Sansar डेली करंट अफेयर्स, 08 September 2020

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Sansar Daily Current Affairs, 08 September 2020


GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Indian Constitution- historical underpinnings, evolution, features, amendments, significant provisions and basic structure.

Topic : Kesavananda Bharati

संदर्भ

केरल के महंत 1973 के प्रसिद्ध केशवानंद भारती वाद के याचिकाकर्ता केरल के कासरगोड स्थित इदनीर हिंदू मठ के वंशानुगत प्रमुख केशवानंद भारती का 79 साल की उम्र में निधन हो गया.

कौन थे केशवानंद भारती?

  • केशवानंद भारती 1961 में केरल के कासरगोड़ में इदनीर नामक स्थान पर एक शैव मठ के प्रमुख बने प्रमुख बने जिसका इतिहास आदि शंकराचार्य से जुड़ा है. शंकराचार्य के शिष्य तोटकाचार्य की परंपरा में यह मठ स्थापित यह मठ तांत्रिक पद्धति का अनुसरण करने वाली स्मार्त भागवत परंपरा को मानता है.
  • केशवानंद भारती की याचिका पर केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार वाद 1973 में सुप्रीम कोर्ट से ऐतिहासिक ‘संविधान के मूल ढांचे’ के सिद्धांत पर फैसला आया, जिसने संविधान में संशोधन को लेकर संसद के अधिकारों को न केवल सीमित किया बल्कि साथ-साथ न्यायपालिका को संशोधन की समीक्षा का अधिकार मिला.

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य वाद का इतिहास

सर्वप्रथम इस धारणा का प्रतिपादन सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा 24 अप्रैल, 1973 को मौलिक अधिकारों से सम्बंधित एक विवाद केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य  पर निर्णय देते हुए किया गया.

1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य विवाद में यह विषय फिर से उच्चतम न्यायालय के समक्ष आया. जिस न्यायपीठ ने इसे सुना उसमें 13 न्यायाधीश थे. बहुमत अर्थात् 7 न्यायाधीशों ने 24वें संविधान संशोधन को विधिमान्य ठहराते हुए “गोलकनाथ मामले” में दिए फैसले को उलट दिया किन्तु साथ ही एक नया सिद्धांत प्रतिपादित किया. न्यायालय ने यह कहा कि संसद् मूल अधिकारों वाले भाग में संशोधन करने के लिए उतनी ही सक्षम है जितनी कि संविधान के किसी अन्य भाग का. परन्तु संविधान का संशोधन करके संसद् संविधान की आधारभूत संरचना (जिसे आधारभूत लक्षण भी कहा गया है) को न तो संक्षिप्त कर सकती है, न समाप्त कर सकती है और न नष्ट कर सकती है. गोलकनाथ मामले के बाद किसी भी मूल अधिकार को न तो छीना जा सकता था और न ही नष्ट किया जा सकता था. केशवानंद मामले के बाद न्यायालय को यह विनिश्चय करना है कि कोई मूल अधिकार आधारभूत लक्षण है या नहीं. यदि वह आधारभूत लक्षण है तो उसे कदापि हटाया नहीं जा सकता.

इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि “संसद मौलिक अधिकारों को संशोधित या सीमित कर सकती है, किन्तु संविधान के अनुच्छेद 368 से संसद को संविधान के मूल ढाँचे (basic structure) में परिवर्तन का अधिकार प्राप्त नहीं होता.”

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने नीचे लिखे हुए तत्वों को संविधान के मूल ढाँचे का हिस्सा बताया –

  1. संविधान की सर्वोच्चता
  2. सरकार का “लोकतांत्रिक” (Democratic) और “गणतांत्रिक” (Republican) ढाँचा
  3. संविधान का “धर्मनिरपेक्ष” (Secular) स्वरूप
  4. संविधान की “संघात्मक” (Federal) प्रकृति
  5. विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच “शक्तियों का बँटवारा”(Separation of Powers)
  6. देश की सम्प्रभुता (Sovereignty)

संविधान की आधारभूत संरचना

  • केशवानंद भारती की संवैधानिक पीठ में, सदस्यों के बीच गंभीर वैचारिक मतभेद देखने को मिले तथा पीठ ने 7-6 से निर्णय किया कि संसद को संविधान के ‘आधारभूत संरचना’ में बदलाव करने से रोका जाना चाहिये.
  • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 368; जो संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्तियाँ प्रदान करता है, के तहत संविधान की आधारभूत संरचना में बदलाव नहीं किया जा सकता है.

