Sansar डेली करंट अफेयर्स, 21 January 2020

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Contents

Sansar Daily Current Affairs, 21 January 2020


GS Paper 1 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Women related issues.

Topic : Tougher law against sexual harassment at work

संदर्भ

कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए कानूनी ढाँचा सुदृढ़ करने के निमित्त गृह मंत्री अमीत शाह की अध्यक्षता में गठित मंत्री समूह (GoM) ने अपने सुझावों को अंतिम रूप दे दिया है.

पृष्ठभूमि

यह मंत्री समूह अक्टूबर, 2018 में उस समय गठित हुआ था जब #MeToo आन्दोलन चल रहा था जिसमें कई स्त्रियों ने सोशल मीडिया पर अपने उत्पीड़न की बात बताई थी.

वर्तमान की स्थिति

वर्तमान में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए एक अधिनियम प्रभावी है जिसका नाम है – कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध एवं समाधान) अधिनियम, 2013 (Sexual Harassment of Women and Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act in 2013).

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा अस्तित्व में लाया गया यह अधिनियम सरकारी कार्यालयों, निजी क्षेत्रों, गैर-सरकारी संगठनों और असंगठित क्षेत्रों पर लागू है.

कठोरतर प्रावधानों की आवश्यकता क्यों पड़ी?

  • 2013 के अधिनियम में आंतरिक शिकायत समिति (Internal Complaints Committee – ICC) को एक व्यवहार न्यायालय की शक्तियां तो दे दी गई थीं, किन्तु यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि इस समिति के सदस्य कानूनी पृष्ठभूमि के होने चाहिएँ अथवा नहीं. ICC के महत्त्व को देखते हुए यह एक बहुत बड़ी कमी थी.
  • 2013 के अधिनियम में नियोजनकर्ताओं को अपनी-अपनी ICC के गठन का निर्देश गया था और यह प्रावधान किया गया था कि यदि वे ऐसा नहीं करते तो उनपर 50,000 रु. का आर्थिक दंड लगेगा. परन्तु व्यवहार में यह प्रावधान अपर्याप्त सिद्ध हुआ क्योंकि बहुत सारे नियोजनकर्ता अपने यहाँ ICC गठन करने से कतराते रहे.

प्रस्तावित सुझावों में विशाखा मार्गनिर्देश (Vishakha guidelines) की भूमिका

मंत्रीसमूह ने जो सुझाव दिए हैं वे मोटे तौर पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 1997 में दिए गये विशाखा मार्गनिर्देशों पर ही आधारित हैं जिनको दृष्टिगत रखते हुए 2013 का अधिनियम बना था.

ज्ञातव्य है कि विशाखा गाइडलाइन में नियोजनकर्ता को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की घटनाओं को रोकने का दायित्व दिया गया था.

यौन उत्पीड़न की परिभाषा

2013 के अधिनियम के अनुसार, प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से किये गये निम्नलिखित अवांछित कृत्य अथवा व्यवहार यौन उत्पीड़न कहलायेंगे –

  1. शारीरिक संपर्क और छेड़छाड़
  2. लैंगिक आधार पर कसी गई फब्तियाँ
  3. अश्लील चित्रों का प्रदर्शन
  4. यौन सम्पर्क के लिए माँग या अनुरोध
  5. कोई भी अन्य ऐसा अवांछित शारीरिक, शाब्दिक अथवा अशाब्दिक आचरण जिसकी प्रकृति यौनाचार से सम्बंधित हो.

कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध एवं समाधान) अधिनियम, 2013 के मुख्य प्रावधान

  1. इस अधिनियम में यौन उत्पीड़न से सम्बंधित शिकायत करने, जाँच-पड़ताल करने और कार्रवाई करने की प्रक्रियाएँ वर्णित की गई हैं.
  2. इसके अनुसार प्रत्येक नियोजनकर्ता को अपने वैसे कार्यालय अथवा शाखा में एक आंतरिक शिकायत समिति (ICC) गठित करनी होगी जहाँ 10 से उससे अधिक कर्मी काम करते हों.
  3. इसमें यौन उत्पीड़न के विभिन्न पहलुओं की परिभाषा के साथ-साथ उससे सम्बंधित प्रक्रियाओं का विधान किया गया है.
  4. अधिनियम कहता है कि यदि किसी ऐसी महिला के साथ यौन उत्पीड़न हुआ हो जो कार्यालय में काम नहीं करती हो वरन किसी काम से आई हो तो उसको भी इस अधिनियम के तहत सुरक्षा मिलेगी.

GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : India and its neighbourhood- relations.

Topic : India-Pakistan trade freeze hits thousands: Report

संदर्भ

भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापार ठप हो जाने के कारण सीमा पर रहने वाले लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा है इसपर प्रकाश डालते हुए एक प्रतिवेदन “उद्योग एवं आर्थिक मूलाधार अनुसंधान ब्यूरो” (Bureau of Research on Industry and Economic Fundamentals – BRIEF) द्वारा प्रकाशित किया गया है जिसका शीर्षक “एकपक्षीय निर्णय, द्विपक्षीय क्षति” / “Unilateral Decisions, Bilateral Losses” है.

पृष्ठभूमि

पुलवामा आक्रमण के पश्चात् वाघा अटारी सीमा तथा नियंत्रण रेखा सलामाबाद-चाखन दा बाग़ मार्ग 2019 में बंद हो गया था. पाकिस्तान को दिया गया सर्वाधिक Most Favoured Nation का दर्जा भी रद्द कर दिया गया था. उधर, पाकिस्तान ने भी कुछ इसी प्रकार के कदम उठाये, जैसे – हवाई क्षेत्र पर प्रतिबंध, व्यापारिक रिश्ते को रोकना आदि.

इन निर्णयों का प्रभाव    

  • पंजाब में कम से कम 9,254 परिवार और 50 हजार लोगों पर व्यापरिक प्रतिबंधों का सीधा प्रभाव पड़ा और कश्मीर में भी 900 परिवारों पर प्रभाव देखने को मिला.
  • दोनों देशों को बिलियनों डॉलर की क्षति हुई और सैकड़ों कार्य दिवस नष्ट हुए.
  • पाकिस्तान से पंजाब क्षेत्र में होने वाले आयात पर शुल्क (duty) में 200% की वृद्धि हुई. 2018-19 में द्विपक्षीय व्यापार (bi-lateral trade) 2 . 56 बिलियन का हुआ था जो अप्रैल अगस्त 2019 में घटकर 547 . 22 मिलियन रह गया. आयात (imports) भी 500 मिलियन से घटकर 11 . 45 मिलियन रह गया.
  • इसी प्रकार, नियंत्रण रेखा पर स्थित बारामुला एवं पुंछ के व्यापार केन्द्रों के बंद होने के कारण जम्मू-कश्मीर के लघु व्यापारियों, शिल्पकारी बेचने वालों, ट्रक चलाने वालों, श्रमिकों और होटल स्वामियों का व्यवसाय ठप पड़ गया.

MFN स्टेटस क्या है?

  • मोस्ट फेवर्ड नेशन वह दर्जा है जो एक देश दूसरे देश को देता है और जिसके अनुसार उन दोनों के बीच व्यापार में भेदभाव नहीं किया जाता है.
  • MFN का महत्त्व इसी से पता चलता है कि यहGAT अर्थात् शुल्क एवं व्यापार पर सामान्य समझौता के तहत पहले अनुच्छेद में ही वर्णित किया गया है.
  • विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के तहत कोई सदस्य देश अपने व्यापार भागीदारों के बीच भेदभाव नहीं कर सकता है. यदि किसी एक व्यापार भागीदार को विशेष दर्जा दिया जाता है तो यह दर्जा विश्व व्यापार संगठन के सभी सदस्यों को मिलना चाहिए.

