बौद्ध संगीतियाँ (प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ)

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आज हम बौद्ध प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ बौद्ध संगीतियों के विषय में पढेंगे और ये जानेंगे कि उन संगीतियों (Buddhist Councils) के समय तत्कालीन शासक, अध्यक्ष और उपाध्यक्ष कौन थे? ये भी जानेंगे कि ये संगीतियाँ (councils) कहाँ और कब (date) हुईं?

विशेषप्रथम संगीतिद्वितीय संगीतितृतीय संगीतिचतुर्थ संगीति
समय>>483 ई.पू.383 ई. पू. (बुद्ध के निर्वाण के सौ वर्ष बाद)250 ई.पू.प्रथम शताब्दी
स्थल>>सप्तपर्णि गुफा राजगृह/राजगीरवैशाली (बिहार)पाटलिपुत्र (तत्कालीन मगध की राजधानी)कुंडलवन
शासक>>अजातशत्रुकालाशोक (शिशुनाग वंश)अशोककनिष्क
उपाध्यक्ष>>_-_अश्वघोष
अध्यक्ष>>महाकश्यपस्थविर यशमोग्गलिपुत्त तिस्सवसुमित्र

बौद्ध संगीतियों के प्रमुख कार्य

प्रथम संगीति

बुद्ध की शिक्षाओं को संकलित कर उन्हें सुत्तपिटक (धर्म सिद्धांत) और विनय पिटक (आचार नियम) नामक दो पिटकों में विभाजित किया गया. आनंद और उपालि ने क्रमशः धर्म व विनय का संकलन किया.

द्वितीय संगीति

पूर्वी भिक्षुओं और पश्चिमी भिक्षुओं के मध्य विनय संबंधी नियमों को लेकर मतभेद होने के कारण भिक्षु संघ दो सम्प्रदायों में विभाजित हो गया –

स्थविर (थेरवादी): “महाकच्चायन” के नेतृत्व वाले इस सम्प्रदाय ने परिवर्तन के परम्परागत विनय के नियम में आस्था राखी.

महासांघिक: “महाकस्स्प/महाकश्यप” के नेतृत्व में इस सम्प्रदाय ने परिवर्तन के साथ विनय के नियमों को स्वीकार किया. कालान्तर में उक्त दोनों सम्प्रदाय 18 उप-सम्प्रदायों में बँट गए.

तृतीय संगीति 

तृतीय पिटक “अभिधम्म” (कथावस्तु) का संकलन जिसमें धर्म सिद्धांत की दार्शनिक व्याख्या की गई है. संघ में भेद को रोकने के लिए कठोर नियमों का निर्माण और बौद्ध साहित्य का परामाणिकीकरण. इस संगीति पर थेरवादियों का प्रभुत्व था.

चतुर्थ संगीति

(महासांघिकों का बोलबाला) बौद्ध ग्रन्थों के कठिन अंशों पर संस्कृत भाषा के विचार-विमर्श के बाद उन्हें “विभाषाशास्त्र” नामक टीकाओं में संकलित किया गया. इसी समय बौद्ध धर्म हीनयान तथा महायान नामक दो स्पष्ट और स्वतंत्र सम्प्रदायों में विभक्त हो गया.

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