Sansar डेली करंट अफेयर्स, 21 March 2020

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Sansar Daily Current Affairs, 21 March 2020


GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Separation of powers between various organs dispute redressal mechanisms and institutions.

Topic : Contempt of Court

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि अवमाननावाद के अंतर्गत न्यायालयों को यह शक्ति है कि वे सम्बंधित पक्षकारों को अपना पासपोर्ट जमा करने का आदेश दे सकते हैं जिससे कि सुनवाई के दौरान उनकी उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके.

पृष्ठभूमि

यह व्यवस्था सर्वोच्च न्यायालय ने उस समय दी जब वह दिल्ली में स्थित किसी विवादित सम्पत्ति के बंटवारे से सम्बंधित एक व्यवहारवाद के संदर्भ में अवमाननावाद पर सुनवाई कर रहा था.

न्यायालय की अवमानना क्या है?

कानूनी रूप से देखा जाए तो अदालत की अवमानना दो तरह की होती है –

  • दीवानी अवमानना, जो अदालत की अवमानना अधिनियम 1971 के सेक्शन 2(बी) में आती है. ‘इसमें वे मामले आते हैं, जिसमें यदि कोई व्यक्ति जान-बूझकर अदालत के किसी निर्णय को न माने. भले ही वह डिक्री हो, निर्देश हो या आदेश तो सजा दी जाती है.
  • आपराधिक अवमानना सेक्शन 2 (सी) के तहत आता है, जिसमें लिखे हुए शब्दों से, मौखिक या कुछ दिखाकर किसी अदालत के आदेश को नीचा दिखाने की कोशिश की गई हो या पूर्वग्रह से ग्रसित हो, न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने की कोशिश की गई हो या, न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करना या करने की मंशा से इसमें रुकावट डाले.

सरल शब्द में यह फैसले या अदालत की प्रतिष्ठा के खिलाफ जानबूझकर की गई अवज्ञा है. एक है प्रत्यक्ष अवमानना और दूसरी है अप्रत्यक्ष अवमानना. अदालत में ही खड़े होकर यदि कोई आदेशों को नहीं माने तो प्रत्यक्ष अवमानना होती है

 माहात्म्य

अदालत की अवमानना एक गंभीर अपराध है. किसी भी व्यक्ति के लिए जरूरी है कि वे अदालत का सम्मान करें. अदालतों के प्राधिकार के खिलाफ न हो न ही स्वेच्छाचार करते हुए आदेशों का पालन न करें. अदालतें कानूनी अधिकारों का स्तंभ है और कोई भी कानून से ऊपर नहीं है. अदालत की अवमानना को सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जगदीश सिंह केहर और न्यायमूर्ति के एस. राधाकृष्णन की खंडपीठ ने भी सुब्रत राय सहारा के मामले में समझाया था. यदि अदालत के आदेशों का पालन नहीं किया जाता है तो यह न्यायिक प्रणाली की नींव हिला देता है, जो कानून के शासन को दुर्बल करता है. अदालत इसी की संरक्षा और सम्मान करती है. देश के लोगों का न्यायिक प्रणाली में आस्था और विश्वास कायम रखने के लिए यह आवश्यक है. इसलिए अदालत की अवमानना एक गंभीर अपराध माना जाता है. साथ ही यह याचिकाकर्ता को भी सुनिश्चित करता है कि अदालत द्वारा पारित होने वाले आदेश का अनुपालन होगा. यह उनके द्वारा पालन किया जाएगा, जो भी इससे संबंधित होंगे. अदालत की अवमानना न्याय के एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में प्रयुक्त होती है.


GS Paper 2 Source: PIB

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UPSC Syllabus : Government policies and interventions for development in various sectors and issues arising out of their design and implementation.

Topic : Defence Procurement Procedure 2020

संदर्भ

रक्षामंत्री श्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) 2020 के प्रारुप (draft) का अनावरण किया जिसका उद्देश्य रक्षा उपकरणों की खरीद के लिए स्वदेशी विनिर्माण को ज्यादा बढ़ाना और उसमें लगने वाली समय सीमा को कम करना है.

रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) 2020 के प्रारुप के बारे में मुख्य तथ्य

  1. इस मसौदे में‘मेक इन इंडिया’ पहल का समर्थन करने के लिए खरीद की विभिन्न श्रेणियों में स्वदेशी सामग्री को लगभग 10 फीसदी तक बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है. पहली बार स्वदेशी सामग्री के सत्यापन के लिए एक सरल और यथार्थवादी पद्धति को शामिल किया गया है.
  2. सरकार द्वारा जारी DDP 2020 में सस्ती दरों पर रक्षा उपकरण प्राप्त करने के उद्देश्य से पट्टे’ (Lease)  को एक श्रेणी के रूप में प्रस्तुत किया गया है. प्रारंभिक पूंजीगत व्यय को प्रतिस्थापित करने के उद्देश्य से मौज़ूदा ‘खरीद’ (Buy) और ‘निर्माण’ (Make) श्रेणियों के साथ-साथ अधिग्रहण के लिये लीज़िंग (Leasing) यानी ‘पट्टे’ को एक नई श्रेणी के रूप में प्रस्तुत किया गया है. विदित हो कि ये उन सैन्य उपकरणों के लिये उपयोगी सिद्ध होगा जो वास्तविक युद्ध में उपयोग नहीं किये जाते हैं जैसे- परिवहन बेड़े, ट्रेनर, सिम्युलेटर आदि.
  3. ज्ञातव्य है कि रक्षा खरीद के दौरान उक्त श्रेणी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है और वर्तमान नियमों के अनुसार, इस श्रेणी के अतर्गत उन उत्पादों का वर्गीकरण किया जाता है जो कुल अनुबंध मूल्य के न्यूनतम 40% स्वदेशी सामग्री के साथ डिज़ाइन, विकसित और निर्मित किये जाते हैं.
  4. कुल अनुबंध मूल्य की लागत के आधार पर न्यूनतम 50% स्वदेशी सामग्री के साथ नई श्रेणी ‘खरीद (वैश्विक-भारत में निर्माण)’ [Buy (Global-Manufacture in India)] को लाया गया है. इसके अंतर्गत मात्र न्यूनतम आवश्यक सामग्री को ही विदेश से खरीदा जाएगा जबकि शेष मात्रा का निर्माण भारत में किया जाएगा.
  5. सॉफ्टवेयर और सिस्टम संबंधित परियोजनाओं के क्रय के लिये एक नवीन खंड का प्रारम्भ किया गया है, क्योंकि ऐसी परियोजनाओं में प्रौद्योगिकी में तीव्रता से परिवर्तन के कारण अप्रचलन भी बहुत तीव्रता से होता है और प्रौद्योगिकी के साथ गति बनाए रखने के लिये खरीद प्रक्रिया में लचीलापन जरूरी है.
  6. इसके अतिरिकित DDP में मूल्य-परिवर्तन खंड’ (Price Variation Clause) सम्मिलित किया गया है जो उन सभी मामलों पर लागू होगा जहाँ अनुबंध की कुल लागत 1,000 करोड़ रुपए से ज्यादा है. इस खंड का प्रयोग अनुबंध के मूल्य में परिवर्तन की स्थिति में किया जाएगा.

GS Paper 2 Source: PIB

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UPSC Syllabus : Important aspects of governance, transparency and accountability, e-governance- applications, models, successes, limitations, and potential; citizens charters, transparency & accountability and institutional and other measures.

Topic : World Consumers Day

संदर्भ

प्रत्येक वर्ष की भाँति इस वर्ष भी 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाया गया. इसके लिए यह तिथि इसलिए चुनी गई थी कि इसी तिथि को 1962 में अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ.केनेडी ने उपभोक्ता के अधिकारों की परिभाषा दी थी. इस बार इस दिवस के समारोह की थीम है – विश्वस्त चतुर उत्पाद (Trusted Smart Products).

इस दिवस को उपभोक्ता के मूलभूत अधिकारों को प्रोत्साहन दिया जाता है और बाजार की कुप्रथाओं और सामाजिक अन्याय का विरोध किया जाता है.

