Sansar डेली करंट अफेयर्स, 23 May 2020

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Sansar Daily Current Affairs, 23 May 2020


GS Paper 2 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Welfare schemes for vulnerable sections of the population by the Centre and States and the performance of these schemes; mechanisms, laws, institutions and bodies constituted for the protection and betterment of these vulnerable sections.

Topic : PM Ujjwala Yojana

संदर्भ

प्रधानमन्त्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के बीच अब तक ‘6.8 करोड़ मुफ्त एलपीजी सिलेंडर’ वितरित किए गए हैं

प्रधानमन्त्री उज्ज्वला योजना

  • पीएमयूवाई की शुरूआत एक मई 2016 को की गयी. इसके तहत मार्च 2019 तक गरीब परिवार की पांच करोड़ महिलाओं को नि:शुल्क गैस कनेक्शन उपलब्ध कराने का लक्ष्य था. बाद में लक्ष्य को बढ़ाकर 2021 तक 8 करोड़ कर दिया गया और अब सभी घर को गैस कनेक्शन उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है.
  • प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) का शुभारम्भ डॉ. बी.आर.अम्बेडकर की जयंती परतेलंगाना राज्य में किया गया.
  • प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का लक्ष्य गरीब परिवारों तक एलपीजी (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) कनेक्शन पहुँचाना है.
  • इस योजना के अंतर्गत सामाजिक-आर्थिक-जाति-जनगणना (SECC) के माध्यम से पहचान किये गए गरीबी रेखा के नीचे आने वाले परिवारों की वयस्क महिला सदस्य को केंद्र सिरकार द्वारा प्रति कनेक्शन 1600 रुपये की वित्तीय सहायता के साथ जमा-मुक्त एलपीजी कनेक्शन दिया जाता है.
  • यह योजना पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा लागू की जा रही है.

PMUY के फायदे

  • शुद्ध ईंधन के प्रयोग से महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार
  • अशुद्ध जीवाश्‍म ईंधन के प्रयोग न करने से वातावरण में कम प्रदूषण
  • खाने पर धुएं के असिर से मृत्‍यु में कमी
  • छोटे बच्‍चों में स्‍वास्‍थ्‍य समस्या से छुटकारा.

चुनौतियाँ

  • सिलिंडरों की खपत कम है और उनकी आपूर्ति में अच्छी-खासी देरी होती है.
  • इस योजना के अंतर्गत 31 मार्च, 2018 तक जिन उपभोक्ताओं ने योजना का लाभ उठाया है उनकी संख्या 93 करोड़ है. परन्तु एक वर्ष में उन्हें औसत रूप से 3.66 रिफिल ही मिले हैं.
  • 31 दिसम्बर, 2018 की तिथि को 18 करोड़ लाभार्थी इस योजना का लाभ उठा रहे थे, पर उन्हें वार्षिक रूप से मात्र 3.21 रिफिल ही मिले.
  • इस योजना के अंतर्गत कुछ ऐसे लोगों को भी लाभ निर्गत कर दिया गया है जो लाभार्थी नहीं थे. सिरकारी तेल विपणन कंपनियों के सॉफ्टवेर में त्रुटि के चलते ऐसा हुआ है. ये वास्तविक लाभार्थियों की सही पहचान नहीं कर पाते हैं.

CAG के सुझाव

  • LPG डेटाबेस की जाँच होनी चाहिए जिससे विसंगतियों का पता लगाकर उन्हें दूर किया जाए.
  • आपूर्ति में दुहराव को निरस्त करने के लिए वर्तमान के साथ-साथ नए लाभार्थी परिवारों के वयस्क सदस्यों का आधार नंबर भी अंकित किया जाए.
  • पात्रता रहित लाभार्थियों को गैर-निर्गत न हो जाए इससे बचने के लिए वितरकों के सॉफ्टवेर को सुधारने हेतु समुचित उपाय किये जाएँ.

GS Paper 2 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Welfare schemes for vulnerable sections of the population by the Centre and States and the performance of these schemes; mechanisms, laws, institutions and bodies constituted for the protection and betterment of these vulnerable sections.

