Sansar डेली करंट अफेयर्स, 25 May 2020

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Contents

Sansar Daily Current Affairs, 25 May 2020


GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Bilateral, regional and global groupings and agreements involving India and/or affecting India’s interests

Topic : What is the Open Skies treaty?

संदर्भ

अमेरिका ने 35 देशों वाली ओपन स्काई संधि से निकलने की धमकी दी है.

अमेरिका इस संधि से क्यों निकलना चाहता है?

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि रूस लगातार एक साल से पड़ोसी जॉर्जिया और बाल्टिक तट पर रूसी इलाके कालिनिनग्राद में अमेरिकी उड़ानों के लिए अड़चनें पैदा कर रहा है. इसके अलावा उनका यह भी कहना है कि रूस अमेरिकी और यूरोपीय क्षेत्र में अपनी उड़ानों का इस्तेमाल संवेदनशील अमेरिकी इंफ्रास्ट्रक्चर की पहचान करने के लिए कर रहा है जिसे युद्ध की स्थिति में निशाना बनाया जा सके.

ओपन स्काई संधि क्या है?

  • ओपन स्काई संधि का प्रस्ताव सबसे पूर्व 1955 में अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आईजनहावर ने रखा था. इस पर अंतत: 1992 में हस्ताक्षर हुए और 2002 से इस पर अमल प्रारम्भ हुआ.
  • ओपन स्काई समझौता प्रत्येक हस्ताक्षरकर्ता देश की सेना को हर वर्ष किसी अन्य सदस्य देश की हवाई सीमा में अल्प सूचना पर एक निश्चित संख्या में निगरानी उड़ानों का संचालन करने की अनुमति देता है.
  • विमान सैन्य प्रतिष्ठानों और गतिविधियों की जानकारी और चित्र एकत्र कर सकता है.
  • रूस और अमेरिका सहित इस संधि में 35 हस्ताक्षरकर्ता हैं, हालांकि एक हस्ताक्षरकर्ता किर्गिस्तान ने अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की है.
  • इसका मूल विचार यह है कि प्रतिद्वंद्वी जितना अधिक एक दूसरे के बारे में जानते हैं, संघर्ष की संभावना उतनी ही कम होगी.

आगे की राह

अमेरिका अगर इस संधि से निकलता है तो फिर ऐसी रूसी उड़ानें अमेरिकी वायु क्षेत्र में संभव नहीं हो पाएंगी. इसके बाद रूस भी समझौते से हट सकता है और फिर अन्य सदस्य देश भी रूसी उड़ानों के लिए अपने आकाश को बंद कर सकते हैं. इससे पूरे यूरोपीय क्षेत्र की सुरक्षा प्रभावित होगी, विशेषकर ऐसे समय में जब रूस समर्थित अलगाववादी यूक्रेन और जॉर्जिया के कुछ क्षत्रों पर नियंत्रण किए हुए हैं.


GS Paper 3 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Technology missions; economics of animal-rearing.

Topic : Beekeeping in India

संदर्भ

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने हाल ही में राष्‍ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) द्वारा आयोजित वेबिनार को सम्‍बोधित करते हुए कहा कि किसानों की आय दुगनी करने के अपने लक्ष्‍य के तहत सरकार मधुमक्खी पालन को प्रोत्साहन दे रही है. इस आयोजन का उद्देश्य कृषि आय और कृषि उत्पादन बढ़ाने के साधन के रूप में भूमिहीन ग्रामीण गरीब, छोटे और सीमांत लोगों के लिए आजीविका के स्रोत के रूप में वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन को लोकप्रिय बनाना है.

