गई थी. उनके राज्य के अधिकांश भाग को संभवतः पल्लवों ने जीता (पल्लव कौन थे? <<यहाँ पढ़ें.)

ह्वेनसांग

सातवीं शती में आया चीनी ह्वानसांग देश का भ्रमण करते हुए चोल राज्य में भी गया था. वह लिखता है –

“चोल राज्य 2400 या 2500 ली में फैला हुआ है और उसकी राजधानी का घेरा 10 ली है. देश उजाड़ है और ज्यादातर भाग में दलदल और वन हैं. जनसंख्या बहुत कम है और दल्कू लूटमार बहुत करते हैं.”

चूँकि ह्वेनसांग ने अपने विवरण में किसी भी चोल राज्य के नाम का उल्लेख नहीं किया है इसलिए अधिकांश इतिहास यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उस समय चोल राज्य महत्त्वपूर्ण नहीं था और संभवत: वह राज्य पल्लवों के अधीन था. पल्लवों की शक्ति नष्ट होने पर चोल राज्य ने पुनः प्रगति की.

चोल साम्राज्य का उत्थान

चोल साम्राज्य की पुनः स्थापना विजयपाल (850-871 ई.) ने की जो आरम्भ में पल्लवों का एक सामंती सरदार था. उसने 850 ई. में तंजावुर को अपने अधिकार में कर लिया और पांड्य राज्य पर आक्रमण कर दिया. विजयपाल की मृतु 871 ई. में हो गई. उसके बाद उसका पुत्र आदित्य प्रथम (871-907 ई.) राजा बना. उसने अपने वंश की शक्ति और सम्मान को बढ़ाया. उसी के शासनकाल में 897 ई. तक चोल इतने शक्तिशाली हो गए थे कि उन्होंने पल्लव शासक को पराजित कर उसकी हत्या कर दी और सम्पूर्ण क्षेत्र पर अधिकार कर लिया. आदित्य प्रथम की मृत्यु के बाद परान्तक प्रथम (907-955 ई.) राजा बना. शुरू-शुरू में वह भी चोलों के प्रभाव को बनाए रख सका. उसके पांड्य राज्य को जीता और “मदुरई कोंडा” की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है – “मदुरई का विजेता”. लेकिन उसे राष्ट्रकूटों से जब लोहा लेना पड़ा तो चोल साम्राज्य को भी हानि हुई. राष्ट्रकूट शासक कृष्णा तृतीय ने 949 ई. में उसे (परान्तक प्रथम) को पराजित किया और चोल साम्राज्य  उत्तरी क्षेत्र पर अधिकार कर लिया. इससे चोल वंश को भारी धक्का लगा. लेकिन 965 ई. में कृष्णा तृतीय की मृत्यु के बाद जब राष्ट्रकूटों का पतन होने लगा तो चोल साम्राज्य एक बार फिर प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होने लगा.

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