Sansar डेली करंट अफेयर्स, 25 October 2019

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Sansar Daily Current Affairs, 25 October 2019


GS Paper 1 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Important Geophysical phenomena such as earthquakes, Tsunami, Volcanic activity, cyclone etc., geographical features and their location- changes in critical geographical features (including water-bodies and ice-caps) and in flora and fauna and the effects of such changes.

Topic : Ozone Hole

संदर्भ

नासा और एनओएए वैज्ञानिकों ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि अंटार्कटिका के ऊपरी वायुमंडल में मौसम की असामान्य घटनाओं के चलते सितंबर और अक्टूबर महीने में ओजोन की कमी को नाटकीय रूप से सीमित कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप 1982 के बाद से पहली बार ओजोन छिद्र के आकार में इतनी कमी देखी गयी है.

ओजोन छिद्र के अकार में कमी क्यों?

नासा और एनओएए के उपग्रहों से मिले आंकड़ों के अनुसार 8 सितम्बर को ओजोन छिद्र अपने चरम आकार 1 करोड़ 64 लाख वर्ग किलोमीटर तक पहुंच गया था. इसके बाद सितंबर और अक्टूबर माह के शेष दिनों में इसका आकार 1 करोड़ वर्ग किलोमीटर से भी छोटा हो गया. आमतौर पर सामान्य मौसम की स्थिति में ओजोन होल सितंबर के अंत या अक्टूबर की शुरुआत में लगभग 2 करोड़ 72 लाख वर्ग किलोमीटर के अधिकतम क्षेत्र तक बढ़ता है, लेकिन 2006 में यह बढ़कर लगभग 2 करोड़ 75 लाख वर्ग किलोमीटर तक फैल गया था. शोधकर्ताओं ने इस वर्ष इसके छोटे आकार के लिए स्ट्रैटोस्फियर (समताप मंडल) में अचानक हो रही वार्मिंग की घटनाओं को जिम्मेदार माना है, जिन्होंने इसके घटने की प्रक्रिया को प्रभावित कर दिया है.

ओजोन परत क्या होता है?

ओजोन गैस पूरे पृथ्वी के ऊपर एक परत के रूप में छाया रहता है और क्षतिकारक UV किरणों के विकिरण को धरातल पर रहने वाले प्राणियों तक पहुँचने से रोकता है. इस परत को ओजोन परत कहते हैं. यह परत मुख्य रूप से समताप मंडल में होती है. इस परत की मोटाई 10-50 किलोमीटर तक होती है. इसे जीवन सहायक इसलिए माना जाता है कि इसमें कम तरंग दैर्ध्य (wave length) का प्रकाश, जो कि 300 नैनोमीटर से कम हो, को अपने में अवशोषित करने की विलक्षण क्षमता है. जहाँ पर वातावरण में ओजोन उपस्थित नहीं होगी, वहाँ सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणें (UV rays) पृथ्वी पर पहुँचने लगेंगी. ये किरणें मनुष्य के साथ-साथ जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के लिए भी बहुत खतरनाक है. ध्रुवों के ऊपर इसकी परत की मोटाई 8 km है और विषुवत् रेखा (equator line) के ऊपर इसकी मोटाई 17 km है.

ओजोन छिद्र क्या होती है?

ओजोन छिद्र उस ओजोन परत के उस भाग को कहते हैं जहाँ वह परत झीनी पड़ गई है. यह छिद्र ध्रुवीय प्रदेशों के ऊपर स्थित है. अगर ओजोन की यह चादर और पतली हो गई तो धरती में गर्मी बढ़ेगी और पराबैंगनी किरण (ultraviolet rays/UV) समस्त प्राणियों और वनस्पतियों को मुश्किल में डाल देगी. ध्रुवों की बर्फ पिघल जाएगी, जिसके चलते समुद्र के पानी का स्तर ऊपर आएगा और फलतः तटवर्ती क्षेत्र बाढ़ की चपेट में आ जायेंगे. चर्म कैंसर के मामले ओजोन छिद्र के कारण बढ़ें हैं.

CFC क्या है?

क्लोरोफ्लूरो कार्बन (CFC) एक यौगिक गैस है जिसमें क्लोरीन, फ्लोरीन और कार्बन के तत्त्व होते हैं. हमारे एरोसोलों, वातानुकूलन पदार्थों (refrigerants) और प्लास्टिक फ़ोम (foams) में CFC होता है. जब यह CFC हवा में प्रवेश करता है तो यह उड़ते-उड़ते ओजोन परत तक पहुँच कर ओजोन कणों को नष्ट करने लगता है. CFC 50 से 100 वर्षों तक सक्रिय रहता है.