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GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Parliament and State Legislatures – structure, functioning, conduct of business, powers & privileges and issues arising out of these.

Topic : Standing Committee

संदर्भ

राज्य सभा सभापति ने सदन को समितियों के लिए 2 वर्ष के निश्चित कार्यकाल की मांग की है. महामारी के कारण संसदीय स्थायी समितियों (Parliamentary Standing Committee : PSCs) के कार्यकाल की महत्त्वपूर्ण अवधि को पूर्ण नहीं किया जा सका है.

इस संदर्भ में, दो विकल्पों पर ध्यान दिया जा रहा है:

  1. प्रथम, समितियों के कार्यकाल में एक वर्ष की वृद्धि करना और
  2. दूसरा, दो वर्ष के निश्चित कार्यकाल के साथ नई समितियों का गठन करना .

वर्तमान में स्थायी समितियों  का कार्यकाल एक वर्ष का होता है. संसदीय स्थायी समितियाँ वस्तुतः स्थायी और नियमित समितियाँ होती हैं, जिन्हें समय-समय पर गठित किया जाता है.

भारतीय संसद की प्रमुख स्थायी समितियाँ निम्नलिखित हैं – 

याचिका समिति (THE COMMITTEE ON PETITIONS)

इस समिति में कम से कम 15 सदस्य होते हैं. लोकसभा अध्यक्ष समिति के सदस्यों का नाम-निर्देशन करता है और समिति का कार्यकाल एक वर्ष है. जनता द्वारा सदन के सम्मुख सामान्य हित से सम्बंधित जो याचिकाएँ प्रस्तुत की जाती हैं यह समिति उन याचिकाओं पर विचार कर सदन के सामने रिपोर्ट देती है.

लोक लेखा समिति (THE PUBLIC ACCOUNTS COMMITTEE)

इस समिति का कार्य सरकार के सभी वित्तीय लेन-देन सम्बन्धी विषयों की जांच करना है. समिति में 22 सदस्य होते हैं, जिनमें 15 सदस्य लोकसभा से और 7 सदस्य राज्यसभा से होते हैं. समिति का कार्यकाल 1 वर्ष है और कोई मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं होता है. इस समिति की सिफारिशों ने देश के वित्तीय प्रशासन को सुधारने में बहुत अधिक योगदान किया है.

प्राक्कलन समिति (ESTIMATES COMMITTEE)

प्राक्कलन समिति कार्य भी शासन पर वित्तीय नियंत्रण करना है. इस समिति का कार्य विभिन्न विभागों के वित्तीय अनुमानों की जांच करना है और यह फिजूलखर्ची रोकने (to stop wasteful expenditure) के लिए सुझाव देती है. इसकी नियुक्ति प्रति वर्ष प्रथम सत्र के प्रारम्भ में की जाती है. समिति में लोकसभा के 30 सदस्य होते हैं और इसका कार्यकाल 1 वर्ष होता है. कोई मंत्री इसका सदस्य नहीं होता है.

विशेषाधिकार समिति (THE COMMITTEE OF PRIVILEGES)

इस समिति का कार्य सदन और उसके सदस्यों के विशेषाधिकारों की रक्षा करना है. इस उद्देश्य से यह समिति विशेषाधिकारों के उल्लंघन के मामलों की जांच करती है. इसमें 15 सदस्य होते हैं, जिन्हें सदन का अध्यक्ष मनोनीत करता है.

सरकारी आश्वासन समिति (THE COMMITTEE ON GOVT. ASSURANCES)

शासन और मंत्रिमंडल के सदस्यों द्वारा समय-समय पर जो आश्वासन दिए जाते हैं, इन आश्वासनों को किस सीमा तक पूरा किया जाता है, इस बात की जाँच यह समिति करती है. इस समिति का कार्य सदन की प्रक्रिया तथा उसके कार्य-संचालन के नियमों पर विचार करना तथा आवश्यकतानुसार उनमें संशोधन की सिफारिश करना है.

