Sansar डेली करंट अफेयर्स, 18 February 2019

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Sansar Daily Current Affairs, 18 February 2019


GS Paper 1 Source: The Hindu

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Topic : Scientists discover massive mountains under Earth’s crust

संदर्भ

वैज्ञानिकों ने हाल ही में यह पता लगाया है कि पृथ्वी के मेंटल में विशाल पहाड़ विद्यमान हैं. इस खोज से पृथ्वी की रचना के विषय में हमारी समझ में एक बड़ा अंतर आ सकता है.

यह खोज क्या है?

  • वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि ये पहाड़ पृथ्वी के मेंटल के ऊपरी और निचली परत के बीच में स्थित हैं. इसके लिए वैज्ञानिकों ने बोलीविया में हुए भीषण भूकंप से मिले आँकड़ों का प्रयोग किया. इससे यह जानकारी हुई कि ये पहाड़ 660 किमी. नीचे हैं और उस स्थान पर हैं जो ऊपरी और निचली मेंटल के बीच में स्थित हैं.
  • 0 स्केल अथवा उससे ऊपर के स्केल वाले भूकम्प सभी दिशाओं में तरंग भेजते हैं जो पृथ्वी के मर्मस्थल (core) से होते हुए दूसरी तरफ दौड़ जाते हैं और फिर वापस आते हैं.
  • जिस परत में विशाल पहाड़ मिले हैं उस परत का कोई औपचारिक नाम नहीं है. इसलिए, शोधकर्ताओं ने इस परत को “660 किमी. सीमा (the 660-km boundary)” का नाम दिया है.

निहितार्थ

660 किमी. सीमा के पास पहाड़ों के अस्तित्व का ज्ञान होने से यह समझने में बहुत सहायता मिलेगी कि पृथ्वी कैसी बनी और कैसे इसका विकास हुआ.

भूकंप तरंगे क्या हैं?

भूकंपीय तरंगें मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती हैं (three types of seismic waves), जिन्हें P, S एवं L तरंगों के नाम से जाना जाता है.

i) P तरंगें: ये प्राथमिक तरंगें (Primary or Preliminary Waves) हैं. इनका संचरण ध्वनि तरंगों के समान होता है, अर्थात् इनमें अणुओं का कम्पन तरंगों की दिशा में आगे एवं पीछे की ओर होता है. अतः इन्हें अनुल्म्ब तरंगें (Longitudinal Waves) या संपीडन तरंगें (Compression Waves) भी कहा जाता है. ये तरंगें ध्वनि तरंगों के ही समान ठोस, तरल एवं गैसीय माध्यमों से होकर गुजर सकती हैं.यह सर्वाधिक तीव्र गति से चलने वाली तरंगें हैं, अतः सिस्मोग्राफ पर सर्वप्रथम P उसके बाद S एवं अंत में L तरंगें अंकित होती हैं. P तरंगों की गति ठोस पदार्थों में सबसे अधिक होती है.

ii) S तरंगें: ये अनुप्रस्थ तरंगें (Transverse or Shear waves) हैं. ये तरंगें धरातल पर P तरंगों के पश्चात् प्रकट होती हैं. अतः इन्हें द्वितीयक या गौण तरंगें (Secondary Waves) भी कहा जाता है.

iii) L तरंगें: ये तरंगें लम्बी अवधि वाली तरंगें (Long Waves) हैं. इनका संचरण केवल धरातलीय भाग में ही होता है, अतः इन्हें धरातलीय तरंगे भी कहते हैं, अतः ये तरंगें सर्वाधिक विनाशकारी होती है. इनका वेग 1.5-3 किमी/प्रति सेकंड होता है. L तरंगें आड़े-तिरछे (Zig Zag) घक्का देती हैं.


GS Paper 2 Source: The Hindu

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Topic : Finance Commission of India

संदर्भ

15वाँ केन्द्रीय वित्त आयोग हैदराबाद पहुँच रहा है. पंचायत राज्य संस्थाओं शहरी स्थानीय निकायों के जनप्रतिनिधि इस अवसर का लाभ उठाते हुए आयोग के समक्ष यह माँग रखने जा रहे हैं कि उन्हें दिए जाने वाले कोष की राशि बढ़ाई जाए. उनके अनुसार यह इसलिए भी आवश्यक हो गया है कि 14वें वित्त आयोग तक उन्हें जिला और मंडल परिषदों के लिए निर्धारित कोष सीधे मिला करता था और अब उस राशि को ग्राम पंचायतों को दिया जा रहा है.

