Sansar डेली करंट अफेयर्स, 01 August 2019

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Sansar Daily Current Affairs, 01 August 2019


GS Paper  2 Source: The Hindu

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Topic : Dam Safety Bill 2019

संदर्भ

भारत सरकार बाँध सुरक्षा विधेयक, 2019 संसद में उपस्थापित करने जा रही है. इस विधेयक पर विपक्ष के सांसदों ने आपत्ति प्रकट की है.

विधेयक पर की गई आपत्तियाँ

  1. यह विधेयक बाँधों की अवसंरचना की सुरक्षा पर आवश्यकता से अधिक ध्यान देता है और उनके संचालन की सुरक्षा के प्रति उदासीन है.
  2. विधेयक में बाँधों के निर्माण से प्रभावित लोगों को जो क्षतिपूर्ति देने का प्रावधान किया गया है, वह अपर्याप्त है.
  3. बाँधों की सुरक्षा के लिए एक स्वतंत्र नियामक की आवश्यकता है जिसका प्रावधान विधेयक में नहीं है.
  4. विधेयक में हितधारकों की सटीक परिभाषा नहीं दी गई है.
  5. कई राज्यों का कहना है कि प्रस्तावित विधेयक राज्यों की सम्प्रभुता का अतिक्रमण करता है और संविधान में निहित संघवाद के सिद्धांतों का हनन करता है. ये राज्य इस विधेयक को सुरक्षा के बहाने अपनी शक्ति बढ़ाने की दिशा में केंद्र का एक प्रयास मानते हैं.

केंद्र यह विधेयक क्यों ला रहा है?

इस संदर्भ में ज्ञातव्य है कि बाँध एवं जलाशय केंद्र की कार्यसूची में नहीं अपितु राज्यों की कार्यसूची में आते हैं, परन्तु फिर भी केंद्र इस मामले में पहल इसलिए कर रहा है कि बाँध सुरक्षा पूरे देश के लिए चिंतनीय विषय है और इस प्रकार की सुरक्षा के लिए अभी तक कोई कानूनी उपाय नहीं हुए हैं.

बाँध सुरक्षा विधयेक, 2019 के मुख्य तथ्य

  • यह विधेयक देश के सभी चिन्हित बांधों की उचित देख-रेख, ​​निरीक्षण, संचालन और रख-रखाव का प्रावधान करता है जिससे कि बांधों का सुरक्षित संचालन सुनिश्चित किया जा सके.
  • इस विधेयक (Dam Safety Bill, 2019) के अनुसार एक राष्ट्रीय बाँध सुरक्षा समिति बनाई जाए जो बाँधों की सुरक्षा के लिए नीतियों का निर्माण करेगी और आवश्यक नियमों की अनुशंसा करेगी.
  • यह भी प्रावधान है कि एक राष्ट्रीय बाँध सुरक्षा प्राधिकार का गठन किया जायेगा जो आयोग द्वारा बनाई गई नीतियों का अनुपालन सुनिश्चित करेगा.
  • इस विधयेक में कहा गया है कि राज्य सरकारें भी अपनी-अपनी बाँध सुरक्षा समिति गठित करेंगी.

विधेयक आवश्यक क्यों?

पिछले 50 वर्षों में भारत ने बाँधों एवं सम्बन्धित निर्माण कार्यों में अच्छा-ख़ासा पैसा लगाया है. बड़े बाँधों की संख्या के मामले में यह अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर है. आज की तिथि में यहाँ 5,254 बड़े-बड़े बाँध चल रहे हैं और अन्य 447 निर्माणाधीन हैं. इनके अतिरिक्त माध्यम और छोटे आकार के हजारों बाँध भी हैं.

