Sansar डेली करंट अफेयर्स, 26 May 2020

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Contents

Sansar Daily Current Affairs, 26 May 2020


GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : India and its neighbourhood- relations.

Topic : China’s BRI

संदर्भ

चीन ने रविवार को स्वीकार किया कि कोरोना वायरस महामारी की वजह से उसके बहु-अरब डॉलर के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (Belt and Road Initiative – BRI) प्रभावित हुआ है. परन्तु चीन का मानना है कि यह प्रभाव अस्थायी और सीमित है. चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि कुल मिलाकर दीर्घकालिक दृष्टिकोण से कोरोना वायरस बीआरआई सहयोग और नई संभावनाओं को खोलने और मजबूत बनाने का काम करेंगे.

बेल्ट एंड रोड परियोजना क्या है?

  • बेल्ट एंड रोड परियोजना की घोषणा चीन द्वारा 2013 में हुई थी. BRI पहल एक ऐसी पहल है जिसमें स्थल और समुद्र दोनों में सिल्क रोड की पट्टियाँ होंगी. इसका उद्देश्य पूर्वी एशिया के आर्थिक क्षेत्र को यूरोप के आर्थिक क्षेत्र से जोड़ना बताया जाता है अर्थात् इसका ध्येय दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य एशिया, खाड़ी क्षेत्र, अफ्रीका और यूरोप को भूमि और समुद्री मार्गों के नेटवर्क से जोड़ना है.
  • इस प्रकार इस परियोजना के अन्दर एशिया, यूरोप और अफ्रीका तीन महाद्वीप आते हैं. यदि यह परियोजना लागू होती है तो इसके अन्दर सकल वैश्विक जनसंख्या का 65% और विश्व की GDP का 60% आ जायेगा. साथ ही इसमें अभिकल्पित 6 आर्थिक गलियारों में 70 देश समाहित हो जाएँगे.
  • चीन देश यूरोप, पश्चिम एशिया, पूर्व अफ्रीका एवं स्वयं चीन को स्थलीय और सामुद्रिक व्यापार सम्पर्कों को फिर से जीवित करने और नये ढंग से रचने के लिए लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर खर्च कर रहा है. इसके अंदर ऐसे आधुनिक बंदरगाह बनाए जा रहे हैं जो तीव्र गति वाली सड़कों और रेल गलियारों से जुड़ जाएँगे.

भारत की चिंता

  • गलियारा का हिस्सा PoK से होकर गुजरेगा जिसे भारत अपना अभिन्न अंग मानता है. भारत का कहना है कि यह गलियारा उसकी क्षेत्रीय अखंडता को आहत करता है.
  • इस परियोजना के कारण हिन्द महासागर में चीन का दबदबा बढ़ सकता है जिससे भारतीय हितों को क्षति पहुँच सकती है.
  • BRI परियोजनाओं के चलते कई देश गहरे कर्ज में डूब रहे हैं जिनको नहीं चुका पाने के कारण इन देशों की सम्प्रभुता पर आँच आ रही है.
  • इस परियोजना में चीन अपने कौशल अथवा तकनीक को हस्तांतरित नहीं कर रहा है. अतः अंततोगत्वा उन देशों को कोई लाभ नहीं होगा जहाँ उसका काम चल रहा है.
  • चीन की परियोजनाएँ पर्यावरण की दृष्टि से भी अनुकूल नहीं हैं.
  • इसके माध्यम से चीन भारत पर रणनीतिक बढ़त बनाना चाहता है. वह पूर्वोत्तर भारत के आस-पास अपनी उपस्थिति सुदृढ़ करना चाहता है. विदित हो कि यहाँ के कुछ भागों पर चीन अपना दावा करता रहा है. इस प्रकार इस परियोजना से भारत की सुरक्षा पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ेगा.
  • चीन और भारत के आपसी रिश्ते ठीक नहीं हैं और दक्षिण-एशिया और हिन्द प्रशांत क्षेत्र में चीन के इरादे ऐसे हैं कि भारत कभी भी इस परियोजना के लिए हामी नहीं भरेगा.
  • इस परियोजना के अंदर बन रही अवसंरचनाओं की सुरक्षा के लिए चीन 30,000 सैनिकों की तैनाती शुरू कर चुका है. भारत का कहना है कि यह तैनाती अंततोगत्वा भारत को घेरने के निमित्त की गई है.

GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : India and its neighbourhood- relations.

Topic : Why are India and Nepal fighting over Kalapani?

संदर्भ

उत्तराखंड-लिपुलेख रोड लिंक से इय यात्रा को ‘काफ़ी हद तक कम अवधि’ वाला बनाना नरेंद्र मोदी सरकार की प्राथमिकता थी. इस साल आठ मई को भारतीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए इसके रोड-लिंक का उद्घाटन किया. लेकिन इस रास्ते में भी कई अनिश्चितताएं और अड़चनें हैं.

पृष्ठभूमि

नेपाल उत्तराखंड के कालापानी और लिपुलेख समेत कई हिस्सों पर अपना दावा पेश करता रहा है. भारत ने गत सप्ताह लिपुलेख में कैलाश मानसरोवर रोड लिंक का उद्घाटन किया तो नेपाल ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई. नेपाल ने कहा कि वह सीमा विवाद पर भारत के साथ वार्ता के लिए कोरोना वायरस संकट के खत्म होने की प्रतीक्षा नहीं करेगा.

गत वर्ष नवंबर महीने में जब भारत ने जम्मू-कश्मीर का विभाजन किया था और जम्मू-कश्मीर व लद्दाख के रूप में दो केंद्रशासित प्रदेश का गठन किया था और दोनों का नया नक्शा निर्गत किया था, तब कालापानी भी उस नक्शे में सम्मिलित था. उस समय भी नेपाल ने आपत्ति जताई थी और दावा किया था कालापानी उसके क्षेत्र में आता है.

कालापानी कहाँ है?

कालापानी 372 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र है जो चीन, नेपाल और भारत की सीमा पर स्थित है. भारत इसे उत्तराखंड का हिस्सा मानता है जबकि नेपाल इसे अपने नक्शे में दर्शाता है. कालापानी की ऊँचाई 3,600 मीटर है. 1962 के भारत-चीन के युद्ध के बाद से कालापानी भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के नियंत्रण में है.

सुगौली समझौता क्या है?

  • नेपाल और ब्रिटिश इंडिया के बीच सुगौली समझौता वर्ष 1816 में हुआ था.
  • इसमें कालापानी इलाके से होकर बहने वाली काली नदी भारत-नेपाल की सीमा मानी गई है. हालांकि, सर्वेक्षण करने वाले ब्रिटिश अधिकारी ने काली नदी के उद्गम एक से अधिक बताये थे. इसलिए भारत और नेपाल में इस नदी को लेकर विवाद चला आ रहा है.
  • नेपाल का दावा है कि काली नदी का उद्गम नेपाल में है और भारत कहता है कि इसका उद्गम भारत में है. इसी बात को लेकर दोनों कालापानी क्षेत्र पर दावा करते हैं.

क्यों महत्वपूर्ण है कालापानी?

कालापानी इलाके का लिपुलेख दर्रा चीनी गतिविधियों पर नजर रखने के लिहाज से बहुत ही अधिक महत्त्वपूर्ण है.

आगे की राह

इस साल कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. वजह है, दुनिया भर में कोविड-19 संक्रमण का प्रसार.

वायरस का शुरुआती केंद्र माने जाने वाले देश चीन के अधिकारियों ने यहाँ पहुंचने वाले हर अंतरराष्ट्रीय यात्री के लिए 14 दिनों तक मेडिकल क्वारंटीन में रहना अनिवार्य कर दिया है.

तिब्बत में भी ऐसे कुछ नियम लागू हैं. नेपाल, तिब्बत और चीन के ट्रैवेल एजेंटों और अधिकारियों का कहना है कि इन सबका असर जून, जुलाई और अगस्त महीने में कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर आने वाले लोगों पर पड़ेगा.


GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : India and its neighbourhood- relations.

Topic : What explains the India-China border flare-up?

संदर्भ

भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव बढ़ता जा रहा है. वास्तविक नियंत्रण रेखा (Line of Actual Control LAC) पर दोनों देश अपने सैनिकों की मौजूदगी बढ़ा रहे हैं.

