Sansar डेली करंट अफेयर्स, 11 February 2022

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Sansar Daily Current Affairs, 11 February 2022


GS Paper 2 Source : PIB

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UPSC Syllabus: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय.

Topic : Privilege Motion

संदर्भ

राज्यसभा में ‘तेलंगाना राष्ट्र समिति’ (TRS) के चार सदस्यों ने, हाल ही में, ‘आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक’ के बारे में 8 फरवरी को उच्च सदन में की गयी टिप्पणी के संबंध में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक ‘विशेषाधिकार प्रस्ताव’ (Privilege Motion) प्रस्तुत किया है.

संबंधित प्रकरण

पीएम मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण के लिए धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान, वर्ष 2014 में आंध्र प्रदेश के तेलंगाना और आंध्र राज्यों में विभाजन के लिए अपनाई गई संसदीय प्रक्रिया पर सवाल उठाया था. पीएम मोदी के कहा था, कि कानून पारित करने के लिए सदन कक्ष के दरवाजे बंद कर दिए गए गए थे, ‘पेपर स्प्रे’ का इस्तेमाल किया गया और माइक के स्विच ऑफ कर दिए गए थे.

सदस्यों द्वारा उठाए गए मुद्दे

  • पीएम मोदी का बयान, संसद भवन को सबसे खराब और तिरस्कारपूर्ण तरीके से दिखाने का प्रयास करने वाला, सदन की प्रक्रियाओं और कार्यवाही और उसके कामकाज को बदनाम और अपमानित करने वाला था.
  • पीएम मोदी का वक्तव्य, संसद सदस्यों और पीठासीन अधिकारियों के सदन में उनके आचरण में दोष खोजने के बराबर था.
  • यहां तक ​​कि, कुछ सदस्यों द्वारा किए जाने वाले विधि-विरुद्ध आचरण अथवा हंगामे को रोकने के लिए पीठासीन अधिकारी के सदन के दरवाजे बंद करने के निर्णय पर भी सवाल उठाया गया.

यह वक्तव्य सदन की अवमानना ​​के समान है, और विशेषाधिकार पर प्रश्न-चिह्न लगाता है.

विशेषाधिकार

एक सांसद या विधायक होना सिर्फ जनप्रतिनिधि होना नहीं है अपितु ये लोग संविधान के पालक और नीतियाँ/कानून बनाने वाले लोग भी हैं. कार्यपालिका के साथ मिलकर यही लोग देश का वर्तमान और भविष्य तय करते हैं. इन पदों की महत्ता और निष्ठा को देखते हुए संविधान ने इन्हें कुछ विशेषाधिकार दिए हैं. संविधान के अनुच्छेद 105 और अनुच्छेद 194 के खंड और खंड 2 के तहत विशेषाधिकार का प्रावधान किया गया है. भारतीय संविधान में विशेषाधिकार के विषय इंग्लैंड के संविधान से लिए गये हैं.

संविधान के अनुच्छेद 105 (3) और 194 (3) के तहत देश के विधानमंडलों को वही विशेषाधिकार मिले हैं जो संसद को मिले हैं. संविधान में यह स्पष्ट किया गया है कि ये स्वतंत्र उपबंध हैं. यदि कोई सदन विवाद के किसी भाग को कार्यवाही से हटा देता है तो कोई भी उस भाग को प्रकाशित नहीं कर पायेगा और यदि ऐसा हुआ तो संसद या विधानमंडल की अवमानना मानना जाएगा. ऐसा करना दंडनीय है. इस परिस्थिति में अनुच्छेद 19 (क) के तहत बोलने की आजादी (freedom of speech and expression) के मूल अधिकार की दलील नहीं चलेगी.

हालाँकि बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि भले ही विशेषाधिकार के मामले अनुच्छेद 19 (क) के बंधन से मुक्त हों लेकिन यह अनुच्छेद 20-22 और अनुच्छेद 32 के अधीन माने जायेंगे.

