Sansar डेली करंट अफेयर्स, 06 March 2021

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Sansar Daily Current Affairs, 06 March 2021


GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus :Issues related to education.

Topic : QS World University Ranking

संदर्भ

क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग  (QS World University Ranking) का 11वाँ संस्करण 4 मार्च, 2021 को निर्गत किया गया. इसमें विषयों/कोर्स के आधार पर उन्च शिक्षण संस्थानों को रैंकिंग दी गई.

प्रमुख बिंदु

  • विषयों के आधार पर दी गई रैंकिंग में भारत के 12 संस्थानों ने 26 विभिन्‍न विषयों/कोर्स के लिए टॉप 100 में जगह बनाई, पिछली बार 8 संस्थानों ने टॉप 100 में जगह बनाई थी.
  • टॉप 100 में शामिल होने वाले चार नए संस्थान हैं: आईआईटी-गुवाहाटी (पेट्रोलियम इंजीनियरिंग के लिए), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (मानव विज्ञान), अन्ना विश्वविद्यालय (पेट्रोलियम इंजीनियरिंग), और ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी (कानून)
  • आईआईटी बॉम्बे को संस्थान में संचालित 7 कोर्स के लिए टॉप 100 में जगह मिली, यह सभी भारतीय संस्थानों से अधिक है.
  • QS वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग चार मापदंडों के आधार पर प्रदर्शन की गणना करती है – शैक्षणिक प्रतिष्ठा, नियोक्ता प्रतिष्ठा, अनुसंधान प्रभाव (प्रति पेपर) और संस्थान के शोध संकाय की उत्पादकता.

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने QS एवं TIME रैंकिंग के मापदंडों पर भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों का प्रदर्शन बेहतर करने के उद्देश्य से प्रतिष्ठित संस्थान योजना (Institute of Eminence) चलाया है.

QS विश्व विद्यालय रैंकिंग 

QS विश्व विद्यालय रैंकिंग विश्व-भर के महाविश्वविद्यालयों की रैंकिंग से सम्बंधित एक वार्षिक प्रकाशन है जो Quacquarelli Symonds (QS) द्वारा निर्गत किया जाता है.

इसके लिए QS जिन मानदंडों को मूल्यांकन के लिए अपनाता है, वे मुख्यतः हैं – विश्वविद्यालय की पढ़ाई-लिखाई के विषय में प्रसिद्धि, पढ़ाने वालों और पढ़ने वालों के बीच अनुपात, प्रत्येक पढ़ाने वाले को मिली प्रशस्तियाँ, विदेशी छात्रों की संख्या तथा विश्वविद्यालय में पढ़ाने की उत्कृष्टता.

इंस्टिट्यूट्स ऑफ़ एमिनेन्स योजना क्या है?

  • यह योजना भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की है. इसका उद्देश्य भारतीय संस्थानों को वैश्विक मान्यता दिलवाना है.
  • चुने गये संस्थानों को सम्पूर्ण शैक्षणिक एवं प्रशासनिक स्वयत्तता मिलेगी.
  • सरकार इन संस्थानों में से दस को चलाएगी और उन्हें विशेष धनराशि मुहैया कराएगी.
  • उत्कृष्ट संस्थान के रूप में संस्थानों को चुनने के लिए एक विशेष विशेषज्ञ समिति गठित की गई है.
  • उत्कृष्ट संस्थान के रूप में चयन के लिए वही शैक्षणिक संस्थानयोग्य माने जाएँगे जिन्हें वैश्विक-स्तर पर शीर्षस्थ 500 संस्थानों में स्थान मिला हुआ है.
  • इसके लिए वह संस्थान भी आवेदन कर सकता है जिसको राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग ढाँचे (NIRF) के अंदर शीर्षस्थ 50 में स्थान मिला है.
  • ‘उत्कृष्ट संस्थान’ के रूप में चुने गए प्रत्येक ‘सार्वजनिक संस्थान’ को पाँच साल की अवधि में 1000 करोड़ रूपये की वित्तीय सहायता दी जायेगी. निजी संस्थानों को यह वित्तीय सहायता नहीं मिलेगी. निजी संस्थानों को यह दर्जा तभी मिलेगा जब वह आगामी 15 वर्ष के लिए अपनी ऐसी योजना प्रस्तुत करे जो भरोसा देने वाली हो.
  • इन संस्थानों को विदेशी छात्रों को प्रवेश देने के लिए, विदेशी अध्यापकों को भर्ती करने के सन्दर्भ में अधिक स्वायत्तता प्रदान की जाएगी.
  • उन्हें UGC की अनुमति के बिना शीर्ष 500 विश्व-संस्थानों के साथ अकादमिक सहयोग करने की भी अनुमति प्रदान की जायेगी.