  • भारत में तीव्र एवं सतत कृषि-वृद्धि एवं विकास में बाँधों की बड़ी भूमिका रही है. बाँधों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बहुत दिनों से अनुभव किया जा रहा था कि इनकी सुरक्षा के लिए एक समरूप कानून और प्रशासनिक ढाँचा होना चाहिए.
  • इस दिशा में केन्द्रीय जल आयोग (CWC) कुछ अन्य संस्थानों, जैसे – राष्ट्रीय बाँध सुरक्षा समिति (NCDS), केंद्रीय बाँध सुरक्षा संगठन (CDSO) और राज्य बाँध सुरक्षा संगठनों (SDSO) की सहायता से कार्य करता रहा है. परन्तु ये सभी संगठन मात्र परामर्श दे सकते हैं क्योंकि इनके पास कोई वैधानिक शक्ति नहीं है.
  • भारत में बाँध की सुरक्षा एक महत्त्वपूर्ण विषय है क्योंकि यहाँ के 75% बड़े बाँध 25 वर्ष से अधिक पुराने हैं और 164 बाँध तो 100 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं. यदि इनकी देख-रेख नहीं की जाए तो भविष्य में कभी-भी मानव-जीवन, वनस्पति, पशु-जगत, सार्वजनिक एवं निजी सम्पत्तियों तथा पर्यावरण को खतरा हो सकता है.
  • यहाँ यह ज्ञातव्य है कि भूतकाल में भारत में 36 बार बाँध टूटने की घटनाएँ हुई हैं.

GS Paper  2 Source: PIB

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Topic : Central Wakf Council

संदर्भ

पिछले दिनों केन्द्रीय वक्फ परिषद् का राष्ट्रीय सम्मलेन आयोजित हुआ.

केन्द्रीय वक्फ परिषद् क्या है?

  • केन्द्रीय वक्फ परिषद् एक वैधानिक निकाय है जो1964 में भारत सरकार द्वारा वक्फ एक्ट, 1954 (अब वक्फ एक्ट, 1995 का एक उपभाग) के तहत स्थापित किया गया था.
  • यह राज्य वक्फ बोर्डों के काम से संबंधित मामलों पर केंद्र को सलाह देने और देश में वक्फ के उचित प्रशासन के लिए स्थापित किया गया है.
  • विदित हो कि मुस्लिम कानून के तहत परोपकारी मुस्लिम चल-अचल संपत्तियों को धार्मिक और परोपकारी कार्यों के लिए स्थाई रूप से दान दे देते हैं.

रचना और नियुक्तियाँ

परिषद की अध्यक्षता एक अध्यक्ष करते हैं, जो वक्फ के प्रभारी केन्द्रीय मंत्री होते हैं और इसमें अधिकतम 20 अन्य सदस्य होते हैं, जिन्हें भारत सरकार द्वारा वक्फ अधिनियम के अंतर्गत दिए गये प्रावधानों के तहत नियुक्त किया जाता है.

वक्फ संपत्तियाँ

उल्लेखनीय है कि देशभर में लगभग 5.77 लाख पंजीकृत वक्फ संपत्तियां हैं. उल्लेखनीय है कि कई वक्फ संपत्तियां पिछले कई दशकों से विवादों में फंसी हैं. ‘प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम’ (पीएमजेवीके) के तहत अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने आजादी के बाद पहली बार देशभर की वक्फ संपत्तियों पर स्कूल, कॉलेज, आईआईटी, कौशल विकास केन्द्र, बहुउद्देशीय सामुदायिक केन्द्र ‘सदभाव मंडप’, ‘हुनर हब’, अस्पताल, व्यापार केन्द्र इत्यादि निर्मित किए हैं. पिछले साढ़े चार वर्षों के दौरान अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में मोदी सरकार ने पीएमजेवीके के तहत 28 डिग्री कॉलेज, 2197 स्कूल इमारतें, 40,201 अतिरिक्त कक्षाओं, 1213 छात्रावासों, 191 आईआईटी, 50 पॉलीटेक्नीक, 39,586 आंगवाड़ी केन्द्रों, 405 सद्भावना मंडपों, 89 आवासीय स्कूलों, 527 बाजार शेडों का निर्माण किया है.