सदन में अनुपस्थित रहने वाले सदस्यों सम्बन्धी समिति (THE COMMITTEE ON ABSENCE OF MEMBERS FROM SITTING OF THE HOUSE)

यदि कोई सदस्य सदन की बैठक से 60 या उससे अधिक दिनों तक सदन की अनुमति के बिना अनुपस्थित रहता है, तो उसका मामला समिति के पास विचार के लिए भेजा जाता है. समिति को अधिकार है की सम्बंधित सदस्य की सदस्यता समाप्त कर दे अथवा अनुपस्थिति माफ़ कर दे. इस समिति में 15 सदस्य होते हैं, जिन्हें अध्यक्ष एक वर्ष के लिए मनोनीत करता है.

और अधिक जानकारी के लिए पढ़ें > स्थायी समिति


GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Important International institutions, agencies and fora, their structure, mandate.

Topic : UNSC 1267 Committee

संदर्भ

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने पाकिस्तान द्वारा दो भारतीय नागरिकों को ‘UNSC के संकल्प 1267 (Resolution 1267) के अंतर्गत आतंकवादी घोषित किये जाने की कोशिश को रद्द कर दिया है. यह इस वर्ष पाकिस्तान द्वारा किया जाने वाला तीसरा ऐसा प्रयास था.

UNSC 1267 समिति क्या है?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की ‘समिति 1267’ को वर्ष 1999 में गठित किया गया था तथा 11 सितंबर 2001 के हमलों के पश्चात् इसे अधिक शक्तिशाली बनाया गया.

  1. इस समिति को दाएश’ (Da’esh) तथा ‘अल कायदा प्रतिबंध समिति’ (Al Qaida Sanctions Committee) के नाम से भी जाना जाता है.
  2. इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी स्थायी और गैर-स्थायी सदस्य सम्मिलित होते हैं.
  3. 1267 आतंकवादियों की सूची, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से स्वीकृत एक वैश्विक सूची है. इसमें पाकिस्तानी नागरिक और इसके निवासी बड़ी संख्या में सूचीबद्ध है.

UNSC 1267 के तहत सूचीबद्ध किये जाने संबंधी प्रक्रिया

कोई भी सदस्य देश, किसी व्यक्ति, समूह या संस्था को सूचीबद्ध करने के लिए प्रस्ताव पेश कर सकता है.

  1. ‘समिति 1267’ की बैठक के लिए चार कार्य दिवसों के पूर्व नोटिस की जरूरत होती है.
  2. किसी व्यक्ति, समूह या संस्था को सूचीबद्ध किये जाने अथवा नहीं किये जाने संबंधी निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं.
  3. प्रस्ताव के लिए सभी सदस्यों को प्रेषित किया जाता है, और यदि पांच कार्यदिवसों के अन्दर किसी सदस्य द्वारा आपत्ति नहीं की जाती है, तो उसे पारित कर दिया जाता है. किसी सदस्य द्वारा ‘आपत्ति’ किये जाने पर प्रस्ताव रद्द हो जाता है.
  4. समिति के किसी सदस्य द्वारा प्रस्ताव को तकनीकी तौर पर विचारधीन’ रखा जा सकता है, तथा वह प्रस्तावकर्ता देश से अधिक जानकारी की मांग कर सकता है. इस दौरान, अन्य सदस्य भी अपने निर्णय को रोक के रख सकते हैं.
  5. मामले को विचाराधीन रखने वाले सदस्य देश द्वारा निर्णय नहीं किये जाने तक, प्रस्ताव को समिति की ‘लंबित’ सूची में रखा जाता है.
  6. लंबित मामलों को छह मॉस की समयावधि में निपटाया जाना चाहिए, परन्तु विचाराधीन रखने वाले सदस्य देश द्वारा निर्णय करने हेतु ‘अतिरिक्त तीन महीने’ के समय की मांग की जा सकती है. इसके बाद कोई आपत्ति नहीं आने पर प्रस्ताव को स्वीकृत मान लिया जाता है.

सूचीबद्ध करने हेतु निर्धारित मानदंड

किसी व्यक्ति / समूह / इकाई को UNSC 1267 के अंतर्गत सूचीबद्ध करने के लिए पेश किये गए प्रस्ताव में इनके द्वारा ‘अल कायदा प्रतिबंध समिति’ या ‘आईएसआईएल दा’एश’ (ISIL Da’esh) अथवा इससे जुड़ी किसी इकाई, समूह, पृथक समूह आदि के लिए किसी कार्य या गतिविधियों के लिए वित्तपोषण, योजना, सुविधा प्रदान करने को सम्मिलित किया जाना आवश्यक है .


