आर्मेनिया और अजरबैजान विवाद – एक अवलोकन

Sansar LochanSansar Editorial 2020Leave a Comment

आर्मेनिया और अजरबैजान इस समय युद्ध की आग में झुलस रहे हैं. विदित हो ये देश ईरान और तुर्की की सीमा से संलग्न दो छोटे देश हैं. युद्ध में अब तक दोनों पक्षों के सैकड़ों सैनिक व कई नागरिक हताहत हो चुके हैं. तुर्की द्वारा अजरबैजान के पक्ष में सीरिया और लीबिया से आतंकी गुटों को युद्धग्रस्त क्षेत्र में भेजे जाने से परिस्थिति और अधिक खराब हो रहे हैं. तुर्की के हस्तक्षेप के पश्चात् अब रूस के दखल की संभावना भी अधिक हो गई  है. रूस और तुर्की में पूर से ही लीबिया और सीरिया के गृहयुद्ध में तलवारें खिंची हुई हैं. UNO और पश्चिमी महाशक्तियों को लग रहा है कि अगर दोनों देश युद्धविराम के लिए सहमत नहीं होते हैं तो यह वैश्विक युद्ध का कारण बन सकता है.

अज़रबैजान के बारे में

  • अज़रबैजान कैस्पियन सागर के किनारे पर ट्रांसकेशियासिया (या दक्षिण काकेशस) के पूर्वी भाग में स्थित है.
  • यह क्षेत्र 86,600 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को कवर करता है और यह दक्षिण काकेशस में स्थित सबसे बड़ा देश है.
  • इस देश का सबसे बड़ा शहर बाकू शहर है. यही इस देश की राजधानी है.
  • यहाँ की राष्ट्रीय भाषा अज़रबैजानी है. वैसे, रूसी भाषा यहाँ मुख्य रूप से बोली जाती है. अज़रबैजान ईरान (765 किमी), तुर्की (15 किमी), रूस (390 किमी), जॉर्जिया (480 किमी) और आर्मेनिया (1007 किमी) के साथ सीमाओं को साझा करता है.
  • देश के पूर्वी किनारे पर कैस्पियन सागर है.

काकेशस

काकेशस पर्वत श्रृंखला यूरोप और एशिया की सीमा पर स्थित काला सागर (black sea) और कैस्पियन सागर के बीच कॉकस क्षेत्र की एक पर्वत श्रृंखला है.

आर्मेनिया और अजरब़ैजान नार्गोनो-काराबाख को लेकर आमने-सामने हैं. अजरब़ैजान इस पर अपना दावा कर रहा है जबकि 1994 में युद्धविराम के पश्चात् से यह इलाका आर्मेनिया के कब्जे में है. रणनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण 4400 वर्ग कि.मी. वाले इस क्षेत्र को लेकर वर्ष 2016 में भी दोनों के मध्य हिंसक संघर्ष हो चुका है. नार्गोनो-काराबाख मध्य एशियाई देश अजरबैजान और आर्मेनिया की सीमाओं से लगता एक पहाड़ी क्षेत्र है. वर्ष 1920 में जब सोवियत संघ अस्तित्व में आया तो अजरबैजान और आर्मेनिया भी उसमें सम्मिलित हो गए.

दरअसल, अजरबैजान और आर्मेनिया के मध्य शत्रुता के बीज उस समय ही डाल दिए गए थे जब 95 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या वाले आर्मेनियाई शेत्र को सोवियत अधिकारियों ने अजरबैजान को सौंप दिया था. इसके पश्चात् 1924 में सोवियत संघ ने अजरबैजान के भीतर नार्गोनो-काराबाख क्षेत्र को स्वायत्त क्षेत्र के रूप में मान्यता दे दी. दूसरी तरफ, नार्गोनो-काराबाख के लोग दशकों से इस क्षेत्र को आर्मेनिया में मिलाये जाने की मांग कर रहे हैं.

सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् असल विवाद उस समय शुरू हुआ जब नार्गोनो-काराबाख की विधानसभा ने दिसंबर 1991 में अजरबैजान गणराज्य से पृथक एक स्वतंत्र राज्य के निर्माण पर जनमत संग्रह किया. जनमत संग्रह में अधिकांश ने जनसंख्या के पक्ष में मतदान किया. जनमत संग्रह के पश्चात् यहाँ अलगाववादी आंदोलन प्रारम्भ हो गया, जिसे अजरब़ैजान ने बलपूर्वक दबाने का प्रयास किया परन्तु आर्मेनिया के समर्थन के कारण आंदोलन जातीय संघर्ष में परिवर्तित हो गया. मई 1994 में रूस की मध्यस्थता में दोनों पक्षों ने युद्धविराम की घोषणा की. युद्धविराम से पहले नार्गोनो-काराबाख पर आर्मेनियाई सेना का कब्जा हो गया.