विदित हो कि 90% वक्फ संपत्तियों का डिजिटलीकरण किया जा चुका है. शेष वक्फ संपत्तियों का भी जल्द डिजिटलीकरण कर लिया जाएगा. पिछले साढ़े चार वर्षों के दौरान सरकार ने अल्पसंख्यक समुदायों के लगभग 3 करोड़ 83 लाख छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान की है, जिनमें लगभग 60% छात्रायें हैं. अल्पसंख्यकों सहित सभी कमजोर वर्गों को शैक्षिक रूप से अधिकार संपन्न बनाने के संबंद्ध में केन्द्र सरकार ने अनेक प्रयास किए हैं. बीच में पढ़ाई छोड़ देने वाली मुस्लिम छात्राओं का औसत 70% से अधिक हुआ करता था जो अब घटकर लगभग 35 प्रतिशत हो गया है. केन्द्र सरकार ने विभिन्न रोजगारपरक कौशल विकास योजनाओं के माध्यम से 6 लाख से अधिक अल्पसंख्यक युवाओं को रोजगार और रोजगार अवसर प्रदान किए हैं. इसी तरह ‘हुनर हाट’ के जरिए पिछले दो वर्षों के दौरान दो लाख से अधिक दस्तकारों को रोजगार और रोजगार अवसर प्रदान किये गये हैं.


GS Paper  2 Source: The Hindu

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Topic : Renaming of states

संदर्भ

विगत कुछ वर्षों से पश्चिम बंगाल की सरकार अपने राज्य का नाम बदलकर “बांग्ला” करना चाह रही है जिसके लिए वहाँ की विधानसभा ने विधिवत् एक प्रस्ताव भी पारित कर दिया है. उस प्रस्ताव के अनुसार, केंद्र सरकार से नाम बदलने के विषय में गत वर्ष अनुरोध किया गया था. परन्तु विदेश मंत्रालय ने नवम्बर, 2018 में यह अनुरोध इस आधार पर निरस्त कर दिया था कि “बांग्ला” शब्द और “बांग्लादेश” शब्द इतने समान हैं कि इससे भ्रान्ति हो सकती है.

राज्य के नाम बदलने के पीछे तर्क

पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार का कहना है कि जब दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर की बैठक होती है तो वर्णक्रम में “वेस्ट बंगाल” का स्थान अत्यंत नीचे होने के कारण उस बैठक में राज्य का पक्ष रखने के लिए वहाँ के राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों को बहुत देर तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है. यदि राज्य का नाम “वेस्ट बंगाल” से बदलकर “बंगाल/बांग्ला” कर दिया जाए तो राज्य के बारे में होने वाली चर्चा बहुत शीघ्र निपट जायेगी. वस्तुतः ऐसी स्थिति में राज्य का नंबर आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और असम के बाद चौथा हो जौएगा.

राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया

  • यदि कोई राज्य अपना नाम बदलना चाहता है तो सबसे पहले वह केन्द्रीय मंत्रिमंडल के लिए एक टिपण्णी तैयार करेगा जिसमें संविधान की अनुसूची 1 में संशोधन का प्रस्ताव दिया जाएगा. तत्पश्चात् संसद में एक संशोधन विधेयक उपस्थापित किया जाएगा. इसे एक सामान्य बहुमत से पारित किया जा सकता है. अंततः उस पर राष्ट्रपति की सहमति की आवश्यकता होती है.
  • किसी राज्य के नाम को बदलने का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 3 और 4 के तहत किया जाता है.
  • अनुच्छेद 3 में कहा गया है कि राज्य का नाम, क्षेत्र और सीमा परिवर्तन का अधिकार संसद को है.
  • बिल तभी संसद में लाया जायेगा जब राष्ट्रपति इसकी अनुमति दें.
  • अनुमति से पूर्व राष्ट्रपति इस को संबंधित राज्य की विधायिका के पास भेज सकता है किंतु उसके द्वारा प्रकट राय से वह बाध्य नहीं होगा और न ही विधायिका अनंत काल तक इस बिल को रोक कर रख सकती है.
  • यदि इस बिल में संसद कोई संशोधन करती है तो भी इसे दुबारा विधायिका के पास नहीं भेजा जायेगा.
  • इस बिल को संसद के दोनों सदन सामान्य बहुमत से ही पारित कर देंगे.
  • राज्य विधानसभा के विचार बाध्यकारी नहीं हैं, न तो राष्ट्रपति एवं न ही संसद पर. इस अवधि की समाप्ति पर, बिल संसद में विचार-विमर्श के लिए भेजा जाएगा.
  • बिल के अनुमोदन के बाद, बिल एक कानून बन जाता है एवं राज्य का नाम संशोधित किया जाता है.

