Sansar डेली करंट अफेयर्स, 12 March 2020

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Sansar Daily Current Affairs, 12 March 2020


GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Separation of powers between various organs dispute redressal mechanisms and institutions.

Topic : Role of L-G and govt. intertwined: Madras HC

संदर्भ

मद्रास उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश पीठ के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें पुडुचेरी के उप-राज्यपाल को उनकी निर्वाचित सरकार के दैनिक कामकाज में हस्तक्षेप से रोका गया था.

न्यायालय का क्या कहना है?

परंतु, न्यायालय ने उप-राज्यपाल किरन बेदी और मुख्यमंत्री नारायण सामी को संघवाद का सम्मान करने के लिए मिल कर काम करने को कहा है.

पृष्ठभूमि

संघशासित प्रदेश के एक विधायक ने उप-राज्यपाल को अधिक अधिकार देने वाले केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश को अदालत में चुनौती दी थी. न्यायामूर्ति महादेवन ने अपने निर्मेंण में कहा था कि उपराज्यपाल को निर्वाचित सरकार के रोजमर्रा के कामकाज में हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है. उनका कहना था कि इससे जनादेश का उद्देश्य विफल हो जाता है.

उपराज्यपाल और केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एकल पीठ के फैसले के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील की थी, जिसकी सुनवाई मुख्य न्यायाधीश ए.पी. साही के नेतृत्व वाली पीठ द्वारा की गई.

पुडुचेरी सरकार का पक्ष

पुडुचेरी सरकार का कहना था कि उपराज्यपाल केवल कैबिनेट की सिफारिशों के अनुसार कार्य कर सकता है.

उपराज्यपाल की ओर से तर्क

  • उपराज्यपाल की ओर से अधिवक्ताओं ने कहा कि एकल न्यायाधीश पीठ इस तथ्य पर विचार करने में असफल रही कि विधायक को मामला दर्ज करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि गृह मंत्रालय के आदेश को केवल सरकार द्वारा चुनौती दी जा सकती है.
  • विदित हो कि उपराज्यपाल किरन बेदी और संघ-शासित प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण सामी के बीच दीर्घ समय से कई मुद्दों पर अनबन चल रही थी.

मुख्य तथ्य

पुडुचेरी भारत के सबसे छोटे और प्रशासनिक रूप से चुनौतीपूर्ण संघ शासित प्रदेशों में से एक है. यह दक्षिण भारत के तीन राज्यों में प्रशासनिक इकाई के रूप में विस्तृत है:

  1. तमिलनाइ में पुडुचेरी और कराईकल
  2. केरल में माहे
  3. आंध्रप्रदेश में यनम जिला

संघीय क्षेत्र प्रशासन अधिनियम, 1963 में अस्पष्टता

  • यह अधिनियम “संघ राज्य क्षेत्र पांडिचेरी” के शासन हेतु विधान सभा तथा एक मंत्रिपरिषद का प्रावधान करता है.
  • यह अधिनियम विधान सभा को “विधायी सीमा” के अंतर्गत राज्य सूची या समवर्ती सूची में वर्णित किसी भी मामले के संबंध में संपूर्ण पुडुचेरी केंद्रशासित प्रदेश या इसके किसी विशेष हिस्से के लिए कानून बनाने की शक्ति प्रदान करता है.
  • हालांकि, इस अधिनियम में कहा गया है कि राज्य का प्रशासन भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त लेफ्टिनेंट गवर्नर के माध्यम से किया जाएगा. अधिनियम की धारा 44 के अनुसार मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद, जिन विषयों पर विधान सभा को कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है उन पर प्रशासक को उसके कार्यों के संचालन में सहायता और सलाह देगी. यदि किसी मुद्दे पर असहमति हो तो यही धारा प्रशासक को अपने विवेकानुसार कानून बनाने की शक्ति भी प्रदान करती है.