वित्त आयोग

वित्त आयोग (Finance Commission) को 22 नवम्बर, 1951 में संविधान के अनुच्छेद 280 के अनुसार, राष्ट्रपति द्वारा पहली बार संविधान लागू होने के दो वर्ष के भीतर गठित किया गया. इस आयोग के प्रथम अध्यक्ष के.सी. नियोगी थे. प्रत्येक पाँच वर्ष की समाप्ति पर या उससे पहले ऐसे समय, जिसे राष्ट्रपति आवश्यक समझे, एक वित्त आयोग को गठित करता है. राष्ट्रपति द्वारा गठित इस आयोग में एक अध्यक्ष (chairman) और चार अन्य सदस्य (members) होते हैं.

अध्यक्ष और अन्य सदस्य की योग्यता

  • इसका अध्यक्ष ऐसा व्यक्ति चुना जाता है जो सार्वजनिक कार्यों में व्यापक अनुभव वाला होता है. वित्त आयोग 2017 के अध्यक्ष योजना आयोग के पूर्व सदस्य थे.
  • शेष चार सदस्यों में एक उच्च न्यायालाय का न्यायाधीश या किसी प्रकार का योग्यताधारी होता है.
  • दूसरा सदस्य सरकार के वित्त और लेखाओं का विशेष ज्ञानी होता है.
  • तीसरा सदस्य वित्तीय विषयों और प्रशासन के बारे में व्यापक अनुभव वाला होता है.
  • चौथा सदस्य अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञानी होता है.

वित्त आयोग के कार्य

आयोग का यह कर्तव्य है कि वह निम्न विषयों पर राष्ट्रपति को सिफारिश करता है –

  • आय कर और अन्य करों से प्राप्त राशि का केंद्र और राज्य सरकारों के बीच किस अनुपात में बँटवारा किया जाये.
  • “भारत के संचित कोष” से राज्यों के राजस्व में सहायता देने के क्या सिद्धांत हों.
  • सुदृढ़ वित्त के हित में राष्ट्रपति द्वारा आयोग को सौंपे गए अन्य विषय के बारे में आयोग राष्ट्रपति को सिफारिश करता है.

राष्ट्रपति वित्त आयोग की संस्तुतियों को संसद के समक्ष रखता है. अनुच्छेद –280, अनुच्छेद -270, 273, 275 भी इसकी पुष्टि करते हैं. संविधान के अनुच्छेद 280 के मुताबिक़ वित्त आयोग जिन मुद्दों पर राष्ट्रपति को परामर्श देता है, उनमें टैक्स से कुल प्राप्तियों का केंद्र और राज्यों में बँटवारा, भारत की संचित निधि से राज्य सरकार को दी जाने वाली सहायता/अनुदान के सम्बन्ध में सिफारिशें शामिल होती हैं.

पिछले वर्षों में राज्य सरकारें निरंतर यह कहती रहीं हैं कि केंद्र सरकार द्वारा उन्हें अधिक वित्तीय साधन प्रदान किये जाने चाहिए. सरकार ने इन सिफारिशों को स्वीकार करते हुए राज्यों को दिए जाने वाले अनुदानों में निरंतर वृद्धि की है.

केंद्र और राज्य सम्बन्ध

  • संविधान के अनुच्छेद 275 (1) के तहत संसद कानून के जरिये जरुरत पड़ने पर राज्यों को अनुदान के तौर पर पैसा दे सकती है.
  • यह अनुदान कितना होगा ये वित्त आयोग के सिफारिशों के बाद तय होगा.
  • इसके अलावा अनुच्छेद 282 के तहत केंद्र और राज्य दोनों किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अनुदान दे सकते हैं. लेकिन इसे वित्त आयोग के निर्णय क्षेत्र से बाहर रखा गया है.