प्रकार

विशेषाधिकार के मामलों को दो भागों में बाँटा जा सकता है –

  1. हर सदस्य को मिला व्यक्तिगत विशेषाधिकार
  2. संसद के प्रत्येक सदन को सामूहिक रूप से मिला विशेषाधिकार

व्यक्तिगत विशेषाधिकार

  1. सदस्यों को सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 135 (क) के तहत गिरफ्तारी से छूट मिलती है. इसके तहत सदस्य को समितियों की बैठक के 40 दिन पहले या 40 दिन बाद तक गिरफ्तारी से छूट मिलती है. यह छूट सिर्फ सिविल मामलों में मिलती है. आपराधिक मामलों के तहत यह छूट नहीं मिलेगी.
  2. जब संसद सत्र चल रहा हो तो सदस्य को गवाही के लिए बुलाया नहीं जा सकता.
  3. संसद के सदस्य द्वारा संसद में या उसकी समिति में कही गई किसी बात के लिए न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती.

लेकिन यहाँ यह जानना जरुरी है कि सदस्यों को मिले ये विशेषाधिकार तब तक लागू रहेंगे जबतक वह संसद या सदन के हित में हो. यानी सदस्य सदन की प्रतिष्ठा की परवाह किये बिना अपनी इच्छानुसार कुछ भी कहने का हकदार नहीं है.

सामूहिक रूप से मिला विशेषाधिकार

  1. चर्चाओं और कार्यवाहियों को प्रकाशित करने से रोकने का अधिकार.
  2. अन्य व्यक्तियों को अपवर्जित या प्रतिबंधित करने का अधिकार.
  3. सदन के आंतरिक मामलों को निपटाने का अधिकार.
  4. संसदीय कदाचार को प्रकाशित करने का अधिकार.
  5. सदस्यों और बाहरी लोगों को सदन के विशेषाधिकारों को भंग करने के लिए दंडित करने का अधिकार.

अन्य अधिकार

इसके अलावा भी सदनों के भीतर कुछ विशेषाधिकारों की बात करें तो सदनों के अध्यक्ष और सभापति को किसी अजनबी को सदन से बाहर जाने का आदेश देने का अधिकार है. सदन के कार्यवाहियों को सुचारू रूप से चलाने और विवाद की स्थिति में बिना न्यायालय के दखल के आंतरिक तौर पर निपटाने का अधिकार भी है. यानी संसद की चारदीवारी के भीतर जो कहा या किया जाता है, उसके बारे में कोई भी न्यायालय जाँच नहीं कर सकता.

एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय न्यायालयों ने भी समय-समय पर स्पष्ट किया है कि संसद या राज्य विधान मंडलों के किसी सदन को यह निर्णय लेने का अधिकार है कि किसी मामले में सदन या सदस्य के Parliamentary Privilege का उल्लंघन हुआ है या नहीं.


GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश.

Topic : ASEAN

संदर्भ

भारत की घरेलू उत्पादों के लिए बाजार तक अधिक पहुंच की सुनिश्चित करने हेतु, भारत एवं आसियान क्षेत्रों के बीच ‘वस्तु व्यापार’ हेतु ‘मुक्त व्यापार समझौता’ (Free -Trade Agreement – FTA) की समीक्षा शुरू करने के लिए 10 देशों के संगठन ‘आसियान’ (ASEAN) के साथ वार्ता जारी है.

पृष्ठभूमि

भारत ने वर्ष 2009 में वस्तुओं में व्यापार हेतु एक FTA पर हस्ताक्षर किए थे – जिसे आसियान (एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशंस) भारत मुक्त व्यापार समझौते (ASEAN-India Free Trade Area – AIFTA) के रूप में जाना जाता है. वर्ष 2014 में, सेवाओं में व्यापार हेतु FTA  को भी इसमें सम्मिलित किया गया था.

समीक्षा की आवश्यकता क्यों हैं?