Topic : Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA)

संदर्भ

ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग ने मनरेगा के दिहाड़ीदारों के लिए 170 करोड़ की राशि जारी कर दी है. लॉकडाउन और महामारी के समय में ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीबों को आर्थिक परेशानी न हो, इसको देखते हुए विभाग ने इससे पहले मनरेगा के दिहाड़ीदारों के लिए 183 करोड़ की राशि जारी की थी.

मनरेगा क्या है?

  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम अर्थात् मनरेगा को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, 2005 (NREGA- नरेगा) के रूप में प्रस्तुत किया गया था. वर्ष 2010 में नरेगा (NREGA) के नाम में बदलाव किया गया और मनरेगा (MGNREGA) रख दिया गया.
  • ग्रामीण भारत को ‘श्रम की गरिमा’ से परिचित कराने वाला मनरेगा रोज़गार की कानूनी स्तर पर गारंटी देने वाला विश्व का सबसे बड़ा सामाजिक कल्याणकारी कार्यक्रम है.
  • मनरेगा कार्यक्रम के अंतर्गत हर भारतीय परिवार के अकुशल श्रम करने के इच्छुक वयस्क सदस्यों के लिये 100 दिन का गारंटीयुक्त रोज़गार, दैनिक बेरोज़गारी भत्ता एवं परिवहन भत्ता (5 किमी. से अधिक दूरी की दशा में) का प्रावधान किया गया है. विदित हो कि सूखाग्रस्त क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों में मनरेगा के अंतर्गत 150 दिवसों के रोज़गार का प्रावधान है.
  • मनरेगा एक राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम है. आज की तिथि में इस कार्यक्रम में पूर्णरूप से शहरों की श्रेणी में आने वाले कुछ जिलों को छोड़कर देश के सभी जिलें सम्मिलित हैं. मनरेगा के अंतर्गत मिलने वाले वेतन के निर्धारण का अधिकार केंद्र एवं राज्य सरकारों के पास निहित है.
  • जनवरी 2009 से केंद्र सरकार सभी राज्यों हेतु अधिसूचित की गई मनरेगा मजदूरी दरों को हर वर्ष संशोधित करती है.

मनरेगा की प्रमुख विशेषताएँ

  • पूर्व की रोज़गार गारंटी योजनाओं के ठीक उलट मनरेगा के अंतर्गत ग्रामीण परिवारों के वयस्क युवाओं को रोज़गार का कानूनी अधिकार दिया जाता है.
  • प्रावधान के अनुसार, मनरेगा लाभार्थियों में 1/3 महिलाओं का होना अनिवार्य है. साथ ही विकलांग एवं अकेली महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहन देने का प्रावधान किया गया है.
  • मनरेगा के अंतर्गत मजदूरी का भुगतान न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के अंतर्गत राज्य में खेतिहर मज़दूरों हेतु निर्दिष्ट मजदूरी के अनुसार ही किया जाता है, जब तक कि केंद्र सरकार मजदूरी दर को अधिसूचित नहीं करती और यह 60 रुपए प्रतिदिन से कम नहीं हो सकती.
  • इसके प्रावधान के अनुसार, आवेदन जमा करने के 15 दिनों के अंदर या जिस दिन से कार्य की मांग की जाती है, आवेदक को रोज़गार दिया किया जाएगा.
  • पंचायती राज संस्थानों को मनरेगा के अंतर्गत किये जा रहे कार्यों के नियोजन, कार्यान्वयन और निगरानी के लिए उत्तरदायी बनाया गया है.
  • मनरेगा में सभी कर्मचारियों हेतु बुनियादी सुविधाओं जैसे- पेय जल और प्राथमिक चिकित्सा आदि के प्रावधान भी किये गए हैं.
  • मनरेगा के अतर्गत आर्थिक बोझ केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा साझा किया जाता है.
  • मनरेगा कार्यक्रम के अंतर्गत कुल तीन क्षेत्रों पर धन व्यय किया जाता है, वे क्षेत्र हैं – (1) अकुशल, अर्द्ध-कुशल और कुशल श्रमिकों की मजदूरी (2) आवश्यक सामग्री (3) प्रशासनिक लागत.
  • केंद्र सरकार अकुशल श्रम की लागत का 100%, अर्द्ध-कुशल और कुशल श्रम की लागत का 75%, सामग्री की लागत का 75% तथा प्रशासनिक लागत का 6% वहन करती है, वहीं शेष लागत का वहन राज्य सरकार करती है.

