[Sansar Editorial] दक्षिण एशियाई एकीकृत बिजली ग्रिड हेतु नए दिशानिर्देश

Richa KishoreSansar Editorial 20193 Comments

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The Hindu – January 05

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केन्द्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने दक्षिण एशियाई देशों में बिजली के आयात और निर्यात के संदर्भ में नए नियमों का एक ज्ञापन जारी किया है.

इस मुद्दे पर भारत ने राजनीतिक अड़चनों को दरकिनार करते हुए अपने पुराने नियमों से हटकर नए दिशानिर्देशों की सूची सभी दक्षिण एशियाई देशों के सामने रखी है.

ये नए दिशानिर्देश एक सच्चे क्षेत्रीय बाजार के निर्माण की ओर उठाया गया एक तात्कालिक पहला कदम हैं जिसमें उपमहाद्वीप के विद्युत उत्पादक आपस में प्रतिस्पर्धा करते हुए ग्राहकों को कम लागत वाली स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराएँगे.

पड़ोसी देशों में आपसी मनमुटाव और अविश्वास के माहौल में भारत का यह कदम राजनीतिक व्यवहारिकता से भरा एक अद्भुत एवं सराहनीय कदम है.

यह कदम न केवल दक्षिण एशियाई विद्युत् व्यापार को मजबूत बनाएगा अपितु यह भारत के पड़ोसी देशों के लिए भारत की ओर से एक ऐसे क्षेत्र में छूट प्रदान करता है जो राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्त्व का है.

दक्षिण-एशिया ने हमेशा भारत की विदेश नीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. अब भारत के इस कदम से इस क्षेत्र में एक-दूसरे के प्रति वचनबद्धता की फिर से पुष्टि हुई है और वह पुनर्जीवित हुई है.

दक्षिण एशियाई आर्थिक एकीकरण

सार्क (SAARC) देशों की आर्थिक सततता ऊर्जा-सुरक्षा पर टिकी हुई है क्योंकि इन देशों में ऊर्जा की माँग का 30% आयात पर ही निर्भर है. इस संदर्भ में भारत ने एक त्रिमुखी रणनीति का सुझाव दिया है जो निम्नलिखित है –

  1. ऊर्जा के पारम्परिक और नवीकरणीय स्रोतों का दोहन.
  2. एक-दूसरे से जुड़े (inter-connected) ट्रांसमिशन ग्रिड का निर्माण.
  3. ऊर्जा के व्यापार के लिए कारगर समझौते तैयार करना.

दक्षिण-एशिया एक मजबूत और उभरता हुआ बाजार है परन्तु विद्युत् आपूर्ति के मार्ग में कई बाधाओं के होने के फलस्वरूप यहाँ के देश बिजली की कमी का सामना किया करते हैं.

सार्क पॉवर ग्रिड दक्षिणी एशिया में एकात्मकता लाएगा

  • भले ही नदियाँ एक ही दिशा में बहती हैं पर ऊर्जा किस दिशा में जायेगी यह हमारे हाथ में है.
  • सार्क पॉवर ग्रिड के निर्माण के बाद बिजली के उत्पादन करने वाले देश बहुत ही सरलता से यथासंभव मात्रा में विद्युत्-अभाव से ग्रसित क्षेत्रों की बिजली-माँग को पूरा कर सकते हैं. उदाहरण के लिए उत्तर-पूर्व भारत में उत्पन्न पनबिजली को बांग्लादेश, भारत और पाकिस्तान के जरिये अफगानिस्तान तक पहुँचाया जा सकता है. वहीं पाकिस्तान या नेपाल में विद्युत् आपूर्ति पहुँचाने के लिए श्रीलंका की तटीय सीमाओं में अपतटीय (offshore) पवन परियोजनाएँ स्थापित की जा सकती हैं.
  • भारत का पूर्वी क्षेत्र जल संसाधन में भी समृद्ध है. यदि इसका सही उपयोग हो तो भारत बांग्लादेश से पनबिजली साझा कर सकता है.
  • भारत को अपने पूर्वोत्तर राज्यों से पश्चिम बंगाल और उसके पश्चिम के राज्यों तक पनबिजली पहुँचाने में बांग्लादेश के सहयोग की आवश्यकता पड़ेगी.

