Sansar डेली करंट अफेयर्स, 20 November 2020

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Sansar Daily Current Affairs, 20 November 2020


GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Welfare schemes for vulnerable sections of the population by the Centre and States and the performance of these schemes; mechanisms, laws, institutions and Bodies constituted for the protection and betterment of these vulnerable sections.

Topic : Electric Vehicles and Fame India Scheme

संदर्भ

सरकार विद्युत गतिशीलता (Electric Mobility) के लिए लोगों को प्रेरित करने हेतु देश भर में लगभग 69000 पेट्रोल पंपों पर कम से कम एक इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिग कियोस्क (electric vehicle charging kiosk) स्थापित करने की योजना निर्मित कर रही है. सरकार का उद्देश्य भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (Electric Vehicles: EVs) की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए एक पारितंत्र का निर्माण करना है.  सरकार आगामी 5 वर्षों में भारत को एक वैश्विक मोटर यान उत्पादन केंद्र बनाने तथा दिल्‍ली और मुंबई एक्सप्रेस-वे पर एक ई-हाईवे निर्मित करने की दिशा में अग्रसर है.

EVs को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा अब तक उठाए गए विभिन्‍न कदम

  • EVs पर जीएसटी में 5 प्रतिशत की कटौती की गई है.
  • वाहन की लागत में से दो या तीन पहिया वाहनों की बैटरी की लागत को कम करना, क्योंकि यह लागत का लगभग 30 प्रतिशत होती है.
  • भारत में फेम इंडिया योजना (FAME India Scheme) [भारत में इलेक्ट्रिक (और हाइब्रिड) वाहनों का तीव्र अंगीकरण एवं विनिर्माण] का शुभारंभ किया गया.
  • सरकार ने “उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन” (Productive-Linked Incentive – PLI) योजना के तहत EV क्षेत्र के लिए 51000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश निर्धारित किया है.
  • इसरो (ISRO) ने स्वदेशी रूप से विकसित की गई लिथियम आयन बैटरी (lithium lon battery) तकनीक का व्यवसायीकरण किया है.
  • एक अनुमान के अनुसार EVs शहरी केंद्रों में वायु प्रदूषण को कम करेंगे. साथ ही, यह सम्भावना भी व्यक्त की गई है कि इसके द्वारा वर्ष 2030 तक 846 मिलियन टन तक निवल कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम करने तथा 474 मीट्रिक टन तेल की बचत की जा सकती है.

फेम इंडिया योजना

FAME India योजना का पूरा नाम है – Faster Adoption and Manufacturing of Electric Vehicles in India अर्थात् भारत में बिजली से चलने वाले वाहनों को अपनाने और उन्हें बनाने में तेजी लाने की योजना.

ई-गतिशीलता के लिए FAME योजना :- FAME योजना 1 अप्रैल, 2015 में शुरू की गई थी और इसका उद्देश्य था बिजली और संकर ऊर्जा से चलने वाले वाहनों के निर्माण के तकनीक को बढ़ावा देना और उसकी सतत वृद्धि को सुनिश्चित करना. इस योजना के अंदर सार्वजनिक परिवहन में बिजली की गाड़ियों (EVs) के प्रयोग को बढ़ावा देना है और इसके लिए बाजार और माँग का सृजन करना है. इसके तहत वाहन परिक्षेत्र में 100% विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की अनुमति दी जायेगी.

  • इस योजना का उद्देश्य देश में बिजली से चलने वाले वाहनों को बढ़ावा देना है.
  • यह योजना 1 अप्रैल, 2019 से आगामी तीन वर्षों तक चलेगी और इसके लिए 10,000 करोड़ रु. की बजटीय व्यवस्था की गई है.
  • यह योजना FAME India I (1 अप्रैल, 2015 में अनावृत) का विस्तारित संस्करण है.

फेम-इंडिया योजना फेज II के उद्देश्य

  • सार्वजनिक परिवहन में बिजली से चलने वाली गाड़ियों का अधिक से अधिक प्रयोग सुनिश्चित करना.
  • बिजली वाले वाहनों की ग्राह्यता को प्रोत्साहित करने के लिए इनके लिए बाजार बनाना और माँग में वृद्धि करना.