हमारे सामने चुनौती

CFC यौगिकों का घरेलू और औद्योगिकों क्षेत्रों में इतना ज्यादा प्रयोग हो रहा है कि उनकी जगह दूसरे रसायन को इस्तेमाल करना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है. अभी तक कोई विकल्प नहीं खोजा जा सका है. इन यौगिकों का प्रयोग वातानुकूलन उपकरणों में, पैकेजिंग उद्योग में, इलेक्ट्रॉनिक उद्योग में, बिजली पैदा करने में, आग को बुझाने के उपकरणों में होता है. CFC विकल्प खोजते समय हमें यह बात दिमाग में रखनी होगी कि जिस तरह CFC यौगिकों में आग नहीं लग सकती, कोई विष नहीं फैल सकता और किसी दूसरे रसायन से वे क्रिया भी नहीं करते – – ये खूबियाँ उसके वैकल्पिक यौगिकों में भी होनी चाहिएँ. इसके साथ ही वैकल्पिक यौगिकों में ओजोन में कमी लाने का दुर्गुण या तो बिल्कुल नहीं या न के बराबर होना चाहिए.

CFC का विकल्प

अनुसंधानों से पता चला है कि ओजोन की परत (ozone layer) नष्ट करने में दो बातें मुख्य रूप से असर डालती हैं-

  • यौगिक में मौजूद क्लोरिन का अनुपात
  • वायुमंडल में तरल यौगिक के सक्रिय बने रहने का समय

इस आधार पर जो मूल CFC खोजे गए थे उनका ओजोन विनाशक अंक एक (1) था और आग बुझाने वाले उपकरणों में विद्यमान CFC में 3 से 10 था. इस आधार पर ऐसे यौगिक खोजे जा रहे हैं जो वायुमंडल में बहुत तेजी से फैल जाएँ और ज्यादा देर तक टिके रहें.

ऐसे यौगिकों की खोज करते हुए वैज्ञानिक हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC) यौगिकों तक पहुँचे. ये टिकाऊ हैं और वायुमंडल की ऊपरी सतह तक पहुँचते-पहुँचते लगभग इनका विनाश हो जाता है. पर्यावरण की दृष्टि से यदि देखें तो CFC यौगिकों की अपेक्षा HFC यौगिक अधिक स्वीकार्य हैं इनका ओजोन विनाशक अंक शून्य से 0.05 तक है जो CFC की तुलना में बहुत कम है. लेकिन अभी नए HFC यौगिकों पर ज्यादा खोज नहीं हुई है. इस विषय में बहुत कम आँकड़े उपलब्ध हैं और इनकी सत्यता के बारे में शकाएँ उठाई गई हैं.

परन्तु जब तक हम सुरक्षित रसायनों और नई तकनीकों को पूरी तरह से विकसित न कर लें तब तक हमारा कर्तव्य है कि हम पृथ्वी के जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की सुरक्षा के लिए ऐसे रसायनों का प्रयोग कम करें जो ओजोन के सुरक्षा कवच को कमजोर बना रहे हैं.

इसी बात को ध्यान में रखते हुए CFC पर पूरे विश्व में प्रतिबंध लगाया जा चुका है.


GS Paper 1 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Important Geophysical phenomena such as earthquakes, Tsunami, Volcanic activity, cyclone etc., geographical features and their location- changes in critical geographical features (including water-bodies and ice-caps) and in flora and fauna and the effects of such changes.

Topic : El Niño

संदर्भ

एक अध्‍ययन में बताया गया है कि एल नीनो के कारण मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में सतह का पानी सामान्य से काफी गर्म हो जाता है, जिसके कारण पश्चिमी प्रशांत से अमेरिका की ओर गर्म हवाएं चलनी शुरू हो जाती हैं. साथ ही यह वैश्विक मौसम को भी प्रभावित कर रहा है.

अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष

  • शोधकर्ताओं ने पाया कि पूर्वी प्रशांत में होने वाली सभी अल नीनो घटनाएं 1970 के दशक से पहले हुई थीं, जबकि पश्चिमी-मध्य प्रशांत में एक दशक के बाद ऐसी घटना देखी गई थी. उन्होंने यह भी पाया कि 1970 के बाद के इतिहास में पांच बार चरम अल नीनो घटनाएं हुई हैं.
  • यदि भविष्य में भी जलवायु परिवर्तन इसी प्रकार जारी रहा तो चरम अल नीनो की आवृत्ति तो बढ़ेगी ही, साथ ही कई तरह की सामाजिक और आर्थिक समस्याएं भी उत्पन्न होनी शुरू हो जाएंगी.
  • अध्ययन के मुताबिक, वर्षों पहले चरम अल नीनो के कारण पश्चिमी प्रशांत द्वीप समूह और ऑस्ट्रेलिया में गंभीर सूखे पड़ गया था , जिससे अकाल की स्थिति पैदा हो गई थी. वहीं, दूसरी और अत्यधिक बारिश ने दक्षिण अमेरिका के उत्तरी तटों को काफी नुकसान पहुंचाया था. इससे समुद्र में मछलियों के साथ -साथ प्रवाल भित्तियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा था. शोधकर्ताओं का दावा है कि इस अध्ययन के परिणामों से वैश्विक स्तर पर मौसम का बेहतर पूर्वानुमान लगाने में मदद मिल सकती है.

एल-निनो और भारतीय मानसून

  • एल-निनो एक संकरी गर्म जलधारा है जो दिसम्बर महीने में पेरू के तट के निकट बहती है. स्पेनिश भाषा में इसे “बालक ईसा (Child Christ)” कहते हैं क्योंकि यह धारा क्रिसमस के आस-पास जन्म लेती है.
  • यह पेरूबियन अथवा हम्बोल्ट ठंडी धारा की अस्थायी प्रतिस्थापक है जो सामान्यतः तट के साथ-साथ बहती है.
  • यह हर तीन से सात साल में एक बार प्रवाहित होती है और विश्व के उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर बाढ़ और सूखे की वजह बनती है.
  • कभी-कभी यह बहुत गहन हो जाती है और पेरू के तट के जल के तापमान को 10 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा देती है.
  • प्रशांत महासागर के उष्ण कटिबंधीय जल की यह उष्णता भूमंडलीय स्तर पर वायु दाब तथा हिन्द महासागर की मानसून सहित पवनों को प्रभावित करती है.
  • एल निनो के अध्ययन से यह पता चलता है कि जब दक्षिणी प्रशांत महासागर में तापमान बढ़ता है तब भारत में कम वर्षा होती है.
  • भारतीय मानसून पर एल-नीनो का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है और इसका प्रयोग मानसून की लम्बी अवधि के पूर्वानुमान के लिए किया जाता है.
  • मौसम वैज्ञानिकों का विचार है कि भारत में 1987 का भीषण सूखा एल-निनो के कारण ही पड़ा था.
  • 1990-1991 में एल-निनो का प्रचंड रूप देखने को मिला था. इसके कारण देश के अधिकांश भागों में मानसून के आगमन में 5 से 12 दिनों की देरी हो गई थी.

ला-निना

एल-निनो के बाद मौसम सामान्य हो जाता है. परन्तु कभी-कभी सन्मार्गी पवनें इतनी प्रबल हो जाती हैं कि वे मध्य तथा पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में शीतल जल का असामान्य जमाव पैदा कर देती हैं. इसे ला-निना कहते हैं जोकि एल-निनो के ठीक विपरीत होता है. ला-निना से चक्रवातीय मौसम का जन्म होता है. परन्तु भारत में यह अच्छा समाचार लाता है क्योंकि यह मानसून की भारी वर्षा का कारण बनता है.

दक्षिणी दोलन (Southern Oscillation)

  • यह प्रशांत महासागर तथा हिन्द महासागर के बीच पाए जाने वाले मौसम सम्बन्धी परिवर्तनों का एक विचित्र प्रतिरूप है.
  • प्रायः देखा गया है कि जब हिन्द महासागर में समुद्र तल पर दाब अधिक होता है तब प्रशांत महासागर में दाब कम होता है. इसके विपरीत जब हिन्द महासागर में दाब कम होता है तब प्रशांत महासागर में दाब अधिक होता है.
  • जब शीतकालीन दाब प्रशांत महासागर पर अधिक तथा हिन्द महासागर पर कम होता है तब भारत की दक्षिणी-पश्चिमी मानसून अधिक प्रबल होती है. इसकी विपरीत दिशा में मानसून कमजोर पड़ जाती है.

GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Important aspects of governance, transparency and accountability, e-governance, e-applications, models, successes, limitations and potential; citizens charters, transparency & accountability and institutional and other measures.

Topic : Government e Marketplace (GeM)

संदर्भ

सरकार ई-मार्केटप्लेस (GeM) ने भुगतान-संबंधित सेवाओं के लिए फेडरल बैंक के साथ एक समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर किए.

एमओयू पोर्टल पर एक कैशलेस, पेपरलेस और पारदर्शी भुगतान प्रणाली की सुविधा प्रदान की जाएगी.

GEM क्या है?

