लोकसभा और राज्यसभा की तुलना और पारस्परिक सम्बन्ध

लोकसभा और राज्यसभा की तुलना और पारस्परिक सम्बन्ध
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लोकसभा और राज्यसभा का तुलनात्मक अध्ययन (comparative study) या दोनों के पारस्परिक सम्बन्धों (mutual relation) का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है. इस पोस्ट को पढ़ कर हम जानेंगे कि लोकसभा और राज्यसभा में क्या relation हैं? कौन-सी बातें इन दोनों में समान (common) हैं? नामकरण, प्रतिनिधित्व, सदस्य संख्या, निर्वाचन, कार्यकाल, साधारण विधेयक, संवैधानिक संशोधन, वित्तीय विधेयक, कार्यपालिका पर नियंत्रण, अन्य कार्य और शक्तियों को आधार बनाकर हम इन दोनों सदनों के बीच तुलना (comparison) और सम्बन्ध (relation) की चर्चा करेंगे.

लोकसभा और राज्यसभा की तुलना और पारस्परिक सम्बन्ध

नामकरण के सम्बन्ध में

भारतीय संसद के दो सदन होते हैं:- लोकसभा और राज्यसभा. लोकसभा संसद का प्रथम अथवा निम्न सदन है और राज्यसभा द्वितीय और उच्च सदन है. लोकसभा को “लोकप्रिय सदन” और राज्यसभा को “वरिष्ठ सदन” भी कहा जाता है.

प्रतिनिधित्व के सम्बन्ध में

लोकसभा भारत की समस्त जनता का प्रतिनिधित्व करती है और राज्यसभा भारतीय संघ की इकाइयों अर्थात् राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन इस सम्बन्ध में यह स्मरणीय है कि राज्यसभा में भारतीय संघ के सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान नहीं किया गया है.

सदस्य संख्या के सम्बन्ध में

लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 552 हो सकती है. वर्तमान समय में यह सदस्य संख्या 545 है. राज्यसभा में अधिक-से-अधिक 250 सदस्य हो सकते हैं, जिनमें से 12 मनोनीत और 238 परोक्ष रूप में निर्वाचित होंगे. इस प्रकार लोकसभा की सदस्य संख्या राज्यसभा के दुगुने से भी अधिक है. संयुक्त बैठक में यह सदस्य संख्या ही लोकसभा की शक्ति का आधार है.

निर्वाचन के सम्बन्ध में

लोकसभा के सदस्यों का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर और प्रत्यक्ष निर्वाचन के तरीके से होता है. राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रीति से और आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर होता है.

कार्यकाल के सम्बन्ध में

लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष है, लेकिन राज्यसभा एक स्थाई सदन है जो कभी भंग नहीं होता है. राज्यसभा के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष है. इसके एक-तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष के बाद अवकाश ग्रहण कर लेते हैं और इतने ही नए सदस्य निर्वाचित कर लिए जाते हैं.

साधारण विधेयकों के सम्बन्ध में

सैद्धांतिक दृष्टि से साधारण या अवित्तीय विधेयकों के सम्बन्ध में दोनों सदनों की शक्तियाँ बराबर हैं. साधारण विधेयक दोनों सदनों में से पहले किसी एक में भी पेश किए जा सकते हैं. यदि दोनों सदनों में किसी विधेयक के बारे में मतभेद उत्पन्न हो जाए तो अनुच्छेद 108 के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है. संयुक्त बैठक में बहुमत के आधार पर उस विधेयक के सम्बन्ध में निर्णय लिया जायेगा. लोकसभा की सदस्य संख्या राज्यसभा के दुगुने से भी अधिक होने के कारण संयुक्त बैठक में लोकसभा की ही इच्छानुसार कार्य होने की संभावना अधिक रहती है. इस प्रकार सैद्धांतिक दृष्टि से राज्यसभा को साधारण विधेयकों के बारे में लोकसभा के बराबर शक्ति प्राप्त होते हुए भी व्यवहार में उसकी स्थिति लोकसभा से बहुत निर्बल होती है.

