मनसबदारी व्यवस्था क्या थी? Mansabdari System in Hindi

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मुगलों द्वारा विकसित मनसबदारी व्यवस्था (Mansabdari System) ऐसी थी जिसका भारत के बाहर कोई उदाहरण नहीं मिलता. मनसबदारी व्यवस्था की उत्पत्ति संभवतः विश्वविख्यात  मंगोल विजेता और आक्रमणकारी चंगेज खां के काल में हुई थी जिसने अपनी सेना को दशमलव के आधार पर संगठित किया था. इसमें सबसे छोटा एकांश (unit या इकाई) दस का था और सबसे ऊँचा दस हजार (तोमान) का था जिसके सेनाध्यक्ष को खान कहकर पुकारा जाता था. मंगोल की इस सैन्यव्यवस्था ने कुछ सीमा तक दिल्ली सल्तनत की सैन्यव्यवस्था को प्रभावित किया क्योंकि इस काल में हम एक सौ और एक हजार के सेनाध्यक्षों (सदी और हजारा) के बारे में सुनते हैं. लेकिन बाबर और हुमायूँ के काल में मनसबदारी प्रथा थी या नहीं इस बारे में इतिहासकार अभी तक कुछ भी ज्ञात नहीं कर सके हैं. इसलिए मनसबदारी व्यवस्था की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में काफी मतभेद है. वर्तमान प्रमाण के आधार पर ऐसा लगता है कि मनसबदारी व्यवस्था का प्रारम्भ अकबर ने अपने शासन काल के उन्नीसवें वर्ष (1575) में किया था.

अकबर जागीरदारी प्रथा के स्थान पर मनसबदारी प्रथा लाया

सम्राट् अकबर सेना के महत्त्व को भली-भांति जानता था. उसे पता था कि एक स्थायी और शक्तिशाली सेना के अभाव में न तो शांति स्थापित की जा सकती है और न ही साम्राज्य की रक्षा और विस्तार किया जा सकता है. अकबर से पूर्व जागीदारी प्रथा के आधार पर सेना एकत्र करने की प्रथा प्रचलित थी. उसने देखा कि जागीरदार निश्चित संख्या में न घोड़े रखते हैं और न ही घुड़सवार या सैनिक रखते हैं. इसके विपरीत वे सरकारी धन को अपनी विलासता पर खर्च कर लेते थे. अकबर ने जागीरदारी प्रथा के स्थान पर मनसबदारी प्रथा (Mansabdari System) के आधार पर सेना को संगठित किया. मनसबदारी सेना को संगठित करने की ऐसी व्यवस्था थी जिसमें प्रत्येक मनसबदार अपनी-अपनी श्रेणी और पद (मनसब) के अनुसार घुड़सवार सैनिक रखता था. इस व्यवस्था में मनसबदार सम्राट् से प्रति माह नकद वेतन प्राप्त करता था.

मनसब शब्द का अर्थ

“मनसब” फारसी भाषा का शब्द है. इस शब्द का अर्थ है पद, दर्जा या ओहदा. जिस व्यक्ति को सम्राट् मनसब देता था, उस व्यक्ति को मनसबदार (Mansabdar) कहा जाता था. अकबर ने अपने प्रत्येक सैनिक और असैनिक अधिकारी को कोई-न-कोई मनसब (पद) अवश्य दिया. इन पदों को उसने जात या सवार नामक दो भागों में विभाजित किया. जात का अर्थ है व्यक्तिगत पद या ओहदा और सवार का अर्थ घुड़सवारों की उस निश्चित संख्या से है जिसे किसी मनसबदार को अपने अधिकार में रखने का अधिकार होता था. इस तरह मनसब शब्द केवल सैनिक व्यवस्था का ही शब्द नहीं अपितु इसका अर्थ है वह पद जिसपर सैनिक और गैर-सैनिक अधिकारी को नियुक्त किया जाता या रखा जाता था. दूसरे शब्दों में, मनसब पद प्रतिष्ठा अथवा अधिकार प्राप्त करने की स्थिति थी. इससे व्यक्ति का पद, स्थान और वेतन निर्धारित होता था. इसके सही अर्थ को समझने के लिए इसकी विशेषताओं की जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है.