सरकार द्वारा किये गये प्रयास

  • सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत मधुमक्खी पालन के लिए 500 करोड़ रुपये का आवंटन किया है. सरकार मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए गठित की गई समिति  की सिफारिशों का कार्यान्‍वयन कर रही है.
  • प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के मार्गदर्शन में सरकार ने मीठी क्रांति के तहत हनी मिशन की भी घोषणा की है, जिसके चार भाग है, इसका भी पर्याप्त लाभ मिलेगा.
  • राष्‍ट्रीय मधुमक्‍खी बोर्ड ने राष्‍ट्रीय मधुमक्‍खी पालन एवं मधु मिशन (एनबीएचएम) के लिए मधुमक्खी पालन के प्रशिक्षण के लिए चार माड्यूल निर्मित किये गए हैं, जिनके माध्यम से देश में 30 लाख किसानों को प्रशिक्षण दिया गया है. इन्हें सरकार द्वारा वित्‍तीय सहायता भी उपलब्ध कराई जा रही है.
  • महिला समूहों द्वारा जैविक शहद व जंगली शहद के उत्पादन, ब्रांडिंग और विपणन को बढ़ावा देने के लिए अपनी सरकार ने विभिन्न कदम उठाये हैं.

मुख्य तथ्य

  • भारत विश्व में शहद के 5 सबसे बड़े उत्पादकों में है.
  • भारत में वर्ष 2005-06 की तुलना में अब शहद उत्पादन 242 प्रतिशत बढ़ गया है, वहीं इसके निर्यात में 265 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

आगे की राह

बढ़ता शहद निर्यात इस बात का प्रमाण है कि मधुमक्‍खी पालन 2024 तक किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्‍य हासिल करने की दिशा में महत्‍वपूर्ण कारक रहेगा. मधुमक्खी पालन का काम गरीब व्यक्ति भी कम पूंजी में अधिक मुनाफा प्राप्त करने के लिए कर सकता है. 500 करोड़ रुपये के पैकेज से मधुमक्खी पालकों के साथ ही किसानों की भी दशा और दिशा सुधारने में मदद मिलेगी.


GS Paper 3 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Conservation, environmental pollution and degradation, environmental impact assessment.

Topic : Preservation of Eastern, Western Ghats

संदर्भ

हाल ही में 21 मई, 2020 को केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बातचीत की. इस बैठक में पश्चिमी घाट को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (Eco-sensitive area – ESA) घोषित करने से संबंधित चर्चा हुई.

मुख्य तथ्य

वीडियो सम्मेलन में भाग लेने वाले राज्यों में कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, गोवा, तमिलनाडु और गुजरात शामिल हैं. भारत सरकार ने डॉ. कस्तूरीरंगन के तहत एक उच्च स्तरीय कार्य समूह का गठन किया. इस समिति ने राज्यों में भौगोलिक क्षेत्रों की पहचान की जिन्हें पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की आवश्यकता है. समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के आधार पर, केंद्र सरकार ने 2018 में क्षेत्रों को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESA) के रूप में अधिसूचित करने के लिए एक ड्राफ्ट नोटिस जारी किया.

महाराष्ट्र

 महाराष्ट्र राज्य ने अधिक से अधिक गांवों को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के रूप में शामिल करने का प्रस्ताव दिया. अपने प्रस्ताव के तहत, महाराष्ट्र ने ईएसए के तहत 2,092 गांवों को शामिल करने का अनुरोध किया है. केंद्र ने 2,133 गांवों को शामिल करने का प्रस्ताव दिया था.  ये गाँव पश्चिमी घाट के 37% हिस्से को कवर करते हैं.

पृष्ठभूमि

पश्चिमी घाटों की जैव-विविधता को संरक्षित और सुरक्षित करने के उद्देश्य से और साथ ही इस क्षेत्र में सतत समावेशी विकास होने देने के उद्देश्य से सरकार ने डॉ. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय कार्यदल का गठन किया था. इस समिति ने यह सुझाव दिया कि केरल, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु के चुने हुए भूभागों को पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया जाए.

पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) क्या होते हैं?