पृष्ठभूमि

यह राष्ट्रीय बिजली गतिशीलता मिशन योजना का अंग है. पर्यावरण के अनुकूल वाहनों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकार ने 2015 में भारत में (FAME – INDIA) योजना की शुरुआत की थी. फेम इंडिया योजना का लक्ष्य है कि दो पहिया, तीन पहिया, चार पहिया यात्री वाहन, हल्के वाणिज्यिक वाहन और बसों सहित सभी वाहन क्षेत्रों में बिजली के प्रयोग को प्रोत्साहित किया जाए. इसके लिए यह योजना सब्सिडी का लाभ प्रदान करती है. इस योजना के तहत संकर एवं इलेक्ट्रिक तकनीकों, जैसे – सशक्त संकर तकनीक (strong hybrid), प्लग-इन शंकर तकनीक (plug-in hybrid) और बैटरी/बिजली तकनीक को प्रोत्साहित किया जाता है. इस योजना को भारी उद्योग मंत्रालय द्वारा चालाया जा रहा है. FAME योजना इन चार क्षेत्रों पर अपना ध्यान केन्द्रित करती है – तकनीकी विकास, माँग का सृजन, प्रायोगिक परियोजनाएँ एवं चार्ज करने की सुविधा.


GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Related to Health.

Topic : Fusarium wilt (Panama) disease in Banana

संदर्भ

भारत के कम से कम 5 प्रमुख राज्यों में उगाए जाने वाले केले की फसल को फफूंद जनित बीमारी क्षति पहुँचा रही है. इस बीमारी को रोकने के लिए केले के पौधे में जड़ रोगजनक संक्रमण फ़्यूज़ेरियम की बेहतर समझ जल्द ही इसके लिए तकनीकी को विकसित करने में सहायता कर सकती है. केले में इस बीमारी की रोक-थाम के लिए भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) की इंस्पायर फैकल्टी फेलोशिप प्राप्तकर्ता डॉ. सिद्धेश घाग संक्रमण आनुवंशिक दृष्टिकोण का उपयोग कर रहे हैं.

फ्यूजेरियम विल्ट रोग के बारे में

फ़्यूज़ेरियम विल्ट पौधों के परिवहन ऊतकों में बढ़ता है, जिससे पानी तथा पोषक पदार्थों की आपूर्ति प्रभावित होती है. पौधे सीधे जड़ों के सिरों तथा जड़ों पर घावों से संक्रमित हो सकते हैं. एक बार रोगजनक किसी स्थान पर स्थित हो जाता है, तो यह वहां वर्षों तक सक्रिय रह सकता है.

यह पहले पत्तियों पर हमला करता है, जिससे पत्तियाँ पीली पड़कर सूखने लगती ओर नीचे की ओर लटक जाती हैं. अभी तक इस रोग का कोई प्रभावी उपाय नहीं खोजा जा सका है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार, TR4 “सभी पौधों की बीमारियों में सबसे विनाशकारी” है.


GS Paper 3 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Awareness in biotechnology.

Topic : GM crops

संदर्भ

अमेरिका ने भारत से खाद्य आयात के लिए “आनुवंशिक रूप से संशोधित नहीं” (No genetically-modified: GM) प्रमाण-पत्र पर अनिवार्य रूप से पुनर्विचार करने के लिए कहा है.

  • अमेरिका ने भारत से भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के उस आदेश पर पुनर्विचार करने को कहा है, जिसमें यह अनिवार्य किया गया है कि 1 जनवरी 2021 से, 24 चिन्हित खाद्य उत्पादों के आयातकों को अनिवार्य रूप से यह घोषित करना होगा कि उत्पाद GM नहीं हैं और उनके पास गैर-GM उत्पत्ति प्रमाण-पत्र भी है.
  • यह आदेश उस अध्ययन के उपरांत पारित किया गया है, जिसमें भारत में आनुवंशिक रूप से अभियांत्रित (GP) पादप सामग्रियों में 21 GM पाई गई थीं, उनमें से 16 आयात की गई थीं.
  • हालांकि, अमेरिका ने अपनी चिंता व्यक्त की है कि इस आदेश से व्यापार में महत्त्वपूर्ण व्यवधान उत्पन्न होगा तथा यह इस मापन के लिए तकनीकी औचित्य के अभाव से भी ग्रसित है.

