भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 – मार्ले-मिंटो सुधार

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भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 भारत के संवैधानिक विकास का अगला कदम था. यह पूर्ववर्ती भारतीयों के ‘सहयोग की नीति’ के क्रियान्वयन की दिशा में एक प्रशंसनीय प्रयास था. इसके जन्मदाता भारत सचिव मार्ले तथा गवर्नर जनरल लार्ड मिण्टो थे. इन्हीं के नाम पर इसे मार्ले-मिंटो सुधार कहते हैं.

भारतीय परिषद अधिनियम 1909 को पारित करने के पीछे कारण

अधिनियम को पारित करने के मुख्य कारण निम्न थे :-

1892 के सुधार से असंतोष

1892 के सुधार अधिनियम से भारतीयों की आकांक्षा की पूर्ति नहीं हुई. व्यवस्थापिका सभा केवल वाद-विवाद का स्थल बना रहा, सरकार के निर्णयों पर उनका प्रभाव नाम मात्र का पड़ता था. निर्वाचन की व्यवस्था भी एक दिखावा मात्रा थी. परिषदों के अतिरिक्त गैर-सरकारी सदस्य भी आंसू पोंछने के समान थे. परिषदों के कार्यों एवं अधिकारों पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लागाये गए थे. इन त्रुटियों के कारण भारतीयों को बहुत निराशा हुई. 

राष्ट्रीय आपदाओं का प्रभाव

1896-97 का अकाल बहुत ही विस्तृत तथा भयंकर था जिसने हजारों लोगों की जानें लीं. इसी बीच बम्बई में अनावृष्टि के कारण बहुत बड़ा अकाल पड़ा. सरकार द्वारा जनता के लिए उठाए गए कदम बहुत तुच्छ थे. उल्टे उसकी आर्थिक नीति के कारण जनता के दु:खों में बढ़ोतरी हुई. भारतीयों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध फैले असंतोष ने इसमें और बढ़ोतरी की. यहां तक कि प्लेग-कमीश्नर को गोली मार दी गई.

कर्जन की प्रतिक्रियावादी नीति

लार्ड कर्जन की साम्राज्यवादी तथा कठोर नीतियों ने आग में तेल का काम किया इससे बुद्धिजीवी लोगों में विदेशी सरकार के प्रति अधिक विरोद्ध उत्पन्न हुआ. कर्जन के मन में भारतीयों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं थी. उसने कलकत्ता निगम का पूर्णरुपेण सरकारी प्रभाव के अधीन बना दिया और इनमें 1899 में एक तिहाई सदस्य कम करके यूरोपियनों को बहुमत दे दिया गया. पांच वर्ष बाद ऐसी ही नीति भारतीय विश्वविद्यालयों में भी लागू की गई जिससे उसकी प्रभुसत्ता समाप्त हो गई. उसी वर्ष 1904 में राजकीय सदस्य अधिनियम लागू की गई. परन्तु सबसे बड़ी ठाकेर बंगाल विभाजन से लगी, जिसको बंगाल की उभरती हुई राष्ट्रीयता पर एक प्रहार माना गया. इसे समाप्त करने के लिए भिन्न-भिन्न आंदोलन किये गये.

विदेशों में भारतीयों का अपमान

समुद्र पार भारतीयों के साथ, विशेषकर दक्षिणी अफ्रीका में बहुत अपमानपूर्वक व्यवहार किया जा रहा था, संभवतः इसलिए कि वे एक दास जाति के सदस्य हैं. अतएव लोगों में यह भावना जागी कि जब तक वे आजाद नहीं हो जाते, उन्हें उचित व्यवहार की आशा नहीं करनी चाहिए और इससे राष्ट्रवाद को बहुत प्रोत्साहन मिला.

विदेशी घटनाओं का प्रभाव

इस अवधि में विदेशों में कुछ ऐसी राजनीतिक घटनाएँ घटीं जिनका भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन पर व्यापक प्रभाव पड़ा. 1896 में छोटे से देश अबिसीनिया ने इटली को हराया और 1905 में जापान ने रूस को. इन घटनाओं ने यूरोपियनों की सर्वोच्चता के रहस्य का भंडाफोड़ कर दिया और एशियावासियों के हृदय में नवस्फूर्ति एवं नवप्रेरणा जागृत की. एशिया में नये युग का उद्भव हुआ.

प्रेस द्वारा प्रचार

प्रेस ने राष्ट्रीय जागरण के  उद्भव तथा सुधार की मांग के लिए सराहनीय कार्य किया. केसरी, काल, वैधव, न्यू इण्डिया, वन्देमातरम्, युगान्तर आदि पत्रों ने ब्रिटिश साम्राज्य का पर्दाफाश किया और भारतीयों में नव जागरण का सन्देश फैलाया. तिलक, विपिन चन्द्र पाल और लाला लाजपत राय जैसे उग्रवादी नेताओं ने देश का भ्रमण कर भारतीयों में राष्ट्रीयता का संदेश पहुंचाया तथा उन्हें अंग्रेजों की अन्यायपूर्ण नीति के प्रति सचेष्ट बनाया.