मुख्यमंत्री के पक्ष में तर्क

निर्वाचित सरकार के अधिकारों को कम करना

  • दिल्ली और पुडुचेरी संघ शासित प्रदेशों में विधान सभा और मंत्रिपरिषद का प्रावधान किया गया है. इसलिए, इन क्षेत्रों के प्रशासक से मुख्यमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के अनुसार कार्य करना अपेक्षित है.
  • जनता के प्रति जवाबदेही – विधान सभा में जनता के प्रतिनिधि होने के नाते, वे जनता के कल्याण के लिए जवाबदेह हैं. LG को अधिक शक्तियाँ प्राप्त होने की स्थिति में संभव है कि LG जनकल्याण से सम्बंधित किसी मामले में मंत्रिपरिषद द्वारा लिए गए नीतिग्रत निर्णय को मंजूरी ना प्रदान करे.
  • केंद्र के समानांतर शक्ति – प्रशासक को निर्वाचित सरकार की अवहेलना कर, जनता से सीधे मिलना, निर्देश देने या निरीक्षण आदि से सम्बंधित कार्य नहीं करने चाहिए. प्रशासक को सरकार के साथ समन्वय के साथ कार्य करना चाहिए.
  • लेफ्टिनेंट गवर्नर और मुख्यमंत्री के बीच शक्ति संतुलन का अभाव – लेफ्टिनेंट गवर्नर मंत्रीमंडल के निर्णय को प्रायः अस्वीकार कर देते हैं जो कि संविधान की परिकल्पना के विपरीत है क्योंकि विधायिका और मंत्रिपरिषद का वित्तीयन लोक निधि (पब्लिक फंड) से होता है.
  • अनुच्छेद 240 (1) के अनुसार विधायी निकाय के सृजन के बाद राष्ट्रपति का प्रशासनिक नियंत्रण समाप्त हो जाता है इसलिए राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त प्रशासक के पास निर्वाचित प्रतिनिधियों की परिषद से अधिक शक्ति नहीं हो सकती है.

संघ शासित प्रदेश और इसका प्रशासन

  • प्रत्येक संघ शासित प्रदेश का प्रशासन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त “प्रशासक” के माध्यम से किया जाता है.
  • संघ शासित प्रदेश के “प्रशासक” के पास राज्य के राज्यपाल के समान शक्तियां प्राप्त होती हैं लेकिन वह राष्ट्रपति का प्रतिनिधि है न की राज्य का संवैधानिक प्रमुख.
  • प्रशासक को लेफ्टिनेंट गवर्नर, मुख्य आयुक्त या प्रशासक के रूप में नामित किया जा सकता है.
  • संविधान के अनुच्छेद 239 और 239AA के तहत प्रशासनिक शक्तियां और कार्यों को परिभाषित किया गया है.

GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Government policies and interventions for development in various sectors and issues arising out of their design and implementation.

Topic : Epidemic Diseases Act, 1897

संदर्भ

कोरोना वायरस से बचने के लिए केंद्र सरकार ने महामारी अधिनियम, 1897 (Epidemic Diseases Act, 1897) लागू करने की बात कही है. कैबिनेट सचिव ने हाल ही में कहा कि सभी राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों को इस कानून के खंड-दो को लागू करना चाहिए, ताकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर जारी परामर्श लागू किये जा सकें.

विदित हो कि वर्ष 2020 में कर्नाटक पहला राज्य बन गया है जिसने Epidemic Diseases Act, 1897 लागू किया है.

कब होता है लागू?

आपको यहां पर ये भी बता दें कि केंद्र सरकार इस कानून को उस वक्‍त लागू करती है जब उसको लगता है कि महामारी को रोकने के लिए उठाए गए सभी कदम नाकाम साबित हो रहे हैं. ऐसे में वह इस कानून के सहारा लेती है. 

महामारी अधिनियम, 1897 क्या है?

  • यह कानून ख़तरनाक महामारी के प्रसार की बेहतर रोकथाम के लिए बनाया गया है.
  • केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को धारा 2 को लागू करने के लिए कहा है.
  • धारा 2 में कहा गया है – जब राज्य सरकार को किसी समय ऐसा लगे कि उसके किसी भाग में किसी ख़तरनाक महामारी का प्रकोप हो गया है या होने की आशंका है, तब अगर वो (राज्य सरकार) ये समझती है कि उस समय मौजूद क़ानून इस महामारी को रोकने के लिए काफ़ी नहीं हैं, तो कुछ उपाय कर सकती है. ऐसे उपाय, जिससे लोगों को सार्वजनिक सूचना के जरिए रोग के प्रकोप या प्रसार की रोकथाम हो सके.
  • इस अधिनियम के धारा 2 के भी 2 उप-धारा हैं. इसमें कहा गया है कि जब केंद्रीय सरकार को ऐसा लगे कि भारत या उसके अधीन किसी भाग में महामारी फ़ैल चुकी है या फैलने का ख़तरा है, तो रेल या बंदरगाह या अन्य तरीके से यात्रा करने वालों को, जिनके बारे में ये शंका हो कि वो महामारी से ग्रस्त हैं, उन्हें किसी अस्पताल या अस्थायी आवास में रखने का अधिकार होगा.
  • महामारी अधिनियम 1897 का धारा-3 जुर्माने के बारे में है. इसमें कहा गया है कि महामारी के संबंध में सरकारी आदेश न मानना अपराध होगा. इस अपराध के लिए भारतीय दंड संहिता यानी इंडियन पीनल कोड की धारा 188 के तहत सज़ा मिल सकती है.
  • इस अधिनियम का धारा 4 क़ानूनी सुरक्षा के बारे में है. जो अधिकारी इस ऐक्ट को लागू कराते हैं, उनकी क़ानूनी सुरक्षा भी यही ऐक्ट सुनिश्चित करता है. ये धारा सरकारी अधिकारी को लीगल सिक्योरिटी दिलाता है. कि ऐक्ट लागू करने में अगर कुछ उन्नीस-बीस हो गया, तो अधिकारी की ज़िम्मेदारी नहीं होगी.