GM फसल क्या है?

संशोधित अथवा परिवर्तित फसल (genetically modified – GM Modified crop) उस फसल को कहते हैं जिसमें आधुनिक जैव-तकनीक के सहारे जीनों का एक नया मिश्रण तैयार हो जाता है.

ज्ञातव्य है कि पौधे बहुधा परागण के द्वारा जीन प्राप्त करते हैं. यदि इनमें कृत्रिम ढंग से बाहरी जीन प्रविष्ट करा दिए जाते हैं तो उन पौधों को GM पौधा कहते हैं. यहाँ पर यह ध्यान देने योग्य है कि वैसे भी प्राकृतिक रूप से जीनों का मिश्रण होता रहता है. यह परिवर्तन कालांतर में पौधों की खेती, चयन और नियंत्रित सम्वर्धन द्वारा होता है. परन्तु GM फसल में यही काम प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से किया जाता है.

 GM फसल की चाहत क्यों?

  • अधिक उत्पादन के लिए.
  • खेती में कम लागत के लिए.
  • किसानी में लाभ बढ़ाने के लिए.
  • स्वास्थ्य एवं पर्यावरण में सुधार के लिए.

GM फसल का विरोध क्यों?

  • यह स्पष्ट नहीं है कि GM फसलों (GM crops) का मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण पर कैसा प्रभाव पड़ेगा. स्वयं वैज्ञानिक लोग भी इसको लेकर पक्के नहीं हैं. कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसी फसलों से लाभ से अधिक हानि है. कुछ वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि एक बार GM crop तैयार की जायेगी तो फिर उस पर नियंत्रण रखना संभव नहीं हो पायेगा. इसलिए उनका सुझाव है कि कोई भी GM पौधा तैयार किया जाए तो उसमें सावधानी बरतनी चाहिए.
  • भारत में GM विरोधियों का यह कहना है कि बहुत सारी प्रमुख फसलें, जैसे – धान, बैंगन, सरसों आदि की उत्पत्ति भारत में ही हुई है और इसलिए यदि इन फसलों के संशोधित जीन वाले संस्करण लाए जाएँगे तो इन फसलों की घरेलू और जंगली किस्मों पर बहुत बड़ा खतरा उपस्थित हो जाएगा.
  • वास्तव में आज पूरे विश्व में यह स्पष्ट रूप से माना जा रहा है कि GM crops वहाँ नहीं अपनाए जाएँ जहाँ किसी फसल की उत्पत्ति हुई हो और जहाँ उसकी विविध किस्में पाई जाती हों. विदित हो कि भारत में कई बड़े-बड़े जैव-विविधता वाले स्थल हैं, जैसे – पूर्वी हिमालय और पश्चिमी घाट – जहाँ समृद्ध जैव-विविधता है और साथ ही जो पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है. अतः बुद्धिमानी इस बात में होगी कि हम लोग किसी भी नई तकनीक के भेड़िया-धसान में कूदने से पहले सावधानी बरतें.
  • यह भी डर है कि GM फसलों के द्वारा उत्पन्न विषाक्तता के प्रति कीड़ों में प्रतिरक्षा पैदा हो जाए जिनसे पौधों के अतिरिक्त अन्य जीवों को भी खतरा हो सकता है. यह भी डर है कि इनके कारण हमारे खाद्य पदार्थो में एलर्जी लाने वाले तत्त्व (allergen) और अन्य पोषण विरोधी तत्त्व प्रवेश कर जाएँ.

भारत में जीन संवर्द्धित फसलों की वैधानिक कानूनी स्थिति

भारत में, जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (Genetic Engineering Appraisal Committee -GEAC) जीएम फसलों की वाणिज्यिक खेती की अनुमति देने के लिए शीर्ष निकाय है.

GEAC क्षेत्र परीक्षण प्रयोगों सहित पर्यावरण में आनुवंशिक रूप से संवर्द्धित किये गए जीवों और उत्पादों को जारी करने संबंधी प्रस्तावों की मंज़ूरी के लिये भी उत्तरदायी है.

