[Sansar Editorial] बजट 2021-22: MSME क्षेत्र के लिए प्रावधान

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कोविड-19 की चुनौतियों के चलते सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (Ministry of Micro, Small and Medium Enterprises – MSME) माँग में सुस्ती और विभिन्न संकटों के गुजरा. हम सब जानते हैं कि छोटी और मंझौली औद्योगिक-कारोबारी इकाइयाँ देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी  है, इसलिए कोविड-19 की आर्थिक सुस्ती के दौर में नए बजट से इस क्षेत्र के लिए भी कारोबार सुगमता आवश्यक है.

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MSME से सम्बंधित कुछ मुख्य तथ्य

  • देश में कृषि के पश्चात् सर्वाधिक रोजगार एमएसएमई क्षेत्र के द्वारा ही दिया जा रहा है.
  • देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में छोटे और मंझोले उद्योग-कारोबार का भाग लगभग 30% तथा देश के निर्यात में योगदान लगभग 48% है.
  • देश में MSME के अंतर्गत लगभग 6.5 करोड़ उद्यम आते हैं जो 15 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार मुहैया करवा रहे हैं और देश की करीब आधी जनसंख्या इनसे जुड़ी है.
  • वर्तमान में देश में MSME क्षेत्र के 66% उद्यम समाज के निचले वर्ग से जुड़े लोगों द्वारा संचालित किये जाते हैं.
  • इनमें से 12.5% अनुसूचित जाति, 4.1% अनुसूचित जनजाति और 49.7% अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित हैं. सभी श्रेणियों के MSMEs के कर्मचारियों में लगभग 80% पुरुष और मात्र 20% ही महिलाएँ हैं. भौगोलिक दृष्टि से देखें तो देश के केवल 7 राज्यों में ही लगभग 50% MSMEs स्थित हैं.
  • इनमें उत्तर प्रदेश (14%), पश्चिम बंगाल (14%), तमिलनाडु (8%), महाराष्ट्र (8%), कर्नाटक (6%), बिहार (5%) और आंध्र प्रदेश (5%) हैं.

चिंताएँ

  • भारत के आधे से अधिक एमएसएमई अन्य देशों के एमएसएमई की तरह तकनीक का प्रयोग नहीं कर पाते हैं परिणामस्वरूप वे अब भी परंपरागत रूप से कारोबार कर रहे हैं. इससे उनकी उत्पादकता कमी आती है और लागत भी बढ़ जाती है.
  • इस क्षेत्र की आर्थिक स्थिति और वर्तमान नकदी संकट को ध्यान में रखते हुए सरकार द्वारा इस क्षेत्र के लिए समर्पित कोष बनाना अनिवार्य दिखाई दे रहा है. इस के लिए एक बड़े आकार के MSME कोष की आवश्यकता है. साथ ही इस कोष से दिए जाने वाले ऋण पर कोई जमानत न माँगी जाए, ऐसी अपेक्षा है.
  • केंद्र और राज्य सरकार के सरकारी विभाग इन छोटे उद्यमों के भुगतान में आनाकानी करते हैं. सरकारी विभागों पर सूक्ष्म और लघु उद्योगों की 11 हजार करोड़ रूपये से भी अधिक की राशि बकाया है.

बजट 2021-22 में MSME के लिए प्रावधान

  • अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए और विकास की मुख्यधारा को गति देने के लिए एमएसएमई को 15,700 करोड़ रुपये दिए गए (जोकि पिछले साल के बजट के मुकाबले दोगुना (7572 रु.) है).
  • इसके अलावा बजट में छोटी कंपनियों की परिभाषा बदलने का भी ऐलान किया गया. यह परिभाषा कंपनियों की पूंजी के आधार पर बदली जाएगी. 50 लाख की मौजूदा सीमा से पूंजीगत आधार को बढ़ाकर करोड़ रुपये करके छोटी कंपनियों की परिभाषा को बदला जाएगा.
  • योग्य उद्यमियों को आपतकाल के समय कर्ज की सुविधा भी मिलेगी. इसके लिए 10,000 करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई है.
  • छोटी कंपनियों के लिए पेडअप कैपिटल सीमा बढ़ाई जाएगी. यह है पेडअप शेयर कैपिटल वह राशि है जिसके लिए शेयरधारकों को शेयर जारी किए जाते हैं और भुगतान शेयरधारकों द्वारा किया जाता है.
  • कुछ इस्पात उत्पादों पर एंटी डंपिंग शुल्क (एडीडी) और प्रतिकारी शुल्क (सीवीडब्ल्यू) को भी रद्द कर दिया गया है. हाल में लोहे और इस्पात की कीमतों में हुई तेज़ बढ़ोतरी से एमएसएमई और अन्य उद्योग गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं. इसलिए गैर-मिश्र धातु, मिश्र धातु और स्टेनलेस इस्पात के उत्पादों पर सीमा शुल्क को समान रूप से घटा कर 7.5 प्रतिशत कर दिया गया है. तांबे को रिसाइकिल करने वालों के लिए भी तांबे के कबाड़ पर सीमा शुल्क को पांच प्रतिशत से घटाकर 2.5 प्रतिशत कर दिया गया.
  • केंद्र सरकार का लक्ष्य आर्थिक विकास में एमएसएमई योगदान को 30 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत पहुंचाना है. एमएसएमई की निर्यात में भागीदारी भी 48 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत तक पहुंचानी है. इस क्षेत्र में 5 करोड़ नौकरियां पैदा करने का लक्ष्य भी है.

सरकार के पूर्व प्रयास

  • सरकारी और निजी क्षेत्र के बैंकों ने 100 फीसदी आपातकालीन ऋण सुविधा गारंटी योजना (Credit Guarantee Scheme) के तहत अब तक 75,426.39 करोड़ रुपये के लोन को स्वीकृति दी है जिसमें से 32,894.86 करोड़ रुपये वितरित किये जा चुके हैं.
  • देश में एमएसएमई के लिए तीन लाख करोड़ रुपये का कोलैटरल फ्री ऑटोमैटिक लोन का प्रवधान किया गया है जिसके अंतर्गत किसी एमएसएमई उद्यमी को अपनी ओर से गारंटी देने की आवश्यकता नहीं है. इसकी समय-सीमा चार वर्ष की होती है. इसके अतिरिक्त पहले एक वर्ष में मूलधन वापस नहीं करना पड़ता है.
  • एनपीए (Non Performing Assets) वाले और तंगी की हालत झेल रहे MSMEs को 20 हजार करोड़ रुपये का सबॉर्डिनेट लोन दिया दिया जाता है
  • आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (Emergency Credit Line Guarantee Scheme –  ECLGS) के तहत जो सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग अच्छा कर रहे हैं और वे व्यापार का विस्तार करना चाहते हैं, अपना आकार और क्षमता बढ़ाना चाहते हैं, परन्तु उन्हें सुविधा नहीं मिल पा रही है, उन्हें फंड ऑफ फंड्स के माध्यम से 50,000 करोड़ रुपये का इक्विटी इन्फ्यूजन किया जाता है.
  • अब सरकारी खरीद के लिए 200 करोड़ रुपये तक ग्लोबल टेंडर की आवश्यकता नहीं होती है. इसका अर्थ यह हुआ कि 200 करोड़ से कम वाले सरकारी टेंडरो में सिर्फ भारतीय कंपनियां ही भाग ले सकेंगी. 
  • विभिन्न योजनाओं (जैसे- पीएम किसान, जन धन योजना आदि) द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में तरलता और MSME उत्पादों की माँग में वृद्धि कर MSMEs को सहायता पहुँचा जाता है.
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