ये वे क्षेत्र हैं जो सुरक्षित क्षेत्रों, राष्ट्रीय उद्यानों एवं वन्यजीव आश्रयणियों के चारों ओर 10 किलोमीटर के भीतर स्थित होते हैं. इन क्षेत्रों का चयन पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम, 1986 के अंतर्गत किया गया है.

ESA के उद्देश्य

  • इन क्षेत्रों के आस-पास होने वाली गतिविधियों को नियंत्रित करना.
  • यह व्यवस्था करना कि अत्यंत सुरक्षित क्षेत्र कालान्तर में अपेक्षाकृत कम सुरक्षित क्षेत्रों में बदल सकें.
  • पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम, 1986 के अनुभाग 3(2)(v) के अनुसार कतिपय औद्योगिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाना एवं उद्योगों के द्वारा कुछ सुरक्षात्मक उपाय लागू करवाना.

गाडगिल समिति की अनुशंसाएँ

  • गाडगिल समिति ने पश्चिमी घाटों की परिभाषा दी और यह अनुशंसा की कि इस पूरे क्षेत्र को पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र (ecologically sensitive area – ESA) घोषित किया जाए. इस क्षेत्र के अन्दर भी तीन पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील जोन (ecologically sensitive zones – ESZ) I, II अथवा III बनाए जाएँ जो और यह वर्गीकरण वहाँ की वर्तमान दशा और खतरे की प्रकृति को देखते हुए किया जाए.
  • समिति का प्रस्ताव था कि पश्चिमी घाट को 2,200 ग्रिडों में बाँटा जाए, जिनमें 75% ESZ I अथवा II के अन्दर आएँ अथवा पहले से विद्यमान सुरक्षित क्षेत्रों, जैसे – वन्य-जीवन आश्रयणियों अथवा प्राकृतिक उद्यानों के अन्दर हों.
  • समिति ने पश्चिमी घाटों की गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए एक पश्चिमी घाट पर्यावरण प्राधिकरण (Western Ghats Ecology Authority) स्थापित करने का प्रस्ताव भी दिया था.

फिर कस्तूरीरंगन समिति की आवश्यकता क्यों?

गाडगिल समिति का रिपोर्ट अगस्त, 2011 में आया परन्तु उसे किसी भी पश्चिम घाट के राज्य ने स्वीकार नहीं किया. इसलिए अगस्त, 2012 में पर्यावरण मंत्रालय ने एक नई समिति बनाई जिसके अध्यक्ष कस्तूरीरंगन नियुक्त हुए थे. इस समिति को कहा गया कि वह गाडगिल समिति के रिपोर्ट का अध्ययन कर एक नए ढंग का रिपोर्ट दें जो सबके लिए मान्य हो.

कस्तूरीरंगन समिति की अनुशंसाएँ

  • पश्चिमी घाट में कोयले का नया बिजली घर नहीं बनाया जाए, अपितु पनबिजली की परियोजनाएँ लगाई जाएँ.
  • प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग यहाँ प्रतिबंधित हों.
  • 20,000 वर्गमीटर तक के भवन और निर्माण परियोजनाओं को अनुमति मिले पर टाउनशिप पूरी तरह मना हो.
  • जंगल को हटाने की अनुमति मिले परन्तु बहुत अधिक सुरक्षात्मक निर्देशों के साथ.
  • इस समिति ने सुझाव दिया था कि खनन के जो काम चल रहे हैं, उनको धीरे-धीरे पाँच वर्षों में बंद कर देना चाहिए.
  • समिति की यह भी अनुशंसा थी कि यहाँ जो भी निर्माण कार्य हों, उनके लिए पर्यावरण विषयक अनुमति अनिवार्य होनी चाहिए.
  • समिति का यह भी कहना था कि भविष्य में यहाँ जो भी परियोजनाएँ लागू की जाएँ उनके बारे में निर्णय लेते समय क्षेत्र के गाँवों की राय भी ली जाए.