जुर्माने का प्रावधान

अप्रमाणित GM संस्करण का उपयोग करने पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1989 के अंतर्गत 5 साल की जेल तथा 1 लाख रुपये का जुर्माना लग सकता है.

किसान जीएम फसलों को क्यों महत्त्व दे रहे हैं?

कम लागत: किसानों द्वारा बीटी कपास के उगाने पर तथा ग्लाइफोसेट का उपयोग करने पर खरपतवार-नाशक की लागत काफी कम हो जाती है.

बीटी बैंगन के संबंध में भी कीटनाशक-लागत कम हो जाने से उत्पादन लागत में कमी हो जाती है.

मेरी राय – मेंस के लिए

 

पर्यावरणविदों का तर्क है कि जीएम फसलों के लंबे समय तक चलने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जाना बाकी है तथा अभी इन्हें व्यावसायिक रूप से अनुमति नही दी जानी चाहिए. इनका मानना है, कि जीन संवर्धन से फसलों में किये गए परिवर्तन लंबे समय में मनुष्यों के लिए हानिकारक हो सकते हैं.

हर बार अवैध जीएम फसलों को इसी तरह से भारत समेत दुनिया के कई देशों में प्रवेश दिया जाता है. उसके बाद सरकार उस अवैध खेती को मंजूरी दे देती है. जीएम बीज बनाने वाली कंपनी पर यह जिम्मेदारी सुनिश्चत होनी चाहिए कि यदि बिना मंजूरी उसका बीज कहीं बाहर मिलता है तो उस पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए. अवैध बीटी बैंगन के इस समूचे खेत को नष्ट कर दिया जाना चाहिए. वहीं, इस कृत्य में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी होनी चाहिए. यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसानों को इसके लिए प्रताड़ित किया जाए. अधिकांश किसानों को वैध और अवैध बीजों की जानकारी नहीं होती. फसल नष्ट करने के बाद किसानों को इसका मुआवजा भी दिया जाना चाहिए.


GS Paper 3 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Science and Technology- developments and their applications and effects in everyday life Achievements of Indians in science & technology; indigenization of technology and developing new technology.

Topic : Deep Ocean Mission

संदर्भ

भारत द्वारा शीघ्र ही एक महत्त्वाकांक्षी डीप ओशन मिशन (Deep Ocean Mission) की शुरुआत की जाएगी. इसके लिए आवश्यक अनुमोदन प्राप्त किए जा रहे हैं.

DOM अभियान के मुख्य तत्त्व

इस अभियान में इन विषयों पर बल दिया जाएगा – गहन समुद्र खनन (deep-sea mining), सामुद्रिक जलवायु में परिवर्तन विषयक पूर्वसूचना सेवाएँ (ocean climate change advisory services), समुद्र-तल से नीचे चलने वाले वाहन (underwater vehicles ) एवं समुद्र-तल के भीतर रोबोटिक तकनीक प्रयोग (underwater robotics related technologies).

इसके अतिरिक्त इस अभियान के दो प्रमुख परियोजनाएँ हैं – ज्वारीय ऊर्जा से संचालित समुद्री जल से लवण को दूर करने वाले एक संयंत्र का निर्माण तथा एक ऐसा वाहन बनाना जो समुद्र-तल के कम से कम 6000 मीटर भीतर जाकर अन्वेषण कार्य सकेगा.

अभियान का महत्त्व

गहन समुद्र अभियान (Deep Ocean Mission – DOM) से भारत ऐसी क्षमता विकसित कर सकेगा जिससे कि वह केन्द्रीय हिन्द महासागर बेसिन (Central Indian Ocean Basin – CIOB) में उपलब्ध संसाधनों का दोहन कर सके.

ज्ञातव्य है संयुक्त राष्ट्र संघ के अंतर्राष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण (International Seabed Authority) ने भारत को केन्द्रीय हिन्द महासागर बेसिन (Central Indian Ocean Basin – CIOB) के अन्दर 75,000 वर्ग किलोमीटर आवंटित किया है. यह आवंटन इस क्षेत्र में बहु-धात्विक अयस्कों (Polymetallic nodules – PMN) की खोज करने के लिए दिया गया है. इस बेसिन में लोहा, मैंगनीज, निकल और कोबाल्ट जैसी धातुओं का 380 मिलियन मेट्रिक टन का भंडार हैं.

