Sansar डेली करंट अफेयर्स, 06 July 2021

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Sansar Daily Current Affairs, 06 July 2021


GS Paper 1 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Issues related to education.

Topic : NIPUN Bharat Programme

संदर्भ

हाल ही में, केंद्रीय शिक्षा मंत्री द्वारा ‘निपुण भारत कार्यक्रम’ (NIPUN Bharat Programme) का शुभारंभ किया गया.

निपुण भारत कार्यक्रम

निपुण कार्यक्रम का अर्थ ‘समझ के साथ पढ़ने तथा संख्या गणना में निपुणता हेतु राष्ट्रीय पहल’ (National Initiative for Proficiency in Reading with Understanding and Numeracy NIPUN) है.

  • यह कार्यक्रम, शिक्षा मंत्रालय द्वारा शुरू की गई एक पहल है.
  • निपुण भारत को स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग द्वारा क्रियान्वित किया जाएगा.
  • लक्ष्य: इस पहल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है, कि देश का प्रत्येक बच्चा वर्ष 2026-27 तक ग्रेड-3 के अंत तक मूलभूत साक्षरता और संख्या-गणना कौशल आवश्यक रूप से प्राप्त कर सके.
  • यह कार्यक्रम, 3 से 9 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों की सीखने संबंधी जरूरतों को पूरा करेगा.

कार्यान्वयन

इस पहल को लागू करने के लिए, केंद्र द्वारा प्रायोजित समग्र शिक्षा योजना के तहत सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में राष्ट्रीय-राज्य-जिला-ब्लॉक-स्कूल स्तर पर एक पांच स्तरीय क्रियान्वन तंत्र स्थापित किया जाएगा.

अपेक्षित परिणाम

  • प्राथमिक कौशल बच्चों को कक्षा में रखने में सक्षम बनाते हैं जिससे बीच में पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों को कम किया जा सकता है तथा इससे प्राथमिक से उच्च प्राथमिक व माध्यमिक चरणों में पढ़ाई छोड़ने की दर में कमी आएगी.
  • गतिविधि आधारित लर्निंग और सीखने के अनुकूल माहौल से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा.
  • खिलौना आधारित और अनुभवात्मक लर्निंग जैसी अभिनव अध्यापन कला कक्षा कार्य में इस्तेमाल की जाएगी जिससे लर्निंग (सीखना) एक आनंदमय और आकर्षक गतिविधि बनेगी.
  • शिक्षकों का उच्च क्षमता निर्माण उन्हें सशक्त बनाता है और अध्यापन कला चुनने के लिये अधिक स्वायत्ता प्रदान करता है.
  • शारीरिक, सामाजिक एवं भावनात्मक विकास, साक्षरता व संख्यात्मक विकास, संज्ञानात्मक विकास, जीवन कौशल आदि जैसे परस्पर संबंधित और निर्भर विकास के विभिन्न क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर बच्चे का समग्र विकास किया जाएगा जो उसके प्रगति कार्ड में परिलक्षित होगा.
  • इस प्रकार बच्चे तेज़ी से सीखने की क्षमता हासिल करेंगे जो उनकी शिक्षा के बाद के जीवन परिणामों और रोज़गार पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है.
  • चूँकि शिक्षा ग्रहण हेतु हर बच्चा प्रारंभिक ग्रेड में प्रवेश लेता है, इसलिये उस स्तर पर ध्यान देने से सामाजिक-आर्थिक व अलाभकारी समूह को भी लाभ होगा, इस प्रकार समान तथा समावेशी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच सुनिश्चित होगी.

GS Paper 3 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Economics of animal rearing.

Topic : Anti-Methanogenic feed supplement ‘Harit Dhara’

संदर्भ

हाल ही में, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (ICAR)  द्वारा ‘हरित धारा’ (Harit Dhara – HD) नामक एक एंटी-मिथेनोजेनिक फीड सप्लीमेंट (Anti-Methanogenic Feed Supplement) विकसित किया गया है.