मुख्य तथ्य

  • विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस 15 मार्च, 1983 को मनाया गया था.
  • इसका आयोजन कंस्यूमर्स इंटरनेशनल नामक संस्था करती है, जिसकी स्थापना 1960 में हुई थी.
  • यह विश्व-भर के उपभोक्ताओं का सबसे प्रामाणिक प्रतिनिधि है जिसके साथ 115 देशों में 220 सदस्य-संगठन जुड़े हुए हैं.
  • भारत में अलग से एक उपभोक्ता अधिकार दिवस प्रत्येक वर्ष 24 दिसम्बर को मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन राष्ट्रपति ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 को अपना अनुमोदन दिया था.

GS Paper 2 Source: PIB

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UPSC Syllabus : Bilateral, regional and global groupings and agreements involving India and/or affecting India’s interests.

Topic : What is a Country-by-Country (CbC) Report?

संदर्भ

केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने देशवार प्रतिवेदन (CbC Report) देने के लिए नियमवाली अधिसूचित कर दी है. इसके अन्दर सभी बड़े बहुराष्ट्रीय प्रतिष्ठानों से सम्बंधित सूचनाएँ दी जाएँगी.

इस प्रतिवेदन का संग्रहण करने के लिए आयकर संयुक्त निदेशक (जोखिम मूल्यांकन) – 1 (Joint Director of Income-tax (Risk Assessment -1) को आयकर प्राधिकारी के रूप में नामित किया गया है अर्थात् इस अधिकारी को ही वांछित सूचनाएँ मुहैया की जाएँगी.

पृष्ठभूमि

यह सुनिश्चित करने के लिए कि एक बहुराष्ट्रीय उद्यम अपने लाभ के बारे में उस स्‍थान या क्षेत्राधिकार में अवश्‍य ही सही ढंग से जानकारी देगा जहां उसे अर्जित किया गया है, आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) ने ‘आधार क्षरण और लाभ स्थानांतरण ‘(बीईपीएस) एक्शन प्लान 13’ नामक एक कार्य योजना तैयार की थी. 

देशवार प्रतिवेदन क्या है?

  • सीबीसी रिपोर्ट एक वार्षिक रिटर्न है जिसमें क्षेत्राधिकार के आधार पर वित्तीय विवरणों के प्रमुख अवयवों का विस्‍तृत ब्‍यौरा होता है.
  • सीबीसी रिपोर्ट से स्थानीय कर प्राधिकरणों को संबंधित एमएनई के राजस्व, आय, अदा किए गए एवं संचित टैक्‍स, रोजगार, पूंजी, बरकरार रखी गई आय, वास्तविक परिसंपत्तियों और विभिन्‍न कार्यकलापों के बारे में महत्‍वपूर्ण जानकारियां प्राप्‍त होती हैं.
  • इस सीबीसी रिपोर्ट का उपयोग राजस्व जोखिम के आकलन के लिए आयकर अधिकारियों द्वारा एक पुष्टिकरण सामग्री के रूप में किया जाता है.

(बीईपीएस) एक्शन प्लान 13

‘बीईपीएस एक्शन प्लान 13’ के तहत सभी बड़े बहुराष्ट्रीय उद्यमों (एमएनई) के लिए आय के वैश्विक आवंटन, लाभ एवं अदा किए गए टैक्‍स के साथ-साथ उन कर क्षेत्राधिकारों में की जा रही आर्थिक गतिविधियों से जुड़े समग्र आंकड़ों वाली देश-दर-देश (सीबीसी) रिपोर्ट तैयार करना आवश्यक है जहां उनका कारोबारी संचालन होता है.

BEPS क्या है?

  • BEPS का पूरा नाम है – Base erosion and profit shifting.
  • BEPS आधार क्षरण एवं लाभ हस्तांतरण की समस्या के समाधान के लिए बनाये गये बहुपक्षीय समझौते का प्रतिफल है.
  • इसमें यह तय हुआ था कि कराधान की ऐसी रणनीतियाँ बनाई जाएँ जिनसे कर से सम्बंधित उन छिद्रों को बंद किया जाए जिनका फायदा उठाकर लाभ को कृत्रिम रूप से ऐसी जगह भेज दिया जाता है जहाँ कर या तो कम हैं या बिल्कुल नहीं हैं और जहाँ नाममात्र की आर्थिक गतिविधियाँ होती हैं जिस कारण निगम कर का भुगतान अत्यंत कम अथवा शून्य होता है.
  • BEPS विकासशील देशों के लिए बड़े महत्त्व की वस्तु है क्योंकि ऐसे देश निगम आयकर, विशेषकर बहुदेशीय प्रतिष्ठानों से मिलने वाले आयकर पर बहुत अधिक निर्भर रहते हैं. 2013 से अनुमानतः इन देशों को निगम आयकर में  प्रतिवर्ष 4 से 10% अर्थात् 100 से लेकर 240 बिलियन डॉलर का घाटा होता आया है.

