Sansar डेली करंट अफेयर्स, 28 April 2020

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Sansar Daily Current Affairs, 28 April 2020


GS Paper 1 Source : Indian Express

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UPSC Syllabus : Important Geophysical phenomena such as earthquakes, Tsunami, Volcanic activity, cyclone etc., geographical features and their location- changes in critical geographical features (including water-bodies and ice-caps) and in flora and fauna and the effects of such changes.

Topic : Ozone Hole

संदर्भ

वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि असामान्य वायुमंडलीय परिस्थितियों के कारण आर्कटिक के ऊपर ओजोन परत में सबसे बड़ा छिद्र बंद हो गया है.

वैज्ञानिकों का दावा था कि यह अब तक के इतिहास का सबसे बड़ा छेद है. यह 10 लाख वर्ग किलोमीटर (997793.28 kms) में फैला था.

ओजोन छिद्र में बंद क्यों हुआ?

कोविड-19 के कारण हुई तालाबंदी के कारण प्रदूषण में कमी आई है, परन्तु ओजोन छिद्र के बंद होने के पीछे यह कारण नहीं है. ऐसा ध्रुवीय भँवर (polar vortex) के कारण हुआ है.

ध्रुवीय भँवर (polar vortex) क्या है?

  • ध्रुवीय भँवर ध्रुवों के ऊपर बनने वाला निम्न-दबाव का एक चक्करदार शंकु होता है जो शरत काल में सबसे प्रबल रहता है. इसका कारण ध्रुवीय क्षेत्रों और अमेरिका और यूरोप जैसे मध्य-अक्षांशीय क्षेत्रों के बीच बढ़ा हुआ तापान्तर होता है.
  • ध्रुवीयभँवर समताप मंडल में चक्कर मारता है. विदित हो कि समताप मंडल वायुमंडल की वह परत है जो भूमि से 10-48 किमी. ऊपर होता है और जिसके नीचे क्षोभमंडल होता है जहाँ कि जलवायु से सम्बंधित घटनाएँ सर्वाधिक होती हैं.
  • जब यह भँवर सबसे अधिक शक्तिशाली होता है तो साधारणतः यह एक ऐसी दीवार बना देता है जो मध्य- अक्षांशीय क्षेत्रों को ठंडी आर्कटिक हवाओं से बचाती है.
  • परन्तु, कई बार ऐसे होता है कि ध्रुवीय भँवर (पोलर वर्टेक्स) छिन्न-भिन्न होकर कमजोर हो जाता है. ऐसा निचले वायुमंडल से ऊपर की ओर उठती हुई तरंग ऊर्जा के कारण होता है. ऐसा होने पर समताप मंडल तेजी से कुछ ही दिनों में गर्म हो जाता है.
  • इस गर्मी के कारण ध्रुवीय भँवर और भी कमजोर हो जाता है और यह ध्रुवों से तनिक दक्षिण की ओर खिसक जाता है. कभी-कभी तो यह भँवर कई छोटे-छोटे भँवरों में बँट जाता है. इन छोटे भँवरों को बहन भँवर (sister vortex)” कहते हैं.

ओजोन परत क्या होता है?

ओजोन गैस पूरे पृथ्वी के ऊपर एक परत के रूप में छाया रहता है और क्षतिकारक UV किरणों के विकिरण को धरातल पर रहने वाले प्राणियों तक पहुँचने से रोकता है. इस परत को ओजोन परत कहते हैं. यह परत मुख्य रूप से समताप मंडल में होती है. इस परत की मोटाई 10-50 किलोमीटर तक होती है. इसे जीवन सहायक इसलिए माना जाता है कि इसमें कम तरंग दैर्ध्य (wave length) का प्रकाश, जो कि 300 नैनोमीटर से कम हो, को अपने में अवशोषित करने की विलक्षण क्षमता है. जहाँ पर वातावरण में ओजोन उपस्थित नहीं होगी, वहाँ सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणें (UV rays) पृथ्वी पर पहुँचने लगेंगी. ये किरणें मनुष्य के साथ-साथ जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के लिए भी बहुत खतरनाक है. ध्रुवों के ऊपर इसकी परत की मोटाई 8 km है और विषुवत् रेखा (equator line) के ऊपर इसकी मोटाई 17 km है.

ओजोन छिद्र क्या होती है?