इस सप्लीमेंट का महत्त्व

यह एंटी-मिथेनोजेनिक फीड सप्लीमेंट, मवेशियों से होने वाले मीथेन उत्सर्जन में 17-20% तक की कमी कर सकता है और इसके परिणामस्वरूप दूध के उत्पादन में भी वृद्धि हो सकती है. 

उत्सर्जन

भारत में एक औसत स्तनपान कराने वाली गाय या भैंस प्रति दिन लगभग 200 लीटर मीथेन का उत्सर्जन करती है. वहीं एक युवा बछिया 85-95 लीटर और एक वयस्क भेड़ 20-25 लीटर मीथेन उत्सर्जन करती है.

मवेशियों द्वारा मीथेन का उत्पादन

जिन मवेशियों में रुमेण (Rumen) जीवाणु (प्रथम आमाशय) पाया जाता है, वे मीथेन का उत्पादन करते है. रुमेण (Rumen), मवेशियों के पेट में पाए जाने वाले ‘चार कोष्ठों’ (Stomachs) में से पहला कोष्ठ या पहला अमाशय होता है, जहाँ मवेशी द्वारा खाए गए पदार्थ, सेलूलोज़, फाइबर, स्टार्च, शर्करा आदि का पाचन होता है. इन पदार्थों का, पाचन होने और पोषक तत्त्वों का अवशोषण होने से पहले सूक्ष्मजीवों द्वारा किण्विन कर दिया जाता है. कार्बोहाइड्रेट के किण्वन से कार्बन डाइऑक्साइड और हाइड्रोजन का उत्पादन होता है. इनका उपयोग रुमेण में विद्यमान रोगाणुओं (आर्किया) द्वारा मीथेन का उत्पादन करने के लिये किया जाता है.

मवेशी जो पौधे सामग्री खाते हैं, वे हैं – सेल्यूलोज, फाइबर, स्टार्च और शर्करा. बाद में जाकर वे पाचन और पोषक तत्व अवशोषण से पहले सूक्ष्मजीवों द्वारा किण्वित या टूट जाते हैं. कार्बोहाइड्रेट किण्वन से CO2 और हाइड्रोजन का उत्पादन होता है. इनका उपयोग आर्किया द्वारा सब्सट्रेट के रूप में किया जाता है – रुमेन में रोगाणुओं – मीथेन का उत्पादन करने के लिए, जिसे जानवर तब डकार के माध्यम से बाहर निकालते हैं.

मीथेन, सबसे ख़तरनाक ग्रीनहाउस गैस है. जो कार्बन डाई ऑक्साइड से 25 गुना ज़्यादा गर्मी अपने अंदर क़ैद करती है.

दुनिया की कुल ग्रीनहाउस गैसों में से 14 प्रतिशत का उत्सर्जन इन पालतू जानवरों से ही होता है. कार्बन डाई ऑक्साइड के अलावा खेती की वजह से दो और गैसें भारी मात्रा में निकलती हैं.

ये हैं नाइट्रस ऑक्साइड, जो खेतों में उर्वरक के इस्तेमाल से पैदा होती है और मीथेन. मीथेन गैस अक्सर भेड़ों और दूसरे पालतू जानवरों के पेट में बनती है. फिर जानवर उसे वातावरण में छोड़ते हैं.

मीथेन गैस अक्सर भेड़ों और दूसरे पालतू जानवरों के पेट में बनती है. फिर जानवर उसे वातावरण में छोड़ते हैं. जुगाली करने वाला एक जानवर दिन भर में औसतन 250-500 लीटर तक मीथेन गैस छोड़ता है.