मनरेगा की उपलब्धियाँ

  • मनरेगा विश्व का सबसे बड़ा सामाजिक कल्याण कार्यक्रम है जिसने ग्रामीण श्रम में एक सकारात्मक परिवर्तन को प्रेरित किया है. आँकड़ों की मानें तो कार्यक्रम के प्रारम्भिक 10 सालों में कुल 3.14 लाख करोड़ रुपए खर्च किये गए.
  • मनरेगा कार्यक्रम ने ग्रामीण गरीबी को घटाने हेतु अपने उद्देश्य की पूर्ति करते हुए ग्रामीण क्षेत्र के लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में सफलता प्राप्त की है.
  • आजीविका और सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से मनरेगा ने ग्रामीण गरीब महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए एक सशक्त साधन के रूप में कार्य किया है. आँकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2015-16 में मनरेगा के जरिये उत्पन्न कुल रोज़गार में से 56 प्रतिशत महिलाओं के लिये था.
  • आँकड़ों को देखा जाए तो वर्ष 2013-14 में मनरेगा के अंतर्गत कार्यरत व्यक्तियों की संख्या 7.95 करोड़ थी जो कि वर्ष 2014-15 में घटकर 6.71 करोड़ रह गई परन्तु उसके पश्चात् यह बढ़कर क्रमशः वर्ष 2015-16 में 7.21 करोड़, वर्ष 2016-17 में 7.65 करोड़ तथा वर्ष 2018-19 में 7.76 करोड़ हो गई.
  • इस कार्यक्रम में कार्यरत व्यक्तियों के आयु-वार आँकड़ों के विश्लेषण से हमें ज्ञात होता है कि वित्त वर्ष 2017-18 के पश्चात् 18-30 वर्ष के आयु वर्ग के श्रमिकों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है.
  • मनरेगा ने आजीविका के अवसरों के सृजन के जरिये अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के उत्थान में भी सहायता की है.
  • विदित हो कि मनरेगा को 2015 में वर्ल्ड बैंक ने विश्व के सबसे बड़े लोकनिर्माण कार्यक्रम के रूप में मान्यता दी थी.
  • नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) के एक प्रतिवेदन के अनुसार, गरीब व सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों, जैसे – मज़दूर, आदिवासी, दलित एवं छोटे सीमांत कृषकों के मध्य गरीबी कम करने में मनरेगा की बहुत ही सराहनीय भूमिका रही है.