MFN इस सन्दर्भ में कुछ छूट भी देता है जो इस प्रकार हैं –

  • मुक्त व्यापार समझौते करने का अधिकार :-इसका अर्थ है कि सदस्य क्षेत्रीय व्यापार समझौते में शामिल हो सकते हैं अथवा मुक्त व्यापार समझौते कर सकते हैं जिसके अन्दर सदस्य देशों और गैर-सदस्य देशों के बीच भेदभाव होता है.
  • सदस्य विकासशील देशों को विशेष एवं अलग सुविधा दे सकते हैं. ये विशेष सुविधाएँ अलग-अलग हो सकती हैं, जैसे – अधिक बड़ा बाजार तक पहुँच, आयात शुल्क की घटी हुई दर, विकासशील देशों को उनके उत्पादन प्रक्षेत्रों आदि में सब्सिडी देना. इन सभी छूटों के लिए कठोर शर्ते भी लागू की जाती हैं.

GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Bilateral, regional and global groupings and agreements involving India and/or affecting India’s interests.

Topic : India-EU Broad Based Trade and Investment Agreement (BTIA)

संदर्भ

यूरोपीय संघ ने भारत के साथ द्विपक्षीय निवेश संरक्षण समझौता (Bilateral Investment Protection Agreement – BIPA) करने में अपनी रूचि दिखलाई है. यह समझौता प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (FTA) से अलग होगा. विदित हो कि FTA के लिए बातचीत तो हो रही है, परन्तु मामला आगे बढ़ता नहीं दिखाई दे रहा है. FTA का औपचारिक नाम व्यापक आधारभूत व्यापार एवं निवेश समझौता (the Broad-based Trade and Investment Agreement – BTIA) है.

निहितार्थ

BTIA से अलग एक भिन्न निवेश संरक्षण समझौते पर यदि आगे कार्रवाई होती है तो यह संभव हो सकता है कि BTIA से पहले ही BIPA पर कोई सहमति बन जाए.

व्यापक आधारभूत व्यापार एवं निवेश समझौता (BTIA) क्या है?

यह भारत और यूरोपीय संघ के बीच का एक व्यापारिक समझौता प्रस्ताव है जिसमें प्रारम्भिक वार्ता बेल्जियम के ब्रुसेल्स में 28 जून, 2007 को शुरू हुई थी. इस प्रकार के व्यापाक आधारभूत व्यापार एवं निवेश समझौते के लिए 13 अक्टूबर, 2006 में हेलसिंकी में आयोजित सातवें भारत यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में उपस्थित राजनेताओं ने प्रतिबद्धता दिखाई थी.

इसके पूर्व इस विषय में भारत और यूरोपीय संघ के एक उच्च-स्तरीय तकनीकी समूह ने एक प्रतिवेदन दिया था जो इस प्रकार के समझौता का मूल आधार होने वाला था.

माहात्म्य

वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार तथा अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में निवेश की अड़चनें दूर कर भारत और यूरोपीय संघ द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देना चाहते हैं. दोनों को विश्वास है कि विश्व व्यापार संगठन के नियमों और सिद्धांतों के अनुरूप एक व्यापक समझौता करने से दोनों पक्षों के व्यवसाय को फैलने का अवसर मिलेगा.

वार्ता के अन्दर चर्चित विषय

BTIA वार्ता में इन वस्तुओं और सेवाओं पर चर्चा हो रही है – वस्तु व्यापार, सेवा व्यापार, निवेश, स्वच्छता एवं फाइटोसैनिट्री उपाय, व्यापार में आने वाली तकनीकी बाधाएँ, व्यापार उपचार, उत्पत्ति के नियम, सीमा शुल्क और व्यापार सुविधा, प्रतिस्पर्धा, व्यापार रक्षा, सरकारी खरीद, विवाद निपटान, बौद्धिक संपदा अधिकार और भौगोलिक संकेत, सतत विकास.

