Sansar डेली करंट अफेयर्स, 27 June 2020

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Sansar Daily Current Affairs, 27 June 2020


GS Paper 2 Source : PIB

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Topic : Nasha Mukt Bharat: Annual Action Plan (2020-21) for 272 Most Affected Districts E-Launched on International Day against Drug Abuse & Illicit Trafficking

संदर्भ 

  • सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने “नशा मुक्त भारत: वार्षिक कार्य योजना (2020-21)” का अनावरण किया है. एक्शन प्लान 272 सबसे प्रभावित जिलों के लिए प्रारम्भ किया गया है. सामाजिक न्याय राज्य मंत्री के द्वारा नशीली दवाओं के दुरुपयोग की रोकथाम के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना के लिए लोगो और टैगलाइन भी जारी की गई है और नशीली दवाओं के दुरुपयोग के लिए जागरूकता वीडियो जारी किए.
  • सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय नशीले पदार्थों की माँग में कमी लाने के लिए एक नोडल मंत्रालय  के रूप में कार्यशील है. यह नशीले पदार्थों के दुरुपयोग को रोकने से जुड़े सभी पहलुओं का समन्वय और निगरानी करता है जिसके अंतर्गत समस्या की सीमा का आकलन, निवारक कदम, नशे से प्रभावित लोगों के उपचार और पुनर्वास, सूचना एवं जन जागरूकता का प्रसार आदि कार्य सम्मिलित हैं.
  • विदित हो कि प्रतिवर्ष 26 जून को सम्पूर्ण विश्व में “अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थ सेवन और तस्करी निरोध दिवस” के रूप में मनाया जाता है.
  • इस वर्ष 2020 के इस दिवस की थीम  है –  बेहतर देखभाल के लिए बेहतर जानकारी/ “Better Knowledge for Better Care”.

नशा मुक्त भारत : वार्षिक कार्य योजना (2020-21)

  • नशा मुक्त भारत वार्षिक कार्य योजना, 2020-21 में सर्वाधिक प्रभावित 272 जिलों पर ध्यान केन्द्रित किया गया है.
  • नशा मुक्ति हेतु नारकोटिक्स ब्यूरो, सामाजिक न्याय द्वारा जागरूकता और स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से उपचार के संयुक्त प्रयासों से इसके निदान हेतु प्रयास आरम्भ किया गया है.

कार्य योजना का स्वरूप

  1. जागरूकता फैलाने से जुड़े कार्यक्रम;
  2. उच्च शैक्षणिक संस्थानों, विश्वविद्यालय परिसरों और विद्यालयों पर बल देना;
  3. अस्पतालों में उपचार सुविधाओं पर बल देना
  4. सेवा प्रदाता के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम.
  • इसका प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के क्रम में एनएपीडीडीआर के अंतर्गत कार्यक्रमों के लिए निगरानी प्रक्रिया में राज्य सरकारों को भी शामिल किया गया है.
  • नेशनल सर्वे ऑन एक्स्टेंट एंड पैटर्न ऑफ सब्सटैंस यूज इन इंडिया के निष्कर्षों और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के दृष्टिकोण से आपूर्ति की दृष्टि से संवेदनशील जिलों की सूची तैयार की गई है

नशा मुक्ति के लिए किये गये अन्य पहल 

  • मंत्रालय ने 2018-2025 की अवधि के लिए नशीले पदार्थों में कमी लाने के लिए एक राष्ट्रीय कार्य योजना भी तैयार की है, जिसका उद्देश्य प्रभावित लोगों और उनके परिवारों को शिक्षा, नशा मुक्ति और पुनर्वास की एक बहु-स्तरीय रणनीति के माध्यम से नशाखोरी के नकारात्मक प्रभावों में कमी लाना है.
  • मंत्रालय स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से नशे के लत वालों की पहचान, उपचार और पुनर्वास के लिए समुदाय आधारित सेवाएँ उपलब्ध कराता है.
  • मंत्रालय नशा मुक्ति केन्द्र चलाने के लिए देश भर के गैर-सरकारी संगठनों  को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराता है.
  • मंत्रालय ने नशीले पदार्थों के पीड़ितों, उनके परिवारों और व्यापक स्तर पर समाज की सहाचता के लिए 24×7 राष्ट्रीय टोल फ्री नशा मुक्ति हैल्पलाइन नंबर 1800110031 भी स्थापित किया है.