मनरेगा से संबंधित चुनौतियाँ

  • पिछले कुछ वर्षों में मनरेगा के अंतर्गत आवंटित बजट काफी कम रहा है, जिसका प्रभाव मनरेगा में काम कर रहे कर्मचारियों के वेतन पर पड़ता है. वेतन में कमी के चलते इसका प्रत्यक्ष प्रभाव ग्रामीणों की शक्ति पर पड़ता है और वे अपनी मांग में कमी कर देते हैं.
  • एक आँकड़े से पता चलता है कि मनरेगा के अतर्गत किये जाने वाले 78% भुगतान समय पर नहीं किये जाते और 45% भुगतानों में विलंबित भुगतानों के लिये दिशा-निर्देशों के अनुसार मुआवज़ा सम्मिलित नहीं था, जो अर्जित मजदूरी का 0.05% प्रतिदिन है. आँकड़ों की मानें तो वित्त वर्ष 2017-18 में अदत्त मजदूरी 11,000 करोड़ रुपए थी.
  • न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के आधार पर मनरेगा की मजदूरी दर निर्धारित न करने के चलते मजदूरी दर बहुत ही स्थिर हो गई है. आज की तिथि में अधिकांश राज्यों में मनरेगा के अतर्गत मिलने वाली मजदूरी न्यूनतम मजदूरी से बहुत ही कम है. यह स्थिति कमज़ोर वर्गों को वैकल्पिक रोज़गार खोजने को मजबूर कर देता है.
  • वर्ष 2012 में कर्नाटक में मनरेगा से सम्बंधित एक घोटाला चर्चा में आया था जिसमें करीब 10 लाख फर्ज़ी मनरेगा कार्ड निर्मित किये गए थे. इसके चलते सरकार को तकरीबन 600 करोड़ रुपए की हानि हुई थी. भ्रष्टाचार मनरेगा की एक बड़ी चुनौती है जिससे निपटना जरूरी है. ज्यादातर यह देखा जाता है कि इसके अंतर्गत आवंटित धन का अधिकतर भाग मध्यस्थों के पास चला जाता है.

GS Paper 2 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Government policies and interventions for development in various sectors and issues arising out of their design and implementation.

Topic : General Financial Rules

संदर्भ

MSME कम्पनियों के लाभ के लिए भारत सरकार ने सामान्य वित्त नियमावली (General Financial Rules – GFRs) में संशोधन करते हुए यह प्रावधान किया है कि 200 करोड़ रु. से कम मूल्य वाली वस्तुओं और सेवाओं का क्रय केवल घरेलू प्रतिष्ठानों से किया जाए.

निहितार्थ

इन संशोधनों का निहितार्थ यह है कि 200 करोड़ रुपयों से कम सरकारी क्रय के लिए अब से वैश्विक टेंडर नहीं होंगे जैसा कि आत्म निर्भर भारत पैकेज की घोषणा करते हुए कहा गया था.

सामान्य वित्त नियमावली (GFR) क्या है?

सामान्य वित्त नियमावली सार्वजनिक वित्त से सम्बंधित नियम को कहते हैं. यह नियमवाली सबसे पहले 1947 में उस समय विद्यमान सभी आदेशों को समेकित करते हुए निर्गत की गई थी. इसमें वित्तीय विषयों से सम्बंधित निर्देश दिए गये हैं.

ये नियम मंत्रालयों और विभागों पर लागू होते हैं. क्रय करने वाले विभाग क्रय के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनाएँ इसके निर्देश इस नियमावली में मिलते हैं. विभिन्न परिस्थितियों को देखते हुए इसमें लचीलेपन की गुंजाइश भी रखी गई है.


GS Paper 3 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Issues related to direct and indirect farm subsidies and minimum support prices; Public Distribution System objectives, functioning, limitations, revamping; issues of buffer stocks and food security; Technology missions; economics of animal-rearing.

Topic : Odisha adopts contract farming system

संदर्भ

COVID-19 महामारी से उत्पन्न विषम परिस्थिति को ध्यान में रखकर ओडिशा सरकार ने एक अध्यादेश निर्गत कर निवेशकों और किसानों को संविदा कृषि (Contract farming) के लिए समझौता करने की अनुमति प्रदान कर दी है.

अध्यादेश का महत्त्व

  • इस अध्यादेश से किसानों और प्रायोजकों दोनों को संविदा कृषि की कुशल प्रणाली अपनाने और उसका लाभ उठाने में सहायता मिलेगी.
  • इससे उत्पादन भी बढ़ेगा और साथ ही कृषि उत्पादों तथा मवेशियों को बाजार में बेचने की बेहतर सुविधा उपलब्ध होगी.

संविदा कृषि क्या है?

संविदा कृषि अग्रिम समझौतों के अंतर्गत प्रायः पूर्व-निर्धारित कीमतों पर कृषि उत्पादों के उत्पादन और आपूर्ति हेतु किसानों और विपणन फर्मों के बीच एक समझौते को संदर्भित करती है. सरल शब्दों में कहा जाए तो यह वह कृषि है जिसके लिए किसान और विपणन प्रतिष्ठान के बीच एक संविदा (contract) होती है जिसमें फसल के मूल्य और किसान को होने वाले भुगतान आदि सभी आवश्यक तत्त्वों का उल्लेख होता है.