हरित धारा

  • हरित धारा हाइड्रोजन उत्पादन के लिये ज़िम्मेदार आमाशय/रुमेण (Rumen) में प्रोटोजोआ रोगाणुओं की जनसंख्या को कम करता है और मीथेन तथा कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की कमी के लिए आर्किया (बैक्टीरिया समान संरचना) को उपलब्ध कराता है.
  • इसे टैनिन युक्त पौधों पर आधारित स्रोतों से बनाया गया है. टैनिन, कड़वे और कसैले रासायनिक यौगिकों वाले उष्णकटिबंधीय पौधों को रुमेण से प्रोटोजोआ को हटाने के लिये जाना जाता है.
  • हरित धारा का उपयोग करने के बाद किण्वन अधिक प्रोपियॉनिक अम्ल (Propionic Acid) का उत्पादन करने में मदद करेगा, जो लैक्टोज (दूध शर्करा) के उत्पादन और शरीर के वज़न को बढ़ाने के लिये अधिक ऊर्जा प्रदान करता है.

GS Paper 3 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Related to Space

Topic : IN-SPACe

संदर्भ

हाल ही में केंद्र सरकार ने निजी अंतरिक्ष कंपनियों को देश के भीतर और बाहर रॉकेट लॉन्च साइट स्थापित करने और संचालित करने की अनुमति दी है. हालांकि, इसके लिए पहले भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) से अनुमति लेनी होगी.

  • निजी कम्पनियों द्वारा अंतरिक्ष मिशन को खुद के स्वामित्व वाली या लीज पर ली गई लॉन्च साइट या जमीन, समुद्र या वायु जैसे मोबाइल प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकता है.
  • यदि लांच भारत के बाहर किया जाएगा, तो सभी आवश्यक अनुमोदन संबंधित राष्ट्र या क्षेत्र के कानूनों के अनुसार होंगे.
  • देश में अभी स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉसमॉस दो प्रमुख निजी अन्तरिक्ष कम्पनियां हैं.

ज्ञातव्य है कि पिछले वर्ष भारत सरकार ने भारतीय अन्तरिक्ष उद्योग को निजी क्षेत्र के लिए खोलने का निर्णय लिया था. इसके अतिरिक्त निजी क्षेत्र को सहायता और मार्गदर्शन देने के लिए भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) की स्थापना भी की गई है.

भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र

  • IN-SPACe के पास अनुकूल नियामक और उत्साहजनक नीतियों के माध्यम से, विभिन्‍न अंतरिक्ष गतिविधियों मेँ निजी क्षेत्र का मार्गदर्शन करने की जिम्मेदारी होगी.
  • IN-SPACe भारतीय अंतरिक्ष अवसंरचना का उपयोग करने हेतु निजी क्षेत्र की कंपनियों को समान अवसर उपलब्ध कराएगा तथा इसरो एवं निजी कम्पनियों के बीच कड़ी का कार्य करेगा.
  • यह स्वायत्त होगा और ISRO के समानांतर कार्य करेगा.
  • IN-SPACe के पास तकनीक, कानूनी, सुरक्षा, निगरानी और गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए अपने स्वयं के निदेशालय होंगे.
  • IN-SPACe के अतिरिक्त 2019 में स्थापित भारत सरकार के एक उपक्रम न्य स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) जो कि ISRO की एक वाणिज्यिक शाखा है, के पास वर्तमान, आपूर्ति आधारित मॉडल से भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र को मांग आधारित में बदलकर अंतरिक्ष गतिविधियों में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक और सामाजिक नीतियों को बदलने की जिम्मेदारी होगी.
  • निजी क्षेत्र को अन्तरिक्ष मिशनों की स्वीकृति देने से इस उद्योग में नई प्रोद्योगिकियों को आगमन होगा, देश के वैज्ञानिकों को देश के भीतर ही इसरो के अतिरिक्त करियर विकल्प मिलेंगे.
  • इसके साथ ही अन्तरिक्ष प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा में वृद्धि होगी जो देश में इस क्षेत्र के विकास में सहायक होगी.

GS Paper 3 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Disaster and disaster management.

Topic : NDMA

संदर्भ

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने कोविड 19 महामारी के दौरान जाँच गँवाने वाले लोगों के आश्रितों को दिए जाने वाले मुआवजे का जिम्मा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) सौंपते हुए कहा है कि अभी तक NDMA अपने कर्तव्यों के बहन में नाकाम रहा है.