पूर्वी घाट

  • पूर्वी घाट भारत के पूर्वी तट पर स्थित पर्वत श्रेणी है. पूर्वी घाट बंगाल की खाड़ी के सहारे अनियमित पर्वतश्रेणी है.
  • यह उत्तरी उड़ीसा से लेकर तमिलनाडु तक लगभग 3000 किमी तक विस्तृत है.
  • सिरूमलाई और कोल्ली हिल्स यहाँ के हिल स्टेशन हैं.
  • पूर्वी घाट के दक्षिण पश्चिम में शेवराय, जावेडी एंव बिलिगिरी रंगन की पहाडियाँ अवस्थित हैं.
  • कृष्णा और चेन्नई के मध्य इसे कोडाविंडु हिल्स के नाम से जाना जाता है.
  • आँध्रप्रदेश में स्थित अरोयाकोंडा पूर्वी घाट का सबसे ऊँचा शिखर है जिसकी ऊँचाई सागर तल से 16 मीटर है.
  • दूसरा सबसे ऊँचा शिखर देवड़ीमुण्डा समुद्र तल से 1598 मीटर है. इसके अतिरिक्त सिंधूराजू (1516मीटर ) और निमालगिरी (1515मीटर) कोरापुट में स्थित हैं, जबकि महेन्द्रगिरी (1501 मीटर ) गंजम जिले में स्थित है.
  • पूर्वी घाट का उद्भव कैलीडोनियन युगीन कुडप्पा भूसन्नति (Geosyncline) से हुआ है जो विभिन्न नदियों जैसे – महानदी , गोदावरी , कृष्णा , कावेरी इत्यादि द्वारा काट दिया गया है.

पूर्वी घाट से जुड़ी समस्याएँ

  • पूर्वी घाट पर लंबी पर्वत श्रेणियों को पर्यावरणवेत्ता न केवल पर्यावरण, बल्कि जैव भौगोलिक, सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी काफी जरूरी मानते हैं.
  • वनों की कटाई, अंधाधुंध उत्खनन, बड़े बांधों का निर्माण, भूमि का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग, वनों में आग, ऊर्जा उत्पादन केंद्र सहित कई कारण हैं, जिनसे पूर्वी घाटों पर पर्यावरण का खतरा मंडरा रहा है.
  • गत दशकों में इन पर्वत श्रेणियों को इतनी क्षति पहुँचाई गई है कि उसकी भरपाई नामुमकिन है.

पश्चिम घाट

  • पश्चिमी घाट पर्वतीय क्षेत्र भारत के पश्चिमी तट के सहारे लगभग 1600 किमी. की लंबाई में महाराष्ट्र व गुजरात की सीमा से लेकर कुमारी अंतरीप तक विस्तृत है. यह दो भागों में बांटी जाती है – उत्तरी सहयाद्रि व दक्षिणी सहयाद्रि.
  • इसे महाराष्ट्र व कर्नाटक में ‘सहयाद्रि’’ और केरल में ‘सहय पर्वतम’ कहा जाता है.
  • पश्चिमी घाट पर्वत श्रेणी को यूनेस्को ने अपनी विश्व विरासत स्थल’ सूची में शामिल किया है और यह विश्व के ‘जैवविविधता हॉटस्पॉट्स’ में से एक है.