मुख्य तथ्य

  • 1951 में वित्त आयोग का गठन हुआ.
  • अनुच्छेद 280 के तहत गठन.
  • इस अनुच्छेद के अनुसार राष्ट्रपति संविधान के प्रारम्भ से दो वर्ष के भीतर एक वित्त आयोग का गठन करेगा और उसके बाद प्रत्येक पाँचवे वर्ष की समाप्ति या उससे पहले…जिसे भी राष्ट्रपति द्वारा आवश्यक समझा जायेगा.
  • वित्त आयोग में एक अध्यक्ष और 4 अन्य सदस्यों को शामिल किया जाएगा जिसे राष्ट्रपति नियुक्त करेगा.
  • अध्यक्ष और सदस्य को दुबारा नियुक्त किया जा सकता है.
  • अध्यक्ष वह बनाया जायेगा जिसके पास सार्वजनिक मामलों का अनुभव हो.
  • जबकि अन्य सदस्यों में एक उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या उसकी योग्यता रखने वाला कोई व्यक्ति होना चाहिए.
  • दूसरा व्यक्ति वित्त और लेखों की विशेष जानकारी रखता हो.
  • तीसरा सदस्य वित्तीय मामलों और प्रबंधन का जानकार हो.
  • चौथा सदस्य अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञान रखने वाला हो.
  • संसद कानून बनाकर आयोग के सदस्यों की नियुक्ति और उनकी योग्यता निर्धारित करेगी.

GS Paper 2 Source: PIB

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Topic : National Commission for Scheduled Tribes (NCST)

संदर्भ

उपराष्‍ट्रपति 19 फरवरी 2019 को राष्‍ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) के 15वें स्‍थापना दिवस को मनाने जा रहे हैं.

एनसीएसटी नेतृत्‍व पुरस्‍कार

इस अवसर पर राष्‍ट्रीय अनुसूचित जनजातीय आयोग ने भी एक ‘एनसीएसटी नेतृत्‍व पुरस्‍कार’ नामक एक राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार का गठन करने का फैसला किया है,‍ जिसे देश में अनुसूचित जनजातियों की दिशा में उल्‍लेखनीय एवं अनुकरणीय सेवा के लिए प्रदान किया जाएगा.यह पुरस्‍कार तीन श्रेणी में दिए जाएंगे –

  • शैक्षणिक संस्‍थान/विश्‍वविद्यालय
  • सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम/बैंक और
  • किसी व्‍यक्ति विशेष, एनजीओ या सिविल सोसायटी द्वारा प्रदान की जाने वाली सार्वजनिक सेवा.

अनुसूचित जनजाति आयोग क्या है?

  • NCST की स्थापना संविधान (89वाँ संशोधन) अधिनियम, 2003 के आलोक में की गई है.
  • विदित हो कि इस संशोधन के द्वारा संविधान में एक नई उपधारा338A जोड़ी गई थी.
  • इस संशोधन के द्वारा राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग को दो भागो में बाँटकर अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए दो अलग-अलग आयोग बना दिया गया था – (i) the National Commission for Scheduled Castes (NCSC), एवं (ii) the National Commission for Scheduled Tribes (NCST).
  • अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल उनकी योगदान की तिथि सेतीन वर्ष तक के लिए होता है.
  • आयोग के अध्यक्ष को केन्द्रीय कैबिनेट मंत्री का दर्जा, उपाध्यक्ष को राज्य मंत्री का दर्जा एवं सदस्यों को भारत सरकार के सचिव का दर्जा प्राप्त होता है.
  • NCST के पास संविधान एवं विभिन्न कानूनों द्वारा अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा के लिए किये गये प्रावधानों से सम्बंधित शिकायतों की जाँच करने और निगरानी करने का अधिकार होता है.
  • आयोग अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा के लिए आवश्यक प्रावधान करने तथा इस दिशा में हुई प्रगति का मूल्यांकन करने के विषय में केंद्र और राज्य सरकारों को परामर्श भी देता है.
  • इस विषय में अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) हर वर्ष राष्ट्रपति के समक्ष प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है.