मेरी राय – मेंस के लिए

 

जब तक आपूर्ति शृंखला नहीं टूटेगी तब तक नशे पर पूर्ण रूप से लगाम लगाना कठिन है, भले एनडीपीएस एक्ट को कितना ही कड़ा क्यों न कर दिया जाए. डोप टेस्ट के अभियान पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बजाय सरकार को ड्रग्स डी-एडिक्शन सेंटर और री-हे‌ब‌िलिटेशन सेंटर पर खर्च करना चाहिए. निजी संस्थानों में इलाज पर प्रतिदिन 1,500 से 3,500 रुपये का खर्च गरीब के बूते से बाहर है. जबकि सरकारी सेंटरों में मुफ्त इलाज का लाभ बढ़ते मरीजों के कारण सभी को नहीं मिल पा रहा है. इलाज के लिए न तो अनुकूल अवसंरचना उपलब्ध है और न ही डॉक्टर. बढ़ रहे मरीजों की तुलना में डॉक्टर और दवाओं की कमी है. भारत में 30 लाख से अधिक लोग किसी न किसी नशे की चपेट में हैं और  सभी के इलाज के लिए पर्याप्त अवसंरचना का अभाव है. नशे की चपेट में 16 से 40 की आयु वर्ग के लोग अधिक हैं.

एक सर्वेक्षण के अनुसार, हरियाणा के सिरसा और अंबाला, राजस्थान के श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़, जम्मू-कश्मीर के जम्मू और कठुआ में अमीर वर्ग अफीम और हेरोइन जैसे महंगे नशे के दलदल में फंसा है जबकि गरीब वर्ग सिंथेटिक केमिकल नशे की गिरफ्त में है. नशे की लत पूरी करने के लिए पिछड़े वर्ग के लोग ही सिंथेटिक केमिकल नशे के कारोबार में लिप्त हैं. ड्रग्स डी-एडिक्शन सेंटर में जाकर पता लगाया जाना चाहिए कि नशे की लत कैसे शुरू हुई और आज हालात क्या हैं? नशे की लत में पड़ने वालों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि क्या रही है? इसके सामाजिक-आर्थिक असर क्या हैं? ड्रग्स री-हे‌बिलिटेशन सेंटरों में स्किल डेवलपमेंट जैसी पहल नहीं हुई, जिससे उनके लिए रोजगार का मार्ग खुल सके.


GS Paper 2 Source : The Hindu

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Topic : ASEAN’s 36th Summit

संदर्भ

हाल ही में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आसियान के 36वें शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया. इस वर्ष 2020 के सम्मेलन की मेजबानी वियातनाम कर रहा है जिसके कारण वियतनामी प्रधानमंत्री गुयेन जुआन फुच इस सम्मलेन के अध्यक्ष हैं.

आसियान के 36वें शिखर सम्मेलन से सम्बंधित मुख्य बिंदु

  • इस शिखर सम्मलेन का मुख्य जोर कोविड-19 की चुनौतियों का सामना कैसे किया जाए पर रहा क्योंकि इसके गंभीर दुष्प्रभाव के कारण सिंगापुर, इंडोनेशिया, थाईलैंड और मलेशिया समेत आसियान की अग्रणी अर्थव्यवस्थाएं गंभीर आर्थिक मंदी का सामना कर रही हैं.
  • वियतनाम द्वारा शिखर वार्ता के पश्चात् आसियान राष्ट्रों की ओर से प्रारूप विज्ञप्ति में कहा गया कि, “हम क्षेत्र में और विश्व पर कोरोना वायरस वैश्विक महामारी के कारण आई अभूतपूर्व चुनौतियों एवं इसकी कीमत को पहचानते हैं. हम मानवीय और सामाजिक आर्थिक स्थिति पर कोविड-19 के कारण उत्पन्न चुनौतियों एवं कीमतों को समझते हैं और उन लक्षित नीतियों को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं जो यह विश्वास जगाए कि आसियान इस नाजुक संघर्ष से अग्रिम मोर्चे पर लोहा लेने के लिए तैयार है.”
  • इस सम्मलेन में उच्च प्रथामिकता के अंतर्गत आसियान कोविड-19 प्रतिक्रिया कोष स्थापित किया जाएगा जिसका प्रयोग चिकित्सीय आपूर्ति एवं सुरक्षात्मक उपकरणों की खरीद में सदस्य राष्ट्रों की मदद करना है.
  • इस सम्मलेन में आसियान देशों के द्वारा चीन की क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा के विरुद्ध एकजुटता भी प्रदर्शित किया किया गया.