GS Paper 3 Source: PIB

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UPSC Syllabus : Disaster and disaster management.

Topic : National Disaster Response Force

संदर्भ

राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) ने COVID-19 के प्रकोप को देखते हुए देश भर में वायु और भूमि बंदरगाहों पर तैनात 15,000 से अधिक कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया है.

राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) क्या है?

  • इसका गठन ‘आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005’ के तहत हुआ था. सन् 1980 से लेकर 2005 तक अलग-अलग समय पर (1) जम्मू-कश्मीर का भूकंप और उसकी वजह से हुआ हिमस्खलन(2) उत्तराखंड, गुजरात और महाराष्ट्र में आए भूकंप(3) असम, बिहार और महाराष्ट्र की बाढ़(4) पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में आए चक्रवात, (5) भोपाल गैस त्रासदी तथा (6) आंध्रप्रदेश, केरल, तमिलनाडु और अंडमान-निकोबार की सुनामी की वजह से बहुत अधिक संख्या में जानमाल की हानि हुई, इसके अलावा पीड़ित व्यक्तियों को अपनी संपत्ति, पशुधन और खाने-पीने के अभावों का सामना करना पड़ा. इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 बनाया और 2006 में राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) का गठन हुआ.
  • इसके गठन का मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक आपदाओं जैसे समुद्री तूफान, चक्रवात, भू-स्खलन, भूकंप, बाढ़ आदि में लोगों को सुरक्षा प्रदान करना और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर ले जाना है.
  • यह गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करता है.
  • प्राकृतिक आपदाओं के भयावह होने की स्थिति में राज्य सरकार द्वारा केंद्र से मदद मांगी जाती है. जिसके बाद केंद्र सरकार की तरफ से एनडीआरएफ राज्य डिजास्टर रेस्पोंस फोर्स (SDRF) का सहयोग करती है और लोगों को प्राकृतिक आपदाओं से बचाकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाती है.
  • इसका मुख्यालय अंत्योदय भवन, नई दिल्ली में है.

राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) क्या है?

  • SDRF हर राज्य में गठित हुआ है. इसका गठन 2005 के आपदा प्रबंधन अधिनियम के अनुसार हुआ है. ज्ञातव्य है कि इसके गठन के लिए 13वें वित्त आयोग ने अनुशंसा की थी.
  • इस कोष से राहत कार्य के लिए व्यय से सम्बंधित सभी मामलों में अंतिम निर्णय एक राज्य कार्यकारिणी समिति करती है जिसके प्रमुख मुख्य सचिव होते हैं.
  • SDRF के अन्दर आने वाली आपदाएँ हैं – च्रकवात, सूखा, भूकम्प, आगजनी, बाढ़, सुनामी, ओलावृष्टि, भूस्खलन, हिमस्खलन, बादल फटना, टिड्डी आक्रमण, बर्फीली और ठंडी हवाएँ.
  • भारत सरकार SDRF कोष में 75% और 90% योगदान करती है. 75% योगदान सामान्य राज्यों को दिया जाता है और 90% उन राज्यों के लिए जिनको विशेष श्रेणी का दर्जा मिला हुआ है.
  • इसके वित्तीय वितरण से संबंधित नोडल एजेंसी वित्त आयोग है, जिसकी सिफारिश से राहत कोष की धनराशि आवंटित की जाती है.
  • जब किसी आपदा को “गंभीर प्रकृति की आपदा” के रूप में घोषित किया जाता है जैसा की केरल के मामले में किया गया, तो राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया निधि (National Disaster Response Fund – NDRF) से अतिरिक्त सहायता प्रदान की जाती है, अन्यथा SDRF कोष का उपयोग किया जाता है.

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