राजकोषीय समेकन (Fiscal consolidation) और ट्विन डेफिसिट हाइपोथीसिस

Sansar LochanFiscal Policy and Taxation, Kalua and Tulsi1 Comment

तुलसी : बिनोद! कल से मेरे दिमाग में एक बात दौड़ रही है. कल तुमने बहुत ही अच्छा बताया कि राजकोषीय घाटा क्या है और उसके चलते मुद्रास्फीति क्यों आ जाती है. और उसके लिए सरकार को क्या कदम उठाने चाहिएँ और नहीं उठाने चाहिएँ. मुझे तो लगा था कि पैसा कम है तो नोट छाप लो, पर तुमने कहा कि नहीं, यह सबसे गलत तरीका है. यहाँ तक तो मैं समझ गई और कांसेप्ट भी क्लियर हुआ. अब ये बताओ कि कभी-कभी परीक्षा में आता है कि इससे इंटरेस्ट रेट यानी ब्याज दर पर क्या प्रभाव पड़ेगा.

बिनोद : वाह, आज तुम बहुत सीरियस लग रही हो पढ़ाई को लेकर. चलो अच्छी बात है. हमने पहले ही देखा है कि, राजकोषीय घाटे के गड्ढे केवल नकदी से भरे जा सकते हैं. इस नकदी को पाने के लिए RBI, अन्य बैंकों, FII आदि से उधार लेना पड़ता है. अब खुद ही सोचो कि यदि सरकार बांड के जरिये इन सभी स्रोतों से उधार लेती है तो अन्य जरूरतमंद व्यवसायी के लिए पैसा कहाँ से आएगा जब सारा पैसा सरकार ही ले लेगी तो?

तुलसी : मैं समझी नहीं. व्यवसाइयों को पैसा अब क्यों चाहिए? क्या उनको भी राजकोषीय घाटे के गड्ढे को भरना है क्या?

बिनोद : अरे, अरे नहीं. वो भला क्यूँ भरेंगे. मेरे कहने का मतलब मानो किसी व्यवसायी को कोई फैक्ट्री सेट अप करना है या किसी चीज में इन्वेस्टमेंट करना है और उनको अपने लिए पैसा चाहिए तो वो तो लोन के लिए बैंक ही जायेंगे न? जब RBI सरकार को पैसा देते रहेगी तो उनके पास क्या बचेगा देने के लिए कमर्शियल/वाणिज्यिक बैंक को? वाणिज्यिक बैंक के पैसा रहेगा तब न व्यावसायी लोन ले पायेंगे? ऐसा भी नहीं है कि उनके पास जीरो पैसा होगा पर हम अनुमान लगा सकते हैं कि इस परिस्थिति में पैसा (क्रेडिट / ऋण) उपलब्ध होना बहुत ही कठिन होगा.

तुलसी : समझी, समझी.

बिनोद : हाँ, तो हम दूसरे शब्द में यह भी कह सकते हैं कि राजकोषीय घाटा (fiscal deficit) प्राइवेट सेक्टर में “निवेश” को हतोत्साहित (discourage) करता है.

तुलसी : हाँ एक बार परीक्षा में आया भी था. यह आप्शन में था कि राजकोषीय घाटा से निजी निवेश बढ़ जाता है जो एक गलत कथन था और मैंने उसी पर टिक लगा दिया था.

बिनोद : कोई बात नहीं. खैर, अब उस जरूरतमंद व्यवसायी को किसी अन्य पार्टी से उच्च ब्याज पर पैसा उधार लेना होगा और इस तरह से राजकोषीय घाटा ‘ब्याज दरों’ में वृद्धि करता है’.

तुलसी : ओह! फिर ब्याज वृद्धि से क्या होता है?

बिनोद : ब्याज बढ़ेगा तो उत्पाद की इनपुट लागत बढ़ जायेगी. वह व्यवसायी लाभ मार्जिन को बनाए रखने के लिए अपने उत्पाद या सेवा की MRP बढ़ाएगा जिससे महंगाई बढ़ेगी और इसी को अर्थशास्त्र में cost push इन्फ्लेशन कहते हैं. और जब भारत का आयात भारत के निर्यात से ज्यादा होता है तो इससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) का आगमन हो जाता है.

तुलसी : अब ये चालू खाता घाटा (CAD) क्या है?

बिनोद : जब भारत निर्यात से ज्यादा आयात करता है तो = करंट अकाउंट डेफिसिट की एंट्री होती है. CAD भी एक तरह का आर्थिक गड्ढा है, पर इसे केवल विदेशी मुद्रा (ज्यादातर डॉलर!) से भरा जा सकता है. इससे विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग बढ़ जाती है = डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है = पेट्रोल की कीमत बढ़ जाती है = फिर से मुद्रास्फीति = एक खराब स्थिति.

तुलसी : हम्म….अब समझी. पर बिनोद यह बताओ कि यह राजकोषीय समेकन (fiscal consolidation) किसे कहते हैं? यह भी न्यूज़ में कभी-कभी सुनने को मिलता है. और यह Twin deficit hypothesis (जुड़वां घाटे की परिकल्पना) क्या होती है?

बिनोद : पहले ट्विन डेफिसिट हाइपोथीसिस के बारे में बताता हूँ. यह परिकल्पना कहती है कि जैसे-जैसे देश का राजकोषीय घाटा बढ़ता है तो व्यापार घाटा (यानी निर्यात और आयात के बीच का अंतर) भी बढ़ता है. इसलिए, जब किसी देश की सरकार जितना कमाती है, उससे अधिक खर्च करती है, तो देश निर्यात से अधिक आयात करना करने लगता है. भारत में, व्यापार घाटे की कहानी मूल रूप से तेल और सोने – इन दो वस्तुओं से ही सम्बंधित है – जिनका देश में उत्पादन न के बराबर होता है लेकिन इनका आयात जी भर के होता है. अब राजकोषीय समेकन के बारे में बताता हूँ. राजकोषीय समेकन का मतलब है कि राजकोषीय घाटे की समस्या को जड़ से ठीक कर देना और भविष्य में आने वाले राजकोषीय घाटे की स्थिति को रोकना.

तुलसी : पर वो कैसे संभव है?

बिनोद : बस आउटगोइंग मनी यानी जाने वाले पैसे को कम करना और आने वाले पैसे को बढ़ाने की कोशिश करना (यदि तुम्हें याद नहीं तो पिछले पोस्ट के टेबल को याद करो). इसका मतलब है कि हमें –

✓सब्सिडी में कटौती करना होगा.

✓सब्सिडी में लीकेज बंद करो.

✓कर संरचना (जीएसटी लागू करें) को सुधारें.

✓सार्वजनिक उपक्रमों के प्रदर्शन में सुधार करें.ब्लैकमनी को खात्मा करने का भरपूर प्रयास करना.

✓मंत्रियों को बिजनेस क्लास फ्लाइट और अन्य बेकार सरकारी खर्चों का उपयोग करने से रोकें.

✓एफडीआई जैसे नीतिगत सुधार.

तुलसी : थैंक यू बिनोद. यू आर माय स्वीटहार्ट.

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