ओजोन छिद्र उस ओजोन परत के उस भाग को कहते हैं जहाँ वह परत झीनी पड़ गई है. यह छिद्र ध्रुवीय प्रदेशों के ऊपर स्थित है. अगर ओजोन की यह चादर और पतली हो गई तो धरती में गर्मी बढ़ेगी और पराबैंगनी किरण (ultraviolet rays/UV) समस्त प्राणियों और वनस्पतियों को मुश्किल में डाल देगी. ध्रुवों की बर्फ पिघल जाएगी, जिसके चलते समुद्र के पानी का स्तर ऊपर आएगा और फलतः तटवर्ती क्षेत्र बाढ़ की चपेट में आ जायेंगे. चर्म कैंसर के मामले ओजोन छिद्र के कारण बढ़ें हैं.

CFC क्या है?

क्लोरोफ्लूरो कार्बन (CFC) एक यौगिक गैस है जिसमें क्लोरीन, फ्लोरीन और कार्बन के तत्त्व होते हैं. हमारे एरोसोलों, वातानुकूलन पदार्थों (refrigerants) और प्लास्टिक फ़ोम (foams) में CFC होता है. जब यह CFC हवा में प्रवेश करता है तो यह उड़ते-उड़ते ओजोन परत तक पहुँच कर ओजोन कणों को नष्ट करने लगता है. CFC 50 से 100 वर्षों तक सक्रिय रहता है.

हमारे सामने चुनौती

CFC यौगिकों का घरेलू और औद्योगिकों क्षेत्रों में इतना ज्यादा प्रयोग हो रहा है कि उनकी जगह दूसरे रसायन को इस्तेमाल करना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है. अभी तक कोई विकल्प नहीं खोजा जा सका है. इन यौगिकों का प्रयोग वातानुकूलन उपकरणों में, पैकेजिंग उद्योग में, इलेक्ट्रॉनिक उद्योग में, बिजली पैदा करने में, आग को बुझाने के उपकरणों में होता है. CFC विकल्प खोजते समय हमें यह बात दिमाग में रखनी होगी कि जिस तरह CFC यौगिकों में आग नहीं लग सकती, कोई विष नहीं फैल सकता और किसी दूसरे रसायन से वे क्रिया भी नहीं करते – – ये खूबियाँ उसके वैकल्पिक यौगिकों में भी होनी चाहिएँ. इसके साथ ही वैकल्पिक यौगिकों में ओजोन में कमी लाने का दुर्गुण या तो बिल्कुल नहीं या न के बराबर होना चाहिए.

CFC का विकल्प

अनुसंधानों से पता चला है कि ओजोन की परत (ozone layer) नष्ट करने में दो बातें मुख्य रूप से असर डालती हैं-

  • यौगिक में मौजूद क्लोरिन का अनुपात
  • वायुमंडल में तरल यौगिक के सक्रिय बने रहने का समय

इस आधार पर जो मूल CFC खोजे गए थे उनका ओजोन विनाशक अंक एक (1) था और आग बुझाने वाले उपकरणों में विद्यमान CFC में 3 से 10 था. इस आधार पर ऐसे यौगिक खोजे जा रहे हैं जो वायुमंडल में बहुत तेजी से फैल जाएँ और ज्यादा देर तक टिके रहें.

ऐसे यौगिकों की खोज करते हुए वैज्ञानिक हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC) यौगिकों तक पहुँचे. ये टिकाऊ हैं और वायुमंडल की ऊपरी सतह तक पहुँचते-पहुँचते लगभग इनका विनाश हो जाता है. पर्यावरण की दृष्टि से यदि देखें तो CFC यौगिकों की अपेक्षा HFC यौगिक अधिक स्वीकार्य हैं इनका ओजोन विनाशक अंक शून्य से 0.05 तक है जो CFC की तुलना में बहुत कम है. लेकिन अभी नए HFC यौगिकों पर ज्यादा खोज नहीं हुई है. इस विषय में बहुत कम आँकड़े उपलब्ध हैं और इनकी सत्यता के बारे में शकाएँ उठाई गई हैं.

परन्तु जब तक हम सुरक्षित रसायनों और नई तकनीकों को पूरी तरह से विकसित न कर लें तब तक हमारा कर्तव्य है कि हम पृथ्वी के जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की सुरक्षा के लिए ऐसे रसायनों का प्रयोग कम करें जो ओजोन के सुरक्षा कवच को कमजोर बना रहे हैं.