क्षमता

अनुमान है कि यदि भारत इन भंडारों के 10% भाग का भी दोहन कर ले तो देश की अगले 200 साल की ऊर्जा आवश्यकताएँ पूरी हो जायेंगी.

संभावनाएं

भारत को मध्य हिंद महासागर बेसिन (CIOB) में पॉली-मेटैलिक नॉड्यूल्स (Polymetallic nodules– PMN) अन्वेषण के लिये संयुक्त राष्ट्र सागरीय नितल प्राधिकरण (UN International Sea Bed Authority for exploration) द्वारा 75,000 वर्ग किलोमीटर का आवंटन किया गया है.

  1. मध्य हिंद महासागर बेसिन क्षेत्र में लोहामैंगनीजनिकल और कोबाल्ट जैसी धातुओं के भण्डार हैं.
  2. अनुमानित है कि, इस विशाल भण्डार के मात्र 10% दोहन से भारत की अगले 100 वर्षों के लिए ऊर्जा आवश्यकताएं पूरी हो सकती हैं.

PMN क्या होता है?

बहु-धात्विक अयस्क, (Polymetallic nodules – PMN) जिसे मैंगनीज नोड्यूल भी कहते हैं, एक आलू के आकर का छिद्रमय अयस्क होता है जो पूरे विश्व में समुद्र-तल बहुत ही सघनता से पाया जाता है. इनमें मैंगनीज के साथ-साथ लोहा, निकल, तांबा, कोबाल्ट, रांगा, मोलिब्डेनम, कैडमियम, वैनेडियम, टाइटेनियम आदि होते हैं. इनमें से निकल, कोबाल्ट और तांबे का बहुत ही बड़ा आर्थिक एवं रणनीतिक महत्त्व है.

अंतर्राष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण (ISA) क्या है?

यह एक संयुक्त राष्ट्र (UN) का निकाय है जिसकी स्थापना समुद्रों के अंतर्राष्ट्रीय भागों में उपलब्ध अजैव संसाधनों के अन्वेषण तथा दोहन को नियंत्रित करने के लिए की गई थी. गत वर्ष भारत इस प्राधिकरण की परिषद् का फिर से सदस्य चुना गया था. इसके अलावा इस निकाय के अधीनस्थ विधिक एवं तकनीकी आयोग तथा वित्तीय समिति में भारत के प्रतिनिधियों का चयन हुआ था.

पॉली-मेटैलिक नॉड्यूल्स (PMN)

  1. पॉली-मेटैलिक नॉड्यूल्स (जिन्हें मैंगनीज नॉड्यूल भी कहा जाता है) आलू के आकार के तथा प्रायः छिद्रयुक्त होते हैं. ये विश्व महासागरों में गहरे समुद्र तलों पर प्रचुर मात्रा में बिछे हुए पाए जाते हैं.
  2. अवगठन: पॉली-मेटैलिक नॉड्यूल्स में मैंगनीज और लोहे के अलावा, निकल, तांबा, कोबाल्ट, सीसा, मोलिब्डेनम, कैडमियम, वैनेडियम, टाइटेनियम पाए जाते है, जिनमें से निकल, कोबाल्ट और तांबा आर्थिक और सामरिक महत्त्व के माने जाते हैं.

Prelims Vishesh

MQ-9B Sea Guardian unarmed drones :-

  • हल ही में, अमेरिका से लीज पर लिए गए दो MQ-9सी-गार्जियन अनआर्म्ड ड्रोन को भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल किया गया है.
  • यह ड्रोन लगभग 40 घंटे से अधिक समय तक 40,000 फीट की अधिकतम ऊँचाई पर उड़ान भरने में सक्षम है.
  • इसमें 3600 समुद्रीय निगरानी रडार और एक वैकल्पिक मल्टीमोड समुद्रीय सतह खोज रडार सम्मिलित है.

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