[Sansar Editorial] चीन की बढ़ती ताकत और South Pacific Silk Road पर उसका दबदबा

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South Pacific Silk Road पर चीन का बढ़ता दबदबा

चीन साउथ पसिफ़िक सिल्क रोड (South Pacific Silk Road) में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के प्रभुत्व को चुनौती दे रहा है और यहाँ भारत रणनीतिक सहयोग से अपना प्रभुत्व बढ़ा सकता है. भारत चीन की सिल्क रोड (South Pacific Silk Road) महत्त्वाकांक्षाओं का सामना करने के लिए संघर्ष करने वाला अकेला देश नहीं है. वर्तमान में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड को भी यह समझ में आ रहा है कि चीन ने दक्षिण प्रशांत पर इन दोनों देशों के लम्बे समय से चले आ रहे प्रभुत्व को कमजोर कर दिया है.

यह एडिटोरियल सामान्य प्रश्न-पत्र II (अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध) से सम्बंधित है.

अगर भारत ने उपमहाद्वीपीय में अपनी प्राथमिकता को मंजूरी दे दी है, तो ऐसा ही दक्षिण प्रशांत (South Pacific) में कैनबरा और वेलिंगटन ने भी किया है. अब, तीनों अपने-अपने हिसाब से चीन के आर्थिक और राजनीतिक शक्ति के प्रदर्शन से निपटने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

south pacific silk roadसमान मनोदशा

देखा जाए तो इन तीनों देशों की मनोदशा काफी हद तक एक समान हैं. उदाहरण के लिए, एक ओर ग्वादर (पाकिस्तान) और हम्बनटोटा (श्रीलंका) में चीन के बंदरगाह निर्माण के रणनीतिक प्रभावों के विषय में दिल्ली चिंतित है. दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया चिंतित है कि चीन वानुअतु में एक सैन्य सुविधा के लिए दबाव डाल रहा है. ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्व में स्थित, वानुअतु की जनसंख्या केवल 2,50,000 लोगों की हैं, परन्तु इसके 80 द्वीप एक विशाल अनन्य आर्थिक क्षेत्र का निर्माण करते हैं.

बढ़ती समुद्री शक्ति के रूप में दक्षिण प्रशांत द्वीपसमूह (South Pacific Islands) ने चीन की बढ़ती दिलचस्पी मेडागास्कर, मॉरिशस, सेशेल्स, मालदीव और श्रीलंका सहित हिन्द महासागर द्वीपों में अपनी बढ़ती सामरिक रूचि से बहुत अलग नहीं है.

सभी बड़ी समुद्री शक्तियाँ अपने लिए एक बेहतर आधार की तलाश करती हैं. अफ्रीका के हॉर्न में जिबूती में चीन का सैन्य आधार बीजिंग के लिए पहला है, पर यह निश्चित रूप से आखिरी नहीं होगा.

ऐसा भी नहीं है कि चीन ने अपने इरादों को छुपा रखा था. सहस्राब्दी के अंत में चीन ने पशिम और दक्षिण-पश्चिम में अपनी परिधि विकसित करने पर एक बड़ी परियोजना का अनावरण किया था. चीन बड़े कनेक्टिविटी परियोजनाओं को बढ़ावा देने और फिर पड़ोसी देशों में सीमा पार करने पर जोर देता है. इसके तुरंत बाद चीन ने एक बोल्ड नौसैनिक रणनीति का अनावरण किया.

चीन की विस्तार नीति

चीन इस तथ्य के साथ सामने आया कि इसके आर्थिक और राजनैतिक हित अब इसकी सीमाओं तक ही सीमित नहीं हैं, इसलिए इसने भारत के तत्काल पड़ोसियों सहित दुनिया भर में समुद्री ढाँचे को विकसित करना आरम्भ कर दिया. इसने अपने वैश्विक रूप से फैले हुए हितों की सुरक्षा के लिए सैन्य और अन्य क्षमताओं को बनाना शुरू कर दिया.

2013 में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने One Belt One Road पहल के तहत सभी को एक साथ लाने का प्रयास किया. इस पहल के बाद कई प्रमुख परियोजनाएँ उपमहाद्वीप की ओर बढ़ने लगीं. इनमें तिब्बत रेलवे, कराकोरम राजमार्ग का आधुनिकीकरण और ग्वादर और हंबनटोटा जैसे रणनीतिक बंदरगाहों का निर्माण शामिल था.

चीन के सीमावर्ती उपमहाद्वीप से काफी दूर बीजिंग ने भारत-प्रशांत क्षेत्र में द्वीप राष्ट्रों में अपनी आर्थिक भागीदारी और सुरक्षा कूटनीति का विस्तार किया. हालाँकि, चीन द्वारा उठाया जा रहा कदम उसके हित के लिए बिल्कुल सही था और वह विश्व-स्तर पर उभरने के साथ उभरने वाली अनिवार्यताओं को कुशलता से संबोधित कर रहा था.