मनसबदारी व्यवस्था की विशेषताएँ

मनसबदारों का श्रेणियों में विभाजन

अकबर ने जात और सवार मनसबदारों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया था –

    1. जिस व्यक्ति को जितना अधिक ऊँचा जात (व्यक्तिगत) मनसब दिया जाता था, वह उतने ही अधिक घुड़सवार रखने का अधिकारी भी होता था और उसे प्रथम श्रेणी का मनसब कहा जाता था. अकबर के काल में सबसे छोटा या निम्न मनसब (पद) दस सिपाहियों के ऊपर अधिकार रखने का था और उच्चतम दस हजार घुड़सवारों पर अधिकार रखने का था. बाद में अकबर ने उच्चतम मनसब की सीमा बढ़ाकर 12 हजार कर दी थी.
    2. जो मनसबदार अपने जात (व्यक्तिगत) से आधी संख्या या आधे से अधिक घुड़सवार रख सकता था, वह दूसरी श्रेणी का मनसबदार होता था.
    3. जिस मनसबदार को अपने जात (व्यक्तिगत पद) से आधे से कम घुड़सवार रखने का अधिकार था, उसे तीसरी श्रेणी का मनसबदार कहा जाता था.

सभी मनसबदारों को एक घुड़सवार के लिए दो घोड़े रखने अनिवार्य होते थे. किसी भी मनसबदार को जात पद के अनुसार ही सवार रखने की अनुमति थी.

मनसबदारों की नियुक्ति

मनसबदारों की नियुक्ति सम्राट् स्वयं करता था और उसकी मर्जी होने तक ही वे पद पर बने रह सकते थे. प्रायः सात हजार का मनसब राजघराने के लोगों या बहुत ही महत्त्वपूर्ण और विश्वसनीय सरदारों जैसे राजा मानसिंह, मिर्जा शाहरुख और मिर्जा अजीज कोका को ही दिया गया. सम्राट् ने राजकुमारों को ही 12 हजार तक मनसब दिए.

मनसबदारों का वेतन

मुग़ल मनसबदारों को बहुत अच्छा वेतन मिलता था. उन्हें प्रायः नकद में वेतन दिया जाता था. परन्तु कभी-कभी जागीर का राजस्व भी वेतन के स्थान पर दे दिया जाता था. उन्हें अपनी व्यक्तिगत आय और वेतन से ही अपने स्वयं के अधीन घुड़सवारों और घोड़ों का खर्च चलाना होता था. इतना होने पर भी अकबर के काल में मनसबदार बहुत सुखी और ठाट का जीवन गुजारते थे क्योंकि उस समय उनको आय-कर नहीं देना होता था और रुपये की क्रय-शक्ति आज की तुलना में बहुत ही अधिक थी. प्रथम श्रेणी के पञ्चहजारी मनसबदार को 30,000 रुपये प्रतिमास, द्वितीय श्रेणी के पञ्चहजारी को 29,000 रुपये प्रति मास और तृतीय श्रेणी के पञ्चहजारी को 28,000 रुपये प्रति मास वेतन मिलता था. इसके अतिरिक्त मनसबदार को प्रत्येक सवार के लिए दो रुपये प्रति मास के हिसाब से अतिरिक्त वेतन भी मिलता था.

मनसबदारों के कार्य

मनसबदार सैनिक-अभियानों में भेजे जा सकते थे. उन्हें विद्रोह रोकने, नए प्रदेश जीतने आदि के साथ-साथ अपने पद से सम्बन्धी और समय-समय पर सौंपे गए गैर-सैनिक और प्रशासनिक कार्य भी करने पड़ते थे.

मनसबदारों पर पाबंदी

अकबर ने मनसबदारों को अपनी मनमानी करने से रोकने के लिए इस बात का विशेष ध्यान रखा कि वे केवल अनुभवी और कुशल सवारों को ही भर्ती करे. उसके अधीन प्रत्येक सवार का हुलिया (खाता रखना) नोट करने की और घोड़े को दागने की प्रथा भी शुरू की गई. समय-समय पर बादशाह स्वयं उसकी सेना का निरीक्षण करता था या वह खुद किसी समिति को उनकी सेना-निरीक्षण हेतु नियुक्त भी कर सकता था. मनसबदारों को प्रत्येक घुड़सवार के पीछे अरबी या ईराकी नस्ल के दो घोड़े रखने होते थे. हर माह अपने (यदि नकद हो तो) वेतन लेने के लिए स्वयं सम्राट् के पास आना होता था. मृत्यु हो जाने पर उसकी संचित पूँजी जब्त कर ली जाती थी. इन पाबंदियों ने मुगलों की सैनिक शक्ति को बहुत सुदृढ़ कर दिया.