न्यायालय ने सरकार के इस कथन की निंदा की है कि कोविड 19 के ‘सतत आपदा (continuous Disaster)’ है, इसलिए इसके दायरे का निर्धारण नही किया जा सकता है. न्यायालय ने कहा कि एक बार आपदा घोषित करने के बाद NDMA की जिम्मेवारी बनती है कि वह पीड़ितों को मुआवजा देने की व्यवस्था करे.

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण

  • National Disaster Management Authority (NDMA) भारत में आपदा प्रबंधन के लिये एक सर्वोच्च निकाय है, जिसका गठन ‘आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005’ के तहत किया गया था.
  • बाद में इस अधिनियम के अनुसार राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण (NDMA) तथा राज्यआपदा प्रबन्धन प्राधिकरण (SDMAs) गठित किये गये जिनके अध्यक्ष क्रमशः प्रधानमन्त्री और सम्बंधित राज्य के मुख्यमंत्री होते हैं. इसका प्रशासनिक नियंत्रण भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन होता है.
  • यह प्राधिकरण आपदा प्रबंधन हेतु नीतियों, योजनाओं एवं दिशा-निर्देशों का निर्माण करता है एवं आपदाओं के दौरान प्रभावी ढंग से आपदा प्रबंधन करता है.
  • उद्देश्य: इस संस्था का उद्देश्य एक समग्र, प्रो-एक्टिव, प्रौद्योगिकी-प्रेरित टिकाऊ विकास रणनीति के माध्यम से एक सुरक्षित और आपदा-प्रबंधन में सक्षम भारत का निर्माण करना है, जिसमें सभी हितधारकों को सम्मिलित किया गया है. यह आपदा की रोकथाम एवं शमन की संस्कृति का सृजन करने में सहयोग करता है.

Prelims Vishesh

Parliamentary Panel holds meeting on glaciers :-

  • हाल ही में, जल संसाधन पर संसदीय स्थायी समिति ने हिमस्खलन और हिमनद प्रबंधन प्रणालियों के लिए अनुसंधान एवं प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (EWS) को सुसंगत बनाने हेतु एक बैठक आयोजित की.

समिति ने निम्नलिखित संभावनाओं पर चर्चा की:

  1. हिमनद विज्ञान या हिमानिकी (glaciology) के एक पृथक केंद्र की स्थापना (वर्तमान में केवल वाडिया संस्थान में एक विभाग है).
  2. संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र में स्वचालित मौसम स्टेशनों के नेटवर्क की स्थापना.
  3. स्थानीय जिला अधिकारियों और प्रशासन के लिए एक मानकीकृत प्रोटोकॉल का निर्धारण.
  4. जलविद्युत परियोजना के प्रस्तावकों द्वारा स्थानीय आबादी को चेतावनियां प्रसारित करने के लिए अपने स्वयं की प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (EWS) की स्थापना करना.

Cassava (Topioca) :-

  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्-केंद्रीय कंद फसल अनुसंधान संस्थान (ICAR-CTCRI) ने वर्ष 2025 के एथेनॉल सम्मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम के लक्ष्य की पूर्ति के लिए बायोएथेनॉल उत्पादन हेतु एक आशाजनक कच्चे माल के रूप में कसावा (टैपियोका) की पहचान की है.
  • कसावा के बारे में:  1. अपने विशिष्ट भौतिक-रासायनिक और कार्यात्मक गुणों से युक्त इसके स्टार्चथ का, खाद्य और औद्योगिक क्षोत्रों में व्यापक अनुप्रयोग होता है 2. कसावा के कृषि अवशेष जैसे छिलके, तना और पत्तियाँ 2G (दूसरी पीढ़ी) बायोएथेनॉल उत्पादन के लिए संभावित कच्चे माल हैं. कसावा का प्रमुख उत्पादक राज्य तमिलनाडु है और दूसरे स्थान पर केरल है.

 


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