पश्चिमी घाट से संबंधित मुद्दे

  • इन क्षेत्रों में भू-संचालन, भूमि उप-विभाजन, पार्श्व प्रसार (दरार) और मिट्टी की कटाई से भूस्खलन का अनवरत खतरा बना रहता है. इस प्रकार की स्थितियाँ केरल के त्रिशूर और कन्नूर ज़िलों में ज्यादा पाई जाती हैं.
  • अत्यधिक वर्षा, अवैज्ञानिक कृषि एवं निर्माण गतिविधियाँ भी भूस्खलन के लिए जिम्मेदार हैं.
  • पश्चिमी घाट के अधिकांश ढलानों का प्रयोग फसलों को उगाने के लिए किया जाता है जिससे कृषि के दौरान प्राकृतिक जल निकासी प्रणालियांँ अवरुद्ध हो जाती हैं जो भूस्खलन की प्रायिकता में वृद्धि लाते हैं.
  • पश्चिमी घाट की प्रमुख पारिस्थितिकीय समस्याओं में जनसंख्या और उद्योगों का दबाव सम्मिलित है.
  • पश्चिमी घाट में होने वाली पर्यटन गतिविधियों के चलते भी इस क्षेत्र पर और यहाँ की वनस्पति पर दबाव पड़ा है.
  • नदी घाटी परियोजनाओं के अंतर्गत वन भूमि का डूबना और वन भूमि पर अतिक्रमण भी एक नवीन समस्या है.
  • पश्चिमी घाट की जैव विविधता के ह्रास की बड़ी वजह खनन कार्य है.
  • चाय, कॉफी, रबड़, यूकेलिप्टस की एक फसलीय कृषि व्यवस्था इस क्षेत्र की जैव विविधता को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही है.
  • रेल और सड़क जैसी बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ भी इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर दबाव बना रही हैं.
  • भू-क्षरण और भू-स्खलन जैसे प्राकृतिक तथा मानवीय कारणों से भी पश्चिमी घाट की जैव विविधता प्रभावित हुई है.
  • तापीय ऊर्जा संयंत्रों के प्रदूषण के चलते भी जैव विविधता प्रभावित हो रही है.
  • पश्चिमी घाट की अधिकांश नदियाँ खड़े ढलानों से उतरकर तेज गति से बहती हैं जिसके फलस्वरूप वे पुराने बांधों को सरलता से तोड़ देती हैं साथ ही वनों की कटाई के पश्चात् कमज़ोर हुई ज़मीन को आसानी से काट भी देती हैं.
  • पुराने बांधों की समय पर मरम्मत न होना सदैव बाढ़ को आमंत्रित करता है.

GS Paper 3 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Science and Technology- developments and their applications and effects in everyday life Achievements of Indians in science & technology; indigenization of technology and developing new technology.

Topic : What is Quantum entanglement?

संदर्भ

सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक विश्लेषण करके कलकत्ता के शोधकर्ताओं ने एक नया प्रोटोकोल विकसित किया है जिससे यह पता लगाया जा सकता है कि इलेक्ट्रोन का जोड़ा पारस्परिक रूप से आबद्ध अवस्था में है अथवा नहीं. इस अवस्था में होने से इन इलेक्ट्रानों का उपयोग कणिका सूचना प्रक्रिया (quantum information processing) के काम में हो सकता है.

यह प्रोटोकॉल क्या है?

यह एक पूर्ण रूप से ऑप्टिकल व्यवस्था है जिसमें बेटा बेरियम बोरेट (Beta barium borate – BBO) क्रिस्टलों पर लेजर प्रकाश डालकर फोटोन के दो परस्पर आबद्ध जोड़े बनाए जाते हैं.

कणिका आबद्धता क्या है?

कणिका आबद्धता एक यांत्रिक घटना है जिसमें 2000 से अधिक वस्तुओं की कणिका अवस्थाओं को एक दूसरे के सन्दर्भ में वर्णित किया जाता है चाहे ये वस्तुएँ एक-दूसरे से अलग क्यों न हों.

यह एक भौतिक घटना है जो उस समय घटित होती है जब कणों का एक जोड़ा अथवा समूह उत्पन्न होने के बाद आपस में इस प्रकार प्रतिक्रिया करता है कि उसके प्रत्येक कण की कणिका अवस्था को दूसरे कण की कणिका अवस्था से स्वतंत्र रूप से वर्णित नहीं किया जा सकता है.