लाभ

संविदा कृषि (Contract Farming) से होने वाले लाभ –

  • संविदा में मूल्य पहले से निर्धारित होता है, अतः उसके उतार-चढ़ाव के जोखिम से किसान मुक्त रहता है.
  • किसान को एक बड़ा बाजार मिल जाता है.
  • खेती का काम बेहतर तरीके से होता है जिससे किसान को सीखने का अवसर मिलता है.
  • संविदा कृषि से क्रेता प्रतिष्ठानों को यह लाभ होता है कि कृषि उत्पाद की उपलब्धता के विषय में अनिश्चितता नहीं रह जाती है.

संविदा कृषि की चुनौतियाँ

  • यह कृषि क्रेता के एकाधिकार को बढ़ावा देता है, अतः वह कम कीमत का प्रस्ताव देकर किसानों का शोषण कर सकते हैं.
  • संविदा की प्रक्रिया सामान्य किसान के लिए समझना कठिन है, अतः उसे असुविधा होगी.
  • संविदा कृषि (Contract Farming) से उत्पन्न उत्पादों पर कृषि उत्पाद विपणन समिति (APMC) द्वारा लगाये गये कर शोषणकारी होते हैं.

समाधान

सरकार संविदा कृषि से जुड़ी हुई समस्याओं का समाधान करने के लिए निम्नलिखित उपाय कर सकती है :-

  • सरकार द्वारा दोनों पक्षों के लिए बाजार-आधारित प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है. E-NAM इस दिशा में उठाया गया एक सकारात्मक कदम है.
  • सरकार को सूचना भंडार बनाए रखना चाहिए जो कि किसानों और प्रायोजकों को संविदा में शामिल होने से पहले एक-दूसरे का मूल्यांकन करने में सहायता करेगा.
  • सरकार फसलों के लिए मानकों की स्थापना और उनके प्रवर्तन की सुविधा प्रदान कर सकती है.
  • सरकार किसानों को शिक्षित कर सकती है और संविदा कृषि और मॉडल संविदा के सम्बन्ध में उन्हें अधिक जागरूक कर सकती है.
  • APMC के दायरे से संविदा कृषि (Contract Farming) को बाहर किया सकता है, जैसा कि कृषि सुधार पर प्रांतीय मंत्रियों की समिति द्वारा इस सम्बन्ध में अनुशंसा भी की गई है.

मॉडल संविदा कृषि अधिनियम, 2018 (MODEL ACT ON CONTRACT FARMING, 2018)

भारत में संविदा कृषि (Contract Farming) को भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के तहत विनियमित किया गया है. इसके अतिरिक्त, मॉडल AMPC अधिनियम, 2003 संविदा कृषि के लिए विशिष्ट प्रावधान करता है.

हाल ही में भारत सरकार ने एक अधिनियम पारित किया है जिसका नाम है – आदर्श कृषि उत्पाद एवं मवेशी संविदा-कृषि तथा सेवाएँ (प्रोत्साहन एवं सुविधा) कानून, 2018 (Model Contract Farming Act, 2018).

  1. यह अधिनियम नियामक (regulatory) प्रकृति का नहीं है अपितु प्रोत्साहन एवं सुविधा प्रदान करने हेतु बनाया गया है.
  2. बजट 2017-18 में भारत के वित्त मंत्री ने आश्वासन दिया था कि वह शीघ्र ही संविदा कृषि के विषय में एक आदर्श संविदा कृषि विधेयक (Model Contract Farming Bill) लायेंगे और यह अधिनयम इसी आलोक में पारित किया गया है.
  3. अधिनियम में जिस संविदा (contract) का उल्लेख है, वह संविदा किसान और थोक खरीदारों/क्रेताओं के बीच होने वाली समझौते से सम्बंधित है.
  4. पर सवाल उठता है कि ये खरीददार कौन हो सकते हैं?
  5. ये खरीददार कृषि प्रसंस्करण कारखाने, निर्यातक, व्यापारिक फर्म आदि हो सकते हैं.
  6. Model Contract में किसानों के हितों का विशेष ध्यान रखा गया है और यदि विवाद हो तो उसके लिए भी एक प्रणाली विकसित की गई है. इसमें विवादों को निपटाने के लिए निचले स्तर पर एक विवाद निपटान तंत्र की व्यवस्था को लेकर प्रयोजन है.