GS Paper 3 Source : Indian Express

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UPSC Syllabus : Cyber Security / Banking Sector & NBFCs.

Topic : Data Empowerment and Protection Architecture – DEPA

संदर्भ

नीति आयोग द्वारा डेटा एम्पावरमेंट एंड प्रोटेक्शन आर्किटेक्चर (Data Empowerment and Protection Architecture – DEPA) का प्रारूप जारी किया गया.

DEPA क्या है और उसका उद्देश्य

  • DEPA डेटा गवर्नेंस का एक नया भारतीय मॉडल है, जिसे अभी विकसित किया जा रहा है. यह लोगों के सशक्तिकरण, आर्थिक सुधार और विकास तथा एक प्रतिस्पर्धात्मक डेटा तक सामान्य-जन की पहुंच (data democracy) को लक्षित करता है.
  • DEPA का उद्देश्य व्यक्तिगत डेटा प्रबंधन को मौजूदा संगठन-केंद्रित डेटा साझाकरण प्रणाली से एक व्यक्ति-केंद्रित दृष्टिकोण में स्थानांतरित करना है, जो सशक्तिकरण हेतु डेटा साझाकरण पर उपयोगकर्ता के नियंत्रण को बढ़ावा देता है.
  • यह उपर्युक्त उद्देश्यों को सुरक्षित डेटा शेयरिंग के लिए विकसित होने योग्य विनियामक, संस्थागत और प्रौद्योगिकी डिजाइन का संचालन करके पूर्ण करेगा.
  • DEPA का लक्ष्य एक नए और बेहतर डेटा गवर्नेंस दृष्टिकोण के लिए एक संयुक्त सार्वजनिक-निजी उद्यम का निर्माण करना है.
  • एक निजी सहमति प्रबंधक संस्थान, सुरक्षित रूप से साझा किए गए प्रत्येक डेटा के लिए व्यक्तिगत सहमति को सुनिश्चित करेगा.

मार्गदर्शक सिद्धांत

DEPA के निम्नलिखित मार्गदर्शक सिद्धांतों में शामिल हैं:-

  1. डेटा का प्रबंधन करने हेतु उपयोगकर्ता के अधिकार
  2. उपयोगकर्ता की सूचित सहमति, डेटा रखने वाली संस्थाओं का उत्तरदायित्व, उपलब्धता और वहनीयता संबंधी सुगमता आदि.

Draft Data Empowerment and Protection Architecture

वित्तीय क्षेत्र में DEPA के संचालन को वर्ष 2020 में ही वित्त मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण (Pension Fund Regulatory and Development Authority : PFRDA), भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (Insurance Regulatory and Development Authority of India: IRDAI) तथा भारतीय प्रतिमूति और विनिमय बोर्ड (Securities and Exchange Board of India : SEBI) के संयुक्त नेतृत्व में प्रारम्भ किया जा रहा है.

DEPA  को व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक, 2019 (Personal Data Protection Bill, 2019) तथा प्रस्तावित डेटा संरक्षण प्राधिकरण (Data Protection Authority) के आधार पर अन्य क्षेत्रों जैसे- स्वास्थ्य और दूरसंचार क्षेत्र में भी लागू किया जाएगा.

मेरी राय – मेंस के लिए

 

आँकड़ों के अनुसार, भारत की तकरीबन 1 बिलियन से अधिक आबादी में लगभग 500 मिलियन सक्रिय वेब उपयोगकर्त्ता हैं और भारत का ऑनलाइन बाज़ार चीन के बाद सबसे बड़ा बाज़ार है. ऐसे में यह अनिवार्य हो जाता है कि ऑनलाइन बाज़ार को विनियमित करने का प्रयास किया जाए. विदित हो कि सरकार हालिया डेटा संरक्षण विधेयक के माध्यम से डेटा सुरक्षा और उसके संरक्षण के मुद्दे को संबोधित करने का प्रयास कर रही है, हालाँकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि हालिया विधेयक में कुछ कमियाँ मौजूद हैं. आवश्यक है कि इन कमियों पर गंभीरता से विचार किया जाए और सभी हितधारकों से विचार-विमर्श कर उपयुक्त विकल्पों की खोज की जाए.