संवैधानिक संशोधन के सम्बन्ध में

संविधान के संशोधन के मामले में संसद के दोनों सदनों को समान शक्ति प्राप्त है. संविधान संशोधन से सम्बन्धित विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तावित किया जाता है और उसे संसद के दोनों सदनों द्वारा अपने विशेष बहुमत से पारित किया जाना आवश्यक है. अब तक केवल एक बार (1975 में 40वाँ संशोधन विधेयक) संविधान संशोधन विधेयक पहले राज्यसभा में प्रस्तावित किया गया है.

वित्तीय विधेयकों के सम्बन्ध में

वित्तीय विधेयकों के सम्बन्ध में संविधान के द्वारा ही लोकसभा को राज्यसभा से अधिक शक्ति दी गई है. संविधान के अनुसार, वित्त विधेयक लोकसभा में ही प्रस्तावित किये जायेंगे और लोकसभा से पारित होने पर ये विधेयक राज्यसभा में आयेंगे, जिसके द्वारा अधिक-से-अधिक 14 दिन तक ऐसे किसी विधेयक पर विचार किया जा सकता है. राज्यसभा के सुझावों को मानना या न मानना लोकसभा की इच्छा पर निर्भर है.

कार्यपालिका पर नियंत्रण के सम्बन्ध में

संसदात्मक शासन में मंत्रिमंडल संसद के लोकप्रिय सदन के ही प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदाई होता है, अतः भारत में भी मंत्रिमंडल लोकसभा के ही प्रति उत्तरदाई है, राज्यसभा के प्रति नहीं. राज्यसभा के सदस्य मंत्रियों से प्रश्न और पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं और उनकी आलोचना भी कर सकते हैं, परन्तु अविश्वास प्रस्ताव के आधार पर मंत्रिमंडल को पदच्युत करने का अधिकार केवल लोकसभा को ही प्राप्त है. अतः कार्यपालिका पर नियंत्रण की दृष्टि से लोकसभा राज्यसभा की तुलना में निश्चित रूप से अधिक शक्तिशाली है.

अन्य कार्यों और अधिकारों के सम्बन्ध में

निम्न मामलों में दोनों सदनों की शक्तियाँ समान हैं –

  1. राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में दोनों ही सदनों के सदस्य समान रूप से भाग लेते हैं.
  2. राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाने का अधिकार दोनों ही सदनों को है. एक सदन अभियोग लगाता है और दूसरा उसकी जांच करता है.
  3. सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों व महालेखा परीक्षक और मुख्य चुनाव आयुक्त को पदच्युत करने के लिए दोनों सदनों की स्वीकृति आवश्यक है.
  4. राष्ट्रपति द्वारा की गई संकटकालीन उद्घोषणा की स्वीकृति संसद के दोनों सदनों से होना आवश्यक है.

राज्यसभा की अन्य शक्तियाँ

राज्यसभा को राज्यों के एकमात्र प्रतिनिधि होने के नाते दो अनन्य शक्तियां भी प्राप्त हैं. प्रथम अनुच्छेद 249 के अनुसार राज्यसभा उपस्थित और मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से घोषित कर सकती है कि राष्ट्रीय हित में संसद को राज्य सूची के अमुक विषय पर कानून बनाना चाहिए. द्वितीय अनुच्छेद 312 के अनुसार, उपस्थित और मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से राज्यसभा नवीन अखिल भारतीय सेवाओं की स्थापना के लिए प्रस्ताव पास कर सकती है.

निष्कर्ष

उपर्युक्त विवेचना से यह नितांत स्पष्ट है कि राज्यसभा को लोकसभा की तुलना में कम शक्तियाँ प्राप्त हैं और ऐसा होना अत्यंत स्वाभाविक है. संसदीय व्यवस्था में अंतिम निर्णय की शक्ति लोकप्रिय सदन को ही प्राप्त हो सकती है, परोक्ष रूप से निर्वाचित द्वितीय सदन को नहीं. संविधान-निर्माताओं के द्वारा राज्यसभा की कल्पना प्रथम सदन के सहायक और सहयोगी सदन के रूप में की गई थी, प्रतिद्वंद्वी सदन के रूप में नहीं.

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