उत्कृष्ट संस्थानों को प्राप्त सुविधाएँ

  1. ये संस्थान अपने कार्यबल के 25% तक शिक्षकों को विदेशी शिक्षकों को नियुक्त कर सकते हैं.
  2. ये देश के अन्दर अन्य शैक्षणिक संस्थानों से सहयोग कर सकेंगे.
  3. विदेशी छात्रों को अपने संस्थान में मेधा के आधार पर ले सकेंगे बशर्ते उनकी संख्या देशी छात्रों के 30% तक हो.
  4. बिना किसी सीमा के ये संस्थान विदेशी छात्रों से शुल्क ले सकेंगे.
  5. उत्कृष्ट संस्थान बन जाने के बाद ये संस्थान UGC के पाठ्यक्रम से हट कर अपना पाठ्यक्रम निर्धारित कर सकते हैं.
  6. ये संस्थान अपने कार्यक्रमों के ऑनलाइन पाठ्यक्रम चला सकते हैं, परन्तु इसके लिए इसकी 20% की अधिकतम सीमा है.
  7. ऐसे संस्थानों में UGC के निरीक्षण की आवश्यकता नहीं होगी.

विश्व-स्तरीय संस्थानों की आवश्यकता क्यों?

अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग के अनुसार, भारत में विश्व-स्तरीय विश्वविद्यालयों का अभाव है और यहाँ के शिक्षकों को विदेश की तुलना में कम पैसा दिया जाता है. चीन की तुलना में भारत में विश्वविद्यालय के स्तर पर पढ़ने वाले छात्रों की संख्या आधी है. इस मामले में वह अधिकांश लैटिन अमेरिकी और अन्य मध्यम आय वाले देशों से कहीं पीछे है.


GS Paper 2 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Development processes and the development industry the role of NGOs, SHGs, various groups and associations, donors, charities, institutional and other stakeholders.

Topic : Land Records and Services Index

संदर्भ

नेशनल कॉसिल ऑफ एप्लाइड रिसर्च (NCAER) ने भूमि अभिलेख एवं सेवा सूचकांक (Land Records and Services Index) जारी किया. यह सूचकांक वर्ष 2019 में शुरू की गई.

NCAER

  • NCAER भूमि नीति पहल (NLPI) का एक भाग है. इस पहल का उद्देश्य आर्थिक अनुसंधान, नीति विश्लेषण और भूमि संबंधित व्यवस्थित डेटा के अंतराल को समाप्त करना है.
  • NCAER एक आर्थिक नीति थिंक टैंक है.

दो चरणों (वर्ष 2019 और वर्ष 2021) के मध्य राष्ट्रीय औसत में 16.2% का सुधार हुआ है. यह अभिलेखों और पंजीकरण प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण में उल्लेखनीय प्रगति दर्शाता है.

भू अभिलेखों का डिजिटलीकरण क्‍यों महत्त्वपूर्ण है?

  • भारत में सभी दीवानी मुकदमों में से भूमि संबंधी विवाद का हिस्सा 60-70% है.
  • ऐसे विवाद स्वामित्व के लिए असुरक्षा उत्पन्न करने के साथ-साथ ऋण और अन्य आर्थिक लेन-देन में अवरोध उत्पन्न करते हैं.
  • ये विवाद व्यापार परिवेश में असुरक्षा की भावना उत्पन्न करते हैं. इसके अतिरिक्त ये नए निवेश को हतोत्साहित करते हैं और शासन के समक्ष चुनौती उत्पन्न करते हैं.

भू-अभिलेखों के डिजिटलीकरण में चुनौतियाँ

  • अपूर्ण/अप्राप्य डेटा.
  • भूखंड (Plots) संख्या-क्रम की पहचान करना.