GS Paper 3 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Awareness in the fields of IT

Topic : OTT

संदर्भ

शीर्ष ओटीटी (ओवर-द-टॉप) मंचों ने शिकायत निवारण हेतु लोकपाल मॉडल अपनाने पर सहमति व्यक्त की है.

मुख्य बिंदु

15 ओटीटी (over-the-top : OTT) मंचों ने सामग्री (content) से संबंधित शिकायतों के निवारण हेतु एक लोकपाल (ombudsman) के अधिवीक्षण में एक सार्वभौमिक स्व-विनियमन संहिता (universal self-regulation code) को लागू करने पर सहमति प्रकट की है.

संहिता की मुख्य विशेषताएं

  • इसके तहत प्रत्येक मंच, शिकायतों एवं अपीलों से निपटने के लिए एक उपभोक्ता शिकायत विभाग और सलाहकार पैनल का गठन करेगा.
  • दिशा-निर्देशों के साथ गैर-अनुपालन से संबंधित रिपोर्ट करने के लिए पारदर्शी, संरचित शिकायत निवारण तंत्र की स्थापना की जाएगी.
  • इसके तहत आयु वर्गीकरण (age classification) और सामग्री विवरण (content description) हेतु एक रूपरेखा निर्मित की जाएगी.
  • विदित हो कि सरकार द्वारा ओटीटी मीडिया सेवाओं को स्व-विनियमित होने का निर्देश दिया गया था. अतः तत्पश्चात इस संहिता का प्रारूप तैयार किया गया है.
  • पांच भिन्‍न-भिन्‍न मीडिया प्रारूपों (प्रिंट, रेडियो, टीवी, फिल्‍मों और ओटीटी) में से केवल ओटीटी में ही विनियमन संबंधी प्रावधान नहीं किए गए हैं, जबकि अन्य सभी में किसी न किसी प्रकार के नियमन की व्यवस्था मौजूद है.
  • इसके अतिरिक्त, ओटीटी प्लेटफार्मों पर जारी की गई सामग्री को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (Central Board of Film Certification) से प्रमाणन की आवश्यकता भी नहीं होती है.

OTT क्या है?

ओटीटी अर्थात् over-the-top एक मिडिया सर्विस है जो फिल्म, विडियो आदि को इन्टरनेट पर ऑनलाइन उपलब्ध करता है. इसके अन्दर ऑडियो प्रसारण, सन्देश सेवा अथवा इन्टरनेट पर आधारित वौइस् कॉलिंग भी आते हैं. OTT सेवा को दूरसंचार नेटवर्क या केबल टेलीविज़न प्रदाताओं की आवश्यकता नहीं पड़ती. यदि आपके पास मोबाइल या किसी स्थानीय नेटवर्क के माध्यम से इन्टरनेट सम्पर्क है तो आप आराम से OTT प्रसारण का आनंद ले सकते हैं. आजकल OTT लोकप्रिय है क्योंकि इसमें कम दाम पर अच्छी-अच्छी सामग्रियाँ उपलब्ध हो जाती हैं. इसमें नेटफ्लिक्स और अमेज़न प्राइम जैसी मौलिक सामग्रियाँ भी मिल जाती हैं.

मेरी राय – मेंस के लिए

 

लॉकडाउन की वजह से दूसरे कारोबार की तरह ही सिनेमा उद्योग भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है. दूसरी ओर, टीवी और सिनेमा जैसे पारंपरिक मीडिया के अतिरिक्त इंटरनेट के माध्यम से उपलब्ध होने वाली सामग्री (ओटीटी) सेवाओं जैसे नए पीढ़ी के मंच, मनोरंजन उद्योग को प्रोत्साहन देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. वास्तविकता तो यह है कि देश के वीडियो ओटीटी बाजार का आकार बढ़कर 82.3 करोड़ डॉलर (5,363 करोड़ रुपये) का होने जा रहा है और भारत का वीडियो ओटीटी बाजार विश्व के शीर्ष दस बाजार में सम्मिलित होने के बेहद निकट है.

यह भी सच है कि कोरोना वायरस और लॉकडाउन के पूर्व से ही ओटीटी यानी over-the-top सेवा का विस्तार बहुत हो चुका था, परन्तु तालेबंदी के दौरान तो यह मनोरंजन के लिहाज से अपरिहार्य ही हो गया है. अब एक बड़ा समूह इस पर आश्रित है.