GS Paper 2 Source: The Hindu

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Topic : Azov sea

संदर्भ

यूरोपीय संघ ने रूस के आठ नागरिकों को प्रतिबंधित कर दिया है क्योंकि संघ के अनुसार ये लोग विगत नवम्बर में अजोव समुद्र में होने वाली घटनाओं के लिए उत्तरदायी थे. विदित हो कि यूक्रेन और रूस में अजोव समुद्र को लेकर हाल ही में उस समय झगड़ा हो गया जब रूस की सेनाओं ने यूक्रेन के 3 जहाज़ों औउर 24 नाविकों को इसलिए गिरफ्तार कर लिया था कि  वे लोग ब्लैक सी से होकर अजोव सागर में घुसने जा रहे थे.

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इतिहास

यूक्रेन और रूस दोनों एक दूसरे पर यह आरोप लगाते हैं कि वे अजोव सागर में अंतर्राष्ट्रीय सामुद्रिक कानून का उल्लंघन कर रहे हैं. दोनों देश 1982 की एक संयुक्त राष्ट्र संधि (UN Convention on the Law of the Sea) का हवाला देते हैं जिस पर इन दोनों देशों ने 1990 के दशक में हस्ताक्षर किये थे.

यूक्रेन कहता है कि इस संधि के अनुसार उसे कर्च जलडमरूमध्य (Kerch Strait) और अजोव सागर में आवाजाही की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए. इन दोनों देशों के बीच कर्च जलडमरूमध्य और अजोव सागर के स्वतंत्र उपयोग के विषय में एक द्विपक्षीय समझौता भी है जिसपर रूस ने कभी भी आपत्ति नहीं जतलाई है.

कर्च जलडमरूमध्य की महत्ता

कर्च जलडमरूमध्य कृष्ण सागर (Black Sea) और अजोव सागर के बीच एकमात्र सम्पर्कसूत्र है. मात्र इसी से होकर यूक्रेन के दो बड़े बंदरगाहों – Mariupol और Berdiansk – तक पहुँचा जा सका है. 2014 में रूस ने क्रीमिया पर कब्ज़ा कर लिया था और तब से वह कर्च जलडमरूमध्य पर नियंत्रण रखे हुए है जिसके कारण यूक्रेन के जहाजों को भयंकर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

अजोव सागर की महत्ता

यह सागर पूर्वी यूरोप में स्थित है. यह इसके दक्षिण में स्थित लगभग 4 किलोमीटर संकरे कर्च जलडमरूमध्य से कृष्ण सागर से जुड़ा हुआ है. इसीलिए इसे कभी-कभी कृष्ण सागर का उत्तरमुखी विस्तार भी कहा जाता है.

  • अजोव सागर के उत्तर और पश्चिम में यूक्रेन है और पूर्व में रूस.
  • दोन (Don) और कूबन (Kuban) वे दो बड़ी नदियाँ हैं जो इसमें आकर गिरती हैं.
  • अजोव सागर की गहराई 9 और 14 मीटर के बीच है. अतः यह विश्व का सबसे छिछला सागर (shallowest sea) है.

GS Paper 2 Source: The Hindu

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Topic : International Court of Justice

संदर्भ

कुलभूषण जाधव के मामले की सुनवाई अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के द्वारा हेग में आरम्भ की जा चुकी है. ज्ञातव्य है कि पाकिस्तान ने जाधव को जासूसी के लिए मृत्युदंड सुना रखा है जबकि भारत का कहना है कि जाधव कोई  जासूस नहीं था. भारत ने उसे दी गई सजा के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में अपील की है.

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice) का मुख्यालय हॉलैंड शहर के  हेग में स्थित है. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में वैधानिक विवादों के समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की स्थापना की गई है. अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का निर्णय परामर्श माना जाता है एवं इसके द्वारा दिए गये निर्णय को बाध्यकारी रूप से लागू करने की शक्ति सुरक्षा परिषद् के पास है. अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के द्वारा राज्यों के बीच उप्तन्न विवादों को सुलझाया जाता है, जैसे – सीमा विवाद, जल विवाद आदि. इसके अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र संघ की विभिन्न एजेंसियाँ अंतर्राष्ट्रीय विवाद के मुद्दों पर इससे परामर्श ले सकती हैं.