पृष्ठभूमि

अक्साई चीन में स्थिति गालवन घाटी को लेकर दोनों देशों के बीच इस तनाव की शुरुआत हुई थी. भारत का कहना है कि गालवन घाटी के किनारे चीनी सेना के कुछ टेंट देखे गए हैं. इसके बाद भारत ने भी वहाँ फ़ैज की तैनाती बढ़ी दी है. वहीं, चीन का आरोप है कि भारत गालवन घाटी के पास रक्षा संबंधी ग़ैर-क़ानूनी निर्माण कर रहा है. मई में दोनों देशों के बीच सीमा पर अलग-अलग जगह टकराव हो चुका है. नौ मई को नॉर्थ सिक्किम के नाकू ला सेक्टर में भारतीय और चीनी सैनिकों में झड़प हुई थी. उसी दौरान लद्दाख़ में एलएसी के पास चीनी सेना के हेलिकॉप्टर देखे गए थे. इसके बाद भारतीय वायुसेना ने भी सुखोई समेत दूसरे लड़ाकू विमानों से पेट्रोलिंग शुरू कर दी.

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चीन का भारत पर आरोप

चीन ने इस तनाव की वजह भारत को बताया है. चीन ने कहा है कि “भारत ने इस इलाक़े में रक्षा संबंधी ग़ैर-क़ानूनी निर्माण किए हैं. इसकी वजह से चीन को वहां सैन्य तैनाती बढ़ानी पड़ी है. भारत ने इस तनाव की शुरुआत की है. लेकिन, हमें यक़ीन है कि यहां डोकलाम जैसे हालात नहीं बनेंगे जैसा साल 2017 में हुआ था. भारत कोविड-19 की वजह से आर्थिक परेशानियों से जूझ रहा है और जनता का ध्यान हटाने के लिए उसने गालवन में तनाव पैदा किया.”

गालवन घाटी क्यों महत्त्वपूर्ण है?

  • गालवन घाटी विवादित क्षेत्र अक्साई चीन में है. गालवन घाटी लद्दाख़ और अक्साई चीन के बीच भारत-चीन सीमा के नज़दीक स्थित है.
  • यहां पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) अक्साई चीन को भारत से अलग करती है. अक्साई चीन पर भारत और चीन दोनों अपना दावा करते हैं. यह घाटी चीन के दक्षिणी शिनजियांग और भारत के लद्दाख़ तक फैली है.
  • यह क्षेत्र भारत के लिए सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये पाकिस्तान, चीन के शिनजियांग और लद्दाख़ की सीमा के साथ लगा हुआ है. 1962 की जंग के दौरान भी गालवन नदी का यह क्षेत्र जंग का प्रमुख केंद्र रहा था.

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद

भारत की 3,488 किलोमीटर की सीमा रेखा चीन के साथ लगती है. चीन-भारत सीमा को सामान्यतः तीन क्षेत्रों में बांटा गया है:

  • पश्चिमी क्षेत्र, (2) मध्य क्षेत्र, और (3) पूर्वी क्षेत्र.

पश्चिमी क्षेत्र

पश्चिमी क्षेत्र में चीन के साथ 2152 किमी लंबी भारतीय सीमा है. यह सीमा जम्मू और कश्मीर तथा चीन के भझिंजियांग (सिक्‍यांग) प्रांत के बीच है.

अक्साई चीन

  • अक्साई चीन पर क्षेत्रीय विवाद की जड़ें ब्रिटिश साम्राज्य की अपने भारतीय उपनिवेश और चीन के बीच कानूनी सीमा की स्पष्ट व्याख्या न करने की विफलता में निहित हैं.
  • ब्रिटिश राज के दौरान भारत और चीन के बीच दो सीमाएं प्रस्तावित की गई थीं – जॉनसन लाइन (Johnson’s Line) और मैकडॉनाल्ड लाइन (McDonald Line)
  • जॉनसन लाइन, अक्साई चिन को भारतीय नियंत्रण में प्रदर्शित करती है जबकि मैकडॉनाल्ड लाइन इसे चीन के नियंत्रण में प्रदर्शित करती है.
  • भारत चीन के साथ अंतर्राष्ट्रीय सीमा के रूप में जॉनसन लाइन को सही मानता है जबकि दूसरी ओर, चीन मैकडॉनल्ड लाइन को भारत-चीन के मध्य अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा मानता है.
  • भारतीय-प्रशासित क्षेत्रों को अक्साई चीन से अलग करने वाली रेखा को वास्तविक नियंत्रण रेखा (लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल: LAC) के रूप में जाना जाता है और यह रेखा चीन द्वारा दावा की जाने वाली अक्साई चिन सीमा रेखा के साथ समवर्ती है.
  • भारत और चीन के बीच 1962 में विवादित अक्साई चिन क्षेत्र को लेकर युद्ध हुआ था. भारत का दावा है कि यह कश्मीर का हिस्सा है, जबकि चीन ने दावा किया कि यह भिंजियांग का हिस्सा है.

