Sansar डेली करंट अफेयर्स, 19 February 2020

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Sansar Daily Current Affairs, 19 February 2020


GS Paper 2 Source: PIB

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UPSC Syllabus : Welfare schemes for vulnerable sections of the population by the Centre and States and the performance of these schemes; mechanisms, laws, institutions and bodies constituted for the protection and betterment of these vulnerable sections

Topic : Apiary on Wheels

संदर्भ

पिछले दिनों सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय ने Apiary on Wheels(पहियों पर मधुमक्खी पालन) का उद्घाटन किया.

पिछले दिनों सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय ने “Apiary on Wheels” (पहियों पर मधुमक्खी पालन) का उद्घाटन किया.

Apiary on Wheels क्या है?

  • यह एक अनूठी अवधारणा है जिसका रूपांकन खादी एवं ग्राम उद्योग आयोग (Khadi and Village Industries Commission – KVIC) ने इस उद्देश्य से किया है कि मधुमक्खियों से भरे बक्सों की देखभाल आसानी से हो तथा उनको आसानी से इधर-उधर ले जाया जा सके.
  • यह एक मंच है जो बिना कठिनाई के 20 मधुमक्खी बक्सों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जा सकता है.
  • यह मंच किसी ट्रेक्टर अथवा ट्रॉली से सरलतापूर्वक जोड़ा जा सकता है और किसी समुचित गंतव्य तक खींच के पहुँचाया जा सकता है.

पृष्ठभूमि

KVIC ने 2017 में अपने मधु अभियान (Honey Mission) का अनावरण किया था तब से यह आयोग मधुमक्खी पालकों को प्रशिक्षण देता आया है और उन्हें मधुमक्खी के बक्से मुहैया करता आया है. इस प्रकार इस मिशन से गाँव के पढ़े-लिखे किन्तु आजीविकाहीन युवाओं को अपने दरवाजे पर ही मधुमक्खी पालन के माध्यम से अतिरिक्त आय कमाने में सहायता पहुँचाता है.

Apiary on Wheels का माहात्म्य

मधुमक्खी पालकों द्वारा झेली जा रही चुनौतियों का यह पूर्ण समाधान प्रस्तुत करता है. इसका रूपांकन इस प्रकार हुआ है जिससे मधुमक्खी के बक्सों को संधारित करने में और मधुमक्खी उपनिवेशों की देखभाल करने में लगने वाले श्रम और लागत में कमी आएगी.


GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Statutory, regulatory and various quasi-judicial bodies. Government policies and interventions for development in various sectors and issues arising out of their design and implementation.

Topic : All medical devices to be treated as ‘drugs’ from April 1

संदर्भ

अप्रैल 1 से सभी चिकित्सकीय उपकरण औषधि कहलायेंगे. इस आशय की अधिसूचना पिछले दिनों केन्द्रीय सरकार ने निर्गत की. इस प्रकार कई प्रकार के चिकित्सकीय उत्पाद औषधि की श्रेणी में आ गये हैं, जैसे – चिकित्सा उपकरण, शरीर के अन्दर डाले जाने वाले उपकरण और यहाँ तक कि मनुष्य या पशु के उपचार के लिए बनाया गया सॉफ्टवेयर भी. अब ये सभी औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम, 1940 के दायरे में आ जाएँगे. वर्तमान में केवल 37 चिकित्सा उपकरण ही औषधि के रूप में अधिसूचित हैं.

चिकित्सा उपकरण नियमावली में किये गये संशोधन और उनके निहितार्थ

केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2017 की चिकित्सा उपकरण नियमावली (Medical Devices Rules, 2017) में कुछ संशोधन किये थे जो निम्नलिखित हैं –

  1. विनियमन का दायरा बढ़ाकर सुरक्षा एवं कुशलता सुनिश्चित की गई.
  2. औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (Drugs Price Control Order – DPCO) के अधीन दामों के विनियमन का मार्ग प्रशस्त किया गया.
  3. प्रावधान किया गया कि जो कम्पनी नियमों का उल्लंघन करेगी उसको न्यायालय के द्वारा दण्डित किया जाएगा.
  4. चिकित्सा उपकरणों को बनाने, आयात करने और बेचने के लिए कम्पनियों को औषधि नियंत्रक से स्वीकृति लेनी पड़ेगी.
  5. चिकित्सा उपकरणों का केन्द्रीय लाइसेंसिंग प्राधिकरण के यहाँ पंजीकरण आवश्यक होगा. यह पंजीकरण केन्द्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (Central Drugs Standard Control Organisation – CDSCO) द्वारा स्थापित किसी चिन्हित ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से होगा. 18 महीने तक यह पंजीकरण स्वैच्छिक रहेगा, परन्तु उसके बाद यह अनिवार्य हो जाएगा.
  6. चिकित्सा उपकरणों के निर्माता को उनके बारे में सूचनाएँ पंजीकरण हेतु CDSCO द्वारा स्थापित ऑनलाइन चिकित्सा उपकरण प्रणाली (Online System for Medical Devices) पर अपलोड करना होगा. आयातकों को भी यह काम करना होगा.

GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Effect of policies and politics of developed and developing countries on India’s interests, Indian diaspora.

Topic : USTR takes India off developing country list

संदर्भ

संयुक्त राज्य व्यापार प्रतिनिधि (United States Trade Representative USTR) कार्यालय ने एक सूचना प्रकाशित की है जिसमें उन सूचियों में संशोधन किया गया है जिनमें वैसे विकासशील एवं कम विकसित देशों के नाम हैं जो काउंटरवेलिंग ड्यूटीज (countervailing duties – CVDs) से सम्बंधित जाँच-पड़ताल के सन्दर्भ में बेहतर व्यवहार के लिए योग्य माने जाते हैं.

इन नई सूचियों में 36 विकासशील देशों और 44 कम विकसित देशों के नाम हैं.

भारत के लिए चिंता का कारण

  • फ़रवरी 10, 2020 तक भारत विकासशील देशों की सूची में था और इसलिए वह अधिक शिथिल मानकों के लिए अर्हता रखता था. अब भारत को इस सूची हटा दिया गया है.
  • इस प्रकार वह ऐसे देशों की श्रेणी में आ गया है जिन्हें CVD जाँच-पड़ताल के विरुद्ध निम्न-स्तर की सुरक्षा उपलब्ध होती है.
  • इस कदम से अमेरिका को भारत से आने वाली वस्तुओं पर CVD लगाना सरल हो जाएगा.
  • अमेरिका से भारत व्यापार वार्ता करने जा रहा है जिसमें वह चेष्टा करने वाला था कि उसे सामान्यीकृत प्राथमिकता प्रणाली (Generalised System of Preference – GSP) के तहत विशेष लाभ उपलब्ध हो. परन्तु ये लाभ मात्र उन्हीं देशों को मिलता है जो विकासशील हैं.

वर्गीकरण का आधार

अमेरिकी कानून को विश्व व्यापार संगठन (WTO) तथा सब्सिडी एंड काउंटरवेलिंग मेजर्स (Subsidies and Countervailing Measures – SCM) समझौते से तालमेल बैठाने के लिए USTR ने 1998 में विकास के स्तर के अनुसार देशों को वर्गीकृत करते हुए सूचियाँ निकाली थीं.

  • इन सूचियों का उपयोग यह निश्चय करने के लिए किया जाता है कि कोई देश अमेरिका द्वारा काउंटरवेलिंग ड्यूटीज लगाये जाने योग्य है अथवा नहीं.
  • विकासशील और कम विकसित देशों के लिए उपेक्षणीय मानक (de minimis) तथा आयात मात्रा छूट (import volume allowance) अपेक्षाकृत शिथिल हैं.
  • उपेक्षणीय मानक उस सब्सिडी को कहते हैं जो मूल्य के अनुसार 1% अथवा कम होती है और कभी-कभी विशेष मामलों में 2% तक जाती है.
  • USTR की नई सूचना के अनुसार, अब 1998 का नियम समाप्त हो चुका है.

उपेक्षणीय आयात मात्रा (negligible import volumes) किसको कहते हैं?

  1. यदि किसी देश से अमेरिका में आने वाली वस्तुओं की मात्रा अमेरिका के अन्दर आने वाले समूर्ण आयात का 3% से कम होता है तो अमेरिका इसे उपेक्षणीय आयात मात्रा कहता है. विशेष मामलों में यह प्रतिशत 4% होता है.
  2. यदि अलग-अलग आयात मात्राएँ 3% (विशेष मामले में 4%) से कम होती हैं परन्तु आयात की सम्पूर्ण मात्रा 7% होती है तो ऐसे देश के आयात को उपेक्षणीय आयात मात्रा वाले देश के अन्दर रखा जाता है.

De Minimis मानक के लिए निर्धारित मापदंड

कोई देश 2% de minimis मानक के लिए अर्हता रखता है यह निश्चय करने के लिए USTR निम्नलिखित मापदंड अपनाता है –

  1. प्रति व्यक्ति कुल राष्ट्रीय आय अथवा GNI
  2. विश्व व्यापार में हिस्सा
  3. कुछ अन्य कारक, जैसे – OECD की सदस्यता अथवा OECD की सदस्यता के लिए आवेदन अथवा यूरोपीय संघ की सदस्यता तथा G20 की सदस्यता.

सूची से भारत को क्यों निकला गया?

केवल भारत ही नहीं कुछ अन्य देश भी विकसित देशों की सूची से बाहर हो गये हैं, जैसे – ब्राजील, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड और वियतनाम. ऐसा इसलिए किया गया कि इन सब देशों का वैश्विक व्यापार में कम से कम 0.5% है जबकि उच्च आय वाले देशों को अन्य देशों से अलग करने वाली विश्व बैंक थ्रेसहोल्ड अर्थात् $12,357 GNI से कम है.

भारत को इस सूची से इसलिए निकाला गया क्योंकि यह G20 के अन्दर आता है जिसमें आने वाले अन्य देश अर्जेंटीना, ब्राजील, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका हैं. G20 का विश्व-भर में बड़ा आर्थिक महत्त्व है.