आसियान क्या है?

  • ASEAN का full-form है – Association of Southeast Asian Nations.
  • ASEAN का headquarters जकार्ता, Indonesia में है.
  • इसकी स्थापनाअगस्त, 1967 को थाइलैंड की राजधानी बैंकॉक में हुई थी.
  • इसका Motto है – “One Vision, One Identity, One Community” अर्थात् एक सोच, एक पहचान, एक समुदाय.
  • आसियान में10 सदस्य देश (ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाइलैंड और वियतनाम) हैं और 2 पर्यवेक्षक देश हैं (Papua New Guinea और East Timor).
  • ASEAN देशों की साझी आबादी 64 करोड़ से अधिक है जो कि यूरोपियन यूनियन से भी ज्यादा है.
  • अगर ASEAN को एक देश मान लें तो यह दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है.
  • इसकी GDP 28 हजार करोड़ डॉलर से अधिक है.
  • सदस्य देशों के अंग्रेजी नामों के वर्णानुक्रम के आधार पर, आसियान की अध्यक्षता प्रतिवर्ष परिवर्तित होती है.
  • आसियान में महासचिव का पद सबसे बड़ा है.पारित प्रस्तावों को लागू करने का काम महासचिव ही करता है. इसका कार्यकाल 5 साल का होता है.
  • क्षेत्रीय सम्बन्ध को मजबूत बनाने के लिए 1997 में ASEAN +3 का गठन किया गया था जिसमें जापान, दक्षिण कोरिया और चीन को शामिल किया गया.
  • बाद में भारत, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैण्ड को भी इसमें शामिल किया गया. फिर इसका नाम बदलकर ASEAN +6 कर दिया गया.
  • 2006 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने आसियान को पर्यवेक्षक का दर्जा दिया.
  • आसियान की बढ़ती महत्ता को देखते हुए अब कई देश इसके साथ करार करना चाहते हैं.

आसियान के चार्टर के अनुसार, इसके शिखर सम्मेलन को संबल प्रदान करने के लिए चार महत्त्वपूर्ण मंत्रिस्तरीय निकाय होते हैं –

  • आसियान राजनीतिक-सुरक्षा समुदाय परिषद् (ASEAN Political-Security Community Council)
  • आसियान आर्थिक समुदाय परिषद् (ASEAN Economic Community Council)
  • आसियान सामाजिक-सांस्कृतिक समुदाय परिषद् (ASEAN Socio-Cultural Community Council)
  • आसियान समन्वय परिषद् (ASEAN Coordinating Council – ACC)

भारत-आसियान संबंधों का इतिहास एवं क्रमिक विकास

भारत ने वर्ष 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की नीति का पालन किया एवं वह दक्षिण-पूर्व एशिया सहित अपने क्षेत्र में उपनिवेशवाद की समाप्ति का चैंपियन बन गया. परन्तु, 1970 के दशक के दौरान सोवियत संघ के प्रति भारत का झुकाव अनुभव किया गया जिसके चलते दक्षिण-पूर्व एशिया भारत से दूर होता गया क्योंकि सोवियत संघ एवं दक्षिण-पूर्व एशिया दोनों भिन्‍न -भिन्‍न प्रकार की आर्थिक एवं राजनीतिक विचारधाराओं का पालन कर रहे थे.