मध्य क्षेत्र

मध्य क्षेत्र में लगभग 625 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा लद्दाख से नेपाल तक जलविभाजक (वाटरशेड) के साथ-साथ चलती है. इस सीमा रेखा पर भारत के हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड राज्य, तिब्बत (चीन) के साथ लगते हैं.

पूर्वी क्षेत्र

  • पूर्वी क्षेत्र में सीमा रेखा 1,140 किमी लंबी है तथा यह भूटान की पूर्वी सीमा से लेकर भारत, तिब्बत और म्यांमार के मिलन बिंदु, तालू दर्राके पास तक विस्तृत है. इस सीमा रेखा को मैकमोहन रेखा (हेनरी मैकमोहन के नाम पर) कहते हैं. हेनरी मैकमोहन एक ब्रिटिश प्रतिनिधि थे जिन्होंने 1913-14 के शिमला कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए थे.
  • यह सीमा रेखा हिमालय पर्वत के उत्तरी भाग में स्थित ब्रह्मपुत्र नदी के जलविभाजक से लगी हुई है, जहां लोहित, दिहांग, सुबनसिरी और केमांग नदियाँ उस जल विभाजक से होकर निकलती हैं.
  • चीन मैकमोहन रेखा को गैरकानूनी और अस्वीकार्य मानता है. उसके अनुसार, तिब्बत को मैकमोहन रेखा का निर्धारण करने वाले 1914 के शिमला कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं था.

सीमा विवाद को सुलझाने के प्रयास

  1. सीमा विवाद को सुलझाने के लिए 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गाँधी चीन गये थे जिसके पश्चात् एक संयुक्त कार्य समूह (Joint Working Group – JWG) की स्थापना हुई थी.
  2. 1993 में इस समूह को सहायता पहुँचाने के लिए भारत-चीन कूटनीतिज्ञ एवं सैन्य अधिकारी विशेषज्ञ समूह (Expert Group of Diplomatic and Military Officers) गठित हुआ. साथ ही एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए जिसके अनुसार, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति बनाये रखने का निर्णय हुआ.
  3. 1996 में आपसी भरोसा बढ़ाने के लिए (Agreement on Confidence Building Measures – CBMs) एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए.
  4. 2003 में भारत और चीन का एक-एक विशेष प्रतिनिधि नियुक्त हुआ जिसे सीमा विवाद का राजनैतिक समाधान निकालने का दायित्व दिया गया.
  5. 2009 तक इन विशेष प्रतिनिधियों के बीच 17 बार वार्ता हो चुकी है, परन्तु समाधान की ओर कोई विशेष कदम नहीं उठाया गया है. पिछले दिनों वार्ता के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा परामर्शी अजित डोभाल को विशेष दूत के रूप में नियुक्त किया गया है.

आगे की राह

कोरोना वायरस से लड़ाई अपनी जगह है और देश की सुरक्षा अपनी जगह. चीन भी दक्षिण चीन सागर में अपने सैन्य निर्माण का विस्तार कर रहा है. दुनिया कोरोना वायरस से निपटने में व्यस्त है लेकिन फ़ौज तो कोरोना वायरस से नहीं लड़ रही है. फ़ौज अपना काम करेगी. ये सामरिक महत्व के मसले हैं जो कोरोना से पहले भी थे, अब भी हैं और आगे भी रहेंगे. इसलिए चीन का ये दावा ठीक नहीं है.


GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Government policies and interventions for development in various sectors and issues arising out of their design and implementation.