युद्धविराम के दौरान हुए समझौते के बाद नार्गोनो-काराबाख अजरब़ैजान का भाग तो अवश्य बन गया लेकिन अलगाववादियों के नियंत्रण से मुक्त नहीं हो पाया. समझौते को प्रारम्भ से ही संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा था क्योंकि मास्को ने कथित रूप से संघर्ष के दौरान आर्मेनिया का सैन्य समर्थन किया था. दूसरी तरफ दोनों पक्षों के मध्य शांति बनाये रखने के लिए 1929 में अमेरिका, रूस और फ्रांस की अध्यक्षता में बने ऑर्गेनाइजेशन फॉर सिक्योरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप (ओएससीई) द्वारा शांति की कोशिश भी किए जाते रहे, परन्तु गत तीन दशक से यहाँ रह-रहकर तनाव गहरा जाता है.

आर्मेनिया और अजरबैजान के मध्य चल रहे संघर्ष में तुर्की, रूस और ईरान के कूदने की संभावना ने चिंता बढ़ा दी है. चिंता का एक बड़ा कारण इस क्षेत्र से गुजरने वाली गैस और कच्चे तेल की पाइप लाइन है, जो दक्षिण काकेशस के पास से होते हुए तुर्की, यूरोप और अन्य देशों तक पहुंचती है. संघर्ष अगर बड़ी लड़ाई में परिवर्तित हो जाता है तो इस क्षेत्र से तेल और गैस निर्यात के बाधित होने की संभावना बढ़ जायगी. पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यूएन और महाशक्तियों की चुप्पी है. तुर्की के पश्चात् पाकिस्तान द्वारा अजरबैजान के समर्थन में स्पेशल सिक्योरिटी ग्रुप के रिटायर्ड कंमाडोज और अलबदर के आतंकवादियों को लड़ने के लिए भेजे जाने के समाचार आ रहे हैं.

वर्ष 1991 जब अजरबैजान सोवियत यूनियन से पृथक होकर एक स्वतंत्र देश के रूप में अस्तित्व में आया तो तुर्की ने सबसे पहले उसे मान्यता दी. इजराइल भी अजरबैजान का पुराना मित्र है. अजरबैजान की सहायता के लिए इजराइल भी अपने परंपरागत शत्रु देश पाकिस्तान और तुर्की के साथ खड़ा है. दूसरी ओर, आर्मेनिया में रूस का एक सैन्य ठिकाना भी है. हालांकि पुतिन के अजरबैजान के साथ भी अच्छे रिश्ते हैं. उन्होंने दोनों देशों से युद्धविराम का आग्रह किया है.

यदि समय रहते दुनिया के बड़े देशों के साथ यूएन आगे नहीं आता है तो काकशियस राष्ट्रों के बीच ऐतिहासिक मतभेदों के चलते जो संघर्ष प्रारम्भ हुआ है, उसे किसी वैश्विक यु़द्ध के स्तर तक पहुँचने में विलम्ब नहीं होगा.

भारत और आर्मेनिया-अज़रबैजान विवाद

अज़रबैजान में मौजूद भारतीय दूतावास के मुताबिक़ वहाँ फ़िलहाल 1300 भारतीय रहते हैं. वहीं आर्मीनिया के सरकारी अप्रवासन सेवा के मुताबिक़ क़रीब 3,000 भारतीय अभी आर्मीनिया में रहते हैं.

यद्यपि भारत ने अभी तक इस विषय में कोई विशिष्ट प्रतिक्रिया नहीं है, परन्तु क्षेत्रीय शांति और स्थिरता से संबंधित इस मामले पर भारत गौर से निगरानी रख रहा है. विदित हो कि भारत के अर्मेनिया और अज़रबैजान दोनों के साथ मधुर संबंध रहे हैं.  

हाल के कुछ सालों में भारत और आर्मेनिया के मध्य द्विपक्षीय सहयोग में बहुत ही तीव्रता देखी गई है. आर्मेनिया के लिये भारत के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करना इस दृष्टि से भी बहुत ही महत्त्वपूर्ण है कि भारत, अज़रबैजान-पाकिस्तान-तुर्की के रणनीतिक गठजोड़ को एक संतुलन प्रदान करता है.

भारत अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरिडोर (INSTC) का भाग है, जो कि भारत, ईरान, अफगानिस्तान, अज़रबैजान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप के मध्य माल की आवाजाही के लिये जहाज़, रेल और सड़क मार्ग का एक नेटवर्क है.

वहीं अज़रबैजान की बात करें, तो वो तुर्की की तरह कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान के पक्ष का समर्थन करता है. इससे अज़रबैजान को लेकर मौजूदा हालात में भारत की कूटनीतिक स्थिति में पर क्या कोई असर पड़ सकता है?azerbaijan_armenia

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