  • समीक्षा की आवश्यकता इसलिए है ताकि AIFTA को वर्तमान व्यापार सुविधाजनक प्रथाओं के अनुरूप आधुनिक बनाया जा सके तथा सीमा शुल्क और प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित किया जा सके.
  • भारत द्वारा उदमव के नियमों (rules of origin : ROO), गैर-प्रशुल्क बाधाओं की समाप्ति और बेहतर बाजार पहुंच के लिए सबल प्रावधान किए गए हैं. विदित हो कि ROO किसी उत्पाद के राष्ट्रीय स्रोत को निर्धारित करने के लिए आवश्यक मापदंड है.
  • नीति आयोग के एक अध्ययन के अनुसार, भारतीय निर्यातकों द्वारा क्षेत्रीय व्यापार समझौतों का उपयोग करने की दर बहुत कम रही है (5% और 25% के बीच). इसका कारण यह है कि इन्होंने नियमों के संबंध में वार्ता करने में कठिनाइयों का सामना किया है.
  • विगत कुछ वर्षों में संगठन के साथ भारत के व्यापार घाटे में वृद्धि हुई है.
  • भारत के घरेलू उद्योगों को क्षति पहुंचा रहे ASEAN देशों से चीन के उत्पादों की डंपिंग की जाँच करना भी अपरिहार्य हो गया है.
  • वस्तुओं की डंपिंग से तात्पर्य एक देश द्वारा वस्तुओं को उनके सामान्य मूल्य से अधिक निम्न मूल्य पर अन्य देशों को निर्यात करने से है.
  • औषध और सूचना प्रौद्योगिकी सक्षम-सेवाओं जैसे कुछ उत्पादों में भारत को एक विनिर्माण केंद्र बनाने में सहायता प्रदान करना.

भारत-आसियान के रिश्ते

  1. 1992 में भारत ASEAN का सेक्टोरल साझेदार बना.
  2. 1996 में ASEAN ने भारत को वार्ता साझेदार बना दिया.
  3. 1996 से भारत हर साल ASEAN की बैठक में हिस्सा ले रहा है.
  4. 2002 में भारत को सम्मेलन साझेदार का दर्जा मिला.
  5. 2003 में ASEAN-भारत मुक्त व्यापार क्षेत्र पर एक महत्त्वपूर्ण करार हुआ.2009 में इस पर अंतिम सहमति बनी और तब से व्यापारिक गतिविधियाँ और तेज हुई हैं.
  6. 2012 में भारत रणनीतिक साझेदार बन गया.
  7. 2015 में भारत ने ASEAN देशों के साथ सम्बन्ध को और मजबूती देने के लिए विशेष राजदूत की नियुक्ति की.
  8. 2015-16 में भारत और आसियान देशों के बीच 65 अरब डॉलर का व्यापार हुआ.
  9. 2016-17 में व्यापार बढ़ कर 70 अरब डॉलर पहुँच गया है.
  10. 2017 में भारत और दोस्ती के 25 साल पूरे होने पर रजत जयंती मनाई जा रही है.

ASEAN के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ

  1. ASEAN का full-form है – Association of Southeast Asian Nations.
  2. ASEAN का headquarters जकार्ता, Indonesia में है.
  3. आसियान में 10 सदस्य देश (ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाइलैंड और वियतनाम) हैं और 2 पर्यवेक्षक देश हैं (Papua New Guinea और East Timor).
  4. ASEAN देशों की साझी आबादी 64 करोड़ से अधिक है जो कि यूरोपियन यूनियन से भी ज्यादा है.
  5. अगर ASEAN को एक देश मान लें तो यह दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है.
  6. इसकी GDP 28 हजार करोड़ डॉलर से अधिक है.
  7. आसियान के chairman Lee Hsien Loong हैं जो ब्रूनेई से हैं.
  8. आसियान में महासचिव का पद सबसे बड़ा है.पारित प्रस्तावों को लागू करने का काम महासचिव ही करता है. इसका कार्यकाल 5 साल का होता है.
  9. क्षेत्रीय सम्बन्ध को मजबूत बनाने के लिए 1997 में ASEAN +3 का गठन किया गया था जिसमें जापान, दक्षिण कोरिया और चीन को शामिल किया गया.
  10. बाद में भारत, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैण्ड को भी इसमें शामिल किया गया. फिर इसका नाम बदलकर ASEAN +6 कर दिया गया.
  11. 2006 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने आसियान को पर्यवेक्षक का दर्जा दिया.
  12. आसियान की बढ़ती महत्ता को देखते हुए अब कई देश इसके साथ करार करना चाहते हैं.