इस अधिनियम का कड़वा इतिहास

1896-97 में पूना में प्लेग का भयंकर आक्रमण हुआ. सरकार ने रैण्ड को प्लेग कमिश्नर नियुक्त किया था तथा महामारी रोग अधिनियम के अन्तर्गत विस्तृत शक्तियाँ प्रदान की थी. उसने इन शक्तियों के अन्तर्गत पृथक्कता के नियम लागू करने में आतंक का साम्राज्य स्थापित कर दिया. रैण्ड के पास जनता के प्रतिनिधि गए परन्तु उसने उनके प्रतिवेदन पर ध्यान नहीं दिया. रैण्ड के अत्याचारों से जनता त्राहि-त्राहि कर उठी. सभी पत्रों ने इस अत्याचार का विरोध किया. लोकमान्य तिलक का हृदय इस भयंकर अपमान तथा अत्याचार से क्षुब्ध हो उठा. उन्होंने अपने पत्र केसरी में 4 मई, 1897 को बम्बई सरकार पर कड़ा प्रहार किया और स्थानीय नेताओ और सम्प्रान्त जन को अपने पत्रों से फटकार लगाईक्या उनका यह कर्त्तव्य नहीं था कि वे सिपाहियों के इन अन्यायपूर्ण कृत्यों का प्रतिकार करने के उपाय ढूँढ़ते और पूना के पीड़ित नागरिकों को दोहरी महामारी प्लेग तथा योरोपियन सिपाहियों द्वारा प्रत्येक गृह की तलाशी लेने से रक्षा करते. कम से कम उन्हें नगर में ठहरना चाहिए था जिससे वे सर्वसाधारण की व्यावहारिक सहायता कर सकते, परन्तु वे नगर छोड़कर भाग गए और बाहर से वे पूनावासियों को इन गोरे सिपाहियों के अत्याचारों का प्रतिकार करने के लिए कहते हैं.” 22 जून, 1897 को दामोदर चापेकर ने रैण्ड तथा उनके सहयोगी लेफ्टिनेन्ट अयरेस्ट की हत्या कर दी. तिलक के द्वारा लिखित उपरोक्त लेख को इन हत्याओं के लिए उत्तरदायी ठहराकर उनको 28 जुलाई, 1897 को गिरफ्तार कर उनके विरूद्ध राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया तथा उनको 18 माह की सख्त कैद की सजा दी गई.  तिलक को सितम्बर, 1898 में जेल से छोड़ दिया गया था.


GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Issues related to health.

Topic : WHO declares coronavirus a pandemic

संदर्भ

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अब कोरोना वायरस को पैनडेमिक यानी महामारी घोषित कर दिया है. अब से पहले डब्ल्यूएचओ ने कोरोना वायरस को महामारी नहीं कहा था. विदित हो कि महामारी उस बीमारी को कहा जाता है जो एक ही समय दुनिया के अलग-अलग देशों में लोगों में फैल रही हो.

महामारी क्या है?

  • “महामारी” शब्द का प्रयोग उन संक्रमणकारी बीमारियों के लिए किया जाता है जो बेहद तेज़ी से कई देशों में एक साथ लोगों के बीच संपर्क से फैलते हैं.
  • इससे पहले साल 2009 में स्वाइन फ्लू को महामारी घोषित किया गया था. विशेषज्ञों के मुताबिक स्वाइन फ्लू की वजह से कई लाख लोग मारे गए थे.
  • महामारी होने की अधिक संभावना तब होती है जब वायरस बिलकुल नया हो, आसानी से लोगों में संक्रमित हो रहा हो और लोगों के बीच संपर्क से प्रभावी और निरंतरता से फैल रहा हो.
  • कोरोना वायरस इन सभी पैमानों को पूरा करता है.