G20 के सदस्यों का सामूहिक आर्थिक भार बहुत उल्लेखनीय है क्योंकि विश्व-भर के आर्थिक उत्पादन और वाणिज्य का एक बहुत बड़ा भाग G20 के देशों के पास है. कहने का तात्पर्य यह है कि G20 की सदस्यता ही दर्शा देती  है कि इसमें शामिल सभी देश विकसित देश ही हैं.


GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Important International institutions, agencies and fora, their structure, mandate.

Topic : How WHO names a new disease?

संदर्भ

फरवरी 11, 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नए कोरोना वायरस से उत्पन्न होने वाले रोग का नाम आधिकारिक रूप से COVID-19 रख दिया है.

स्मरण रहे कि 40 दिन पहले चीन ने WHO को बताया था कि उसके हुबेई प्रांत के वुहान नगर में निमोनिया जैसा एक रोग फैला हुआ है.

COVID-19 नाम का विश्लेषण

COVID में “CO” का तात्पर्य कोरोना से है जबकि “VI” का अर्थ है वायरस और “D” का आशय disease अथवा रोग से है. इस नाम में 19 इसलिए जोड़ा गया है क्योंकि 2019 में ही इसका पता चला.

WHO के द्वारा रोगों के नामकरण से सम्बंधित दिशानिर्देश

  • 2015 के मई महीने में WHO ने किसी नए रोग के नामकरण के लिए दिशानिर्देश प्रकाशित किये थे.
  • WHO ने विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (World Organisation for Animal Health – OIE) तथा संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (Food and Agriculture Organization of the United Nations – FAO) के परामर्श एवं सहयोग से नामकरण की एक पद्धति निकाली है.
  • इस पद्धति का उद्देश्य ऐसे नाम निश्चित करना है जिनका कोई अनावश्यक नकारात्मक प्रभाव व्यापार, पर्यटन, यात्रा अथवा पशु कल्याण पर नहीं पड़े और साथ ही किसी सांस्कृतिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, प्रादेशिक, व्यावसायिक अथवा जाति समूह को आघात नहीं पहुँचे. दिए गये दिशा निर्देश के अनुसार, किसी नए रोग के नाम में एक से अधिक शब्दों का मिश्रण होना चाहिए.
  • इन शब्दों से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि नए रोग के लक्षण क्या हैं और वो शरीर के किस अंग से सम्बंधित हैं. उदाहरण के लिए कोई रोग स्वास रोग से सम्बंधित हो सकता है, उसमें अतिसार का लक्षण हो सकता है अथवा वह हृदय आदि अंगों से सम्बंधित हो सकता है. नए नाम में इन सब का संकेत होना चाहिए.
  • नए रोग के नाम में ऐसे वर्णनात्मक शब्द होने चाहिएँ जिनसे पता चले कि यह रोग किसे और किस ऋतु तथा कितनी भीषणता से होता है. उदहारणार्थ यह रोग बच्चों को होता है या किशोरों को अथवा माँ को होता है; गर्मी में होता है या जाड़े में होता है तथा यह हल्के ढंग से होता है या इसका प्रकोप भीषण होता है.
  • नए नाम में कुछ अन्य तत्त्व भी हो सकते हैं, जैसे – पर्यावरण (समुद्र, नदी), रोगजनक वायरस (कोरना वायरस) तथा वह वर्ष जिसमें नए रोग की पहचान पहली बार हुई हो. महीने का भी उल्लेख हो सकता है पर यह आवश्यक नहीं है.
  • नए नाम में वर्ष इसलिए डाला जाता है कि अलग-अलग वर्षों में हुए समान प्रकोप की पहचान सरलता से हो सके.
  • अपने दिशानिर्देश में WHO ने कुछ ऐसे शब्द भी बताये हैं जिनका प्रयोग नए नाम में करने से बचना चाहिए. ये शब्द जिन विषयों से सम्बंधित हैं, वे हैं – भौगोलिक स्थिति, लोगों के नाम, पशु अथवा भोजन की प्रजाति, संस्कृति, जनसंख्या, उद्योग अथवा व्यवसाय तथा ऐसे शब्द जिनसे अकारण भय उत्पन्न हो.

दिशानिर्देश के पहले रखे हुए कुछ आपवादिक नाम

  • कुछ रोगों के नाम भौगोलिक स्थिति अर्थात् नगरों, देशों और प्रदेशों पर रखे जा चुके हैं, जैसे – जिका (युगांडा का एक जंगल).
  • कुछ रोगों के नाम में उस व्यक्ति का नाम जोड़ा हुआ है जिसने उस रोग का सबसे पहले पता लगाया. उदाहरण के लिए “चागस” रोग का नाम उसे 1909 में पता लगाने वाले ब्राजीली चिकित्सक कार्लोस चागस के नाम पर पड़ा है.
  • कुछ रोगों के नाम पशुओं भी पड़ चुके हैं, उदाहरण के लिए – बर्ड फ्लू (H5N1) और स्वाइन फ्लू (H1N1).

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