इसी बात को ध्यान में रखते हुए CFC पर पूरे विश्व में प्रतिबंध लगाया जा चुका है.

यह जरुर पढ़ें >

पराबैंगनी किरण ओजोन परत को कैसे प्रभावित करती हैं?


GS Paper 2 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Statutory, regulatory and various quasi-judicial bodies.

Topic : Chief Vigilance Commissioner (CVC)

संदर्भ

हाल ही में राष्ट्रपति द्वारा संजय कोठारी को केन्द्रीय सतर्कता आयोग (Central Vigilance Commission – CVC) के रूप में शपथ दिलाई गई.

CVC क्या है?

  • यह सतर्कता से सम्बंधित देश की सर्वोच्च संस्था (vigilance institution) है.
  • यह अपनी रिपोर्ट भारत के राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है.
  • यह एक संवैधानिक संस्था नहीं है अपितु Santhanam committee की सिफारिशों के आधार पर एक कार्यकारी आदेश से इसका गठन 1964 में किया गया.
  • इस आयोग में एक केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त और दो सतर्कता आयुक्त होते हैं.
  • इनका चयन प्रधान मंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और लोकसभा के विपक्षी के नेता मिल कर करते हैं और उस पर राष्ट्रपति मुहर लगाते हैं.
  • यदि कोई विपक्ष का नेता नहीं है तो लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का नेता इस चयन में भाग लेता है.
  • इनका कार्यकाल 4 साल का अथवा आयुक्त के 65 वर्ष के हो जाने तक होता है.
  • दुर्व्यवहार और अयोग्यता साबित हो जाने पर राष्ट्रपति केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त और अन्य सतर्कता आयुक्त को हटा सकता है.

GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Welfare schemes for vulnerable sections of the population by the Centre and States and the performance of these schemes; mechanisms, laws, institutions and bodies constituted for the protection and betterment of these vulnerable sections.

Topic : Who are Chakmas and Hajongs?

संदर्भ

मानवाधिकार निकाय – अधिकार एवं जोखिम विश्लेषण समूह (Rights and Risks Analysis Group RRAG) ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि अरूणाचल प्रदेश के चकमा और हाजोंग समुदायों को सरकार के आर्थिक पैकेज में सम्मिलित किया जाए क्योंकि वे भुखमरी के शिकार हो रहे हैं.

मामला क्या है?

पिछले दिनों कोविड-19 महामारी के कारण उत्पन्न कठिन परिस्थिति से निटपने के लिए सरकार ने कमजोर तबकों के लिए आर्थिक पैकेज की घोषणा की थी जिसके अन्दर प्रत्येक लाभार्थी को प्रधानमंत्री गरीब अन्न योजना के अंतर्गत 5 किलो चावल और 1 किलो दाल दी जायेगी.

चकमा और हाजोंग शरणार्थी कौन हैं?

  • चकमा और हाजोंग शरणार्थी मूल रूप से पूर्वी पाकिस्तान के चटगांव हिल ट्रैक्ट्स (Chittagong Hill Tracts) के निवासी थे. पर कर्नाफुली (Karnaphuli) नदी पर बनाए गए कैपटाई बांध (Kaptai dam) के चलते जब वर्ष 1960 में उनका क्षेत्र जलमग्न हो गया तो उन्होंने अपने मूल स्थान को त्यागकर भारत में शरण लिया.
  • चकमा बौद्ध सम्प्रदाय के हैं, जबकि हाजोंग हिन्दू हैं.
  • इन दोनों जनजातियों ने बांग्लादेश में कथित तौर पर धार्मिक उत्पीड़न का सामना किया तथा असम की लुशाई पहाड़ी (जिसे अब मिज़ोरम कहा जाता है) के जरिये भारत में प्रवेश किया.
  • इसके बाद भारत सरकार द्वारा अधिकांश शरणार्थियों को उत्तर-पूर्व सीमान्त एजेंसी (जिसे अब अरुणाचल प्रदेश कहा जाता है) में निर्रामित राहत शिविरों में भेज दिया गया.
  • विदित हो कि वर्ष 1964-69 में इनकी संख्या मात्र 5,000 के करीब थी, जबकि वर्तमान में इनकी संख्या बढ़कर एक लाख हो चुकी है.

इन्हें शरणार्थी क्यों कहा जाता है?