  • भारत ने अपनी नीतियों में शीत युद्ध युग से बड़ा बदलाव करते हुए, 1991 में आर्थिक उदारीकरण के ठीक बाद ही, चीन जैसे पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ आर्थिक और वाणिज्यिक संबंधों को बढ़ाने के लिएलुक ईस्ट नीति (LEP) को अपनाया. पिछले वर्षों में इस नीति द्वारा इस क्षेत्र में रणनीतिक और सुरक्षा पहलुओं पर घनिष्ठ संबंधों के निर्माण पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है.
  • आसियान-भारत मुक्त व्यापार समझौता(AIFTA), आसियान के साथ भारत की संलग्नता के प्रमुख परिणामों में से एक रहा है. इसे गहन आर्थिक एकीकरण की ओर आवश्यक चरण के रूप में देखा गया था. इसके प्रारंभिक ढांचे पर बाली, इंडोनेशिया में 8 अक्टूबर 2003 को हस्ताक्षर किए गए थे एवं 1 जनवरी 2010 से प्रवर्तित होने वाले अंतिम समझौते पर 13 अगस्त 2009 को हस्ताक्षर किए गए थे. मुक्त व्यापार समझौते (FTA) ने भारत और आसियान देशों के बीच व्यापार शुल्क बाधाओं को कम कर दिया एवं सेवाओं के व्यापार एवं निवेश को सुगम बनाने के लिए विशेष प्रावधानों को सम्मिलित किया.
  • भारत को आसियान क्षेत्रीय मंच में अपनी सदस्यता के वाद1995 में पूर्ण आसियान वार्ता साझेदार की प्रस्थिति प्रदान की गयी थी. भारत-आमियान संबंधों ने शीघ्र ही राजनीतिक और साथ ही सुरक्षा क्षेत्रों में अपना सहयोग विस्तारित किया. भारत 2005 में पूर्व एशिया शिखर सम्मेलन (ईस्ट एशिया समिट: EAS) में भी सम्मिलित हो गया.
  • आसियान 2012 से भारत का रणनीतिक साझेदार रहा है. भारत और आसियान के बीच 30 वार्ता तंत्र हैं जो नियमित रूप से बैठक करते हैं.
  • नवम्बर 2014 में म्यांमार में आयोजित 12वें आसियान-भारत शिखर सम्मेलन एवं 9वें पूर्व एशिया शिखर सम्मेलन में ‘Act East Policy’ (AEP) की स्थापना के बाद आसियान एवं वृहत्तर एशिया-प्रशांत क्षेत्र के साथ भारत की संलग्नता ने और अधिक गति प्राप्त कर ली है.
  • AEP के अंतर्गत भारत से न केवल क्षेत्र के साथ अपनी आर्थिक संलग्नता को सुदृढ़ करने की अपेक्षा है बल्कि यह संभावित सुरक्षा सम्तुलनकर्ता के रूप में उभरने के लिए भी उत्सुक है.

भारत के लिए आसियान का महत्त्व

आर्थिक रूप से:

भारत, आसियान का एक रणनीतिक साझेदार है. 1.8 बिलियन की कुल जनसंख्या एवं 3.8 ट्रिलियन डॉलर के संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के साथ आसियान और भारत दोनों मिलकर विश्व का एक महत्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्र निर्मित करते हैं.

भूराजनैतिक रूप से:

  • भारत, भूराजनैतिक रूप से एवं साथ ही साथ आसियान एवं अन्य क्षेत्रीय देशों के साथ अपनी नवीन मित्रता से लाभान्वित होने की अपेक्षा करता है.
  • भारत ने क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने की अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का प्रयास किया है. दक्षिण चीन सागर में नौसंचालन की स्वतंत्रता बनाए रखने के महत्व का उल्लेख कर भारत ने चीन को एक दृढ़ संकेत दिया है.

समुद्री (maritime) महत्व:

  • समुद्र के माध्यम से होने वाले अपने व्यापार को निर्वाध जारी रखने के लिए दक्षिण चीन सागर में नौसंचालन की स्वतंत्रता भारत के लिए आवश्यक है.
  • समुद्री मार्ग “विश्व व्यापार की जीवन रेखायें” हैं. भारत नौसंचालन की स्वतंत्रता का समर्थन करता है, जोसमुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCLOS) पर आधारित हो.
  • नौसंचालन की स्वतंत्रता, नशीले पदार्थों की तस्करी एवं साइबर अपराध इत्यादि के क्षेत्र में सहयोग को विस्तार देने के लिए आसियान महत्वपूर्ण है.

सुरक्षा से जुड़े पहुलू:

भारत और आसियान विविध क्षेत्रों जैसे आतंकवाद, मानव और नशीले पदार्थों की तस्करी, साइबर अपराध एवं मलक्का जलडमरूमध्य में समुद्री डकैती इत्यादि जैसे गैर-पारंपरिक सुरक्षा खतरे पर संयुक्त रूप से काम कर रहे हैं.