मिश्रित सवार

अकबर ने इस बात की व्यवस्था की कि मनसबदारों के सवारों में मिश्रित अर्थात् सभी जातियों (मुग़ल, पठान, राजपूत आदि) के सैनिक और घुड़सवार हों. प्रारम्भ में मुग़ल और राजपूत मनसबदारों को इस बात की छूट थी कि वे अपनी-अपनी जाति के ही सवार रखें लेकिन धीरे-धीरे उसने भी मिश्रित सवारों की पद्धति को अपनाया. इस तरह अकबर ने सेना में जाति और विशिष्टता की भावना को निर्बल करने का प्रयास किया ताकि तुर्कों का वर्चस्व बना रहे.

अनेक तरह के सैनिक कार्य करने वालों की भर्ती

मुग़ल सेना में घुड़सवारों के अतिरिक्त तीरंदाज, बंदूकची, खन्दक खोदने वाले भी भर्ती किये जाते थे. इनके वेतन अलग-अलग होते थे. ईरानी और तुर्की सवारों को अधिक वेतन दिया जाता था लेकिन शेष सभी सवारों का औसत वेतन 20 रु. प्रति मास था. पैदल सैनिक का वेतन बहुत कम होता था. उसे केवल 3 रु. प्रति माह वेतन मिलता था.

मनसबदारी प्रथा के दोष

फिजूलखर्ची और विलासता को बढ़ाना

कुछ विचारकों के अनुसार मनसबदारी प्रथा चूँकि वंश परम्परागत नहीं थी और मनसबदारों की मृत्यु के बाद उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली जाती थी, इससे वे प्रायः फिजूलखर्ची किया करते थे. चूँकि उन्हें अच्छे वेतन मिलते थे इसलिए प्रायः वे बहुत विलासी होते थे.

नैतिक पतन

बेईमान अधिकारी एवं धोखेबाज मनसबदार परस्पर मिल कर प्रायः निरीक्षण के समय दूसरे मनसबदारों से नकली सैनिक एवं घोड़े लेते थे और कागजों पर ही सैनिक शक्ति पूरी रखते थे.

अकबर के काल में मनसबदारी व्यवस्था में बदलाव

अकबर द्वारा विकसित प्रशासनिक तथा कर व्यवस्था जहाँगीर तथा शाहजहाँ ने मामूली परिवर्तनों के साथ कायम रखीं लेकिन मनसबदारी प्रथा में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए. अकबर के काल में सबसे छोटा मनसबदार दस सवारों का होता था और सबसे बड़ा दस हजार का. किन्तु शुरुआत में 7,000 से ऊपर मनसब केवल राजकुमारों को ही दिए जाते थे. आगे चलकर अकबर ने राजकुमारों का मनसब 12,000 तक कर दिया. अकबरकालीन इतिहासकार अबुलफजल लिखता है कि अल्लाह के अक्षरों की संख्या का योग (1+30+35+5 = 66) के आधार पर सम्राट अकबर ने सेना के पदाधिकारियों (मनसबदारों) को 66 वर्गों में विभक्त किया. अकबर के काल में भी यद्यपि मनसबदारों पर नियंत्रण रखा जाता था लेकिन बाद के सम्राटों के काल में इस नियंत्रण को बढ़ा दिया गया क्योंकि मनसबदार प्रायः उतने सैनिक नहीं रखते थे जितने रखने का उन्हें अधिकार एवं वेतन दिया जाता था. अब उनके घोड़ों पर दाग तथा सैनिकों के हुलिया लिखने के साथ-साथ प्रायः सेना का 1/3 या 1/4 भाग निर्मित रूप से निरीक्षण के लिए मंगवाया जाता था. जो मनसबदार निरीक्षण के समय जितने अच्छे सैनिक उपस्थित करता था उसे प्रत्येक सैनिक पर दो रुपये के हिसाब से उन अच्छे सैनिकों की संख्या के बराबर इनाम दिया जाता था.

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