  1. सरकारी ई-बाजार (GeM) एक ऑनलाइन बाजार है जिसके माध्यम से सरकार के विभिन्न मंत्रालय एवं एजेंसियाँ वस्तुओं और सेवाओं का क्रय करती हैं.
  2. यह बाजार केन्द्र सरकार के विभागों, राज्य सरकार के विभागों, लोक उपक्रम प्रतिष्ठानों और सम्बद्ध निकायों के लिए है.
  3. यह एक सर्वसमावेशी अभियान है जिसमें सभी प्रकार के विक्रेताओं और सेवा-प्रदाताओं को सशक्त किया जाएगा, जैसे – MSMEs, स्टार्ट-अप, स्वदेशी निर्माता, महिला उद्यमी, स्वयं सहायता समूह (SHGs).
  4. इस बाजार का उद्देश्य सरकारी खरीद में भ्रष्टाचार दूर करना तथा उसमें पारदर्शिता, सक्षमता और गति लाना है.
  5. सरकारी ई-बाजार एक 100% सरकारी कम्पनी है जिसकी स्थापना केन्द्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अधीन हुई है.

GEM से फायदे

  • विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा के चलते उत्पाद की कीमतों में कमी (15-20% ↓)
  • अवैध रूप से सरकारी खरीददारी पर रोक लगेगी.
  • इस अभियान का एक उद्देश्य नकद रहित, सम्पर्क रहित और कागज़ रहित लेन-देन को बढ़ावा देना है जिससे कि डिजिटल इंडिया के लक्ष्य को पाया जा सके.

GEM पोर्टल में आने वाली दिक्कतें

  • GeM के माध्यम से खरीददारी कर रहे लोगों की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि GeM किसी भी तरह की खरीद-बिक्री की जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं लेता.
  • इस पोर्टल पर उपलब्ध सामान की कीमत और उपलब्धता पर इसे चलाने वाले विभाग DGS&D का कोई नियंत्रण नहीं होता.
  • उत्पादों की रेट एक समान नहीं है और हमेशा उतार-चढ़ाव होता रहता है जिससे एक ही विभाग एक ही सामान के अलग-अलग समय पर अलग-अलग दाम चुकाता है.
  • GeM के जरिये खरीददारी करते वक़्त कई अलग-अलग ID देनी पड़ती है. इसे लेकर अधिकृत अधिकारी एतराज जताते हैं.

GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Bilateral, regional and global groupings and agreements involving India and/or affecting India’s interests.

Topic : Non-Aligned Movement summit

संदर्भ

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शनिवार को कुवैत और बहरीन के अपने समकक्षों के साथ मुलाकात की और उनके साथ द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा की. यह मुलाकात यहां चल रहे गुट-निरपेक्ष आंदोलन (नाम) सम्मेलन से इतर हुई. दोनों खाड़ी देशों के साथ मजबूत द्विपक्षीय संबंधों पर बातचीत हुई है. 120 सदस्य देशों के प्रमुखों को एक मंच पर लाने के लिए शुक्रवार को दो दिवसीय नाम शिखर सम्मेलन शुरू हुआ. भारत इसका संस्थापक सदस्य है.

गुट-निरपेक्ष आंदोलन के बारे में

  • गुट निरपेक्ष आंदोलन की आन्दोलन 1961 में बेलग्रेड में की गयी थी, इसमें भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु तथा यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति जोसिप ब्रोज़ टिटो ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
  • भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में देश ने फैसला किया कि वो इन दोनों में से किसी गुट का हिस्सा नहीं बनेगा. और इनसे इतर गुट निरपेक्षता की नीति अपनाएगा. यानी कि भारत न तो अमेरिका के पक्ष में रहेगा और न ही रूस के पक्ष में बल्कि इनसे अलग एक और गुट का निर्माण करेगा जो दुनिया में शांति कायम करने की कोशिश करेगा. नेहरू के इसी फलसफे के साथ गुट निरपेक्ष आंदोलन की शुरुआत हुई. 1961 में युगोस्लाविया के बेलग्रेड शहर में गुट निरपेक्ष देशों का पहला सम्मेलन हुआ.
  • यह शीत युद्ध के दौरान अस्तित्व में आया था, इसका उद्देश्य नव स्वतंत्र देशों को किसी गुट (अमेरिका व सोवियत संघ) में शामिल होने के बजाय तटस्थ रखना था.
  • गुट निरपेक्ष आन्दोलन के 120 सदस्य तथा 17 पर्यवेक्षक हैं.
  • यह संगठन संयुक्त राष्ट्र के कुल सदस्यों की संख्या का लगभग 2/3 एवं विश्व की कुल जनसंख्या के 55% भाग का प्रतिनिधित्व करता है.