  • भारत में रह रहे चकमा और हाजोंग शरणार्थी अधिकांश मिज़ोरम से हैं जोकि मिज़ो जनजातीय संघर्ष के कारण दक्षिणी त्रिपुरा के राहत शिविरों में रहते हैं.
  • उल्लेखनीय है कि त्रिपुरा में रह रहे इन भारतीय चकमा लोगों ने मिज़ोरम के चुनावों में भी मतदान किया था. इसके लिये चुनाव आयोग ने राहत शिविरों में ही मतदान केंद्र बनाए थे.
  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, केवल अरुणाचल प्रदेश में ही 47,471 चकमा लोग रह रहे हैं.
  • चकमा और हाजोंग जनजातियाँ मुख्यतः पूर्वोत्तर भारत, पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश और म्याँमार में पाई जाती हैं.

अरुणाचल प्रदेश को चकमाओं से क्या समस्या है?

  • वर्ष 1960 में जब चकमा शरणार्थियों को उत्तर-पूर्व सीमान्त एजेंसी (नेफा) के तिरप, लोहित और सुबनसिरी ज़िले की खाली भूमियों पर बने राहत शिविरों में भेजा गया तो वहाँ इसको लेकर बहुत विरोध हुआ.
  • मगर जब वर्ष 1972 में नेफा का नाम बदलकर अरुणाचल प्रदेश कर दिया गया और इसे केंद्र शासित प्रदेश तथा बाद में राज्य का दर्ज़ा दे दिया गया तो इस विरोध ने और अधिक विकराल रूप धारण कर लिया.
  • अरुणाचल प्रदेश के स्थानीय तथा क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने अपनी भूमि पर शरणार्थियों को बसाये जाने का पुरजोर विरोध किया था. उनका मानना था कि इससे राज्य की जनसांखिकीय में बड़ा परिवर्तन आएगा और उन्हें अपने पास उपलब्ध सीमित संसाधनों का भी बँटवारा करना पड़ेगा.

GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Bilateral, regional and global groupings and agreements involving India and/or affecting India’s interests.

Topic : Comprehensive Nuclear-Test-Ban Treaty (CTBT)

संदर्भ

पिछले दिनों अमेरिका के विदेश विभाग ने CTBT के सन्दर्भ में एक अनुपालन प्रतिवेदन प्रकाशित किया है जिसमें आशंका जताई गई है कि CTBT का उल्लंघन करके चीन और रूस परमाणु परीक्षण कर रहे हैं. प्रतिवेदन के इस दावे को रूस और चीन ने अस्वीकार कर दिया है.

CTBT क्या है?

CTBT एक ऐसी संधि है जो सभी प्रकार के आणविक विस्फोट को निषिद्ध करती है. इस संधि की रुपरेखा जेनेवा में हुए निरस्त्रीकरण सम्मलेन में तैयार की गई थी और इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अंगीकृत कर लिया था. 24 सितम्बर, 1996 से यह संधि हस्ताक्षर के लिए खुली हुई है.

संधि की अनुसूची 2 में वर्णित सभी 44 देशों के अनुमोदन के उपरान्त यह संधि लागू हो जायेगी. ये वे देश हैं जो संधि पर विचार और अंगीकरण के समय परमाणु सुविधाओं से लैस थे.

भारत, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया ने अभी तक इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं.

भारत और CTBT

भारत को आरम्भ से ही CTBT पर कुछ आपत्तियाँ हैं. भारत भी चाहता है कि यह विश्व आणविक अस्त्रों से मुक्त हो. पर उसका कहना है कि निरस्त्रीकरण एक अंतिम लक्ष्य है जिसका मार्ग परीक्षण पर प्रतिबंध से होकर जाता है.

भारत के अनुसार यह एक जटिल विषय है. भारत को संधि की धारा 14 के Entry-into-force (EIF) अनुच्छेद पर भी अप्पत्ति है क्योंकि किसी अंतर्राष्ट्रीय संधि में प्रतिभागिता को स्वेच्छा से रोके रखने के अधिकार का यह उल्लंघन है.

संधि की आवश्यकता

आणविक निरस्त्रीकरण और आणविक अप्रसार के लक्ष्य को पाने में CTBT की एक प्रमुख भूमिका है. इस संधि के बने हुए 20 वर्ष हो गये हैं पर अभी भी इसे लागू नहीं किया जा सका है. इसे लागू करने में विफलता के कारण इसे पूरे तौर से कार्यान्वित नहीं किया जा रहा है जिसका असर अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ रहा है.