न्यायालय की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है. किसी एक राज्य के एक से अधिक नागरिक एक साथ न्यायाधीश नहीं हो सकते. अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में 15 न्यायाधीश होते हैं जिनका कार्यकाल 9 वर्षों का होता है. ये 15 न्यायाधीश निम्नलिखित क्षेत्रों से चुने जाते हैं –

  • अफ्रीका से तीन.
  • लैटिन अमेरिका और कैरीबियाई देशों से दो.
  • एशिया से तीन.
  • पश्चिमी यूरोप और अन्य देशों में से पाँच.
  • पूर्वी यूरोप से दो.

न्यायाधीशों को प्राप्त स्वतंत्रता

  • एक बार यदि कोई व्यक्ति अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के लिए सदस्य चुन लिया जाता है तो वह किसी भी देश का प्रतिनिधि नहीं रह जाता है.
  • न्यायालय के सदस्य स्वतंत्र न्यायाधीश होते हैं जिनका पहला काम खुले दरबार में यह शपथ लेना होता है कि वे अपनी शक्तियों का प्रयोग निष्पक्ष रूप से और विवेक के साथ करेंगे.
  • न्यायाधीशों की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाने के लिए यह व्यवस्था है कि उन्हें तब तक नहीं हटाया जा सकता जब तक कि अन्य सदस्य इस बात पर सर्वसहमति से एक हों कि वे आवश्यक सेवा-शर्तों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं. वस्तुतः ऐसी स्थिति आज तक कभी आई नहीं है.

GS Paper 2 Source: PIB

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Topic : Deendayal Disabled Rehabilitation Scheme

संदर्भ

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने 18 फरवरी, 2019 को कोलकाता में दीनदयाल दिव्‍यांगजन पुनर्वास योजना (डीडीआरएस) पर क्षेत्रीय सम्‍मेलन आयोजित किया.

दीनदयाल दिव्‍यांगजन पुनर्वास योजना

  • योजना का लक्ष्य ऐसा परिवेश बनाना है जिससे कि दिव्यांगजनों को समान अवसर, समानता, सामाजिक न्याय एवं सशक्तता मिल सके.
  • स्वैच्छिक कार्य को बढ़ावा देना जिससे कि दिव्यांग जन अधिनियम, 1995 का कारगर क्रियान्वयन हो सके.
  • यह पूर्व एवं पूर्वोत्‍तर क्षेत्र के 13 राज्‍यों – पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, छत्‍तीसगढ़, बिहार, असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम एवं त्रिपुरा – को कवर करेगा.
  • इसमें हितधारकों अर्थात् डीडीआरएस के तहत अनुदान प्राप्‍त करने वाले गैर सरकारी संगठनों, राज्‍य सरकार के अधिकारियों और जिला-स्‍तर अधिकारियों की भागीदारी होगी.
  • इस योजना के अंतर्गत प्रत्‍येक वर्ष 600 से अधिक एनजीओ को दिव्‍यांगजनों के पुनर्वास के लिए विशेष विद्यालय, पूर्व विद्यालय एवं आरंभिक उपाय, हाफवे होम्‍स एवं समुदाय आधारित पुनर्वास जैसी उनकी परियोजनाओं के परिचालन के लिए वित्‍तीय सहायता उपल‍ब्‍ध कराई जाती है.

क्षेत्रीय सम्मलेन के उद्देश्य

  • सम्‍मेलन का उद्देश्‍य संशोधित योजना के प्रावधानों को प्रसारित करना तथा विभिन्‍न हितधारकों को इसके बारे में संवेदनशील बनाना है.
  • यह सम्‍मेलन सभी हितधारकों के बीच परस्‍पर संपर्क के लिए एक अनूठा अवसर भी उपलब्‍ध कराता है.
  • यह सम्‍मेलन योजना स्‍कीम की प्रभावोत्‍पादकता के पहलुओं पर अंत: क्षेत्रीय विचारों का आदान-प्रदान एवं इसमें सुधार लाने की संभावनाएं सुनिश्चित करेगा.

GS Paper 3 Source: The Hindu

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Topic : Policy bias against rainfed agriculture

संदर्भ

रिवाइटलाइजिंग रेनफेड एग्रीकल्चर नेटवर्क (RRA) नामक संस्था ने हाल ही में वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों का एक नया मानचित्र प्रकाशित किया है.