उग्रवाद तथा आतंकवाद का विकास

सरकार की प्रतिक्रियावादी एवं दमनकारी नीति के परिणामस्वरूप नवयुवकों में क्रांति और आतंकवाद की भावना फैली. भारतीयों में यह विश्वास फ़ैल गया कि उदारवादियों की भिक्षावृत्ति की नीति से स्वतंत्रता की प्राप्ति संभव नहीं है. कांग्रेस पर उदारवादियों का प्रभाव घटने लगा. सरकार डर गयी कि कांग्रेस की बागडोर उग्रवादियों के हाथों में जा सकती है. अतः उसने शासन में सुधार लाना आवश्यक समझा. दूसरी तरफ आतकंवादी संवैधानिक तरीकों में विश्वास नहीं करते थे. बम फेंकना या राजनीतिक षड्यंत्रों की रचना करना आम बात बन गई. यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने आतंकवादियों को दबाने के लिए अपना दमन चक्र जोरों से चलाया, फिर भी गैर-क्रांतिकारियों को जीतने के लिए उसने संवैधानिक सुधार लाना आवश्यक समझा.

कांग्रेस की मांग

1905 में कांग्रेस ने अपने उद्देश्य के संबंध में एक प्रस्ताव पास किया जिसमें यह कहा गया कि भारत का शासन भारतीयों के हित में होना चाहिए और कालान्तर में ब्रिटिश साम्राज्य के अन्य स्वशासित उपनिवेशों की भांति भारत में सरकार का संगठन होना चाहिए. कांग्रेस अध्यक्ष गोखले ने यह भी मांग की कि प्रांतीय तथा केंद्रीय विधान परिषदों में सुधार लाया जाना चाहिए.

उन्होंने स्वयं भारत सचिव मार्ले से भेंट की और कांग्रेस की मांग को उनके समक्ष रखा. मार्ले ने औपनिवेशिक स्वशासन पर अपनी स्वीकृति नहीं दी, पर उनको न्यायोचित सुधार का वचन दिया.

सांप्रदायिकता का उदय

भारत में राष्ट्रीयता के प्रभाव को रोकने के लिए अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति अपनायी. इस के लिए उन्होंने मुसलमानों को प्रोत्साहित कर भारतीय राजनीति में सांप्रदायिकता का बीज बोना शुरू कर दिया. लार्ड मिंटो के निजी प्रोत्साहन पर आगा खाँ  के नेतृत्व में मुसलमानों का एक शिष्टमंडल वायसराय से मिला और आगामी सुधारों में मुसलमानों के लिए जातीय प्रतिनिधित्व की मांग की. लार्ड मिंटो ने शिष्टमंडल के सदस्यों का स्वागत किया और उन्हें उनकी मांगों को पूरा करने का आश्वासन दिया. 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई, जिसने पृथक निर्वाचन मंडल की मांगों को दुहराया. इस तरह ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति को क्रियान्वित करने के लिए भी सुधार की आवश्यकता पडी़.

इंग्लैंड में उदारवादी दल की विजय

दिसम्बर, 1905 में इंग्लैंड में उदारवादियों का मंत्रिमंडल बना. मार्ले भारत का सचिव हुआ. वह भारतीयों तथा भारतीय समस्याओं से पूर्ण सहानुभूति रखता था. तत्कालीन वायसराय मिंटो भी समान विचार का पोषक था. लार्ड मिंटो ने कार्यपालिका परिषद की एक समिति का गठन कर उसे सुधार संबंधी प्रस्तावों का प्रारूप तैयार करने के लिए कहा. अन्त में एक विधयेक बनाया गया जो 1919 में कानून के रूप में पास हुआ. यदि 1892 का भारतीय परिषद अधिनियम इसलिए पारित किया गया कि कांग्रेस आन्दोलन को हानि पहुँचे तो 1909 का अधिनियम कांग्रेस के संयतमार्गियों तथा मुसलमानों को अपनी ओर मिलाने के लिए पारित किया गया.

अधिनियम के मुख्य उपबंध

विधान परिषदों के आकार में बढ़ोतरी

1910 के अधिनियम द्वारा प्रत्येक परिषद के अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढा़ दी गई. केन्द्रीय व्यवस्थापिका परिषद की अधिकतम संख्या 60 निर्धारित की गयी. विभिन्न प्रांतीय विधान परिषदों की अधिकतम निर्धारित सदस्य संख्या इस प्रकार थी. बम्बई, बंगाल, मद्रास, संयुक्त प्रांत, बिहार, उडी़सा के लिए 50 तथा पंजाब-20, बर्मा-30 और असम-30, पदेन सदस्य इसके अतिरिक्त थे.  