Topic : Domicile rules for J&K

संदर्भ

पिछले दिनों भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने जम्मू एवं कश्मीर सिविल सेवा (विकेंद्रीकरण तथा नियुक्ति) अधिनियम, 2010 में संशोधन करते हुए “स्थायी निवासियों” इस शब्द युग्म को हटाकर वहां यह डाल दिया – “जम्मू एवं कश्मीर संघीय क्षेत्र के डोमिसाइल”.

साथ ही, डोमिसाइल की परिभाषा बदलते हुए एक आदेश निर्गत किया जिसका नाम “जम्मू एवं कश्मीर पुनर्गठन (राज्य कानूनों का अनुकूलन) आदेश 2020 है. यह आदेश जम्मू एवं कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के अनुभाग 96 के अन्दर निकाला गया.

जम्मू एवं कश्मीर सिविल सेवा (विकेंद्रीकरण तथा नियुक्ति) अधिनियम, 2010

यह अधिनियम जिला, प्रभाग और राज्य के कैडर पदों कि सिविल सेवाओं में नियुक्ति के लिए पारित हुआ था. इसके अनुसार, राजपत्रित एवं अराजपत्रित पदों के लिए जम्मू एवं कश्मीर के केवल स्थायी निवासी ही आवेदन कर सकते थे.

मुख्य परिवर्तन

अब से जम्मू-कश्मीर के सभी सरकारी पदों में नियुक्ति के लिए डोमिसाइल नियमावली चलेगी. डोमिसाइल प्रमाणपत्र निर्गत करने की शक्ति तहसीलदार को दी गई है.

नए डोमिसाइल नियम में क्या हैं?

  • अब जम्मू-कश्मीर में 15 साल तक रहने वाला व्यक्ति अब वहाँ का निवासी कहलाएगा.
  • जिस भी शख्स ने जम्मू-कश्मीर में 15 साल बिताए हैं या जिसने यहां सात साल पढ़ाई की और 10वीं-12वीं की परीक्षा यहीं के किसी स्थानीय संस्थान से दी, वह यहां का निवासी होगा.
  • इसमें उन केंद्र सरकार के अधिकारियों के बच्चे, अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी, सार्वजनिक उपक्रम के अधिकारी और केंद्र सरकार के स्वायत्त निकाय, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, वैधानिक निकायों के अधिकारी, केंद्रीय विश्वविद्यालयों के अधिकारी और केंद्र सरकार के मान्यता प्राप्त अनुसंधान संस्थान शामिल हैं जिन्होंने दस वर्षों की कुल अवधि के लिए जम्मू और कश्मीर में सेवाएं दी है.
  • इस कानून ने तहसीलदारों को निवास प्रमाण पत्र जारी करने के लिए अपने क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के भीतर अधिकार दिया है.
  • जम्मू कश्मीर यूटी की सरकार को भी अधिवास प्रमाण पत्र जारी करने के लिए किसी अन्य अधिकारी को सक्षम प्राधिकारी के रूप में सूचित करने का अधिकार दिया गया है.
  • उपर्युक्त शर्तों को पूरा करने वाले किसी भी व्यक्ति को जम्मू-कश्मीर के केंद्र के स्तर 4 (25500) से अधिक के वेतनमान वाले किसी भी पद की नियुक्ति के उद्देश्य से जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश के निवासी के रूप में समझा जाएगा. हालाँकि, यह प्रावधान जम्मू-कश्मीर में सेवारत केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के बच्चों और दस साल से अधिक समय से जम्मू-कश्मीर में रहने वाले सभी गैर-स्थानीय लोगों के लिए भी उपलब्ध होगा.
  • जम्मू और कश्मीर सिविल सेवा अधिनियम के 5A के मुताबिक, “इस अधिनियम के प्रावधानों के अधीन, कोई भी व्यक्ति जब तक वह जम्मू और कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश का निवासी नहीं है, तब तक स्तर 4 (25500) से अधिक के वेतनमान वाले पद पर नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा.”
  • स्तर 4 में जूनियर सहायक, कांस्टेबल जैसे पद शामिल हैं, जिन्हें गैर-राजपत्रित पदों की सबसे निचली श्रेणी के रूप में माना जाता है. यह इंगित करता है कि जम्मू और कश्मीर केन्द्र शासित प्रदेशों के अधिवासों को वर्ग 4 और गैर-राजपत्रित पदों पर अनन्य अधिकार होगा.
  • जम्मू और कश्मीर निवासी सहित सभी भारतीय नागरिक शेष अराजपत्रित और राजपत्रित पदों के लिए पात्र होंगे.
  • विदित हो कि 5 अगस्त से पहले, जम्मू और कश्मीर के पूर्ववर्ती राज्य में सभी नौकरियाँ विशेष रूप से राज्य के स्थायी निवासियों के लिए आरक्षित थीं.