इससे पूर्व, स्वामित्व योजना (ग्रामों का सर्वेक्षण और ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर प्रौद्योगिकी के साथ मानचित्रण) (Survey of Villages and Mapping with Improvisioned Technology in Village Areas: SVAMITVA scheme) ग्रामीण भारत के अब तक गैर-मानचित्रित तथा आवासित हिस्सों में भू-स्वामित्व प्रदान करने के लिए प्रारंभ की गई थी.

इस टॉपिक से UPSC में बिना सिर-पैर के टॉपिक क्या निकल सकते हैं?

भारत का अग्रणी अर्थशास्त्रीय थिंकटैंक – राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक सूद परिषद् (National Council for Applied Economic Research (NCAER) – एक  त्रैमासिक सर्वेक्षण करके व्यवसाय भरोसा सूचकांक (Business confidence index – N-BCI) प्रकाशित किया करता है जिसको तैयार करने के लिए वह भारत की लगभग 600 कम्पनियों की व्यवसायगत भावनाओं का पता लगाता है.


GS Paper 3 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Effects of liberalization on the economy, changes in industrial policy and their effects on industrial growth.

Topic : Rise in Prices of Petrol-Diesel

संदर्भ

हाल ही में भारतीय स्टेट बैंक के रिसर्च में सामने आया है कि पेट्रोल-डीजल को वस्तु एवं सेवा कर (GST) दायरे में लाकर राजस्व संग्रह में अधिक कमी लाये बिना भी कीमतों की अप्रत्याशित वृद्धि को रोका जा सकता है तथा मध्यम वर्ग को कम कीमत पर पेट्रोल-डीजल मुहैया कराया जा सकता है.

पृष्ठभूमि

उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ समय से पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और पेट्रोल के प्रति लीटर कीमत कई राज्यों में ₹100 को पार कर गई है.

भारतीय बैंक के शोध के बारे में

भारतीय स्टेट बैंक ने 28% GST और पेट्रोल-डीजल पर क्रमश: ₹30 और ₹20 के उपकर एवं कच्चे तेल की कीमतों 60 डॉलर प्रति बैरल मानते हुए अनुमान लगाया कि केंद्र और राज्य सरकारें उक्त स्थिति में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को देशभर में क्रमश: ₹75 और ₹68 पर ला सकती हैं और ऐसा करने पर केंद्र और राज्य सरकारों को मिलाकर प्रतिवर्ष केवल ₹1 लाख करोड़ की राजस्व हानि होगी.

भारत में पेट्रोल-डीजल कीमतों का मूल्य निर्धारण

भारत में पेट्रोल, डीजल की आवश्यकता का लगभग 85% विदेशों से आयात किया जाता है. अतः वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ता है.

कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि होने पर तत्काल प्रभाव से पेट्रोल, डीजल के मूल्यों में तो वृद्धि हो जाती है, लेकिन जब कच्चे तेल की कीमतों में कमी आती है तब उसका लाभ अंतिम उपभोक्ता को नहीं मिलता है तथा कीमतें जस की तस बनी रहती है.

भारत में मिलने वाले पेट्रोल डीजल की कीमतों में लगभग दो तिहाई हिस्सा केंद्र और राज्य द्वारा लगाये गये करों, क्रमश: उत्पाद शुल्क और मूल्य वर्धित कर (VAT) का होता है तथा शेष भाग आधार मूल्य और डीलर कमीशन तथा अन्य किसी उपकर का होता है| उदाहरण के तौर पर जब अप्रैल 2020 में जब कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में भारी कमी आई तब भारत में पेट्रोल-डीजल के दामों में भी कमी आनी चाहिए थी लेकिन तब कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का लाभ उठाने के लिए केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में क्रमश: ₹13 प्रति लीटर और ₹16 प्रति लीटर की वृद्धि कर दी. इससे पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क ₹19.98 प्रति लीटर से ₹32.98 और डीजल पर ₹15.83 से ₹31.83 प्रति लीटर हो गया. लेकिन जब कच्चे तेल के दाम वापस बढ़े, तब इस कर में कमी नहीं की, इससे अंतिम उपभोक्ता के लिए पेट्रोल डीजल के दाम अधिक ही रहे.


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