GS Paper 3 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Indian Economy and issues relating to planning, mobilization of resources, growth, development and employment.

Topic : Merger of BSNL and MTNL

संदर्भ

सरकार ने घाटे में चल रही सार्वजनिक क्षेत्र की दूरसंचार कंपनियों बीएसएनएल और एमटीएनएल के लिए 68,751 करोड़ रुपये के पुनरुद्धार पैकेज को बुधवार को मंजूरी दे दी है.

  • इसमें एमटीएनएल का बीएसएनएल में विलय, कर्मचारियों के लिये स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वीआरएस) और 4 जी स्पेक्ट्रम आवंटन शामिल है.
  • वीआरएस पैकेज के तहत पात्र कर्मचारियों को 60 वर्ष की आयु तक कंपनी की सेवा करके अर्जित होने वाली आय का 125 प्रतिशत मिलेगा.
  • वीआरएस पूरी तरह से स्वैच्छिक है. कोई भी इसे अपनाने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है
  • विलय प्रक्रिया पूरी होने तक एमटीएनएल प्रमुख दूरसंचार कंपनी बीएसएनएल की अनुषंगी के रूप में काम करेगी.
  • बीएसएनएल के पुनरुद्धार के लिए 15 हजार करोड़ रुपये के सॉवरेन बॉन्ड लाये जायेंगे. 38 हजार करोड़ रुपये की संपत्तियां बेची जायेंगी. विलय प्रक्रिया पूरी होने तक एमटीएनएल, बीएसएनएल की सब्सिडियरी रहेगी. साथ ही, बीएसएनएल-एमटीएनएल को 4जी स्पेक्ट्रम दिये जाने पर भी सहमति जतायी गयी है.

पृष्ठभूमि

दोनों कंपनियों पर कुल 40,000 करोड़ रुपये का कर्ज है , जिसमें से आधा कर्ज एमटीएनएल का है, जो सिर्फ दिल्ली और मुंबई में परिचालन करती है. दोनों कंपनियां बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए लंबे समय से स्पेक्ट्रम की मांग कर रही थी ताकि 4 जी सेवा शुरू की जा सके.


Prelims Vishesh

GIA – Group of Intellectuals and Academicians :-

  • ग्रुप ऑफ़ इंटेलेक्चुअल्स एंड अकैडेमिशियंस (GIA) भारतीय प्रोफेशनल महिलाओं तथा उद्यमियों, मीडिया पर्सन्स, बुद्धिजीवियों तथा शिक्षाविदों का समूह है, जो समाज में महिलाओं की स्थिति को बेहतर करने के लिए कार्य कर रहे हैं.
  • इसमें राष्ट्रीय नेता, सर्वोच्च न्यायालय के वकील, उद्योगपति, महिला खिलाड़ी, लेखक, कवि, राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता, कॉलेजों के प्रिंसिपल, प्रतिष्ठित संस्थानों के प्रोफेसर, संस्थान के निदेशक, अंतर्राष्ट्रीय खाद्य प्राप्त कलाकार, आईटी प्रोफेशनल इत्यादि शामिल हैं.

East Antarctic Marine Protected Area :-

  • अंटार्कटिक सन्धि के अंतरगत अंटार्कटिका पर किसी भी प्रकार की सैनिक और ओद्योगिक गतिविधि पर पाबंदी है.
  • यह संरक्षित क्षेत्र ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ द्वारा प्रस्तावित किया गया था.
  • अपनी भयंकर सर्दी और अंटार्कटिका तक पहुँच पाने की कठिनाई ने इसे अब तक मानवीय दख़ल से बचाया हुआ है.
  • भूमंडलीय ऊष्मीकरण (ग्लोबल वार्मिन्ग) से इसकी हिमचादर को ख़तरा है लेकिन पूर्वी अंटार्कटिका के भीतरी भागों में साढ़े-चार किलोमीटर तक की मोटी हिमचादर बिछी हुई है.

Chenani-Nashri tunnel renamed :-

  • चेनानी-नाशरी सुरंग का नाम बदलकर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कर दिया गया है.
  • चेनानी-नाशरी सुरंग जिसे पत्नीटॉप सुरंग के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर के राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 44 पर स्थित एक सड़क सुरंग है.
  • इसका कार्य वर्ष 2011 में आरम्भ हुआ तथा उद्धघाटन 2 अप्रैल 2017 को किया गया.
  • यह देश में कला सुरंग (art tunnel) का सबसे लंबा सुरंग है, जो उधमपुर को जम्मू में रामबन से जोड़ता है.

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