मेरी राय – मेंस के लिए

 

आसियान और भारत

  1. भारत की एक्ट एशिया नीति के लिए आसियान देश महत्त्वपूर्ण हैं. भारत के साथ उनके सांस्कृतिक और आर्थिक सम्बन्ध काफी पुराने हैं.
  2. भारत की दृष्टि से आसियान 2018 के प्रमुख पहलू हैं  क्षेत्रीय सुरक्षा और नौवहन सहयोग.
  3. इस शिखर सम्मेलन का मकसद ASEAN देशों के साथ सांस्कृतिक और धार्मिक रिश्तों को मजबूत करना है.
  4. बौद्ध धर्म और रामायण भारत और ASEAN को आपस में जोड़ते हैं.
  5. आसियान के देशों में बौद्ध धर्म और रामायण अलग-अलग रूपों में मौजूद हैं.
  6. दक्षिण चीन सागर में चीन के बढ़ते दखल के बीच आसियान देश भारत के साथ रिश्तों को मजबूत कर रणनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
  7. आसियान क्षेत्र आर्थिक रूप से भी मजबूत है. तेजी से विकसित हो रहा भारत आसियान में मजबूत आर्थिक और वाणिज्यिक संभावनाओं का लाभ उठाना चाहता है.
  8. आसियान क्षेत्र भारत का चौथा सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है और भारत उनका सातवाँ बड़ा व्यापारी हिस्सेदार है.
  9. पिछले दशक में आसियान देशों में भारत का निवेश 70 अरब डॉलर रहा है.
  10. यातायात सुगम बनाने के लिए भारत-म्यांमार-थाईलैंड के बीच राजमार्ग का निर्माण जारी है. आने वाले दिनों में इस सड़क को बढ़ाकर कम्बोडिया, लाओस और विएतनाम तक पहुंचाने की योजना है.
  11. ASEAN और भारत के बीच सहयोग बढ़ाने के लिए कई साझे कोष बनाए गए हैं, जैसे – आसियान-भारत सहयोग कोष, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास कोष, हरित कोष.
  12. दोनों के बीच कृषि, अन्तरिक्ष, पर्यावरण, मानव संसाधन विकास, विज्ञान और प्रौद्योगिकी समेत ऊर्जा, पर्यटन, यातायात के क्षेत्र में कई परियोजनाओं पर काम चल रहा है.
  13. शिखर बैठक का आयोजन ऐसे वक्त में हो रहा है जब क्षेत्र में चीन की आर्थिक और सैन्य हठधर्मिता बढ़ी है. इसके अलावा उत्तर कोरिया परमाणु विवाद, दक्षिण चीन सागर विवाद और हिन्द महासागर में समुद्री जहाज़ों की सुरक्षा सम्बंधित सभी मुद्दे क्षेत्र की सुरक्षा और स्थायित्व के लिए खतरा बन रहे हैं.
  14. भारत का जोर इन देशों के साथ जल्द से जल्द मुक्त व्यापार समझौता करने पर है.

GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus: भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध.

Topic : Indo-Pacific region

संदर्भ

हाल ही में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने कहा है कि, यूक्रेन के ऊपर रूसी हमले की आशंकाओं के बावजूद उसका ध्यान दीर्घकालिक रूप से ‘हिंद-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र’ (Indo-Pacific region) पर केंद्रित है. अमेरिका का यह दृष्टिकोण ‘हिंद-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र’ / इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के महत्व और इस क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के संबंध में भारत की भूमिका पर प्रकाश डालता है.

हिंद-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र

एकल रणनीतिक क्षेत्र के रूप में इंडो-पैसिफिक’ (Indo- Pacific) की अवधारणा, हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के परिणाम है. यह, हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के मध्य परस्पर संपर्क तथा सुरक्षा और वाणिज्य के लिए महासागरों के महत्त्व का प्रतीक है.

भारत के लिए ‘इंडो-पैसिफिक क्षेत्र’ की भूमिका एवं निहितार्थ

  1. इंडो-पैसिफिक / हिंद-प्रशांत क्षेत्र, जैसा कि, राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में वर्णित है, विश्व के सबसे अधिक आबादी वाले और आर्थिक रूप से गतिमान हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है. यह, भारत के पश्चिमी तट से संयुक्त राज्य के पश्चिमी तट तक विस्तृत है.
  2. भारत, सदैव से गंभीर राष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षाओं वाला देश रहा है और “इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी” अवधारणा का सबसे महत्त्वपूर्ण पैरोकार है.
  3. मुक्त अर्थव्यवस्था के साथ, भारत, हिंद महासागर में आने निकटवर्ती देशों और विश्व की प्रमुख समुद्री शक्तियों के साथ संबंध स्थापित कर रहा है.