वार्ता में अवरोध क्यों हो रहा है?

2013 से ही व्यापक आधारभूत व्यापार एवं निवेश समझौता (BTIA) के अंतर्गत वार्ताएं ठंडी पड़ी हुई हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि यूरोपीय संघ ने कुछ ऐसी माँगें रख दी हैं कि जिसपर सहमति नहीं बन पा रही है. ये माँगें हैं –स्वचालित वाहन, मदिरा एवं स्प्रिट के लिए बड़ा बाजार तथा बैंकिंग बीमा और ई-कॉमर्स जैसी वित्तीय सेवाओं को और भी अधिक सुलभ बनाना.

यूरोपीय संघ यह भी चाहता था कि वार्ता में श्रम, पर्यावरण और सरकारी खरीद को भी शामिल किया जाए. दूसरी ओर, भारत की माँग थी कि कामगार वीजा और अध्ययन वीजा के मानक सरल बनाए जाएँ और डाटा सुरक्षा इस प्रकार की हो जिससे कि यूरोपीय कम्पनियाँ भारत में अपना व्यवसाय आउटसोर्स कर सकें. परन्तु इसके प्रति यूरोपीय संघ के देशों ने उत्साह नहीं दिखाया.


GS Paper 3 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Science and Technology- developments and their applications and effects in everyday life.

Topic : Hyperloop

संदर्भ

रिचर्ड ब्रैन्सन की कम्पनी वर्जिन हाइपरलूप वन ने महाराष्ट्र सरकार के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके अनुसार वह मुंबई और पुणे के बीच एक हाइपरलूप का निर्माण करेगी. बताया जाता है कि इससे मुंबई और पुणे की यात्रा तीन घंटे (सड़क) से घटकर मात्र 25 मिनट की हो जायेगी. परन्तु महराष्ट्र की वर्तमान सरकार को संदेह है कि इस प्रकार का हाइपरलूप विश्व के किसी भी कोने में संचालित नहीं हुआ है. राज्य सरकार के इस दृष्टिकोण से पूरी परियोजना का भविष्य अधर में लटक सकता है ऐसा प्रतीत होता है.

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हाइपरलूप परिवहन प्रणाली क्या है?

  • हाइपरलूप परिवहन की वह प्रणाली है जिसमें एक निर्वात ट्यूब के माध्यम से एक वाहन को वेगपूर्वक ढकेला जाता है. ऐसा करने से उस वाहन की गति हवाई जहाज की गति जैसी हो जाती है.
  • हाइपरलूप की अवधारणा टेसला कम्पनी के संस्थापक एलन मस्क की देन है.
  • अमेरिका की हाइपरलूप ट्रांसपोर्ट टेक्नोलॉजी का दावा है कि इस प्रणाली से प्रत्येक किलोमीटर पर 40 मिलियन डॉलर का खर्च आता है और यदि हाइपरलूप की जगह कोई तीव्र गति वाली रेलगाड़ी का प्रबंध किया जाए तो इससे लगभग दुगुना खर्च आएगा.

यह कैसे काम करता है?

  • हाइपरलूप में एक कैप्सूल होता है जो एक स्टील ट्यूब के अन्दर आना-जाना करता है. यह ट्यूब निर्वात होता है. यह ट्यूब एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक लगातार बना होता है.
  • जिस कैप्सूल में यात्री बैठेंगे या माल रखा जाएगा वह इस ट्यूब के एक छोर से दूसरे छोर तक तेजी से यात्रा करेगा.
  • इसमें आगे एक एयर कंप्रेसर और पीछे एक बैटरी कम्पार्टमेंट होता है.
  • कैप्सूल के अन्दर हवा की एक पतली परत होती है जो कैप्सूल के गतिरोध को दूर करती है.
  • ये कैप्सूल बिना ड्राईवर के चलते हैं और उनकी गति एक हजार किलोमीटर प्रति घंटे होती है.
  • ट्यूब के किनारे-किनारे इंडक्शन मोटर लगे होते हैं जो कैप्सूल की गति को नियंत्रित करते हैं.
  • कैप्सूल की गति को बढ़ाने और रोकने के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगे हुए हैं.