GS Paper 3 Source: The Hindu

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Topic : International Charter Space and Major Disasters

संदर्भ

भारत अन्तरिक्ष एवं बड़ी आपदाओं से सम्बंधित एक अंतर्राष्ट्रीय चार्टर (International Charter ‘Space and Major Disasters’) का सदस्य है. इस हैसियत से उसे पिछले दिनों फ्रांस, रूस चीन आदि अन्य सदस्य देशों से असम में आई बाढ़ से सम्बंधित उपग्रहीय डाटा प्राप्त हुआ है.

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अन्तरिक्ष एवं बड़ी आपदाओं से सम्बंधित अंतर्राष्ट्रीय चार्टर क्या है?

  • यह एक अबाध्यकारी संधि है.
  • बड़ी आपदा घटित होने पर यह अन्तरिक्ष में स्थित उपग्रहों से प्राप्त डाटा को राहत कार्य में लगे हुए संगठनों को आवश्यक कार्रवाई हेतु उपलब्ध कराता है.
  • इस चार्टर का सूत्रपात जुलाई 1999 में ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना में आयोजित UNISPACE III सम्मेलन के उपरान्त यूरोपीय अन्तरिक्ष एजेंसी (ESA) और फ्रांस की अन्तरिक्ष एजेंसी CNES के द्वारा किया गया था.
  • यह चार्टर नवम्बर 1, 2000 में औपचारिक रूप से तब सक्रिय हुआ जब इस पर अक्टूबर 20, 2000 में कनाडा की अन्तरिक्ष एजेंसी ने भी हस्ताक्षर कर दिए.
  • इस अंतर्राष्ट्रीय चार्टर का सदस्य वही देश हो सकता है जिसकी अन्तरिक्षीय एजेंसियाँ उपग्रह पर आधारित पृथ्वी प्रेक्षण का डाटा रखती हों और उन्हें उपलब्ध करा सकती हों.
  • इस चार्टर के सदस्य देश स्वैच्छिक आधार पर एक-दूसरे से सहयोग करते हैं.

चार्टर का मुख्य कार्य

  • यह चार्टर संसार-भर में फैली राहत एजेंसियों से संपर्क बनाए रखता है और उनकी विशेषज्ञता और उनके उपग्रहों का लाभ उठाता है. इसके लिए यह सप्ताह के सातों दिन और दिन के चौबीसों घंटे एक एकल पहुँच बिंदु (single access point) के रूप में काम करता है जिसके लिए उपभोक्ता को कोई खर्च नहीं करना पड़ता है.
  • बड़ी-बड़ी आपदाएँ घटित होने पर यह चार्टर संसाधनों और विशेषज्ञताओं का समन्वय करके नागरिक सुरक्षा अधिकारियों के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय मानवतावादी समुदायों को आपदा से निबटने में सहकार करता है.
  • अन्तरिक्ष में कई उपग्रह नियमित रूप से पृथ्वी का प्रेक्षण करते रहते हैं और डाटा भेजते रहते हैं. इस डाटा का प्रयोग आपदा प्रबंधन में कुशलतापूर्वक किया जाता है.

GS Paper  3 Source: The Hindu

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Topic : GI Certification

संदर्भ

पिछले दिनों ओडिशा को स्थानीय “रसगोला” के लिए “भौगोलिक संकेतक/GI टैग” मिल गया. इस GI टैग की संख्या 612 है. ओडिशा को ऐसा GI टैग दूसरी बार मिला है. विदित हो कि इसका पहला GI टैग कंधमाल हल्दी के लिए मिला था.