पृष्ठभूमि

5 अगस्त, 2019 को केंद्र द्वारा जम्मू और कश्मीर के विशेष दर्जे को रद्द कर दिया गया.  धारा 370 के तहत जम्मू और कश्मीर का अलग संविधान था और अनुच्छेद 35A ने बाहर के लोगों को जम्मू-कश्मीर में संपत्ति खरीदने और बाहरी निवासियों के लिए नौकरी पर रोक लगा रखा थी. 1954 में घोषित अनुच्छेद 35A को भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत बनाए गए एक राष्ट्रपति के आदेश द्वारा भारत के संविधान में शामिल किया गया था.


GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Effect of policies and politics of developed and developing countries on India’s interests, Indian diaspora.

Topic : US discussed conducting its first nuclear test in decades

संदर्भ

अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप करीब 28 साल बाद परमाणु बम परीक्षण पर विचार कर रहे हैं. विदित हो कि अमेरिका ने आखिरी बार 1992 में परमाणु परीक्षण किया था. माना जा रहा है कि इस परीक्षण का मकसद अपने हथियारों की विश्‍वसनीयता को परखना और नए डिजाइन वाले हथियार बनाना है.

ऐसा विचार अभी क्यों?

अप्रैल महीने के मध्य में अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट ने एक रिपोर्ट निर्गत किया था जो शस्त्र नियंत्रण, अप्रसार एवं निरस्त्रीकरण समझौतों एवं प्रतिबद्धताओं के अनुपालन के विषय में था. इस रिपोर्ट में चिंता व्यक्त की गई कि व्यापक आणविक परीक्षण प्रतिबंध संधि (Comprehensive Nuclear-Test-Ban Treaty – CTBT) का उल्लंघन करते हुए चीन अपने लोप नुर परीक्षण स्थल पर कम शक्ति वाले आणविक अस्त्रों का परीक्षण कर रहा है.

रिपोर्ट में रूस पर भी CTBT के शून्य उत्पादन (zero yield) लक्ष्य का उल्लंघन करते हुए आणविक अस्त्र प्रयोग करने का आरोप है. यद्यपि ऐसे प्रयोगों की संख्या अनिश्चित है.

पृष्ठभूमि

फरवरी 2021 में अमेरिका और रूस के बीच आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी खत्म हो रही है. रूस ने कई बार अमेरिका से इस ट्रीटी को पांच वर्ष तक बढ़ाने के लिए कहा है. अमेरिका का कहना है कि वह अब इस ट्रीटी को तभी बढ़ाएगा जब इसमें चीन, ब्रिटेन और फ्रांस भी आएंगे. 1945 के बाद से कम से कम आठ देशों ने लगभग 2,000 परमाणु परीक्षण किए हैं. इनमें से अमेरिका ने अकेले 1,000 से अधिक परीक्षण किए थे.

CTBT क्या है?

CTBT एक ऐसी संधि है जो सभी प्रकार के आणविक विस्फोट को निषिद्ध करती है. इस संधि की रुपरेखा जेनेवा में हुए निरस्त्रीकरण सम्मलेन में तैयार की गई थी और इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अंगीकृत कर लिया था. 24 सितम्बर, 1996 से यह संधि हस्ताक्षर के लिए खुली हुई है.

संधि की अनुसूची 2 में वर्णित सभी 44 देशों के अनुमोदन के उपरान्त यह संधि लागू हो जायेगी. ये वे देश हैं जो संधि पर विचार और अंगीकरण के समय परमाणु सुविधाओं से लैस थे.

भारत, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया ने अभी तक इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं.

भारत और CTBT

भारत को आरम्भ से ही CTBT पर कुछ आपत्तियाँ हैं. भारत भी चाहता है कि यह विश्व आणविक अस्त्रों से मुक्त हो. पर उसका कहना है कि निरस्त्रीकरण एक अंतिम लक्ष्य है जिसका मार्ग परीक्षण पर प्रतिबंध से होकर जाता है.