हाइपरलूप की समस्याएँ

  • हाइपरलूप चलाने के लिए एक नगर से दूसरे नगर तक सैंकड़ों किलोमीटर एक ट्यूब बनाना होता है. यह अपने-आप में एक दुष्कर कार्य है.
  • इतने लम्बे निर्वात ट्यूब को इतना सशक्त होना होगा कि वह सैंकड़ों किलोमीटर प्रति घंटे से चलने वाले और हजारों किलोग्राम के भार वाले गतिशील कैप्सूल को सम्भाल सके. यह भी एक अत्यंत कठिन कार्य है.
  • हाइपरलूप से सम्बंधित प्रयोग छोटे पैमाने पर हो चुके हैं. विचारने की बात यह है कि क्या बड़े स्तर पर इसका प्रयोग सफल होगा? क्योंकि तब उसे हजारों किलोग्राम का वायुदाब झेलना होगा जिससे कोई भी निर्वात चैंबर ध्वस्त हो सकता है.
  • हाइपरलूप को चलाने में ताप उत्पन्न हो सकता है. अतः इसमें ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि यह समयानुसार ताप की वृद्धि को सम्भाल सके.
  • हाइपरलूप पर बहुत अधिक खर्च आएगा.
  • हाइपरलूप से न केवल मालों वरन् मनुष्यों का भी आना-जाना होगा. अतः इसका संचालन ऐसा होना चाहिए कि जान-माल की क्षति शून्य हो.

Prelims Vishesh

About CICT :-

  • केन्द्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान (CICT) भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीनस्थ उच्चतर शोध से सम्बंधित एक स्वायत्त संस्थान है जो कुरल पीडम पुरस्कार देने के अतिरिक्त शास्त्रीय तमिल में उच्च कोटि के शोध की वैसी सुविधा प्रदान करता है जो विश्व में अन्यत्र दुर्लभ है.
  • इसके अनेक शोध तमिल भाषा के अनूठेपन और प्राचीनता पर बल देते हैं.

About Dedicated Freight Corridor Corporation of India (DFCCIL) :

कम्पनी अधिनियम, 1956 के अंतर्गत 30 अक्टूबर, 2006 को पंजीकृत कम्पनी DCCIL का संचालन रेल मंत्रालय द्वारा माल ढुलाई गलियारों से सम्बंधित इन कार्यों के लिए किया जाता है, जैसे – वित्तीय संसाधनों का प्रबंध, योजना एवं विकास कार्य, निर्माण कार्य, संधारण कार्य और समर्पित माल-ढुलाई गलियारों का संचालन.

ELECRAMA 2020 :-

  • यह भारतीय विद्युत उद्योग का एक मूर्धन्य मंच है जो इस उद्योग को विश्व-भर से जोड़ते हुए अन्य देशों में तकनीक में हुई नवीनतम प्रगति, नए रुझानों और नवाचारों से अवगत कराता है.
  • यहाँ बिजली के वाहनों, इन्टरनेट ऑफ़ थिंग्स (IoT), विद्युत भंडारण के उपाय तथा नवीकरणीय ऊर्जा के विषय में भारत और विश्व के अन्य विद्युत उद्योग आपस में ज्ञान को बाँटते हैं.
  • इस मंच को सरकार के इन मन्त्रालयो का सहयोग मिलता है – ऊर्जा मंत्रालय, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्राल तथा भारी उद्योग एवं सार्वजनिक प्रतिष्ठान मंत्रालय.

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