असल समस्या दिल्ली, कैनबरा और वेलिंगटन के साथ थी जो चीन को पूरी तरह से वैध आकांक्षाओं की सराहना करने और अपने सम्बंधित क्षेत्रों के रणनीतिक परिणामों का आकलन करने में बार-बार असक्षम साबित हो रहे थे. वे यह भी देखने में नाकाम रहे कि बीजिंग के पास “प्रभाव के विशेष क्षेत्रों” के लिए दिल्ली, कैनबरा और वेलिंगटन के दावों का सम्मान करने का कोई कारण नहीं था.

विरोध के स्वर

2017 में जहाँ एक ओर चीन की ओर से पहले OBOR फोरम में भाग लेने के लिए बहुत दबाव दिया जा रहा था, तो वहीं दूसरी ओर भारत अपने पड़ोस में बीजिंग की बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं की व्यापक आलोचना कर रहा था. और यह केवल पिछले कुछ महीनों में ही हुआ है कि ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सरकारों ने दक्षिण प्रशांत (South Pacific Silk Road) में चीन की सामरिक प्रेरणा से सार्वजनिक रूप से सवाल उठाना प्रारम्भ कर दिया है.

पिछले महीने वेलिंगटन में जारी एक रक्षा नीति समीक्षा ने रेखांकित किया कि दक्षिण प्रशांत में चीन की बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक प्रोफाइल क्षेत्रीय व्यवस्था को उजागर कर सकती है और न्यूज़ीलैण्ड की सुरक्षा को चुनौती दे सकती है. दक्षिण प्रांत में चीन की उधार नीतियों के परिणामों की ओर इशारा करते हुए ऑस्ट्रेलिया विदेश मंत्री जूली बिशप ने जून में जोर देकर कहा कि कैनबरा यह सुनिश्चित करेगा कि दक्षिण प्रशांत द्वीप अपनी संप्रभुता बरकरार कैसे रख सकता है, क्योंकि उनके पास स्थायी अर्थव्यवस्थाएँ हैं और वही किसी भी अस्थिर ऋण परिणाम में फँस नहीं सकते.

South Pacific Silk Road में बीजिंग के प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से ही ऑस्ट्रेलिया ने सोलोमन द्वीप और पापुआ न्यू गिनी के बीच समुद्र के अन्दर इन्टरनेट केबल बिछाने के चीन के Huawei की कोशिशों पर लगाम लगा दिया. चीन की डिजिटल सिल्क रोड (Silk Road) में बंधे के सम्भावित खतरों को पहचानते हुए कैनबरा ने कहा कि वह इस परियोजना की पूरी लागत अर्थात् 100 million डॉलर का खर्च कर इसे पूरा करेगा. इसके अतिरिक्त कैनबरा और वेलिंगटन अब द्वीप राष्ट्रों को अपनी आर्थिक सहायता बढ़ा रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड सितम्बर में नौरु में द्वीपों के नेताओं के साथ एक शिखर सम्मलेन में दक्षिण प्रशांत राष्ट्रों के साथ व्यापक सुरक्षा संधि पर हस्ताक्षर करने की तैयारी कर रहे हैं. कैनबरा और वेलिंगटन दक्षिण प्रशांत में अपनी राष्ट्रीय निगरानी क्षमताओं को भी अपग्रेड कर रहे हैं.

निष्कर्ष

लेकिन हम यह भी जानते हैं कि चीन आसानी से हार मानने वालों में से नहीं है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग नवम्बर, 2018 में एशिया-प्रशांत महासागरीय आर्थिक सहयोग (APEC) शिखर सम्मलेन के समय पापुआ न्यू गिनी में प्रशांत द्वीप राष्ट्रों के नेताओं के साथ एक दूसरे शिखर सम्मलेन की मेजबानी करने वाले हैं.

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चार साल पहले, नवम्बर 2014 में, शी और प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी फिजी में थे, जब दोनों ने द्वीपवासियों के साथ शिखर सम्मलेन आयोजित किया था. तब से, दक्षिण प्रशांत में चीन की सहनशीलता बहुत तेज हो गई है. लेकिन दक्षिण प्रशांत में भारतीय सामरिक वादे को महसूस किया जाना अभी शेष है.

जैसा कि हम जानते हैं कि भारत में संसाधन हमेशा सीमित रहेंगे, तो यह ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, इंडोनेशिया, जापान, न्यूजीलैंड और अमेरिका जैसी अपने साथी देशों के सहयोग से इस क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ा सकता है – जिनमें सभी दक्षिण प्रशांत में बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं.

Tags : South Pacific Silk Road in Hindi, How will India Deal with China in South Pacific Silk Road battle? One Belt, One Road (OBOR), Indian Express Article in Hindi

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