नये मार्गनिर्देशों की आवश्यकता क्यों पड़ी?

  • पुराने दिशानिर्देशों के अनुसार भारत के पड़ोसी देशों के गैर-भारतीय विद्युत् उत्पादक ही भारत को बिजली भेज सकते थे. पड़ोसी देशों में, विशेषकर नेपाल में, कई ऐसी निजी कंपनियाँ थीं जो भारत से व्यापार करना चाहती थीं पर उनको ऐसा करने की अनुमति नहीं थी.
  • एक ओर नेपाल में जो पनबिजली परियोजनाएँ यह कहकर बनाई जा रही थीं कि उनसे बिजली का निर्यात होगा तो दूसरी ओर उन्हें भारत के विशाल बाजार से वंचित भी किया जा रहा था.
  • भूटान को एक प्रावधान को लेकर चिंता थी जिसमें बिजली निर्यात करने वाली उत्पादक कंपनियों का बड़ा हिस्सा किसी भारतीय प्रतिष्ठान का होना अनिवार्य बना दिया गया था.
  • इससे भारत और भूटान के संयुक्त उपक्रमों में आपसी खींचतान पैदा हुई. भूटान इस बात को लेकर खिन्न था कि उसे भारत की मुख्य बिजली बाजार तक पहुँचने की पूरी छूट नहीं मिली थी जहाँ उसे सायंकाल के समय होने वाली ऊँची माँग को पूरा करके अच्छा-ख़ासा लाभ कमाने का अवसर मिलता.

नया दिशानिर्देश पड़ोसी देशों के दो वर्षों से चले आ रहे अड़चनों को समाप्त करेगा और विद्युत् व्यापार को सरलीकृत करेगा. भारत को विश्वास है कि नए दिशानिर्देशों के फलस्वरूप उसके और सार्क देशों के बीच साख मजबूत बनेगी और उसकी अग्रणी भूमिका सब के समक्ष आएगी.

सार्क पॉवर ग्रिड : हरित ग्रिड में सहायक साधन

उदारवादी विद्युत् व्यापार प्रणाली भारत के राष्ट्रीय हित में है. धीरे-धीरे भारत अब एक ऐसे बिजली ग्रिड की ओर कदम बढ़ा रहा है जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा का प्रभुत्व होगा जो ग्रिड को बनाये रखने में उपयोगी सिद्ध होगा.  नवीकरणीय ऊर्जा के प्रति भारत की जो प्रतिबद्धताएँ हैं , उसके कारण एक दशक के भीतर-भीतर भारत की आधी अधिष्ठापित बिजली नवीकरणीय ऊर्जा से ही आएगी. परन्तु इसके साथ यह चिंता भी जुड़ी हुई है कि जब सूर्य उतना प्रखर न होगा अथवा पानी कम बरसेगा तो ग्रिड को बनाए रखने में कठनाई होगी.

ऐसी दशा में पनबिजली – विशेषकर हिमालय की नदियों से उत्पन्न की गई पनबिजली – देश में अधिक हरित ग्रिड के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण साधन सिद्ध होगी. नेपाल और भूटान को इस बात की जानकारी बहुत पहले ही लग चुकी है कि उनकी समृद्धि उनके विशाल पनबिजली भंडारों के सतत उपयोग से जुड़ी हुई है.

ज्ञातव्य है कि प्रति व्यक्ति बिजली की खपत और मानव विकास सूचकांक दोनों में चोली-दामन का साथ है क्योंकि बिजली स्वास्थ्य सुविधा से लेकर शिक्षा और आजीविका के लिए परमावश्यक है.

लेखिका का नाम ऋचा किशोर है. यह एक अनुभवी लेखिका हैं. आपको ये अक्सर विज्ञान से सम्बंधित लेख उपलब्ध कराती हैं.

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3 Comments on “[Sansar Editorial] दक्षिण एशियाई एकीकृत बिजली ग्रिड हेतु नए दिशानिर्देश”

  1. Sir koshish kre ki THE HINDU ke Editorial and Environment portion ko v hindi me kre. Hm hindi medium walo ke liye please sir inta v kr de.

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