प्रत्यक्ष धान बीजारोपण तकनीक – DSR Technique

Sansar LochanGeography Current AffairsLeave a Comment

कोविड-19 के कारण कृषि श्रमिकों के अपने-अपने प्रदेश में लौट जाने के कारण पंजाब सरकार ने यह निर्णय किया है कि इस बार धान का रोपण पारम्परिक ढंग से नहीं होगा, अपितु बीजों को सीधे रोप दिया जाएगा. रोपण की इस पद्धति को प्रत्यक्ष धान बीजारोपण (direct seeding of rice (DSR) technique)  कहते हैं.

प्रत्यक्ष धान बीजारोपण (Direct Seeding of Rice – DSR) तकनीक क्या है?

  1. प्रत्यक्ष धान बीजारोपण (DSR) तकनीक में धान के जनमे हुए बीजों को एक ट्रेक्टर से चलने वाली मशीन से खेत में सीधे अन्दर डाल दिया जाता है.
  2. इस पद्धति में बीजों की तैयारी या रोपण नहीं होता है. किसान को केवल अपनी भूमि को समतल करना पड़ता है और बीज डालने के पहले एक बार सिंचाई कर देनी होती है.

पारम्परिक पद्धति से यह भिन्न कैसे?

पारम्परिक पद्धति में किसान पहले भूमि में धान के बीज बिखेर देता है और उनको पौधों के रूप में उगने देता है. जितने क्षेत्र में धान को रोपना होता है, उसके मात्र 5-10% क्षेत्र में ही ये बीज लगाये जाते हैं. बाद में इन बीजों को उखाड़ लिया जाता है और 25 से 35 दिनों के पश्चात् उनको फिर से एक ऐसे खेत में रोपा जाता है जो पानी से भरपूर होता है.

प्रत्यक्ष धान बीजारोपण (DSR) के लाभ

  • पानी की बचत : बीज डालने के पहले की गई सिंचाई के बाद इस पद्धति में पहली सिंचाई 21 दिनों के बाद ही आवश्यक होती है. ज्ञातव्य है कि पारम्परिक पद्धति में लगभग प्रतिदिन पानी पटाना पड़ता है जिससे कि खेत 3 सप्ताह तक पानी में डूबा रहे.
  • कम मजदूर : इस पद्धति में एक एकड़ भूमि में धान लगाने के लिए मात्र 3 मजदूर चाहिए होते हैं जिन पर प्रति एकड़ लगभग 2,400 रु. का खर्च बैठता है.
  • पतवारनाशक का खर्च : प्रत्यक्ष धान बीजारोपण (DSR) पद्धति में एक एकड़ में पतवारनाशकों (herbicides) पर 2000 रु. से कम ही खर्च होता है.
  • मीथेन उत्सर्जन में कमी : पारम्परिक पद्धति में खेत को पानी में बहुत दिनों तक डुबाये रखना पड़ता है और उसकी मिट्टी अधिक मात्रा में इधर से उधर हो जाती है. परन्तु DSR पद्धति में खेत में पानी भरने की अवधि बहुत छोटी होती है इसलिए मीथेन का उत्सर्जन भी बहुत कम होता है.

प्रत्यक्ष धान बीजारोपण की कमियाँ

  1. पतवारनाशकों की अनुपलब्धता.
  2. DSR में लगभग दुगुने बीज लगते हैं. जहाँ पारम्परिक चावल की रोपाई में 4-5 किलोग्राम प्रति एकड़ बीज लगते हैं, वहीं DSR में 8-10 किलोग्राम बीजों की आवश्यकता होती है.
  3. DSR पद्धति लागू करने के लिए लेजर से भूमि को समतल बनाना अपरिहार्य होता है जबकि रोपाई में ऐसा नहीं होता है.
  4. मानसून की बरसात आने के पहले बीजों का रोपण समय से हो जाना आवश्यक है अन्यथा पौधे ठीक से नहीं निकलेंगे.
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