मुख्य बिंदु

  • ज्ञातव्य है कि विश्व का लगभग 90% विदेशी व्यापार समुद्र के जरिये किया जाता है और इसके एक बड़े हिस्से का संचालन हिन्द और प्रशांत महासागरों के माध्यम से किया जाता है.
  • 25% विश्व समुद्री व्यापार मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है.
  • इसके अलावा, संयुक्त राज्य अमेरिका की वार्षिक रक्षा रिपोर्ट के अनुसार, चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना है.
  • इसमें 350 से अधिक जहाज और पनडुब्बी हैं तथा चीन, हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी पकड़ का विस्तार करने के अवसरों की खोज कर रहा है.

GS Paper 3 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता.

Topic : Nuclear Fusion Technology

संदर्भ

हाल ही में, यूनाइटेड किंगडम के वैज्ञानिकों ने ‘परमाणु संलयन ऊर्जा’ (Nuclear Fusion Energy) के उत्पादन, अथवा ‘सूर्य में होने वाली ऊर्जा उत्पादन प्रक्रिया’ की नक़ल करने में एक नया मील का पत्थर हासिल करने का दावा किया है.

नया रिकॉर्ड

  • मध्य इंग्लैंड में ऑक्सफ़ोर्ड के नजदीक ‘जॉइंट यूरोपियन टोरस’ (JET) केंद्र में वैज्ञानिकों के दल ने दिसंबर माह में एक ‘प्रयोग’ के दौरान 59 मेगाजूल की लगातार ऊर्जा उत्पन्न करने में सफलता हासिल की, जोकि वर्ष 1997 में बनाए गए रिकॉर्ड के दोगुने से अधिक थी.
  • संलयन ईंधन की एक किलो मात्रा में कोयले, तेल या गैस के एक किलोग्राम की तुलना में लगभग 10 मिलियन गुना अधिक ऊर्जा होती है.

प्रयोग (The experiment)

यह ऊर्जा ‘डॉनट’ आकार के उपकरण (doughnut-shaped apparatus) ‘टोकामक’ (Tokamak) नामक मशीन में उत्पन्न की गयी थी और ‘जॉइंट यूरोपियन टोरस’ केंद्र, दुनिया में अपनी तरह का सबसे बड़ा क्रियाशील ‘टोकामक’ है.

  • प्लाज्मा का निर्माण करने हेतु, हाइड्रोजन के समस्थानिक, ड्यूटेरियम और ट्रिटियम को सूर्य के केंद्र के तापमान से 10 गुना अधिक गर्म तापमान पर गर्म किया गया.
  • चूंकि, टोकामक मशीन चक्कर काटती हुई तेजी से घूमती है, समस्थानिकों को फ़्यूज़ करती है और ऊष्मा के रूप में अत्यधिक उर्जा उत्सर्जित करती है, अतः इसे सुपरकंडक्टर इलेक्ट्रोमैग्नेट्स का उपयोग करके विशालकाय कुंड जैसे बर्तन में रखा जाता है.

इस उपलब्धि का महत्त्व

  • मानव लंबे समय से ‘परमाणु संलयन’ के माध्यम ऊर्जा उत्पन्न करने की कोशिश में लगा हुआ है, क्योंकि इस प्रकार से उत्पन्न उर्जा में कार्बन की मात्र काफी निम्न होती है, और परमाणु ऊर्जा का उत्पादन करने की तुलना में काफी सुरक्षित है और साथ ही तकनीकी रूप से 100% से भी अधिक कार्यक्षम हो सकती है.
  • इसके अलावा, इन महत्वपूर्ण प्रयोगों का रिकॉर्ड और वैज्ञानिक डेटा, ‘अंतर्राष्ट्रीय ताप-नाभिकीय प्रायोगिक रिएक्टर’ (International Thermonuclear Experimental Reactor – ITER) के लिए महत्वपूर्ण रूप से उपयोगी हो सकते हैं.
  • ITER, जॉइंट यूरोपियन टोरस’ (Joint European Torus – JET) का बड़ा और अधिक उन्नत संस्करण है.