इंटरनेट जैसे-जैसे अपनी गति बढ़ाता जा रहा है, वैसे-वैसे अपने मोबाइल के माध्यम से कहीं भी वीडियो, कंटेंट देखने की सुविधा ने इसके प्रयोग को जबरदस्त उछाल दिया है. विद्यालयों, कॉलेजों के छात्रों को जितना अपनी परीक्षा को लेकर चिंता नहीं होती है उससे कहीं अधिक उनको इन्तजार इस बात का होता है कि वेब सीरीज का अगला एपिसोड कब रिलीज हो रहा है. OTT के जरिये आसानी से उपलब्ध वेब सीरीज को देखने की लत छात्रों पर कुछ इस कदर भारी है कि अपने खाने-पीने, खेलकूद पर लगने वाले अनिवार्य समय को वे वेब सीरीज का सस्पेंस समाप्त करने में लगा देते हैं. छात्र जीवन जीवन का बड़ा अनमोल समय होता है एवं इसी काल में कच्ची मिट्टी से अच्छे मटके बनने की शुरुआत होती है. इस समय हमें सही दिशा-निर्देश की आवश्यकता होती है.

अगर ऊर्जा को सही दिशा नहीं दी जाए तो इसका दुष्परिणाम घातक हो सकता हैं, उदाहरण के तौर पर हम परमाणु शक्ति से बिजली भी बनना सकते हैं जो कि समाज के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, वहीं दूसरी ओर इस शक्ति का प्रयोग परमाणु बम बनाने में भी कर सकते हैं जो कि समाज की आने वाली पीढ़ियों को भी विनाश की कगार पर खड़ा कर देती है.

OTT पर उपलब्ध कई सामग्रियाँ कम उम्र के बच्चों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं. इसमें उपलब्ध कई विडियो महिलाओं को गलत अर्थों में दिखाते हैं और बच्चों के साथ-साथ युवाओं के दिमाग को भी दूषित करते हैं. NETFLIX, ULLU app, Jio Cinema, Amazon Prime जैसी कंपनियां भारतीय दंड संहितासूचना प्रौद्योगिकी अधिनियममहिलाओं का प्रतिनिधित्व (निषेध) अधिनियम और भारतीय संविधान के कई प्रावधानों का भी उल्लंघन कर रही हैं. सच कहा जाए तो OTT पर प्रसारित सामग्रियों ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीवन के अधिकार को प्रभावित किया है.

प्रीलिम्स बूस्टर

 

आईपीसी की धारा 153A : यह धारा उनके विरुद्ध लगाई जाती है, जो धर्म, नस्ल, भाषा, निवास स्थान या फिर जन्म स्थान के आधार पर अलग-अलग समुदायों के मध्य नफरत फैलाने और सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास करते हैं. इस धारा के अंतर्गत तीन साल की जेल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है.

इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी यानी आईटी एक्ट 2000 की धारा 67 : इसमें प्रावधान किया गया है कि अगर कोई इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से आपत्तिजनक पोस्ट करता है या फिर शेयर करता है, तो उसके विरुध्द मामला दर्ज किया जा सकता है. अगर कोई प्रथम बार सोशल मीडिया पर ऐसा करने का दोषी पाया जाता है, तो उसे 3 साल की जेल हो सकती है. साथ ही 5 लाख रुपये का जुर्माना भी देना पड़ सकता है. इतना ही नहीं, अगर ऐसा अपराध पुनः दोहराया जाता है, तो मामले के दोषी को 5 वर्ष की जेल हो सकती है और 10 लाख रु. तक का जुर्माना भी देना पड़ सकता है.


Prelims Vishesh

West Texas Intermediate (WTI) :-

  • वेस्ट टैक्सस इंटरमिडिएट (WTI) अर्थात् टेक्सस लाइट स्वीट कच्चे तेल का एक प्रकार है जिसे तेल का दाम निश्चय करने के लिए बेंचमार्क के रूप में प्रयोग किया जाता है.
  • इस कच्चे तेल का घनत्व अपेक्षाकृत कम होता है और इसमें गंधक की मात्रा भी कम होती है इसलिए इसे हल्का (light) और मीठा (sweet) कहा जाता है.
  • WTI विश्व का सर्वोत्तम कच्चा तेल माना जाता है. 

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