GS Paper 3 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Infrastructure- energy.

Topic : Hydrogen Fuel

संदर्भ

सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली कंपनी NTPC ने हाइड्रोजन ईंधन सेल से चलने वाली इलेक्ट्रिक बसें और कार खरीदने के लिए वैश्विक स्तर पर रुचिपत्र मंगाया है. नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सहयोग से इस पहल को पायलट परियोजना के आधार पर दिल्ली और लेह में लागू किया जाएगा. कंपनी इसके लिए हाइड्रोजन के उत्पादन और भंडारण के साथ-साथ वितरण की भी व्यवस्था करेगी.

इसकी आवश्यकता क्यों?

हाइड्रोजन ईंधन से चलने वाले वाहनों को भारत में लाने का उद्देश्य यह है कि परिवहन व्यवस्था की कार्बन पर निर्भरता को दूर किया जा सके जिससे पर्यावरण को सुरक्षित बनाया जा सके. इसके लिए NTPC द्वारा कई तरह की तकनीकी पहलें की जा रही रही हैं.

हाइड्रोजन ईंधन ही क्यों?

  • हाइड्रोजन ईंधन का एक स्वच्छ स्रोत है क्योंकि इसके प्रयोग से सह-उत्पाद के रूप में मात्र पानी और ताप का ही सृजन होता है.
  • हाइड्रोजन कई स्रोतों से निकाला जा सकता है, जैसे – मीथेन, कोयला, पानी और यहाँ तक कि कचरा भी.
  • हाइड्रोजन से चलने वाले इलेक्ट्रिक वाहन को रिचार्ज करने में कम समय लगता है और ये अधिक दूर तक भी जाती हैं.
  • हाइड्रोजन गेसोलीन और जीवाश्म इंधनों से तिगुना सशक्त होता है.

इलेक्ट्रिक वाहन कैसे कार्बन उत्सर्जन को कम करते हैं?

  • पर्यावरण अनुकूल इन वाहनों में हाइड्रोजन ईंधन आधारित सेल होता है.
  • इसमें एक ईंधन सेल में से हाइड्रोजन को प्रवाहित किया जाता है.
  • सेल के भीतर हाइड्रोजन इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन में टूट जाता है. वहीं अलग हुए इलेक्ट्रॉन को एक सर्किट में भेजा जाता है, जो विद्युत धारा और ऊष्मा का उत्पादन करता है. यह ईंधन कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद करता है.

ग्राहक हाइड्रोजन ईंधन बैटरी वाली गाड़ियों से कतरा क्यों रहे हैं?

  • इन गाड़ियों में ईंधन भरने के लिए अनेक स्टेशन बनाने पड़ेंगे जिनमें भारी-भरकम खर्च भी होगा.
  • ऐसे स्टेशन लाभप्रद हों उसके लिए आवश्यक है कि बाजार में इस प्रकार की गाड़ियाँ काफी संख्या में दौड़ने लगेंगी.
  • ग्राहक डरते हैं कि इन गाड़ियों में विस्फोट हो सकता है.
  • ये गाड़ियाँ महंगी होती हैं. अतः इनका दाम गैसोलीन से चलने वाली गाड़ियों के बराबर में लाना तभी संभव होगा जब सरकार इनको भारी-भरकम सब्सिडी दे.