माहात्म्य

कणिका परस्पर आबद्धता कणिका यांत्रिकी उन विशिष्टताओं में से एक है जिसके कारण कणिका दूर परिवहन एवं अत्यंत घनत्व वाली कोडिंग जैसे कार्य संभव हो जाते हैं.

और जानकारी के लिए यह विडियो देखिये >


GS Paper 3 Source : Indian Express

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UPSC Syllabus : Awareness in space.

Topic : What is the SpaceX Demo-2 mission?

संदर्भ

अमेरिका ने 2011 में अन्तरिक्ष में शटल भेजना बंद कर दिया था. उसके पश्चात् अब पहली बार वह मई 27 को अपनी मिट्टी से मानव सहित एक शटल छोड़ने वाला है जो अंतर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष केंद्र (International Space Station – ISS) तक जाएगा. नासा के इस शटल को SpaceX Demo-2 मिशन  नाम दिया गया है.

SpaceX Demo02 मिशन क्या है?

यह नासा के व्यावसायिक क्रू कार्यक्रम का एक अंग है जिसके अंतर्गत स्पेस एक्स के क्रू ड्रैगन अन्तरिक्षयान से दो अन्तरिक्षयात्रियों को अन्तरिक्ष में भेजा जाएगा. यह अभियान मूलतः एक उड़ान परीक्षण है जिसका ध्येय यह पता लगाना है कि स्पेस एक्स की क्रू परिवहन प्रणाली का प्रयोग अन्तरिक्ष केंद्र तक क्रू को भेजने और वहां से लाने में प्रयोग हो सकता है अथवा नहीं.

इस प्रणाली का यह अंतिम उड़ान परीक्षण होगा जो कार्यक्रम के विभिन्न अवयवों पर मुहर लगाएगा, जैसे – अन्तरिक्षयान (क्रू ड्रैगन), प्रक्षेपण यान (फाल्कन 9), लॉन्च पैड (LC-39A) तथा संचालन की विभिन्न क्षमताएँ.

व्यावसायिक क्रू कार्यक्रम (Commercial Crew Program) क्या है?

यह कार्यक्रम मानव एवं सामग्रियों के अंतर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष केंद्र तक आवागमन को सुलभ बनता है जिससे कि बेहतर ढंग से वैज्ञानिक अनुसंधान संभव हो सके.

निजी प्रतिभागिता

अन्तरिक्षयात्रियों और कार्गो को अन्तरिक्ष में ले जाने और लाने में बोईंग एवं स्पेस एक्स जैसी निजी कम्पनियों का सहयोग लिया जा रहा है जिससे कि नासा अपना ध्यान मात्र अन्तरिक्षयान एवं रॉकेट बनाने पर केन्द्रित कर सके और गहन अन्तरिक्ष में खोज के लिए अभियान चलाये जा सकें.


Prelims Vishesh

 Revised criteria for medium units :-

  • पिछले दिनों भारत सरकार ने MSME की परिभाषा बदल दी थी. इसके साथ ही मीडियम इकाइयों के लिए निर्धारित मानदंड को संशोधित करते हुए उनके लिए निवेश एवं टर्न ओवर की सीमाएँ क्रमशः 50 करोड़ और 200 करोड़ बढ़ा दी गई हैं.
  • अब 1 करोड़ के तक के निवेश और 5 करोड़ के टर्नओवर वाले प्रतिष्ठान को माइक्रो (सूक्ष्म) कहा जाएगा. इसी प्रकार 10 करोड़ तक के निवेश और 50 करोड़ तक के टर्नओवर वाली कम्पनी को अब स्माल (लघु) कहा जाएगा.

National Test Abhyas :-

  • पिछले दिनों भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक कृत्रिम बुद्धि से चलने वाले मोबाइल ऐप का अनावरण किया है.
  • यह ऐप राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (National Testing Agency – NTA) ने JEE में और NEET की आगामी परीक्षाओं के लिए पढ़ रहे छात्रों को मौक टेस्ट उपलब्ध करने के लिए तैयार किया है.

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