कनेक्टिविटी से जुड़े पहलू:

  • भारत कनेक्टिविटी, भारत के लिए रणनीतिक प्राथमिकता का विषय है. यही स्थिति आसियान देशों के लिए भी है.
  • भारत ने भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग और कालादान मल्टी मोडल परियोजना को लागू करने में काफी प्रगति की है. दूसरी तरफ, भारत और ASEAN के बीच समुद्री व हवाई संपर्क बढ़ाने तथा संपर्क गश्तियारों को आर्थिक गलियारों में बदलने से संबंधित मुद्दों पर बातचीत चल रही है.
  • असीमित आर्थिक अवसर प्रदान करने वाले क्षेत्र के प्रवेश द्वार पर स्थित भारत के अत्यधिक अविकमित पूर्वोत्तर राज्य, आर्थिक बदलाव के साक्षी बनेंगे.

ऊर्जा सुरक्षा:

  • विशेष रूप से म्यांमार, वियतनाम और मलेशिया जैसे आसियान देश भारत की ऊर्जा सुरक्षा में संभावित रूप से योगदान कर सकते हैं.
  • दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में तेल और प्राकृतिक गैस के भंडार विद्यमान हैं.

GS Paper 3 Source : Times of India

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Topic : Indian Navy inducts indigenously developed anti-torpedo decoy system Maareech

संदर्भ

हाल ही में उन्नत टॉर्पीडो डिकोय सिस्टम ‘मारीच’ को नौसैनिक बेड़े में सम्मिलित कर लिया गया है. मारीच उन्नत टॉर्पीडो प्रणाली किसी भी टॉर्पीडो हमले को विफल करने में नौसेना की सहायता करेगा.

मारीच के विषय में जानकारी

  • इस एंटी टॉर्पीडो डिकोय सिस्टम मारीच का डिज़ाइन और विकास स्वदेशी डीआरडीओ प्रयोगशालाओं (एनएसटीएल और एनपीओएल) में किया गया है.
  • टॉर्पीडो का पता लगाने और टॉर्पीडो हमले को असफल बनाने के लिए यह एक अत्याधुनिक स्वदेशी प्रणाली है.
  • टॉर्पीडो हमले के विरुद्ध यह प्रणाली किसी भी नौसेना की रक्षा उपायों को लागू करने में सहयोग प्रदान करने में सक्षम होगा.
  • इस प्रणाली का प्रयोग करके आने वाले टॉर्पीडो का पता लगाया जा सकता है, रास्ते से हटाया जा सकता, भ्रमित किया जा सकता है और उन्हें नष्ट भी किया जा सकता है.
  • दुश्मन की स्थिति का पता चलते ही मारीच को लॉन्च कर दिया जाता है जिसके बाद यह लगातार अपनी स्थिति बदलते हुए रॉकेट लॉन्च करता रहता है.
  • मारीच उन्नत टॉर्पीडो प्रणाली में कुल 10 रॉकेट लॉन्चर हैं. जहाँ मारीच से निकलने वाली किरणें दुश्मन को दिग्भ्रमित करती हैं और वहीं दूसरी तरफ सबमरीन अपनी लोकेशन बदलकर दुश्मन की सबमरीन को टारगेट कर लेती है.
  • सार्वजनिक क्षेत्र का रक्षा उपक्रम भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड इस डिकॉय सिस्टम के उत्पादन का कार्य करेगा.

लाभ

  • यह प्रणाली रक्षा क्षेत्र की निर्भरता के साथ मेक इन इंडिया तथा आत्मनिर्भर भारत को दृढ़ता प्रदान करेगा.
  • इस प्रणाली के विकास से भारत विश्व के उन देशों की श्रेणी में सम्मिलित हो गया है जिनके पास नौसेना प्लेटफार्म और हथियार प्रणालियों के व्यापक हाइड्रोडायनामिक मॉडल परीक्षण का कार्य करने की क्षमता है.

भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड

  • यह रक्षा क्षेत्र की सार्वजानिक नवरत्न कंपनी है.
  • इसकी स्थापना 1954 में की गई थी.
  • भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड मुख्य रूप से रक्षा संचार, रडार एंड मिसाइल प्रणाली, सोनार एवं फायर कंट्रोल प्रणाली पर काम करती है.