पृष्ठभूमि

वर्षों से रसगुल्ला के आविष्कार को लेकर पश्चिम बंगाल और ओडिशा में झगड़ा चलता रहा है. परन्तु, 2017 में पश्चिम बंगाल को इस मिठाई के लिए GI टैग मिल गया. परन्तु यह टैग उसे “बांग्लार रासोगुल्ला” के लिए दिया गया. बंगालियों का दावा था कि 19वीं शताब्दी में नबीन चन्द्र दास ने कलकत्ता में स्थित अपने बाग़ बाजार निवास पर रसगुल्ले की खोज की थी. दूसरी ओर, ओडिशा वासियों का कहना था कि 12वीं शताब्दी से निलाद्री बीजे में रसगुल्ला को नैवेद्य के रूप में वितरित किया जाता रहा है. वहाँ के रसगुल्ले को GI टैग मिल जाने से इस विवाद का पटाक्षेप हो गया गया है.

GI टैग क्या है?

  • GI का full-form है – Geographical Indicator
  • भौगोलिक संकेतक के रूप में GI टैग किसी उत्पाद को दिया जाने वाला एक विशेष टैग है.
  • नाम से स्पष्ट है कि यह टैग केवल उन उत्पादों को दिया जाता है जो किसी विशेष भगौलिक क्षेत्र में उत्पादित किये गए हों.
  • इस टैग के कारण उत्पादों को कानूनी संरक्षण मिल जाता है.
  • यह टैग ग्राहकों को उस उत्पाद की प्रामाणिकता के विषय में आश्वस्त करता है.
  • डब्ल्यूटीओ समझौते के अनुच्छेद 22 (1) के तहत GI को परिभाषित किया गया है.
  • औद्योगिक सम्पत्ति की सुरक्षा से सम्बंधित पहली संधि के अनुसार GI tag को बौद्धिक सम्पदा अधिकारों का एक अवयव माना गया है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर GI WTO के बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के व्यापार से सम्बंधित पहलुओं पर हुए समझौते से शाषित होता है. भारत में वह भौगोलिक वस्तु संकेतक (पंजीकरण एवं सुरक्षा) अधिनयम, 1999 से शाषित होता है.

भौगोलिक संकेतक पंजीयक

  • भौगोलिक वस्तु संकेतक (पंजीकरण एवं सुरक्षा) अधिनयम, 1999 के अनुभाग 3 के उप-अनुभाग (1) के अंतर्गत पेटेंट, रूपांकन एवं व्यापार चिन्ह महानिदेशक की नियुक्ति GI पंजीयक के रूप में की जाती है.
  • पंजीयक को उसके काम में सहयोग करने के लिए केंद्र सरकार समय-समय पर अधिकारियों को उपयुक्त पदनाम के साथ नियुक्त करती है.

Prelims Vishesh

Red Mud :-

  • भारत सरकार के खनन मंत्रालय ने पिछले दिनों लाल कीचड़ के कारगर उपयोग के विषय में एक कार्यशाला का आयोजन किया.
  • विदित हो कि एल्युमिनियम के उत्पादन की प्रक्रिया में एक ठोस कचरा निकलता है जिसे “लाल कीचड़” कहा जाता है.
  • भारत में प्रतिवर्ष 9 मिलियन टन लाल कीचड़ उत्पन्न होता है.

Hyperbola-1:

  • पिछले दिनों चीन के iSpace नामक एक स्टार्ट-अप कंपनी ने चीन के पहले वाणिज्यिक रॉकेटहाइपरबोला I – का प्रयोग किया.
  • इस रॉकेट के माध्यम से दो छोटे-छोटे उपग्रह प्रक्षेपित किये गये – CAS-7B CubeSat और दूसरा एक उपग्रह जो Aerospace Science and Technology Space Engineering Development Co. Ltd. ने तैयार किया है.
  • हाइपरबोला I का भार 31 मेट्रिक टन है और यह 260 किलोग्राम के भार को 500 किमी. की ऊँचाई तक प्रक्षेपित करने में समर्थ है.

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