हाईड्रोजन उत्‍पादन

  • हाईड्रोजन धरती पर मात्र मिश्रित अवस्‍था में पाया जाता है और इसलिए इसका उत्‍पादन इसके यौगिकों के अपघटन प्रक्रिया से होता है. यह एक ऐसी विधि है जिसमें ऊर्जा की आवश्‍यकता होती है.
  • विश्‍व में 96% हाईड्रोजन का उत्‍पादन हाईड्रोकार्बन के प्रयोग से किया जा रहा है. लगभग 4% हाईड्रोजन का उत्‍पादन जल के विद्युत अपघटन के माध्यम से होता है.
  • तेल शोधक संयंत्र एवं उर्वरक संयंत्र दो बड़े क्षेत्र है जो भारत में हाईड्रोजन के उत्‍पादक तथा उपभोक्‍ता हैं. इसका उत्‍पादन क्‍लोरो अल्केलिक उद्योग में उप-उत्‍पाद के रूप में होता है.
  • हाईड्रोजन का उत्‍पादन तीन वर्गो से संबंधित है – तापीय विधि, विद्युत अपघटन विधि एवं प्रकाश अपघटन विधि है. 
  • कुछ तापीय विधियों में ऊर्जा संसाधनों की आवश्यकता होती है, जबकि अन्‍य में जल जैसे अभिकारकों से हाईड्रोजन के उत्‍पादन के लिए बंद रासायनिक अभिक्रियाओं के साथ मिश्रित रूप में उष्‍मा को प्रयोग में लाया जाता है. इस विधि को तापीय रासायनिक विधि कहा जाता है. परन्‍तु इस तकनीक का प्रयोग  विकास के प्रारंभिक अवस्‍था में होता है.
  • उष्‍मा मिथेन पुनचक्रण, कोयला गैसीकरण और बायो-मास गैसीकरण भी हाईड्रोजन उत्‍पादन की अन्‍य विधियाँ हैं.
  • कोयला और जैव ईंधन का लाभ यह है कि दोनों स्‍थानीय संसाधन के रूप में उपलब्‍ध रहते हैं तथा जैव ईंधन नवीकरणीय संसाधन भी है. विद्युत अपघटन विधि में विद्युत के प्रयोग से जल का विघटन हाईड्रोजन और ऑक्‍सीजन में होता है तथा यदि विद्युत संसाधन शुद्ध हों तो ग्रीन हाऊस गैसों के उत्‍सर्जन में भी कमी आती है.

हाईड्रोजन भंडारण

  • हाईड्रोजन के भंडारण की तकनीक बहुत ही जटिल और चुनौतीपूर्ण है.
  • गैसीय अवस्‍था में हाईड्रोजन के भंडारण करने की सबसे सामान्य पद्धति सिलेंडर में इसे उच्‍च दबाव पर रखना है. हालांकि यह सबसे हल्‍का तत्‍व है जिसे उच्‍च दाब की आवश्‍यकता होती है. इसे द्रव अवस्‍था में क्रायोजिनिक प्रणाली में रखा जाता है, परन्तु इसमें अधिक ऊर्जा की जरूरत होती है.
  • इसे धात्विक हाईड्राइड, द्रव कार्बनिक हाईड्राइड, कार्बन सूक्ष्‍म संरचना तथा रासायनिक रूप में इसे ठोस अवस्‍था में भी रखा जा सकता है. इस क्षेत्र में नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय अनुसंधान एवं विकास संबंधी परियोजनाओं में सहयोग कर रहा है.

यह जरुर पढ़ें > HYDROGEN – CNG क्या है? HCNG के लाभ एवं चुनौतियाँ


Prelims Vishesh

Matterhorn :-

  • पिछले दिनों स्विट्ज़रलैंड के मैटरहॉर्न पर्वत पर 1,000 मीटर से बड़े भारतीय तिरंगे को प्रोजेक्ट कर के कोविड-19 के विरुद्ध भारत की लड़ाई के प्रति एकजुटता दिखाई गई.
  • ज्ञातव्य है कि 4,478 मीटर (14,692 फुट) ऊँचा मैटरहॉर्न शिखर आल्प्स और यूरोप के सर्वोच्च शिखरों में से एक है.
  • इसे पर्वतों का पर्वत (Mountain of Mountains) भी कहा जाता है.

Daporijo Bridge :

  • मात्र 27 दिनों में सीमा सड़क संगठन (BRO) ने अरुणाचल प्रदेश की नदी सुबंसिरी के ऊपर दापोरिजो नामक पुल खड़ा कर दिया है.
  • यह पुल भारत और चीन के बीच स्थित वास्तविक नियंत्रण रेखा तक जाने वाली सड़क को जोड़ता है.
  • विदित हो कि सुबंसिरी नदी ब्रह्मपुत्र की सबसे बड़ी सहायक नदी है.

Earth Day :-

  • पृथ्वी दिवस एक वार्षिक आयोजन है, जिसे 22 अप्रैल को दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्थन प्रदर्शित करने के लिए आयोजित किया जाता है.
  • इसकी स्थापना अमेरिकी सेनेटर गेलॉर्ड नेल्सन ने 1970 में पर्यावरण शिक्षा के लिए की थी.
  • इस वर्ष की थीम है – “जलवायु विषयक कार्रवाई” / climate action.

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