सर्वोच्च व्यवस्थापिका परिषद में सरकारी बहुमत

प्रत्येक परिषद में तीन प्रकार के सदस्य थे- नामांकित सरकारी सदस्य, नामांकित गैर-सरकारी सदस्य और निर्वाचित सदस्य. केन्द्रीय व्यवस्थापिका परिषद में सरकारी सदस्यों का बहुमत रखा गया. अब विधान मंडल में 69 सदस्य थे जिनमें से 37 शासकीय सदस्य तथा 32 अशासकीय वर्ग के थे. शासकीय में से केवल 9 पदेन सदस्य थे अर्थात् गर्वनर जनरल तथा उसके सात कार्यकारी पार्षद और एक असाधारण सदस्य तथा 28 सदस्य गर्वनर जनरल द्वारा मनोनीत किये जाते थे. 32 अशासकीय सदस्यों में से 5 गर्वनर जनरल द्वारा मनोनीत किये जाते थे और शेष 27 निर्वाचित किये जाते थे.

इन निर्वाचित सदस्यों के विषय में यह कहा गया कि प्रादेशिक अथवा क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व तो भारत में उपुयक्त नहीं है. अतएव देश में वर्ग तथा विशेष हितों को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. इस प्रकार 1909 के अधिनियम में विभिन्न वर्गों के आधार पर निर्वाचित सदस्यों को स्थान दिया गया. केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा में निर्वाचित सदस्यों की संख्या इस प्रकार थी –  5 मुसलमानों के द्वारा, 6 जमींदारों के द्वारा, 1 मुसलमान जमींदारों द्वारा, एक एक बंगाल तथा बम्बई के वाणिज्य मडंल द्वारा तथा 13 नौ प्रांतीय परिषदों के गरै सरकारी निर्वाचित सदस्यों द्वारा.

लार्ड मिंटो ने प्रांतीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी बहुमत को हानिप्रद नहीं समझा. फिर भी इसका अर्थ चुने हुए सदस्यों का बहुमत नहीं था क्योंकि इनमें कुछ गरै-सरकारी सदस्यों को गवर्नर मनानेीत करता था. इस प्रकार इन 47 सदस्यों में से 26 गैर-सरकारी थे, परन्तु इनमें से केवल 21 ही निर्वाचित होते थे और शेष 5 गर्वनर द्वारा मनोनीत. ये मनोनीत सदस्य सदैव ही सरकार का पक्ष लेते थे.

सांप्रदायिक और पृथक निर्वाचन पद्धति

1909 के अधिनियम द्वारा पृथक एवं सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति अपनायी गयी. सामान्य निर्वाचन एवं क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को भारत के लिए अनुपयुक्त समझा गया. विभिन्न वर्गों, हितों और जातियों के आधार पर निर्वाचन की व्यवस्था की गयी.

विधान परिषद के कार्यक्षेत्रा का विस्तार

विधान परिषदों की शक्ति में बढ़ोतरी की गयी. पहला-इसके पूर्व सदस्यों को पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं था. इस अधिनियम द्वारा मूल प्रश्न करने वाले सदस्य को पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया. दूसरा, सदस्यों को सार्वजनिक हित संबंधी प्रस्ताव प्रस्तुत करने तथा उन पर मत देने का अधिकार मिला. ऐसे प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिए 15 दिनों की सूचना आवश्यक थी. वाद-विवाद के समय इनमें संशोधन लाया जा सकता था. सरकार इन प्रस्तावों को मानने के लिए बाध्य थी, चाहे ये प्रस्ताव जनता के लिए हों अथवा वित्तीय विवरण के लिए हों. तीसरा, वित्तीय मामलों में परिषदों की शक्ति में बढ़ोतरी की गयी. बजट पर गैर-सरकारी प्रभाव बढ़ा दिया गया. सदस्यों को बजट पर विचार करने, बजट संबंधी प्रस्ताव पेश करने तथा राजस्व और व्यय के मूल विषयों पर मत देने का अधिकार दिया गया, लेकिन व्यय की कुछ मदों पर मतदान नहीं हो सकता था, जिसका निश्चय सरकार करती थी.

कार्यकारिणी परिषदों में भारतीयों की नियुक्ति

इस अधिनियम में कार्यकारिणी परिषदों में भारतीयों की नियुक्ति की इच्छा व्यक्त की गयी थी. परिषदों तथा ब्रिटिश नौकरशाही के विरोध के बावजूद ब्रिटिश मंत्रिमंडल ने इस संबंध में अपनी स्वीकृति दे दी. इसके फलस्वरूप दो भारतीयों के.जी. गुप्ता तथा सैय्यद हुसैन बिलग्रामी को भारत सचिव के कौंसिल का सदस्य और एक भारतीय श्री सत्येन्द्र सिंह को गवर्नर जनरल की कायर्कारिणी परिषद का सदस्य मनानेीत किया गया. निःसंदेह यह एक महत्त्वपूर्ण कदम था.

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