एपिडेमिक या पैनडेमिक में अंतर

  • कभी-कभी WHO किसी बीमारी को एपिडेमिक या तो कभी पैनडेमिक घोषित करता है.
  • कोई बीमारी निश्चित दायरे या सीमा में रहते हैं तो उसे एपिडेमिक कहा जाता है, लेकिन जब वो दूसरे देशों में दाखिल होने लगे और उसके फैलने का खतरा और ज्यादा बढ़ने लगे तो उसे पैनडेमिक कहा जाता है.
  • साल 2014-15 में पश्चिमी अफ्रीका में फैले इबोला को एपिडेमिक घोषित किया गया क्योंकि ये बीमारी इसकी सीमाओं से लगते कुछ चुनिंदा देशों में ही फैली थी. जब किसी बीमारी को महामारी घोषित कर दिया जाता है तो इसका मतलब बीमारी लोगों के बीच आपस में एक-दूसरे में फैलेगी. सरकार के लिए एक तरह अलर्ट होता है.

महामारी की घोषणा कब की जाती है?

  • किसी बीमारी के महामारी होने की घोषणा उसके कारण होने वाली मौतों और पीड़ितों की संख्या पर निर्भर करती है. 2003 में SARS कोरोना वायरस सामने आया था. उससे 26 देश प्रभावित हुए थे. इसके बावजूद उसे को महामारी घोषित नहीं किया गया था. किसी बीमारी को महामारी घोषित करने का फैसला डब्ल्यूएचओ को लेना होता है.
  • साल 2009 में आखिरी बार स्वाइन फ्लू को महामारी घोषित किया गया था. इस जानलेवा बीमारी के चलते करीब दो लाख लोगों की मौत हुई थी. महामारी होने की अधिक संभावना तब होती है जब वायरस बिल्कुल नया हो. आसानी से लोगों में संक्रमित हो रहा हो और लोगों के बीच संपर्क से फैल रहा हो. कोरोना वायरस इन सभी पैमानों को पूरा करता है.

GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Indian Constitution- historical underpinnings, evolution, features, amendments, significant provisions and basic structure.

Topic : What is the Anti Defection Law and how is it implemented?

संदर्भ

मध्यप्रदेश में हो रही राजनैतिक उठापटक से यह स्पष्ट नहीं हो रहा है कि कुछ MLA दल-बदल रहे हैं या विधान सभा सदस्यता से त्यागपत्र दे रहे हैं.

संविधान की दसवीं अनुसूची क्या है?

राजनीतिक दल-बदल लम्बे समय से भारतीय राजनीति का एक रोग बना हुआ था और 1967 से ही राजनीतिक दल-बदल पर कानूनी रोक (anti-defection law) लगाने की बात उठाई जा रही थी. अन्ततोगत्वा आठवीं लोकसभा के चुनावों के बाद 1985 में संसद के दोनों सदनों ने सर्वसम्मति से 52वाँ संशोधन पारित कर राजनीतिक दल-बदल पर कानूनी रोक लगा दी. इसे संविधान की दसवीं अनुसूची (10th Schedule) में डाला गया.

सदस्यता समाप्त

निम्न परिस्थितियों (conditions) में संसद या विधानसभा के सदस्य की सदस्यता समाप्त हो जाएगी –

  • यदि वह स्वेच्छा से अपने दल से त्यागपत्र दे दे.
  • यदि वह अपने दल या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति की अनुमति के बिना सदन में उसके किसी निर्देश के प्रतिकूल मतदान करे या मतदान में अनुपस्थित रहे. परन्तु यदि 15 दिनों निम्न परिस्थितियों (conditions) में संसद या विधानसभा के सदस्य की सदस्यता समाप्त हो जाएगी – के अन्दर दल उसे इस उल्लंघन के लिए क्षमा कर दे तो उसकी सदस्यता (membership) पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.

सदस्यता बनी रहेगी

निम्न परिस्थितियों (conditions) में संसद या विधानसभा के सदस्य की सदस्यता बनी रहेगी –

  • यदि कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य (Independent Member) किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाये.
  • यदि कोई मनोनीत सदस्य शपथ लेने के बाद माह की अवधि में किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाये.
  • किसी राजनीतिक दल के विलय (merger) पर सदस्यता समाप्त नहीं होगी, यदि मूल दल में कम-से-कम 2/3 सांसद/विधायक दल छोड़ दें.
  • यदि लोकसभा/विधानसभा का अध्यक्ष (speaker) अपना पद छोड़ देता है तो वह अपनी पुरानी में लौट सकता है, इसको दल-बदल नहीं माना जायेगा.