यद्यपि अभी मॉडल अधिनियम में कुछ मुद्दों पर पुनः विचार किये जाने की आवश्यकता है. यह अधिनियम प्रायोजकों और किसानों को समझौते को समझौता पंजीयन समिति के पास संविदा को पंजीकृत करने की आवश्यकता होगी, जिसके लिए शुल्क जमा करने होंगे. छोटे और मध्यम किसान आसानी से इन शुल्कों का भुगतान नहीं कर पायेंगे. यह अधिनियम पूर्व-समझौते के समय निर्धारित मूल्य द्वारा मूल्य सुरक्षा का भी प्रस्ताव करता है जो उत्पादन के लिए प्रतिकूल हो सकता है. यह सामुदायिक कृषि की अवधारणा का भी उपयोग करता है जो भारतीय संदर्भ में प्रासंगिक नहीं है क्योंकि यहाँ 86% छोटे या सीमांत किसान हैं.

निष्कर्ष

इस प्रकार हम देखते हैं कि संविदा कृषि (Contract Farming) एक नई अवधारणा है जिसको साकार एवं सार्थक रूप धारण करने में समय लग सकता है और प्रारम्भ में किसानों और प्रतिष्ठानों दोनों को कठिनाइयाँ आ सकती हैं. आशा की जाती है कि सतत सुधार के माध्यम से यह कृषि सर्वसुलभ एवं लाभकारी सिद्ध होगी.


GS Paper 3 Source : PIB

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UPSC Syllabus : e-technology in the aid of farmers.

Topic : What are geotextiles?

संदर्भ

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत ग्रामीण सड़क विकास में कॉयर जियो टेक्सटाइल्स का उपयोग किया जायेगा. यह कार्य राष्ट्रीय ग्रामीण आधारभूत संरचना विकास एजेंसी द्वारा किया जायेगा.

कॉयर जियोटेक्सटाइल क्या है?

यह कॉयर अर्थात् नारियल के रेशों से बने होते हैं और 3 से 5 साल तक चलते हैं. नारियल के रेशे 100% प्राकृतिक फाइबर होते हैं. नारियल से निकलने के कारण इनकी उपलब्धता सतत बनी रहती है.

जियोटेक्सटाइल क्या है?

  • जियोटेक्सटाइल उन पारगम्य कपड़ों को कहते हैं जिनका मिट्टी के साथ प्रयोग करने से ये उसे सुदृढ़ता और सुरक्षा प्रदान करते हैं. पारगम्य होने के कारण पानी इस पर नहीं ठहरता है. ये कपड़े पोलियेस्टर के बने होते हैं. नारियल रेशों से बना जियोटेक्सटाइल सड़ता नहीं है और उसमें फंफूद या नमी नहीं होती है.
  • यह सूक्ष्म जीवाणुओं के आक्रमण से मुक्त रहता है, अतः इसमें रसायन का उपचार करने की आवश्यकता नहीं होती. यह जियोटेक्सटाइल बहुत बलवान और टिकाऊ होता है.