भारत के अनुसार यह एक जटिल विषय है. भारत को संधि की धारा 14 के Entry-into-force (EIF) अनुच्छेद पर भी अप्पत्ति है क्योंकि किसी अंतर्राष्ट्रीय संधि में प्रतिभागिता को स्वेच्छा से रोके रखने के अधिकार का यह उल्लंघन है.

संधि की आवश्यकता

आणविक निरस्त्रीकरण और आणविक अप्रसार के लक्ष्य को पाने में CTBT की एक प्रमुख भूमिका है. इस संधि के बने हुए 20 वर्ष हो गये हैं पर अभी भी इसे लागू नहीं किया जा सका है. इसे लागू करने में विफलता के कारण इसे पूरे तौर से कार्यान्वित नहीं किया जा रहा है जिसका असर अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ रहा है.

आगे की राह

दुनिया की सर्वोच्‍च महाशक्ति अमेरिका के पास 3800 परमाणु हथियार हैं. ये परमाणु बम पूरी दुनिया को कई बार नष्‍ट कर सकते हैं. इन परमाणु हथियारों को ले जाने के लिए अमेरिका के पास 800 मिसाइले हैं. ये मिसाइलें दुनिया के किसी भी शहर को पलक झपकते ही तबाह कर सकती हैं. सिप्री के मुताबिक अमेरिका ने 1750 परमाणु बमों को मिसाइलों और बमवर्षक विमानों में तैनात कर रखा है. इसमें से 150 परमाणु बम अमेरिका ने यूरोप में तैनात कर रखे हैं ताकि रूस पर नजर रखी जा सके.

परमाणु परीक्षण करना अन्‍य परमाणु हथियार संपन्‍न राष्‍ट्रों को ऐसा करने के लिए प्रेरित करेगा. इससे पूरी दुनिया में परमाणु हथियारों की अप्रत्‍याशित होड़ शुरू हो सकती है.


Prelims Vishesh

International Tea Day (ITD) :-

  • संयुक्त राष्ट्र ने 21 मई को प्रथम अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस के रूप में मनाया.
  • इसका आयोजन खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) कर रहा है.
  • इस दिवस को मनाने का उद्देश्य पूरे विश्व में चाय के इतिहास और उसके सांस्कृतिक एवं आर्थिक माहात्म्य के विषय में जागरूकता फैलाना है.

Agappe Chitra Magna :-

  • श्री चित्र तिरुनल चिकित्सा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (SCTIMST) तथा कोचीन स्थित अगापे डायग्नोस्टिक्स लिमिटेड ने मिलकर RnA आइसोलेशन किट तैयार किया है जो COVID-19 का पता लगाने में काम आएगा.
  • इसका दाम मात्र 150 रु है जबकि इसी प्रकार का विदेशी किट 300 रु. में मिलता है.

What is China’s May Fourth Movement? :-

  • चीन का मई 4 आन्दोलन एक बौद्धिक तथा सामाजिक-आर्थिक सुधार आन्दोलन था जो 1919 में मई 4 को हुआ था.
  • इस आन्दोलन में छात्रों ने पश्चिमी जगत के साम्राज्यवाद का विरोध किया था तथा अपनी सरकार की कमजोरी पर रोष प्रकट किया था.
  • यह आन्दोलन इसलिए आयोजित हुआ था क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध के अंत में पेरिस शान्ति सम्मेलन के प्रतिनिधियों ने चीन में स्थित जर्मन उपनिवेशों को लौटाने से मना कर दिया था.

What is ‘Sonic Boom’?

  • जब कोई वस्तु ध्वनि से अधिक तेज गति से हवा में चलती है तो ध्वनि आघात उत्पन्न होते हैं जिसे सोनिक बूम कहते हैं.
  • इसमें बहुत बड़ी मात्रा में ध्वनि ऊर्जा का उत्सर्जन होता है और बिजली कड़कने जैसी आवाज़ आती है.
  • यदि कोई हवाई जहाज ध्वनि से तेज गति में उड़ते समय कम ऊँचाई पर होता है तो सोनिक बूम के कारण भूकम्प जैसा कम्पन होता है और कई बार काँच टूट जाते हैं.

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