महत्त्वपूर्ण तथ्य

  • दल-बदल पर उठे किसी भी प्रश्न पर अंतिम निर्णय सदन के अध्यक्ष का होगा और किसी भी न्यायालय को उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होगा. सदन के अध्यक्ष को इस कानून की क्रियान्विति के लिए नियम बनाने का अधिकार होगा.
  • स्पष्ट है कि किसी राजनीतिक दल के विलय की स्थिति को राजनीतिक दल-बदल की सीमा के बाहर रखा गया है. राजनीतिक दल-बदल का कारण राजनीतिक विचारधारा या अन्तःकरण नहीं अपितु सत्ता और पदलोलुपता या अन्य लाभ ही रहे हैं. इस दृष्टि से दल-बदल पर लगाई गई रोक “भारतीय राजनीति को स्वच्छ करने और राजनीति में अनुशासन लाने का एक प्रयत्न” ही कहा जा सकता है. वस्तुतः इस कानून में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दलीय अनुशासन के बीच संतुलित सामंजस्य बैठाया गया है.

पृष्ठभूमि

दल-बदल निषेध कानून (52nd Amendment) और इस कानून की विविध व्यवस्थाओं को 1991 में सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि “दल-बदल” निषेध कानून वैध है, लेकिन दल-बदल निषेध कानून की यह धारा अवैध है कि “दल-बदल (Anti-Defection)” पर उठे किसी भी प्रश्न पर अंतिम निर्णय सदन के अध्यक्ष का होगा और किसी भी न्यायालय को उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होगा. सर्वोच्च न्यालायाय ने अपने निर्णय में कहा कि सदन का अध्यक्ष इस प्रसंग में एक “न्यायाधिकरण” के रूप में कार्य करता है और उपर्युक्त विषय में सदन के अध्यक्ष के निर्णय पर न्यायालय विचार कर सकता है.

दल-बदल अधिनियम के लाभ

  • इससे किसी सरकार को स्थायित्व मिलता है क्योंकि दल बदलने पर इसमें रोक लगाईं गई है.
  • यह सुनिश्चित करता है कि विधायक अथवा सांसद अपने दल के प्रति निष्ठावान रहें और साथ ही उन नागरिकों के प्रति निष्ठा रखें जिन्होंने उन्हें चुना है.
  • इससे दलीय अनुशासन को बल मिलता है.
  • इसमें राजनीतिक दलों के विलयन का भी प्रावधान है.
  • आशा की जाती है कि इससे राजनीतिक स्तर पर भ्रष्टाचार घटेगा.
  • यह उन सदस्यों के लिए दंडात्मक प्रावधान करता है जो एक दल से दूसरे दल में चले जाते हैं.

Prelims Vishesh

Crime multi agency centre (CRI-MAC) :-

  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने अपने 35 वें स्थापना दिवस के उत्सव के दौरान 12 मार्च को अपराध बहु-एजेंसी केंद्र (Cri-MAC) और राष्ट्रीय साइबर क्राइम प्रशिक्षण केंद्र (NCTC) का शुभारंभ किया.
  • अंतर-राज्य समन्वय से संबंधित अपराध और अन्य मुद्दों पर जानकारी साझा करने के लिए Cri-MAC की शुरुआत की गई.
  • साथ ही, पुलिस अधिकारियों, न्यायाधीशों, अभियोजकों और अन्य हितधारकों के लिए बड़े पैमाने पर साइबर अपराध जांच पर पेशेवर गुणवत्ता वाली ई-लर्निंग सेवाओं के लिए एनसीटीसी शुरू किया गया था.
  • NCRB की स्थापना 11 मार्च, 1986 को हुई थी. इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है.
  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो गृह मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है.

Only one white giraffe left in the world :-

  • कुछ दिन पहले केन्या के जंगलों में शिकारियों ने ऐसे ही दो सफेद जिराफों को मार डाला।
  • IUCN ने दिसंबर 2016 में सफ़ेद जिराफ को लाल सूची के अंतर्गत असुरक्षित (vulnerable) के रूप में वर्गीकृत किया था.
  • दुनिया में सफेद जिराफों की संख्या पहले ही बहुत कम थी अब इन दोनों को मार दिए जाने के बाद से मात्र एक जिराफ बच गया है।
  • शिकारियों द्वारा मारे जाने वालों में नर जिराफ और उसका बछड़ा शामिल है. अब एक नर सफेद जिराफ बच गया है.

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