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO)

  • रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन भारत की रक्षा से जुड़े अनुसंधान कार्यों के लिये देश की अग्रणी संस्था है. यह संगठन भारतीय रक्षा मंत्रालय की एक आनुषांगिक ईकाई के रूप में काम करता है.
  • इस संस्थान की स्थापना 1958 में भारतीय थल सेना एवं रक्षा विज्ञान संस्थान के तकनीकी विभाग के रूप में की गयी थी.
  • वर्तमान में संस्थान की अपनी अनेक प्रयोगशालाएँ हैं जो इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण इत्यादि के क्षेत्र में अनुसंधान में कार्यरत हैं.
  • पाँच हजार से अधिक वैज्ञानिक और पच्चीस हजार से भी अधिक तकनीकी कर्मचारी इस संस्था के संसाधन हैं. यहां राडार, प्रक्षेपास्त्र इत्यादि से संबंधित कई बड़ी परियोजनाएँ चल रही हैं.

GS Paper 3 Source : PIB

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Topic : Urban, multi-State cooperative banks to come under RBI supervision

संदर्भ

केंद्र सरकार ने, जमाकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी शहरी तथा बहु-राज्य सहकारी बैंकों को भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की प्रत्यक्ष देखरेख में लाने का निर्णय किया है. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस आशय के अध्यादेश को स्वीकृति दे दी है.

इन बैंकों को पहले कैसे विनियमित किया जाता था?

आज के समय में, ये बैंक RBI तथा सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार के दोहरे विनियमन के अंतर्गत आते हैं.

  • सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार, इन बैंकों के निगमन, पंजीकरण, प्रबंधन, लेखा परीक्षा, बोर्ड का निवर्तन और विघटन के लिए उत्तरदायी होते हैं.
  • RBI इन बैंकों के विनियामक की भूमिका निभाती है, तथा आरक्षित नकदी और पूंजी पर्याप्तता, जैसे नियमों के कार्यान्वयन के लिए उत्तरदायी होती है.

सहकारी बैंक, राज्य सहकारी समिति अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत होते हैं. वे भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के दो कानूनों, बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949, और बैंकिंग कानून (सहकारी समितियाँ) अधिनियम, 1955 के तहत विनियामक दायरे में आते हैं.

इसकी आवश्यकता क्या थी?

सरकार द्वारा यह निर्णय, धोखाधड़ी और गंभीर वित्तीय अनियमितताओं की कई घटनाओं के घटित होने के बाद लिया गया है, जिसमें पिछले वर्ष, पंजाब और महाराष्ट्र सहकारी (Punjab and Maharashtra Co-operative- PMC) बैंक में हुए बड़े घोटाले सम्मिलित हैं.

सितंबर में, RBI को PMC बैंक के बोर्ड को विघटित करने और कड़े प्रतिबंध लगाने के लिए कहा गया था.

निहितार्थ

इस निर्णय के द्वारा, भारतीय रिज़र्व बैंक को, सभी शहरी और बहु-राज्य सहकारी बैंकों को, वाणिज्यिक बैंकों की तर्ज पर विनियमित करने का अधिकार प्रदान किया गया है.

सरकार की यह पहल, जमाकर्ताओं को अधिक सुरक्षा प्रदान करेगा.

  • वर्तमान में, देश में 1,482 शहरी सहकारी बैंक और 58 बहु-राज्य सहकारी बैंक विद्यमान हैं.
  • इन बैंकों में 86 मिलियन से ज्यादा जमाकर्ताओं की लगभग 4.84 ट्रिलियन राशि जमा है.

प्रीलिम्स बूस्टर

 

वैधानिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio-SLR) : यह भारत में कार्य करने वाले सभी अनुसूचित बैंकों ( देशी तथा विदेशी) की सकल जमाओं का वह अनुपात है जिसे बैंकों को अपने पास रखना होता है. यह नकद तथा गैर नकद-स्वर्ण या सरकारी प्रतिभूति किसी भी रूप में हो सकता है. साल 2007 में इसकी 25% की न्यूनतम सीमा को खत्म कर दिया गया था. अब यह 25 प्रतिशत के नीचे भी रखा जा सकता है. SLR से बैंकों के कर्ज देने की क्षमता नियंत्रित होती है. यदि कोई बैंक कठिन परिस्थिति में फँस जाता है तो रिजर्व बैंक SLR की मदद से ग्राहकों के पैसे की कुछ हद तक भरपाई कर सकता है.


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