[संसार मंथन 2020] मुख्य परीक्षा लेखन अभ्यास – Modern History Gs Paper 1/Part 13

Sansar LochanGS Paper 1 2020-21Leave a Comment

“हिन्दू समाज की सबसे बड़ी बुराई जाति-प्रथा एवं छुआछूत की भावना थी.” इस कथन की पुष्टि करें और साथ-साथ यह भी बताएँ कि 19वीं शताब्दी के दौरान अस्पृश्यता का अंत एवं हरिजनोद्धार के लिए क्या-क्या कदम उठाये गये?

उत्तर :-

जाति-प्रथा वर्ण-व्यवस्था का विकृत रूप था. इस व्यवस्था ने हिंदू समाज के एक वर्ग, अछूतों को समाज से लगभग अलग कर दिया था. उनकी जनसंख्या हिंदुओं की जनसंख्या के लगभग 20 प्रतिशत थी. उनपर अनेक प्रकार के सामाजिक प्रतिबंध लाद दिए गए थे. उनका स्पर्श, यहाँ तक कि छाया भी सवर्णों के लिए वर्जित थी. उनके खान-पान, रहन-सहन के तौर-तरीके और निवास के निश्चित और कठोर नियम बने हुए थे. वे सवर्णों द्वारा प्रयुक्त कुओं या जलाशयों से पानी नहीं ले सकते थे, मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकते थे. शास्त्रों का अध्ययन, पूजा-पाठ, यज्ञ इत्यादि भी उनके लिए वर्जित थे. उन्हें उच्च एवं सम्मानजनक नौकरियों में प्रवेश नहीं मिलता था; भूमि के स्वामित्व-संबंधी अधिकार भी नहीं थे. उनका कार्य सवर्णों की सेवा एवं अन्य ‘अपवित्र’ कार्यों को करना ही था. जाति-व्यवस्था भी भीषण रूप में व्याप्त थी. विभिन्न जातियों के खान-पान, विवाह-संबंधी नियम एवं अन्य सामाजिक नियम निश्चित थे. फलतः, हिंदू समाज में आंतरिक कलह और फूट विद्यमान था.

19वीं शताब्दी के धार्मिक सुधारकों ने इन समस्याओं की तरफ ध्यान तो दिया था, परंतु पर्याप्त सुधार नहीं हो सके थे. यह कार्य 20वीं शताब्दी में किया गया और इन बुराइयों को हटाया गया. जाति-प्रथा की विभीषिका को समाप्त करने में अंग्रेजी सरकार की नीतियों एवं भारतीय समाज-सुधारकों दोनों का योगदान है. आवागमन के आधुनिक साधनों (रेल, बस इत्यादि) के विकास, औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण की प्रक्रिया, कानून के समक्ष समानता की नीति, शिक्षा-प्रसार इत्यादि ने जाति-प्रथा के बंधन ढीले कर दिए. रही-सही कसर सुधारकों एवं समाजसेवी संस्थाओं ने पूरा किया. ब्रह्मसमाज, आर्यसमाज, प्रार्थनासमाज, रामकृष्ण मिशन जैसी संस्थाओं ने जाति-प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई. 1917 ई० में बिट्ठलभाई पटेल ने जाति-प्रथा को समाप्त करने का प्रयास किया. 1922 ई० में जाति-व्यवस्था को भंग करने के लिए एक संस्था स्थापित की गई. राष्ट्रीय आंदोलन एवं कांग्रेस के नेताओं ने भी इस सामाजिक कोढ़ को दूर करने, विशेषत: अस्पृश्यता को मिटाने एवं हरिजनों को समानता का दर्जा देने के लिए संघर्ष किया. महात्मा गाँधी ने इस दिशा में विशेष प्रयल किए. उन्होंने अछूतों को “हरिजन” कहा और उनके उद्धार के लिए अनेक प्रयास किए. उनके प्रयासों के फलस्वरूप 1932 ई. में  “अखिल भारतीय हरिजन संघ” की स्थापना की गई. हरिजन के माध्यम से उन्होंने हरिजनों की दयनीय स्थिति की तरफ सबों का ध्यान खींचा. अन्य नेताओं, जैसे – डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने भी अपना सारा जीवन हरिजनों के उद्धार में लगा दिया. उन्होंने “अखिल भारतीय दलितवर्ग संघ” (All India Depressed Classes Federation) की स्थापना की. अपने प्रयासों से वे विधानसभाओं में हरिजनों के लिए स्थान सुरक्षित करवाने में भी सफल हुए स्वतंत्रतापूर्व ही कांग्रेसी सरकार ने छुआछूत को एक संगीन अपराध घोषित कर दिया. हरिजन नेताओं ने अपने हितों की सुरक्षा और अधिकारों की माँग के लिए “अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद्” (All India Depressed Class Association) जैसी संस्थाएँ कायम कीं. दक्षिण भारत में ब्राह्मणों के प्रभुत्व के विरुद्ध हरिजनों ने “स्वाभिमान आंदोलन” (Self-respect movement) चलाया. इन सबके परिणामस्वरूप हरिजनों की स्थिति में आमूल परिवर्तन हुए. उन्हें मंदिरों में प्रवेश मिला, छुआछूत समाप्त हो गया, उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति सुधरी, शिक्षा का विकास हुआ एवं राजनीति में भाग लेने का भी मौका प्राप्त हुआ. स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद जाति-व्यवस्था की असमानता—अस्पृश्यता को कानूनी तौर पर समाप्त कर दिया गया तथा हरिजनों एवं अन्य दलित वर्गों को विशेष सुविधाएँ प्रदान की गईं. फलतः, हरिजनों की स्थिति आज पूर्णतया बदल चुकी है. अब वे हिंदू समाज के अविभाज्य अंग बन गए हैं.

इस प्रकार, 20वीं शताब्दी के सुधार-आंदोलनों ने स्त्रियों ओर हरिजनों को समानता एवं स्वतंत्रता प्रदान की. यह एक बड़ी उपलब्धि है.

Author
मेरा नाम डॉ. सजीव लोचन है. मैंने सिविल सेवा परीक्षा, 1976 में सफलता हासिल की थी. 2011 में झारखंड राज्य से मैं सेवा-निवृत्त हुआ. फिर मुझे इस ब्लॉग से जुड़ने का सौभाग्य मिला. चूँकि मेरा विषय इतिहास रहा है और इसी विषय से मैंने Ph.D. भी की है तो आप लोगों को इतिहास के शोर्ट नोट्स जो सिविल सेवा में काम आ सकें, मैं उपलब्ध करवाता हूँ. मैं भली-भाँति परिचित हूँ कि इतिहास को लेकर छात्रों की कमजोर कड़ी क्या होती है.
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