इस एटलस में न केवल वर्षा पर आधारित खेती वाले क्षेत्रों की कृषि-जैव विविधता, अपितु सामाजिक-आर्थिक दशाओं का भी वर्णन है. यह एटलस यह बताने का प्रयास करता है कि नीतिगत पक्षपात के कारण इनमें से कई क्षेत्रों में खेती करना क्यों लाभप्रद नहीं सिद्ध हो रहा है.

वर्तमान चुनौतियाँ

  • भारत के पाँच किसानों में से तीन सिंचाई से नहीं, अपितु वर्षा के पानी से फसलें उपजाते हैं. पर सरकार का प्रति हेक्टेयर निवेश इन भूमियों में सिंचाई भूमियों की तुलना में 20 गुना कम है. सरकार जो फसलें खरीदती है वह मुख्य रूप से बड़े-बड़े सिंचित भूमियों से आती हैं. सरकार की मूर्धन्य कृषि योजनाएँ अधिकांशतः ऐसे बनाई गई हैं जिससे वर्षा पर निर्भर खेतों को कोई लाभ नहीं पहुँचता.
  • वर्षा-आधारित क्षेत्रों के प्रति “लापरवाही” हुई है जो इन क्षेत्रों में किसानों के लिए कम आय का कारण बन रहा है. वर्षा पर निर्भर किसान खेती से जो आय पाते हैं वह सिंचित खेतों के किसानों के आय की तुलना में 40% कम है.
  • बड़े बांधों और नहर नेटवर्क के माध्यम से सिंचित भूमि को प्रति हेक्टेयर 5 लाख का निवेश मिलता है. वर्षा आधारित भूमि में वाटरशेड प्रबंधन का खर्च केवल 18,000-25,000 है.
  • उपज का अंतर निवेश के अंतर के अनुपात में नहीं है. जब खरीद की बात आती है, तो 2001-02 और 2011-12 के बीच के दशक में सरकार ने गेहूं और चावल पर 5.4 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. दूसरी ओर वर्षा-निर्भर क्षेत्रों में उगाये जाने वाले मोटे अनाजों की उसी अवधि में जो खरीद हुई वह मात्र 3,200 करोड़ रु. थी.
  • फ्लैगशिप सरकारी योजनाएं, जैसे कि बीज और उर्वरक सब्सिडी और मृदा स्वास्थ्य कार्ड, सिंचित क्षेत्रों के लिए डिज़ाइन किए गए हैं. वर्षा-निर्भर किसानों के लिए इन योजनाओं को विस्तारित तो किया गया है परन्तु उनकी आवश्यकताओं को ध्यान में रखे बिना.

क्या किया जाना चाहिए?

  • वर्षा-निर्भर किसानों तक सिंचित भूमि के किसानों के समान शोध एवं तकनीक पहुँचाने और उत्पादन में सहयोग करने के विषय में सरकार को एक अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए.
  • सच पूछा जाए तो बहुत अधिक खरीद से अच्छा यह होगा कि दीर्घकाल में वर्षा पर निर्भर रहने वाले किसानों को नकद उत्प्रेरण और आय समर्थन, जैसे – PM किसान योजना का लाभ दिया जाए.

Prelims Vishesh

EXERCISE VAYU SHAKTI-2019 :

हाल ही में भारतीय वायुसेना ने राजस्थान में “वायु शक्ति 2019” नामक अभ्यास किया जिसमें भारतीय वायुसेना की जमीनी ठिकानों पर लक्ष्य भेदने की शक्ति आदि का प्रदर्शन किया गया.

Blackbuck :-

  • ब्लैकबक अर्थात् काला मृग भारत का अपना देसी मृग है जो नेपाल और पाकिस्तान में भी पाया जाता है.
  • इस मृग की मादाओं के सिंग नहीं होते.
  • कहते हैं कि चीता के बाद यही वह जानवर है जो सबसे तेज दौड़ता है.
  • यह IUCN की लाल सूची में “सबसे कम चिंताजनक श्रेणी” (Least Concern) में रखा गया है.

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