प्रयोग

  • जियो टेक्सटाइल का उपयोग जीवाश्म फुटप्रिंट की रक्षा के लिए किया जाता है. यह कम लागत पर मिट्टी को मजबूत करने में सहायता करता है. जियो टेक्सटाइल का उपयोग ढलानों को सुरक्षित करने के लिए किया जाता है.
  • इसका मुख्य अनुप्रयोग सिविल इंजीनियरिंग उद्योग में हैं. इसका उपयोग एयरफील्ड्स, तटबंधों, जलाशयों, नहरों, सड़कों, बांधों, गाद बाड़ आदि में किया जाता है. इसका उपयोग क्षरण नियंत्रण में व्यापक रूप से होता है, विशेषकर पहाड़ी ढलानों में.
  • कृत्रिम रीफ बनाने में जियो टेक्सटाइल सैंड बैग का भी प्रयोग किया जाता है.

निर्माण कार्य एवं अनुमानित लागत

  • तदनुसार, कॉयर जियो-टेक्सटाइल्स का उपयोग करके आंध्र प्रदेश में 164 किलोमीटर, गुजरात में 151 किमी., केरल में 71 किमी., महाराष्ट्र में 328 किमी., ओडिशा में 470 किमी., तमिलनाडु में 369 किमी. और तेलंगाना में 121 किमी. सड़क का निर्माण किया जाएगा.
  • इस प्रकार सात राज्यों में ‘कॉयर जियो टेक्सटाइल्स’ का उपयोग करके 1674 किलोमीटर सड़क का निर्माण किया जाएगा जिसके लिये एक करोड़ वर्ग मीटर कॉयर जियो-टेक्सटाइल्स की जरूरत होगी. इसकी अनुमानित लागत 70 करोड़ रुपए है.

Prelims Vishesh

Charan Paduka :-

मध्य प्रदेश से होकर गुजरने वाले प्रवासी श्रमिकों के लिए वहां की सरकार ने चरण पादुका नामक एक अभियान चलाया है जिसके अंतर्गत पुलिस के माध्यम से खाली पैर चलने वाले प्रवासी श्रमिकों को जूते और चप्पल दिए जा रहे हैं जिससे कि उनकी पीड़ा कम हो.

Hanko :-

  • हैंको एक मुहर है जो लकड़ी या प्लास्टिक से बनती है.
  • ये छोटे, गोलाकार या आयताकार होते हैं. इसको गीला करने के लिए जिस स्याही पैड का प्रयोग होता है उसे शुनिकु (shuniku) कहते हैं और किसी प्रलेख पर इससे बनाई गई छाप इनकान (inkan) कहलाती है.
  • हैंको का प्रयोग सरकारी प्रलेखों को प्रमाणित करने के लिए होता है, जैसे – संविदा, विवाह पंजीकरण आदि के प्रलेख.
  • पिछले दिनों हैंको इसलिए चर्चा में आया कि इसके प्रयोग के लिए कई लोगों को COVID-19 के समय में भी कार्यालय परिसर जाना पड़ा क्योंकि ऐसी मुहरें सुरक्षा कारणों से अन्यत्र नहीं ले जाई जा सकती है.

Less invasive surfactant administration (LISA) :-

नवजात शिशुओं को वेंटिलेटर लगाने से उनके फेंफडों को क्षति पहुँचती है. इसलिए LISA मानक एक वेंटिलेटर बनाया गया है जो समय से पहले जन्मे बच्चों के प्राण बचाने में सहायक सिद्ध हो सकता है.

Pinanga Andamanensis :-

  • अंडमान द्वीपसमूह में पाए जाने वाले पिनांगा अंडमानेसिस एक ऐसा कम प्रसिद्ध पाम वृक्ष है जो IUCN के अनुसार विकट रूप से संकटग्रस्त (critically endangered) है.
  • दक्षिणी अंडमान के Mount Harriet राष्ट्रीय उद्यान के एक छोटे सदा हरित जंगल में इसके 600 नमूने पाए जाते हैं.
  • यह पाम पिछले दिनों इसलिए चर्चा में रहा कि इसे तिरुवनंतपुरम में स्थित जवाहरलाल नेहरु उष्णकटिबंधीय वनस्पति उद्यान एवं शोध संस्थान (Jawaharlal Nehru Tropical Botanic Garden and Research Institute – JNTBGRI) में लगाया जा रहा है.

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