‘अंतर्राष्ट्रीय थर्मोन्यूक्लियर प्रायोगिक रिएक्टर’ क्या है?

  • ‘अंतर्राष्ट्रीय ताप-नाभिकीय प्रायोगिक रिएक्टर’ (International Thermonuclear Experimental Reactor – ITER) संलयन ऊर्जा की वैज्ञानिक और तकनीकी व्यवहार्यता के बारे में अनुसंधान एवं प्रदर्शन करने हेतु लिए फ्रांस के दक्षिण में स्थित एक संलयन अनुसंधान मेगा-प्रोजेक्ट है.
  • ITER परियोजना सात सदस्यों – यूरोपीय संघ, चीन, भारत, जापान, रूस, दक्षिण कोरिया और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा वित्त पोषित तथा संचालित की जा रही है.

ITER के कार्य

  1. 500 मेगावाट संलयन ऊर्जा का उत्पादन करना.
  2. संलयन ऊर्जा संयंत्र (fusion power plant) के लिए प्रौद्योगिकियों के एकीकृत परिचालन का प्रदर्शन करना.
  3. ड्यूटेरियम-ट्रिटियम प्लाज्मा को हासिल करना, जिसमें आंतरिक ताप के माध्यम से सतत अभिक्रिया होती है.
  4. ट्रिटियम ब्रीडिंग (Tritium Breeding) का परीक्षण करना.
  5. संलयन उपकरण (Fusion Device) की सुरक्षा विशेषताओं का प्रदर्शन करना.

संलयन क्या होता है?

संलयन (Fusion), सूर्य तथा अन्य तारों का ऊर्जा स्रोत है. इन तारकीय निकायों के केंद्र में अत्याधिक ऊष्मा तथा गुरुत्वाकर्षण के कारण, हाइड्रोजन नाभिक परस्पर टकराते हैं, इसके परिणामस्वरूप हाइड्रोजन नाभिक संलयित होकर भारी हीलियम अणुओं का निर्माण करते हैं जिससे इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में ऊर्जा निर्मुक्त होती हैं.

प्रयोगशाला में संलयन अभिक्रिया के लिए आवश्यक तीन शर्तें

  1. बहुत उच्च तापमान (150,000,000 डिग्री सेल्सियस से अधिक)
  2. उचित प्लाज्मा अणु घनत्व (अणुओं के परस्पर टकराव की संभावना में वृद्धि के लिए)
  3. उपयुक्त परिरोध समय (प्लाज्मा को रोकने के लिए)

Prelims Vishesh

Khaibar- Buster :-

  • हाल ही में, ईरान ने ‘खैबर-बस्टर’ (Khaibar- Buster) नामक एक नई मिसाइल का अनावरण किया है. यह मिसाइल अपने कट्टर दुश्मन इजरायल के भीतर के अमेरिकी ठिकानों और लक्ष्यों को मारने में सक्षम है.
  • मिसाइल के लिए ‘खैबर-बस्टर’ नाम, इस्लाम के शुरुआती दिनों में मुस्लिम योद्धाओं द्वारा एक यहूदी महल पर कब्जा करने के एक संदर्भ में दिया गया है.
  • इसकी मारक क्षमता 900 मील है और यह ठोस ईंधन से संचालित होती है.
  • मध्य पूर्व में ईरान के पास मिसाइलों का सबसे बड़ा शस्त्रागार है.

Radio Frequency Identification – RFID :-

  • भारतीय सेना ने अपनी गोला-बारूद सूची की ‘रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन’ (Radio Frequency Identification – RFID) टैगिंग करना शुरू कर दिया है.
  • ‘रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन’ (RFID) एक विशिष्ट प्रकार की रेडियो तकनीक है, जो किसी वस्तु से जुड़े टैग की पहचान करने के लिए रेडियो तरंगों का उपयोग करती है और वस्तु की पहचान करती है.
  • टैग में एक ‘ट्रांसीवर चिप’ (Transceiver Chip) होता है जो RFID रीडर से विद्युत चुम्बकीय तरंग द्वारा ट्रिगर होता है और एक पहचान संख्या को वापस ‘पढने वाले’ तक पहुंचाता है.
  • इसके बाद पहचान संख्या का उपयोग टैग के साथ वस्तुओं की विस्तृत सूची के लिए किया जाता है.

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