सित्तनवासल – एक जैन विरासत स्थल

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सित्तनवासल में अधिकांश कला पर्यटकों द्वारा क्षतिग्रस्त या नष्ट कर दी गई हैं. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने कुछ संरक्षण के उपाय किए हैं और उन तक सार्वजनिक पहुँच को ट्रैक करने के लिए डिजिटल जाँच भी शुरू की है।

यहाँ 7वीं शताब्दी के उत्कृष्ट भित्तिचित्रों के अवशेष हैं। भित्तिचित्रों को मंदिर के अंदर स्तंभों और छत के शीर्ष भागों पर संरक्षित किया गया है। उनमें से कई 9वीं शताब्दी के पांड्य काल के हैं और इनमें जानवरों, मछलियों, बत्तखों, तालाब से कमल इकट्ठा करने वाले लोग और नाचती हुई लड़कियों के उत्कृष्ट चित्र शामिल हैं। यहाँ 9वीं और 10वीं शताब्दी के शिलालेख भी विद्यमान हैं।

सित्तनवासल गुफा, तमिलनाडु

सित्तनवासल का इतिहास

सित्तनवासल गुफा का इतिहास पहली शताब्दी ईसा पूर्व से 10वीं शताब्दी ईस्वी तक का है। यहाँ जैन धर्म का विकास हुआ। आरम्भ में इस मंदिर-गुफा को पल्लव राजा महेंद्रवर्मन् प्रथम (580-630 ईस्वी) के समय का समझा गया था। एक अभिलेख से पता चलता है कि इस मंदिर-गुफा का पुनरुद्धार किसी पांड्य राजा, संभवतः मारण सेंडन (654-670 ई.) अथवा अरिकेसरी मारवर्मन्, (670-700 ई.) के द्वारा किया गया था.

  • तमिलनाडु के पुदुकोट्टई जिले में स्थित , सित्तनवासल गुफा मुख्य रूप से चट्टान में काटा गया एक जैन मंदिर है जिसे 7 वीं-9वीं शताब्दी ईस्वी में बनाया गया था।
  • सित्तनवासल गुफा 70 मीटर ऊंची चट्टान की सतह पर स्थित है।
  • सित्तनवासल नाम का उपयोग उस गाँव और पहाड़ी के लिए किया जाता है जिसमें अरिवार कोविल (अरिहत का मंदिर – जैन जिन्होंने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त की थी), ‘एझादिपट्टम’ (17 पॉलिश रॉक बेड के साथ एक गुफा), मेगालिथिक दफन स्थल और नवचुनई तरन (छोटी पहाड़ी झील) एक जलमग्न मंदिर के साथ अवस्थित हैं।
  • इतिहासकारों द्वारा सित्तनवासल को जिले के सबसे पुराने बसे हुए क्षेत्रों में से एक माना जाता है, और जैन प्रभाव का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। 
  • तमिलनाडु में सित्तनवासल गुफा में भारत के कुछ सबसे आकर्षक प्राचीन गुफा चित्र हैं।
  • गुफा की छत पर भव्य चित्र हैं जो अच्छी तरह से संरक्षित हैं। कलाकृति की गुणवत्ता और तकनीक भारत में अन्य गुफाओं में पाई जाने वाली बेहतरीन कलाकृतियों में से एक है। 
  • ऐसा माना जाता है कि यह तमिलनाडु का एकमात्र स्थान है जहाँ कोई पांड्य काल के चित्रों को देख सकता है 
  • सित्तनवासल की साइट और कला का उल्लेख पहली बार स्थानीय इतिहासकार एस राधाकृष्णन अय्यर ने अपनी 1916 की पुस्तक जनरल हिस्ट्री ऑफ पुदुकोट्टई स्टेट में किया था। 
  • 1920 में फ़्रांसीसी पुरातत्वविद् गेब्रियल जौव्यू-डुब्रेल के साथ-साथ मूर्तिकार टीए गोपीनाथ राव द्वारा किए गए शोध ने स्मारकों के महत्त्व पर और प्रकाश डाला।
  • गर्भगृह की छत और अरिवर कोविल के अर्ध मंडपम पर बनी कलाकृतियाँ चौथी से छठी शताब्दी के अजंता गुफा चित्रों का एक प्रारंभिक उदाहरण हैजिसमें फ्रेस्को-सेको तकनीक (चित्रकला की एक तकनीक है जिसे ताजा रूप से बिछाए गए या गीले चूने के प्लास्टर पर निष्पादित किया जाता है) का प्रयोग हुआ है.
  • बरामदे के स्तंभ (1900 के दशक में तत्कालीन दीवान अलेक्जेंडर टोटेनहम के कहने पर पुदुकोट्टई के महाराजा द्वारा जोड़े गए), कुडुमियानमलाई से लाए गए थे। 

पुदुकोट्टई जिले के 20 गुफा मंदिरों में से 19 हिंदू धर्म की शैव और वैष्णव धाराओं से संबंधित हैं. सित्तनवासल एकमात्र जैन मंदिर है।

तमिलनाडु में जैन धर्म का प्रसार पहली या तीसरी शताब्दी में शुरू हुआ था या नहीं, इस बारे में बहस चल रही है। फिर भी, सित्तनवासल जैन धर्म के इतिहास का अध्ययन करने के लिए एक महत्त्वपूर्ण स्थान बना हुआ है। 

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